بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

मदीनतुर्रसूल में मस्जिदे नब्वी के क़रीब दिल दहलाने वाला हादसा
मोहसिने इंसानियत व ख़ैरूल बरिय्यह व अफ़ज़लुर्रुसुल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मस्जिद में दुनिया के कोने-कोने से आए हुए लाखों ज़ाएरीन ख़ालिक़े कायनात का नाम लेकर 29 वें रोज़े का इफ़्तार कर रहे थे कि इंसानियत के दुश्मन, न सिर्फ क़ाबिले मज़म्मत बल्कि क़ाबिले लाअनत एक ज़लिम शख़्स को जब मस्जिदे नब्वी के क़रीब सिक्योरिटी के अफ़राद ने शक व शुबह की बिना पर उसे आगे बढ़ने से रोका तो उस ज़ालिम शख़्स ने ख़ुदकुश हमले से न सिर्फ अपने आपको मौत के घाट उतार दिया बल्कि मस्जिदे नब्वी की हिफाज़त में मसरूफ चार सिक्योरिटी अफ़राद को भी शहीद कर दिया। दहशतगर्दी के बड़े-बड़े वाक़्यात दुनिया में रूनुमा होते हैं लेकिन इस वाक़्ये ने दुनिया के मुसलमानों के दिलों की धड़कनों को इस तरह तेज़ कर दिया कि दुनिया के चप्पे चप्पे से मुसलमानों की ज़बान से बस ये दुआ निकल रही थी कि अल्लाह तआला सबसे अफज़ल व आला बशर और क़यामत तक आने वाले इंसानों के पैगम्बर की मस्जिद (जहाँ आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मदफू़न हैं) को तमाम शर से महफूज़ फ़रमाए। ये मस्जिद ऐसी अज़ीम हस्ती की तरफ मंसूब है कि दुनिया के वुजूद से लेकर आज तक तमाम औसाफ़े हमीदा से मुत्तसिफ़ शख़्स दुनिया में न कभी आया है और न कल क़यामत तक पैदा होगा, जिसने सिर्फ 23 साला नबुव्वत वाली जिन्दगी में अपने क़ौल व अमल के ज़रिए जिन्दगी का ऐसा नमूना इंसानियत के सामने पेश फ़रमाया कि इनकी तालीमात पर अमल किए बगैर दुनिया में अम्न व सुकून क़ायम नहीं किया जा सकता। इस मस्जिद की हिफाज़त के लिए लाखों नहीं बल्कि करोड़ों मुसलमान अपनी जान का नज़राना पेश करने में दोनों जहाँ की कामयाबी व कामरानी समझते हैं। सिक्योरिटी के चारों अफ़राद जो इस नापक हमले में मारे गये हैं यक़ीनन शहीद हैं और अल्लाह तआला इन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाएगा इंशाअल्लाह। अल्लाह तआला इन चारों शहीदों के पसमांदगान को सब्रे जमील अता फ़रमाए और इनके लिए दुनियावी जिन्दगी में बेहतरीन सहारे का इंतेज़ाम फ़रमाए।
सऊदी अरब की मौजदा हुकूमत जो हरमैन शरीफ़ैन की ख़िदमत को अपना मक़सद समझती है इंशाअल्लाह हरमैन शरीफ़ैन की हिफाज़त के लिए मज़ीद ख़ुसूसी इंतेज़ाम फ़रमाएगी, ताकि इस्लाम मुख़ालिफ ताक़तें अपने मक़ासिद में कभी कामयाब न हो सकें जैसा कि सऊदी अरब के बादशाह शाह सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ ने दहशतगर्दों के आहनी हाथों से निमटने के अज़्म का इज़हार किया है। मैं अल्लाह तआला से दुआगो हूँ कि मौजूदा सऊदी हुकूमत की हर तरफ से मदद फ़रमाए, इस मुल्क के अम्न व अमान को बाक़ी रखे और हरमैन शरीफ़ैन व मक़ामाते मुक़द्दसा की मुकम्मल हिफाज़त फ़रमाए। मुझे पूरा यक़ीन है कि इस सिलसिले में हुकूमत सऊदी अरब बहुत मोहतात रहेगी, क्योंकि इस्लाम मुख़ालिफ ताक़तें दहशतगर्द तहरीकों से हरमैन शरीफ़ैन या मक़ामाते मुक़द्दसा में ख़ासकर हज की अदाएगी के दौरान कोई भी दहशतगर्दी का वाक़्या करा सकती हैं। ज़ाएरीन और हज व उमरा की अदाएगी पर आने वाले अल्लाह के मेहमानों से भी दरख़्वास्त है कि हुकूमत और सिक्योरिटी के अफराद का मुकम्मल तआवुन करें, ताकि हरमैन शरीफ़ैन और तमाम मुकद्दस जगहों में कोई भी दहशतगर्दी का वाक़्या न हो सके।
