بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

हदीस की हुज्जियत
हदीस की तारीफ
उस कलाम को हदीस कहा जाता है जिसमें नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के क़ौल या अमल या किसी सहाबी के अमल पर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सुकूत या आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सिफात में से किसी सिफत का ज़िक्र किया गया हो। हदीस के दो अहम हिस्से होते हैं:
(सनद) जिन वास्तों से नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का क़ौल या अमल या तक़रीर या आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की कोई सिफत उम्मत तक पहुंची हो।
(मतन) वो कलाम जिसमे नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के क़ौल या अमल या तक़रीर या आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की कोई सिफत ज़िक्र की गयी हो।
मिसाल के तौर पर “फलां शख्स ने फलां शख्स से और उन्होने हज़रत उमर से रिवायत किया कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया” ये हदीस की सनद है और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का ये फरमान कि “आमाल का दार व मदार नियत पर है” ये हदीस का मतन है।
हुज्जियत का मतलब हुज्जीयत का मतलब इस्तिदलाल (किसी हुकुम का साबित करना) करने के हैं, यानी क़ुरान की तरह हदीसे नबवी से भी अक़ाएद व अहकाम व फज़ाइले आमाल साबित होते हैं, अलबत्ता इसका दर्जा क़ुरान करीम के बाद है, जिस तरह ईमान के मामले में अल्लाह और उसके रसूल के दरमियान फ़र्क़ नही किया जा सकता है कि एक को माना जाए और दूसरे को न माना जाए, ठीक इसी तरह कलामुल्लाह और कलामे रसूल के दरमियान तफरीक की कोई गुंजाइश नहीं है कि एक को वाजिबुल इताअत माना जाए और दूसरे को न माना जाए, क्योंकि इन दोनों में से किसी एक के इंकार पर दूसरे का इंकार खुद बखुद लाज़िम आएगा, खुदाई गैरत गवारा नहीं करती कि उसके कलाम को तसलीम करने का दावा किया जाए मगर उसके नबी के कलाम को तसलीम न किया जाए, अल्लाह तआला ने अपने पाक कलाम में साफ साफ बयान फरमा दिया ‘‘पस ऐ नबी यह लोग आपके कलाम को नहीं ठुकराते बल्कि यह ज़ालिम अल्लाह की आयतों के मुंकिर है” (सूरह इनाम 33) गरज़ ये कि क़ुरान करीम पर ईमान और उसके मुताबिक़ अमल करने की तरह अहादीसे नबविया पर ईमान लाना और उनके मुताबिक़ ज़िन्दगी गुज़ारना ईमान की तकमील के लिए ज़रूरी है, क्योंकि अल्लाह तआला ने आपको यह ओहदा दिया है कि आपकी ज़बाने मुबारक से जिस चीज़ की हिल्लत का एलान हो गया वह हलाल है और जिसको आप सल्लल्लह अलैहि वसल्लम ने हराम फरमा दिया वह हराम है, नीज़ अल्लाह तआला ने वाज़ेह तौर पर अपने पाक कलाम में बयान फरमा दिया कि क़ुरान करीम के पहले मुफस्सीर हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हैं जिनकी इताअत क़यामत तक आने वाले हर इंसान के लिए लाज़िम और ज़रूरी है और हुज़ूर अकरम सल्ल्ल्लाह अलैहि वसल्लम की इताअत आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अक़वाल व अफआल के मुताबिक़ ज़िन्दगी गुज़ारना ही तो है और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अक़वाल व अफआल हमें हदीस के ज़ख़ीरे में ही तो मिलते हैं।
हुज्जीयते हदीस क़ुरान करीम से
अल्लाह तआला ने अपने पाक कलाम क़ुरान करीम में बहुत बार हदीसे रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के कतई दलील होने को बयान फरमाया है, जिनमें से चंद आयात नीचे लिखे जा रही हैं।
“यह किताब हमने आपकी तरफ उतारी है कि लोगों की जानिब जो हुकुम नाज़िल फरमाया गया है आप उसे खोल खोल कर बयान कर दें, शायद कि वह गौर व फिक्र करें” (सूरह नहल 44)
“यह किताब हमने आप पर इसलिए उतारी है कि आप उनके लिए हर चीज़ को वाज़ेह करदें जिसमें वह इख्तिलाफ कर रहे हैं” (सूरह नहल 64)
