بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔


हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शान में गुस्ताखी नाकाबिले बर्दाश्त
हिन्दु महासभा के लीडर के जरिया सैयदुल बशर व नबियों के सरदार हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के खिलाफ गुस्ताखाना कलेमात कहे जाने पर उसको जुर्म के कठहरे में खड़ा करके उसके खिलाफ कार्यवाही की जानी चाहिए, क्योंकि मुसलमान हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शान में गुस्ताखी को बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं और इस तरह के वाकयात से मुल्क में अमन व अमान के बजाये अफरातफरी, अदमे रवादारी और अदमे तहम्मुल में इजाफा होगा, जिससे मुल्क में तरक्की के बजाये अदमे इस्तिहकाम पैदा होगा, लोगों में नफरत और अदावत पैदा होगी।
पूरी दुनिया के अरबाब इल्म व दानिश का मौकिफ है कि किसी शख्स की तौहीन व तहकीर का राय की आजादी से कोई तअल्लुक नहीं है, क्योंकि तकरीबन हर मुल्क में शहरियों को यह हक हासिल है कि वह अपनी हितक इज्जत की सूरत में अदालत से रुजू करें और हितक इज्जत करने वालों को कानून के मुताबिक सजा दिलवायें। सवाल यह है कि किसी शख्स की हितक इज्जत करने वाले को कानूनन मुजरिम तसलीम किया जाता है, तो मजाहिब के पेशवाओं और खास तौर पर अंबिया-ए-कराम के लिए यह हक क्यों तसलीम नहीं किया जा रहा है और मजहबी रहनुमाओं की तौहीन व तहकीर को राय की आजादी कह कर जराएम की फेहरिस्त से निकाल कर हूकूक की फेहरिस्त में कैसे शामिल किया जा रहा है? यह आजादी राय नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ इस्लाम मुखालिफ तंजीमों और हुकूमतों की इंतिहा पसंदी और फिक्री दहशतग्रदी है। इस्लाम ने हमेशा दुनिया में अमन व सलामती कायम करने की ही दावत दी है। जिसकी जिन्दा मिसाल हिन्दुस्तान के अहवाल हैं कि मुख्तलिफ हिन्दु तंजीमें मुल्क के अमन व अमान को नेस्त व नाबूद करने पर तुली हैं मगर मुसलमान अपने जज्बात पर काबू रख कर यही कोशिश कर रहा है कि मुल्क में चैन और सुकून बाकी रहे।
पूरी उम्मते मुस्लिमा मुत्तफिक है और दूसरे मजाहिब भी इसकी तायीद करते हैं कि हजरात अम्बिया-ए-कराम की तौहीन व तहकीर संगीन तरीन जुर्म है। इसलिए कि इसमें मजहबी पेशवाओं की तौहीन के साथ साथ उनके करोड़ों पैरूकारों के मजहबी जज्बात को मजरूह करने और अमन व अमान को खतरे में डालने के जराएम भी शामिल हो जाते हैं जिससे इस जुर्म की संगीनी में बेपनाह इजाफा हो जाता है। कुरान व सुन्नत और दूसरे मजाहिब में इसकी सजा मौत ही बयान की गई है क्योंकि इससे कम सजा में न हजरात अम्बिया-ए-कराम के इहतिराम के तकाजे पूरे होते हैं और न ही उनके करोड़ों पैरूकारों के मजहबी जज्बात की जायज हद तक तसकीन हो पाती है।
हाँ! यह बात मुसल्लम है कि मौत की सजा देने की आथोरिटी सिर्फ हूकूमत वक्त को ही हासिल है क्योंकि आम आदमी के कानून को हाथ में लेने से मुआशरा में लाकानूनियत और अफरातफरी को ही फरोग मिलेगा। लिहाजा हूकूमत वक्त की जिम्मेदारी है कि तौहीन व तहकीर के अमल को संगीन जुर्म करार देकर मुजरिमों के खिलाफ जरूरी कार्यवाई करे।
उम्मते मुस्लिमा का इत्तिफाक है कि हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शान में गुस्ताखी करने वाले शख्स को कतल किया जायगा। अल्लामा इबने तैमिया ने 3 जिल्दों पर मुशतमिल अपनी किताब में इस मौजू पर कुरान व हदीस के दलाएल की रौशनी में तफसीली बहस की है। गिलाफे काबा से लिपटे हुए तौहीने रिसालत के मुरतकिब को कतल करने का हूकूम हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दिया। हजरत अनस रजी अल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि फतहे मक्का के दिन रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मक्का में तशरीफ फरमा थे। किसी ने अर्ज किया (आपकी शान में तौहीन करने वाला) इबने खत्तल काबा के परदों से लिपटा हुआ है। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया उसे कतल कर दो। (सही बुखारी) यह अब्दुल बिन खत्तल मुरतद था जो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हिजू में शेर कह कर हूजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शान में तौहीन करता था। उसने दो गाने वाली लौंडियाँ इसलिए रखी हुई थी कि वह हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हिजू में अशआर गाया करें। जब हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उसके कतल का हूकूम दिया तो उसे गिलाफे काबा से बाहर निकाल कर बांधा गया और मस्जिदे हराम में मकामे इब्राहिम और जमजम के कुऐं के दरमयान उसकी गरदन उड़ा दी गई। (फतहुल बारी) उस दिन एक साअत के लिए हरमे मक्का को हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए हलाल करार दिया गया था। मस्जिदे हराम में मकामे इब्राहिम और जमजम के कुऐं के दरमयान यानी बैतुल्लाह से सिर्फ चंद मीटर के फासला पर उसको कतल किया जाना इस बात की दलील है कि गुस्ताखे रसूल बाकी मुरतदीन से बदरे जहां बदतर बद हाल है।