इस्लाम में क़त्ल की संगीनी:
क़ुरआन व हदीस में किसी इंसान को नाहक़ क़त्ल करने पर ऐसी सख़्त वईदें बयान की गई हैं जो किसी और जुर्म पर बयान नहीं हुईं। इस्लामी तालीमात के मुताबिक़ किसी इंसान को नाहक़ क़त्ल करना शिर्क के बाद सबसे बड़ा गुनाह है। बल्कि बाज़ उल्मा ने सूरह अन्निसा आयत न0 92 की रौशनी में फ़रमाया है कि किसी मुसलमान को नाहक़ क़त्ल करने वाला मिल्लते इस्लामिया से ही निकल जाता है और जो शख़्स किसी मुसलमान को जान बूझ कर क़त्ल करे तो उसकी सज़ा जहन्नम है जिसमें वो हमेशा रहेगा और अल्लाह उस पर गज़ब नाजिल करेगा और लाअनत भेजेगा और अल्लाह ने उसके लिए बड़ा अज़ाब तैयार कर रखा है। कु़रआन करीम में दूसरी जगह अल्लाह तआला ने एक शख़्स के क़त्ल को तमाम इंसानों का क़त्ल क़रार दिया: “इसी वजह से बनी इसराईल को ये फ़रमान लिख दिया था कि जो कोई किसी को क़त्ल करे जबकि ये क़त्ल न किसी और जान का बदला लेने के लिए हो और न किसी के ज़मीन में फसाद फैलाने की वजह से हो तो ये ऐसा है जैसे उसने तमाम इंसानों को क़त्ल कर दिया और जो शख़्स किसी की जान बचा ले तो ये ऐसा है जैसे उसने तमाम इंसानों की जान बचा ली।” (सूरह अल माएदह: 32) गर्ज़ कि अल्लाह तआला ने एक शख़्स के क़त्ल को पूरी इंसानियत का क़त्ल क़रार दिया, क्योंकि कोई शख़्स क़त्ले नाहक़ का इरतिकाब उसी वक़्त करता है जब उसके दिल से इंसान की हुरमत का एहसास मिट जाए, नीज़ अगर किसी को नाहक़ क़त्ल करने का चलन आम हो जाए तो तमाम इंसान गैर महफूज़ हो जाएँगे, लिहाज़ा क़त्ले नाहक़ का इरतिकाब चाहे किसी के ख़िलाफ किया गया हो तमाम इंसानों को ये समझना चाहिए कि ये जुर्म हम सब के ख़िलाफ किया गया है। हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: अल्लाह तआला के नज़दीक एक मुसलमान शख़्स के क़त्ल से पूरी दुनिया का नापैद (और तबाह) हो जाना हल्का (वाक़्या) है। (तिर्मिज़ी) इन दो आयात और एक हदीस से किसी शख़्स को नाहक़ क़त्ल करने की सख़्त तरीन सज़ा मालूम हुई। अब ज़रा सोचें कि मस्जिदे नब्वी (जहाँ तमाम नबियों के सरदार और सारी कायनात में सबसे अफज़ल व आला व ताजदारे मदीना हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम आराम फ़रमा रहे हैं) के क़रीब पहुँच कर जो शख़्स दहशतगर्दी के मज़मूम अमल का इरादा रखता हो वो कितने बड़े जुर्म का मुरतकिब कहलाएगा, लिहाज़ा 29वें रोज़े के इफ़्तार के वक़्त मस्जिदे नब्वी के क़रीब हुए दहशतगर्दाना अमल की जितनी भी मज़म्मत की जाए कम ही कम है।
आइए इस मौके़ को ग्नीमत समझ कर मस्जिदे नब्वी की मुख़तसर तारीख़ और अल्लाह के हबीब मुहम्मद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़बाने मुबारक से इस मुबारक सरज़मीन की अहमियत व फ़ज़ीलत को पढ़ें:
मस्जिदे नब्वी: जब हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मक्का मुकर्रमा से हिज़रत करके मदीना मुनव्वरा तशरीफ लाए तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने 1 हिजरी में मस्जिदे क़ुबा की तामीर के बाद सहाबा-ए-किराम के साथ मस्जिदे नब्वी की तामीर फ़रमाई, उस वक़्त मस्जिदे नब्वी 105 फीट लम्बी और 90 फिट चैड़ी थी। हिज़रत के सातवें साल फतह ख़ैबर के बाद नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मस्जिदे नब्वी की तौसीअ फ़रमाई। इस तौसीअ के बाद मस्जिदे नब्वी की लम्बाई और चैड़ाई 150 फिट हो गई। हज़रत उमर फारूक़ रजि॰ के अहद ख़िलाफत में मुसलमानों की तादाद में जब गैर मामूली इज़ाफा हो गया और मस्जिद नाकाफ़ी साबित हुई तो 17 हिजरी में मस्जिदे नब्वी की तौसीअ की गई। 