अल्लाह तआला ने इन दोनों आयात में वाज़ेह तौर पर बयान फरमा दिया कि क़ुरान करीम के मुफस्सीरे अव्वल हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हैं और अल्लाह तआला की तरफ से नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर यह ज़िम्मेदारी आएद की गई है कि आप उम्मते मुस्लिमा के सामने क़ुरान करीम के अहकाम व मसाइल खोल खोल कर बयान करें, इन दोनों मज़कूरा आयात के अलावा अल्लाह तआला ने क़ुरान करीम की सैकड़ो आयात में अपनी इताअत के साथ रसूल की इताअत का भी हुकुम दिया है, कहीं फरमाया ‘‘अल्लाह की इताअत करो और रसूल की इताअत करो” और फरमाया ‘‘अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करो” इन सब जगहों पर अल्लाह तआला की तरफ से बंदों से एक ही मुतालबा है कि फरमाने इलाही की तामील करो और इरशादे नबवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इताअत करो, गरज़ ये कि अल्लाह तआला ने क़ुरान करीम में बहुत सी जगहों पर यह बात वाज़ेह तौर पर बयान कर दी कि अल्लाह तआला की इताअत के साथ रसूलूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इताअत भी ज़रूरी है और अल्लाह तआला की इताअत रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इताअत के बेगैर मुमकिन नहीं है, अल्लाह तआला ने हमें रसूल की इताअत का हुकुम दिया और रसूल की इताअत जिन वास्ते से हम तक पहुंची है यानी अहादीस का ज़खीरा अगर उन पर हम शक व शुबहा करें तो गोया हम क़ुरान करीम की सैकड़ों आयात के मुंकिर हैं या ज़बाने हाल से यह कह रहे हैं कि अल्लाह तआला ने ऐसी चीज़ का हुकुम दिया यानी इताअते रसूल का जो हमारे इख्तियार में नहीं है।
इसी तरह अल्लाह तआला ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इताअत को इताअते इलाही क़रार देते हुए फरमाया ‘‘जिसने रसूल की इताअत की उसने दरअसल अल्लाह तआला की इताअत की।” (सूरह निसा 80)
इस आयत में अल्लाह तआला ने इताअते रसूल को हुब्बे इलाही का मेयार क़रार दिया, यानी अल्लाह तआला से मोहब्बत रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इताअत में है, चुनांचे अल्लाह तआला का इरशाद है ‘‘ऐ नबी लोगों से कह दें कि अगर तुम हक़ीक़त में अल्लाह तआला से मोहब्बत रखते हो तो मेरी पैरवी इख्तियार करो, अल्लाह तुमसे मोहब्बत करेगा और तुम्हारे गुनाहों को माफ फरमाएगा”। (सूरह आले इमरान 31)
“जो अल्लाह तआला और उसके रसूल की इताअत करेगा उसे अल्लाह तआला ऐसी जन्नतों में दाखिल फरमाएगा जिनके नीचे नहरे बहती होंगी और इन बागों में वह हमेशा रहेंगे और यही बड़ी कामयाबी है और जो अल्लाह तआला और उसके रसूल की नाफरमानी करेगा और उसकी मुक़र्रर हदों से आगे निकलेगा, उसे जहन्नम में डाल देगा जिसमें वह हमेशा रहेगा, ऐसों ही के लिए रुसवाकुन अज़ाब है।” (सूरह निसा 13, 14)
गरज़ ये कि अल्लाह और उसके रसूल की इताअत न करने वालों का ठिकाना जहन्नम है।
“जो अल्लाह तआला और उसके रसूल की इताअत करेगा उसे अल्लाह तआला ऐसी जन्नतों में दाखिल फरमाएगा जिनके नीचे नहरें बहती होगीं, और जो मुंह फेरेगा उसे दर्दनाक अज़ाब देगा” (सूरह फतह 17)
इन दो आयात में अल्लाह तआला ने अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इताअत पर हमेशा हमेशा की जन्नत और अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की नाफरमानी पर हमेशा हमेशा के अज़ाब का फैसला फरमाया है।
“जो लोग अल्लाह तआला और उसके रसूल की इताअत करेंगे वह उन लोगों के साथ होगें जिन पर अल्लाह तआला ने इनाम नाज़िल फरमाया है, यानी अम्बिया, सिद्दीक़ीन, शोहदा और सालेहीन, कैसे अच्छे हैं यह रफीक़ जो किसी को मुयस्सर आएं” (सूरह निसा 69)
इस आयत में अल्लाह तआला ने फरमाया कि अल्लाह तआला और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इताअत करने वालों का हशर अम्बिया, सिद्दीक़ीन, शोहदा और नेक लोगो के साथ होगा।