पूरी इंसानियत को यह भी अच्छी तरह मालूम होना चाहिए कि हर मुसलमान के दिल में हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मोहब्बत दुनिया की हर चीज से ज्यादा है क्योंकि शरीअते इस्लामिया की तालिमात के मुताबिक हर मुसलमान का हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और आपकी सुन्नतों से मोहब्बत करना लाजिम और जरूरी है। नीज हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जिन्दगी में ऐसी औसाफे हमीदा बयक वक्त मौजूद थीं जो आज तक न किसी इंसान की जिन्दगी में मौजूद रही हैं और न ही उन औसाफे हमीदा से मुत्तसिफ कोई शख्स इस दुनिया में आयेगा। आपकी चंद सिफात यह हैं।
इज्ज व इंकिसारी, अफव दर गुजर, हमसायों का ख्याल, लोगों की खिदमत, बच्चों पर शफकत, औरतों का इहतिराम, जानवरों पर रहम, अदल व इंसाफ, गुलाम और यतीम का ख्याल, शुजाअत व बहादुरी, इस्तिकामत, जुहद व किनाअत, सफाई मामलात, सलाम में पहल, सखावत व फैयाजी, मेहमान नवाजी।
हजरत अनस रजी अल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया तुममें से कोई उस वक्त तक कामिल मोमिन नहीं हो सकता जब तक मैं उसको अपने बच्चों, अपने मां बाप और सब लोगों से ज्यादा महबूब न हो जाऊं। (सही मुस्लिम व बुखारी) एक मरतबा हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हजरत उमर रजी अल्लाहु अन्हु का हाथ पकड़े हुए थे। हजरत उमर रजी अल्लाहु अन्हु ने अर्ज किया या रसूलुल्लाह! आप मुझे हर चीज से ज्यादा अजीज हैं सिवाए मेरी अपनी जान के। हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया नहीं, उस जात की कसम जिसके कब्जा में मेरी जान है (ईमान उस वक्त तक पूरा नहीं हो सकता) जब तक मैं तुम्हें अपनी जान से भी ज्यादा अजीज न हो जाऊं। हजरत उमर रजी अल्लाहु अन्हु ने अर्ज किया वल्लाह! अब आप मुझे मेरी अपनी जान से भी ज्यादा अजीज हैं। हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया उमर! अब बात हुई। (सही बुखारी)
हिन्दुस्तान की मौजूदा सूरते हाल को सामने रख कर मैं तमाम मुस्लमानों से यही दरखास्त करता हूं कि अपने जज्बात को काबू में रख कर हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तालिमात को अपनी अम्ली जिन्दगी में लायें और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पैगाम को दूसरों तक पहुंचाने में अपनी सलाहियतें लगायें।
नबी बनाये जाने से लेकर वफात तक आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को बेशुमार तकलिफें दी गईं। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ऊपर ऊंटनी की ओझड़ी डाली गई। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ऊपर घर का कूडा डाला गया। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को काहिन, जादुगर और मजनु कह कर मजाक उड़ाया गया। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बेटियों को तलाक दी गई। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का तीन साल तक बायेकाट किया गया। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर पत्थर बरसाये गये। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अपना शहर छोड़ना पड़ा। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जंगे उहद के मौका पर जख्मी किए गए। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को जहर दे कर मारने की कोशिश की गई। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कभी एक दिन में दोनों वक्त पेट भर कर खाना नहीं खाया। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भूक की शिद्दत की वजह से अपने पेट पर दो पत्थर बांधे। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के घर में दो दो महीने तक चुल्हा नहीं जला। आप सल्लल्लाहु अलैहि के ऊपर पत्थर की चट्टान गिरा कर मारने की कोशिश की गई। हजरत फातिमा रजी अल्लाहु अन्हा के सिवा आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सारी औलाद आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने वफात हुई। गर्जकि सैयदुल अम्बिया व सैयदुल बशर को मुख्तलिफ तरीकों से सताया गया मगर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कभी सबर का दामन नहीं छोड़ा। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रिसालत की अहम जिम्मेदारी को इस्तिकामत के साथ बहुसन खुबी अंजाम देते रहे, हमें इन वाक्यात से यह सबक लेना चाहिए कि घरैलू या मूल्की या आलमी सतह पर जैसे भी हालात हमारे ऊपर आयें हम उनपर सबर करें और अपने नबी के नकशे कदम पर चलते हुए अल्लाह से अपना तअल्लुक मजबूत करें।
मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)