29 हिजरी में हज़रत उस्मान गनी रजि॰ के ज़माने में मस्जिदे नब्वी की तौसीअ की गई। उमवी ख़लीफा वलीद बिन अब्दुल मलिक ने 88 से 91 हिजरी में मस्ज्दिे नब्वी की तौसीअ की। हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ उस वक़्त मदीना मुनव्वरा के गर्वनर थे। उमवी और अब्बासी दौर में मस्जिदे नब्वी की कई बार तौसीअ हुई। तुर्कों ने मस्जिदे नब्वी की नये सिरे से तामीर की, उसमें सुर्ख़ पत्थर का इस्तेमाल किया गया, मज़बूती और ख़ूबसूरती के एतबार से तुर्कों की अक़ीदतमंदी की नाक़ाबिले फ़रामोश यादगार आज भी बरक़रार है। हज और उमरा करने वालों और ज़ाएरीन की ज़्यादती की वजह से जब ये तौसीआत भी नाकाफी रहीं तो मौजूदा सऊदी हुकूमत ने क़रीब की इमारतों को ख़रीद कर और उन्हें ढा कर अज़ीममुश्शान तौसीअ की जो अब तक की सबसे बड़ी तौसीअ मानी जाती है।
हुजरए मुबारका (रोज़ए अक़दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी जिदगी के आख़िरी दस ग्यारह साल मदीना मुनव्वरा में गुज़ारे। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इंतक़ाल के बाद हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तालीमात के मुताबिक़ मस्जिदे नब्वी से लगे हुए हज़रत आयशा रजिअल्लाहु अन्हा के हुजरे में ही आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को दफ़्न कर दिया गया, इसी हुजरे में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इंतक़ाल भी हुआ था। हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ रजि॰ और हज़रत उमर फारूक़ रजि॰ भी इसी हुजरे में मदफ़ू़न हैं। इसी हुजरए मुबारका के पास खड़े होकर सलाम पढ़ा जाता है। हुजरए मुबारका के क़िब्ला रूख़ तीन जालियाँ हैं जिसमें दूसरी जाली में तीन सुराख़ हैं, पहले और बड़े गोलाई वाले सुराख़ के सामने आने का मतलब है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की क़ब्र सामने है। दूसरे सुराख़ के सामने आने का मतलब हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रजि॰ की क़ब्र सामने है और तीसरे सुराख़ के सामने आने का मतलब हज़रत उमर फारूख़ रजि॰ की क़ब्र सामने है। अब ये हुजरए मुबारका मस्जिदे नब्वी के अन्दर है।
रियाज़ुल जन्नह: पुरानी मस्जिदे नब्वी में मिम्बर और हुजरए मुबारका (रोज़ए अक़दस) के दरम्यान जो जगह है वो रियाज़ुल जन्नह कहलाती है। हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहुअलैहि वसल्लम का इरशाद है: “मिम्बर और रोज़ए अक़दस के दरम्यान की जगह जन्नत की क्यारियों में से एक क्यारी है।’’ रियाज़ुल जन्नह की पहचान के लिए यहाँ सफेद संगमरमर के सुतून हैं। इन सुतूनों को उस्तवानह कहते हैं, इन सुतूनों पर इनके नाम भी लिखे हुए हैं। रियाज़ुल जन्नह के पूरे हिस्से में जहाँ सफेद और हरी क़ालीनों का फर्श है नमाज़ें अदा करना ज़्यादा सवाब का बाएस है, नीज़ कुबूलियते दुआ के लिए भी ख़ास मक़ाम है।