“किसी मोमिन मर्द व मोमिना औरत को यह हक़ नही है कि जब अल्लाह और उसके रसूल किसी मामले का फैसला कर दें तो फिर उसे इस मामला में खुद फैसला करने का इख्तियार हासिल है और जो अल्लाह तआला और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की नाफरमानी करेगा वह खुली गुमराही में पड़ेगा” (सूरह अहज़ाब 36)
“तेरे रब की कसम यह कभी मोमिन नहीं हो सकते जब तक कि अपने आपसी इख्तिलाफ में आपको फैसला करने वाला न मान लें, फिर जो कुछ तुम फैसला करो उसपर अपने दिलों में तंगी भी न महसूस करें बल्कि सर झुका कर तसलीम कर लें” (सूरह निसा 65)
इस आयत मे अल्लाह तआला ने रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फैसलों की नाफरमानी को अदमे ईमान की निशानी और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इताअत को ईमान की अलामत क़रार दिया है।
“हकीकत यह है कि अल्लाह ने मोमिन पर बड़ा इहसान किया कि उनके दरमियान उन्हीं में से एक रसूल भेजा जो उनके सामने आयतों की तिलावत करे, उन्हें पाक साफ बनाए और उन्हें किताब व हिकमत की तालीम दे” (सूरह आले इमरान 164) इस आयत से वाज़ेह तौर पर मालूम हआ कि रसूल का काम सिर्फ किताब पहुंचाना नहीं था, बल्कि अल्लाह की किताब सुना कर उसके अहकाम को सिखाना भी था, नीज़ लोगों का तज़किया करना भी आपको भेजने का मक़सद भी था, तज़किया सिर्फ किताब हाथ में देने से नहीं होता बल्कि उसके लिए क़ौल व अमल से रहनुमाई ज़रूरी है जिसको अल्लाह तआला ने बयान फरमाया कि वह नबी लोगों को किताब और हिकमत सिखाता है, किताब से मुराद क़ुरान करीम और हिकमत से मुराद क़ौल व अमल से लोगो की रहनुमाई यानी हदीस नबवी है।
“रसूल उम्मी उनको नेकियों का हुकुम देते हैं और बुराइयों से रोकते हैं और पाकिज़ा चीज़ों को उनके लिए हलाल क़रार देते हैं और गन्दी चीज़ को उन पर हराम क़रार देते हैं” (सूरह आराफ 157)
इस आयत में अल्लाह तआला ने हूज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को हलाल क़रार देने वाला और हराम क़रार देने वाला बताया है, गरज़ ये कि अल्लाह तआला ने आपको यह ओहदा दिया कि आपकी ज़बाने मुबारक से जिस चीज़ के हलाल का एलान हो गया वह हलाल है और जिसको आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हराम फरमा दिया वह हराम है।
“यक़ीनन तुम्हारे लिए रसूलल्लाह में उमदा नमूना मौजूद है, हर उस शख्स के लिए जो अल्लाह तआला की और क़यामत के दिन की उम्मीद रखता है और कसरत के साथ अल्लाह को याद करता है” (सूरह अहज़ाब 21)
यानी नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़िन्दगी जो अहादीस के ज़खीरा की शकल में हमारे पास महफूज़ है कल क़यामत तक आने वाले तमाम इंसानों के लिए बेहतरीन नमूना है कि हम अपनी ज़िन्दगियाँ इसी नमूना के मुताबिक़ गुजारें।
इस आयत में हुक्मे रसूलूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सुन्नते नबवी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुखालिफत करने वालों को अल्लाह जहन्नम की सज़ा सुनाते हुए फरमाता है ‘‘जो शख्स रसूल की मुखालफत करे और अहले ईमान की रविश के सिवा किसी और के रास्ते पर चले जबकि हिदायत इस पर वाज़ेह हो चुकी है तो इसको हम इसी तरफ चलाएंगे जिधर वह फिर गया और उसे जहन्नम में झोंकेंगे जो बदतरीन ठिकाना है।” (सूरह निसा 115)
गरज़ ये कि अल्लाह तआला ने क़ुरान करीम में बहुत सी जगहों पर यह बात बतलाई है कि अल्लाह तआला की इताअत के साथ रसूल की इताअत भी ज़रूरी है यानी अल्लाह तआला की इताअत रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इताअत के बेगैर मुमकिन नहीं है, अल्लाह तआला ने हमें रसूल की इताअत का हुकुम दिया और रसूल की इताअत जिन वास्तों से हम तक पहचीं है यानी अहादीस का ज़खीरा उनपर अगर हम शक व शूबहा करने लगे तो हम क़ुरान करीम की इन मज़कूरा तमाम आयात के मुंकिर या ज़बाने हाल से यह कह रहे हैं कि अल्लाह तआला ने ऐसी किसी चीज़ का हुकुम दिया है यानी इताअते रसूल जो हमारे इख्तियार में नही है।
हुज्जीयते हदीस नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अक़वाल से
सारे अम्बिया के सरदार व आखिरी नबी हूज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भी क़ुरान करीम के साथ सुन्नते रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इत्तिबा को ज़रूरी क़रार दिया है, हदीस की तक़रीबन हर किताब में नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इरशादात तवातुर के साथ मौजूद हैं, इनमें से सिर्फ तीन अहादीस पेशे खिदमत हैं।
रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जिसने मेरी इताअत की उसने अल्लाह की इताअत की और जिसने मेरी नाफरमानी की उसने अल्लाह की नाफरमानी की। (बुखारी व मुस्लिम)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जब मैं तुम्हें किसी चीज़ से रोकूं तो उससे रूक जाओ और जब मै तुम्हें किसी काम का हुकुम करूं तो हसबे इस्तिाअत उसकी तामील करो। (बुखारी व मुस्लिम)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया मेरी उम्मत के तमाम अफराद जन्नत में दाखिल होंगे सिवाए उन लोगों के जिन्होनें इंकार किया, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कहा गया कि ऐ अल्लाह के रसूल!  दुखूले जन्नत से कौन इंकार कर सकता है? तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जिसने मेरी इताअत की वह जन्नत में दाखिल हो गया और जिसने मेरी नाफरमानी की उसने (दुखूले जन्नत से) इंकार किया। (बुखारी व मुस्लिम)
हुज्जीयते हदीस इजमा से
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़िन्दगी में और इन्तिकाल के बाद साहाबा-ए- किराम किसी भी मसअला का हल पहले क़ुरान करीम में तलाश किया करते थे, फिर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत में, इसी वजह से जमहूर उलमा ने वही की दो किसमें की है, जैसा कि सूरह नज्म की इब्तिदाई आयात से मालूम होता है जिसमे अल्लाह ताआला इरशाद फरमाता है कि “और न वह अपनी ख्वाहिश से कोई बात कहते हैं, वह तो सिर्फ वही है जो उतारी जाती है।”
(1) वही मतललू - वह वही जिसकी तिलवात की जाती है यानी क़ुरान करीम जिसका एक एक हर्फ कलामे इलाही है।
(1) वही गैर मतललू - वह वही जिसकी तिलवात नहीं की जाती है यानी सुन्नते रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जिसके अल्फ़ाज़ नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के हैं, अलबत्ता बात अल्लाह तआला की है।
बाज़ हज़रात क़ुरान करीम की चंद आयात मसलन ‘‘तिबयानन लिकुल्ले शैय” (सूरह नहल 89) और ‘‘तफसीलन लिकुल्ले शैय” (सूरह इनाम 154) से गलत मफहूम ले कर यह बयान करने की कोशिश करते हैं कि क़ुरान करीम में हर मसअला का हल है और क़ुरान करीम को समझने के लिए हदीस की कोई खास ज़रूरत नहीं है, हालांकि हदीसे रसूल भी क़ुरान करीम की तरह शरीअते इस्लामिया में कतई दलील और हुज्जत है, जैसा कि अल्लाह तआला ने अपने पाक कलाम में बहुत सी जगहों पर पूरी वज़ाहत के साथ ज़िक्र किया है यानी नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के क़ौल व अमल से भी अहकामे शरीया साबित होते हैं।
क़ुरान करीम में उमूमन अहकाम की तफसील मज़कूर नहीं है, नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अल्लाह तआला के हुकुम के मुताबिक़ अपने अक़वाल व आमाल से इन मुजमल अहकाम की तफसील बयान की है, इसी लिए तो अल्लाह तआला नबी व रसूल को भेजता है कि वह अल्लाह तआला के अहकाम अपने अक़वाल व आमाल से उम्मतियों के लिए बयान करें, मसलन अल्लाह तआला ने क़ुरान करीम मे बेशुमार जगह पर नमाज़ पढ़ने, रुकू और सजदे करने का हुकुम दिया है, लेकिन नमाज़ की तफसील क़ुरान करीम में मज़कूर नहीं है कि एक दिन में कितनी नमाज़ अदा करनी है? क़याम या रुकू या सजदा कैसे किया जाएगा और कब किया जाएगा और उसमें क्या पढ़ा जाएगा? एक वक़्त में कितनी रिकात अदा करनी है?