अस्हाबे सुफ़्फा का चबूतरा: मस्जिदे नब्वी में हुजरए शरीफा के पीछे एक चबूतरा बना हुआ है। ये वो जगह है जहाँ वो मिस्कीन व गरीब सहाबा-ए-किराम क़याम फ़रमाते थे जिनका न घर था न दर और जो दिन व रात जिक्र व तिलावत करते और हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सोहबत से मुस्तफीद होते थे। हज़रत अबू हुरैरा रजि॰ इसी दरस्गाह के मुमताज़ शार्गिदों में से हैं। अस्हाबे सुफ़्फ़ा की तादाद कम और ज़्यादा होती रहती थी, कभी कभी उनकी तादाद 80 तक पहुँच जाती थी। सूरह अल कहफ की आयत नम्बर 28 इन्हीं अस्हाबे सुफ़्फा के हक़ में नाजिल हुई जिसमें अल्लाह तआला ने नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को उनके साथ बैठने का हुक्म दिया।
मदीना तय्यबा के फज़ाएल: मदीना मुनव्वरा के फज़ाएल व मनाक़िब बेशुमार हैं, अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नज़दीक उसका बुलंद मक़ाम व मर्तबा है। मदीना मुनव्वरा की फ़ज़ीलत के लिए यही काफ़ी है कि वो तमाम नबियों के सरदार और हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का दारूल हिजरह और मस्कन व मदफ़न है। इसी पाक व मुबारक सरज़मीन से दीने इस्लाम दुनिया के कोने-कोने तक फैला। इस शहर को तय्यबा और ताबा (यानी पाकीज़गी का मरकज़) भी कहते हैं। इसमें आमाल का सवाब कई गुना बढ़ जाता है। हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़बाने मुबारक से मदीना मुनव्वरा के चंद फज़ाएल पेश ख़िदमत हैं:
1) रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दुआ करते हुए फ़रमाया: ऐ अल्लाह.! मदीना की मुहब्बत हमारे दिलों में मक्के की मुहब्बत से भी बढ़ा दे। (बुख़ारी)
2) नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: या अल्लाह.! मक्का को तूने जितनी बरकत अता फ़रमाई है मदीना को उससे दूनी बरकत अता फ़रमा। (बुख़ारी)
3) रसूलुल्लाहसल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: जिसने मदीना के क़याम के दौरान आने वाली मुश्किलात व मसाएब पर सब्र किया, क़यामत के रोज़ मैं उसकी सिफारिश करूँगा या फ़रमाया मैं उसकी गवाही दूँगा। (मुस्लिम)
4) हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: मदीना के रास्तों पर फरिश्ते मुक़र्रर हैं, उसमें न कभी ताऊन फैल सकता है न दज्जाल दाख़िल हो सकता है। (बुख़ारी)
5) रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: जो शख़्स मदीना में मर सकता है (यानी यहाँ आकर मौत तक क़याम कर सकता है) उसे ज़रूर मदीना में मरना चाहिए, क्योंकि मैं उस शख़्स के लिए सिफारिश करूँगा जो मदीना मुनव्वरा में मरेगा। (तिर्मिज़ी)
6) रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: ईमान (क़ुर्बे क़यामत) मदीना में सिमट कर इस तरह वापस आ जाएगा जिस तरह साँप घूम फिर कर अपने बिल में वापस आ जाता है। (बुख़ारी)
7) रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: जो भी मदीना में रहने वालों के साथ मक्र करेगा वो ऐसे घुल जाएगा जैसे कि पानी में नमक घुल जाता है। (यानी उसका वुजूद बाक़ी न रहेगा) (बुख़ारी, मुस्लिम)
8) रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: मदीना बुरे लोगों को यूँ अलग कर देता है जिस तरह आग चाँदी के मैल कुचैल को दूर कर देती है। (मुस्लिम)
मस्जिदे नब्वी की जियारत के फज़ाएल:
1) रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: तीन मसाजिद के अलावा किसी दूसरी मस्जिद का सफर इख़्तियार न किया जाए मस्जिदे नब्वी, मस्जिदे हराम और मस्जिदे अक़सा। (बुख़ारी)
2) रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: मेरी इस मस्जिद में नमाज़ का सवाब दीगर मसाजिद के मुक़ाबले में हज़ार गुना ज़्यादा है सिवाए मस्जिदे हराम के। (सही मुस्लिम) इब्ने माजा की रिवायत में पचास हज़ार नमाज़ों के सवाब का जिक्र है। जिस ख़ुलूस के साथ वहाँ नमाज़ पढ़ी जाएगी उसी के मुताबिक़ अज्र व सवाब मिलेगा इंशाअल्लाह।
3) रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: जिस शख़्स ने मेरी इस मस्जिद (यानी मस्जिदे नब्वी) में फ़ौत किए बगैर चालीस नमाज़ें अदा कीं उसके लिए आग से बराअत, अज़ाब से नजात और निफ़ाक़ से बराअत लिखी गई।(तिर्मिज़ी, तबरानी, मुसनद अहमद) बाज़ उल्मा ने इस हदीस को ज़ईफ क़रार दिया है, लेकिन दीगर मुहद्दीसन ने सही क़रार दिया है।
क़ब्रे अतहर की जियारत के फज़ाएल:
1) रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: जो शख़्स मेरी क़ब्र के पास खड़े होकर मुझ पर दुरूद सलाम पढ़ता है मैं उसको ख़ुद सुनता हूँ और जो किसी और जगह दुरूद पढ़ता है तो उसकी दुनिया व आख़रत की ज़रूरतें पूरी की जाती हैं और मैं क़यामत के दिन उसका गवाह और उसका सिफारिशी हूँगा। (बैहक़ी)
2) हुज़ूर अकरम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: जो शख़्स मेरी क़ब्र के पास आकर मुझ पर सलाम पढ़े तो अल्लाह तआला मुझ तक पहुँचा देते हैं, मैं उसके सलाम का जवाब देता हूँ। (मुसनद अहमद, अबू दाऊद)
3) हुज़ूर अकरम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: जिस शख़्स ने मेरी क़ब्र की जियारत की उसके लिए मेरी शफ़ाअत वाजिब हो गई। (दारक़ुतनी, बज़्ज़ार)
4) हुज़ूर अकरम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: जो मेरी जियारत को आए और उसके सिवा कोई और नीयत उसकी न हो तो मुझ पर हक़ हो गया कि मैं उसकी शफ़ाअत करूँ। (तबरानी)
5) नबी अकरम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: जिसने मदीना आकर सवाब की नीयत से मेरी (क़ब्र की) जियारत की वो मेरे पड़ोस में होगा और मैं क़यामत के दिन उसका सिफ़ारिशी हूँगा। (बैहक़ी)
6) हुज़ूर अकरम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: या अल्लाह.! मेरी क़ब्र को बुत न बनाना। अल्लाह तआला ने उन लोगों पर लाअनत फ़रमाई है जिन्होंने अम्बिया की क़ब्रों को इबादतगाह बना लिया। (मुसनद अहमद)
मस्जिदे हराम, मस्जिदे नब्वी और तमाम मक़ामाते मुक़द्दसा की हिफाज़त दीने इस्लाम की हिफाज़त की तरह मतलूब है। मुझे पूरा यक़ीन है कि मौजूदा सऊदी हुकूमत इंशाअल्लाह हिफाज़त के मज़ीद ख़ुसूसी इंतेज़ामात फ़रमाएगी। अल्लाह के मेहमानों और ज़ाएरीन से दरख़्वास्त है कि सिक्योरिटी अफ़राद का मुकम्मल तआवुन करके मक़ामाते मुक़द्दसा की हिफाज़त में अपनी शिरकत फ़रमाएँ। आम मुसलमानों से भी दरख़्वास्त है कि सोशल मीडिया पर आने वाली ख़बरों की तहक़ीक़ के बगैर दूसरों को हरगिज़ इरसाल न करें, बल्कि अपने क़ौल व अमल से ऐसी कोशिश करें कि इस्लाम मुख़ालिफ ताक़तें अपने घिनावने जराएम के इरतेकाब में कामयाब न हो सकें। नीज़ पूरी दुनिया में अम्न व अमान क़ायम करने की हर मुमकिन कोशिश करें और रब्बुल आलमीन से दुनिया में ख़ास कर रहमतुल आलमीन के शहर तय्यबा और ताबा यानी पाकीज़गी के मरकज़ में सलामती और अम्न व सुकून के क़याम की ख़ूब दुआ करें।
मोहम्मद नजीब क़ासमी सम्भली