इसी तरह क़ुरान करीम में ज़कात की अदाएगी का तो हुकुम है, लेकिन तफसीलात मज़कूर नहीं है कि ज़कात की अदाएगी रोज़ाना करनी है या साल भर में या पांच साल में या ज़िन्दगी में एक मरतबा? फिर यह ज़कात किस हिसाब से दी जएगी? किस माल पर ज़कात वाजिब है और इसके लिए क्या क्या शरायत हैं?
गरज़ ये कि अगर हदीस की हुज्जीयत पर शक करें तो क़ुरान करीम की वह सैकड़ों आयात जिनमें नमाज़ पढ़ने, रुकू करने या सजदा करने का हुकुम है या ज़कात की अदाएगी का हुकुम है वह सब अल्लाह की पनाह बेमानी हो जाएंगी।
इसी तरह क़ुरान करीम (सूरह माइदा 38) में हुकुम है कि चोरी करने वाले मर्द और औरत के हाथ को काट दिया जाए, अब सवाल पैदा होता है कि दोनों हाथ काटें या एक हाथ? और अगर एक हाथ काटें तो दाहिना काटे या बायां? फिर उसे काटें तो कहाँ से? बगल से या कोहनी से? या कलाई से? या उनके बीच में किसी जगह से? फिर कितने माल की क़ीमत की चोरी पर हाथ काटें? इस मसअला की वज़ाहत हदीस में ही मिलती है, मालूम हुआ कि क़ुरान करीम हदीस के बेगैर नही समझा जा सकता है।
इसी तरह क़ुरान करीम (सूरह जुमा) में यह इरशाद है कि जब जुमा के लिए पुकारा जाए तो अल्लाह तआला के ज़िक्र की तरफ दौड़ो और खरीद व फरोख्त छोड़ दो, सवाल यह है कि जुमा का दिन कौन सा है? यह अज़ान कब दी जाए? उसके अल्फ़ाज़ क्या हों? जुमा की नमाज़ कब अदा की जाए? उसको कैसे पढ़ें? खरीद व फरोख्त की क्या क्या शराएत हैं? इस मसअला की पूरी वज़ाहत अहादीस में ही मज़कूर है।
बाज़ हज़रात सनद हदीस की बुनियाद पर हुई अहादीस की अक़साम या रावियों को सिक़ह क़रार देने में मुहद्दिसीन व फुक़हा के इख्तिलाफ की वजह से हदीसे रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को ही शक व शुबहा की निगाह से देखते हैं, हालांकि उन्हें मालूम होना चाहिए कि अल्लाह तआला ने क़ुरान करीम क़यामत तक आने वाले तमाम अरब व अजम की रहनुमाई के लिए नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर नाज़िल फरमाया और क़यामत तक उसकी हिफाज़त का वादा किया है और इसी क़ुरान करीम में अल्लाह तआला ने बहुत सी जगह (मसलन सूरह नहल 44, 64) पर इरशाद फरमाया है कि “ऐ नबी! यह किताब हमने आप पर नाज़िल फरमाई ताकि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस कलाम को खोल खोल कर लोगों के लिए बयान कर दें” तो जिस तरह अल्लाह तआला ने क़ुरान करीम के अल्फ़ाज़ की हिफाज़त की है, उसके मानी व मफ़हूम जो नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बयान फरमाए हैं वह भी कल क़यामत तक महफूज़ रहेंगे इन्शाअल्लाह, क़ुरान करीम के अल्फ़ाज़ के साथ साथ उसके मानी व मफहूम की हिफाज़त भी मतलूब है, वरना नुज़ूले क़ुरान का मक़सद ही फौत हो जाएगा।
इसमें कोई शक नहीं कि अहादीस के ज़खीरे में बाज़ बातें गलत तरीक़े से नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तरफ मंसूब कर दी गई हैं, लेकिन मुहद्दिसीन व उलमा की बेलौस क़ुर्बानियों से तक़रीबन तमाम ऐसे गलत अक़वाल की तहदीद हो गई है जो हदीस के कामिल ज़खीरा का अदना सा हिस्सा है? जहां तक रावियों के सिलसिला में मुहद्दिसीन व उलमा के इख्तिलाफात का तअल्लुक़ है तो इस इख्तिलाफ की बुनियाद पर हदीस की हुज्जीयत पर शक व शुबहा नहीं किया जा सकता है, क्योंकि इख्तिलाफ का असल मक़सद खुलूस के साथ अहादीस के ज़खीरा में मौज़ूआत को अलग करना और अहकामे शरीआ में इन्ही अहादीस को क़ाबिले अमल बनाना है जिस पर किसी तरह का कोई शक व शुबहा न रहे, जहाँ कोई शक व शुबहा हो तो उन अहादीस को अहकाम के बजाए सिर्फ आमाल की फज़ीलत की हद तक महदूद रखा जाए।
मसलन मरीज़ के इलाज में डाक्टरों का इख्तिलाफ होने की सूरत में डाक्टरी पेशा को ही रद्द नहीं किया जाता है, इसी तरह मकान का नक्शा तैयार करने में इंजीनियरों के इख्तिलाफ की वजह से इंजीनियरों के बजाए मज़दूर से नक्शा नहीं बनवाया जाता है, मौजूदा तरक़्क़ी याफ्ता दौर में भी तालीम व तअल्लूम के लिए एक ही कोर्स के मुख्तलिफ तरीक़े राएज हैं, हर इलाका में ज़िन्दगी गुज़ारने के तरीक़े मुख्तलिफ हैं, गरज़ ये कि ज़िन्दगी के तक़रीबन हर शोबे में इख्तिलाफ मौजूद है, इन इख्तिलाफात के बावज़ूद हम ज़िन्दगी के ही मुंकिर नहीं बन जाते हैं तो अहादीस की तक़सीम और रावियों को सिक़ह क़रार देने में इख्तिलाफ की वजह से हदीस का ही इंकार क्यों? बल्कि यह इख्तिलाफ कभी उम्मत के लिए रहमत बनते है कि ज़माने के बदलाव के एतबार से मसअला का फैसला किसी एक राय के मुताबिक़ कर दिया जाता है, नीज़ इन इख्तिलाफात की वजह से तहक़ीक़ का दरवाजा भी खुला रहता है।
खुलासा कलाम
सहाबा-ए-किराम, ताबेइन, तबेताबेइन, मुहद्दिसीन, मुफस्सेरीन व फ़ुक़हा व उलमा व मुअर्रेखीन गरज़ ये कि इब्तिदाए इस्लाम से असरे हाज़िर तक उम्मते मुस्लिमा के तमाम मकातिबे फिक्र ने तसलीम किया है कि क़ुरान के बाद हदीस इस्लामी क़ानून का दूसरा अहम बुनियादी माखज़ है और हदीसे नबवी भी क़ुरान करीम की तरह शरीअते इस्लामिया में क़तई दलील और हुज्जत है जैसा कि अल्लाह तआला ने क़ुरान में बहुत सी जगहों पर ज़िक्र फरमाया, नीज़ क़ुरान करीम में एक जगह भी यह मज़कूर नहीं कि सिर्फ और सिर्फ क़ुरान करीम पर अमल करो, गरज़ ये कि अहकामे क़ुरान पर अमल के साथ हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अक़वाल व अफआल यानी हदीसे नबवी के मुताबिक़ ज़िन्दगी गुजारना ज़रूरी है, हक़ तो यह कि क़ुरान फहमी हदीस नबवी के बेगैर मूमकिन नहीं है, क्योंकि अल्लाह की तरफ से हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर यह ज़िम्मेदारी आएद की गई है कि आप उम्मते मुस्लिमा के सामने क़ुरान करीम के अहकाम व मसाइल खोल खोल कर बयान करें और हमारा यह ईमान है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी ज़िम्मेदारी बहुस्ने खूबी अंजाम दी है, मगर असरे हाज़िर में मुस्तशरेक़ीन ने तौरेत व इंजील की हिफाज़त व तदवीन के तरीकों पर चश्म पोशी करके हदीस नबवी के हिफाज़त व तदवीन पर एतेराज़ात किए हैं, मगर वह हक़ाएक़ के बजाए सिर्फ और सिर्फ इस्लाम दुशमनी पर मबनी है।
अल्लाह तआला हम सबको क़ुरान व सुन्नत के मताबिक़ ज़िन्दगी गुज़ारने वाला बनाए, आमीन।
मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)