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بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

शरीअते इस्लामिया में हदीस का मक़ाम
हदीस वह कलाम है जिसमें नबी अकरम के क़ौल या अमल या किसी सहाबी के अमल पर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सुकूत या आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सिफात में से किसी सिफत का ज़िक्र किया गया हो। सहाबा किराम व ताबेईन व तबे ताबेईन व मुहद्दिसीन व मुफस्सेरीन व फुक़हा व उलमा व मुअर्रिखीन गरज़ ये कि इब्तिदाये इस्लाम से असरे हाज़िर तक उम्मते मुस्लिमा के तमाम मकातिबे फिक्र ने तसलीम किया है कि क़ुरान के बाद हदीस इस्लामी क़ानून का दूसरा अहम व बुनियादी माखज़ है और हदीसे नबवी भी क़ुरान करीम तरह शरीअते इस्लामिया में क़तई दलील और हुज्जत है जैसा कि अल्लाह तआला ने क़ुरान में कई बार ज़िक्र फरमाया है मिसाल के तौर पर अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है “वअनजलना ऐलैकज़ ज़िकरा आखिर तक” (सूरह नहल) अल्लाह तआला ने क़ुरान की सैकड़ों आयात में अपनी इताअत के साथ रसूल की इताअत का हुकुम दिया है और रसूल की इताअत पर अमल अहादीस पर अमल करना ही तो है। गरज़ ये कि अहकामे क़ुरान पर अमल के साथ हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अक़वाल व अफआल यानी हदीसे नबवी के मुताबिक़ ज़िन्दगी गुज़ारना ज़रूरी है। हक़ तो ये है कि क़ुरान फहमी हदीसे नबवी के बेगैर मुमकिन ही नहीं है, क्यूंकि अल्लाह की जानिब से हुज़ूर अकरम सल्लम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर यह ज़िम्मेदारी आयद की गई है कि आप उम्मते मुस्लिमा के सामने क़ुरान करीम के अहकाम व मसाइल खोल खोल कर बयान करें। नबी व रसूल के भेजने का बुनियादी मक़सद अहकामे इलाही को अपने क़ौल व अमल के ज़रिये इंसानों की रहनुमाई के लिए लोगों के सामने पेश करना होता है।
जिस तरह ईमान के मामला में अल्लाह और उसके रसूल के दरमियान तफरीक़ नहीं की जा सकती है कि एक को माना जाए और दूसरे को न माना जाए, ठीक इसी तरह कलामुल्लाह और कलामे रसूल के दरमियान भी किसी तफरीक़ की कोई गुंजाइश नहीं है कि एक को वाजिबुल इताअत माना जाए और दूसरे को न माना जाए, क्यूंकि इन दोनों में से किसी एक के इंकार पर दूसरे का इंकार खुद बखुद लाज़िम आएगा।
हदीस मज़कूरा मक़ासिद में से किसी एक मक़सद के लिए होती है:
1) क़ुरान करीम में वारिद अक़ाएद व अहकाम व मसाइल की ताकीद।
2) क़ुरान करीम में वारिद अक़ाएद व अहकाम व मसाइल के इजमाल की तफसील
3) क़ुरान करीम के इबहाम की वज़ाहत।
4) क़ुरान करीम के उमूम की तखसीस।
5) बाज़ दूसरे अक़ाएद व अहकाम व मसाइल का ज़िक्र, जैसा कि अल्लाह तआला ने सूरह हशर, आयत 7 में इरशाद फरमाया “जिसका हुकुम नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दें उसको बजा लाओ और जिस काम से मना करें उससे रूक जाओ।”
हदीस की क़िस्में
सनदे हदीस (जिन वास्तों से नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का क़ौल या अमल या तक़रीर या आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की कोई सिफत उम्मत तक पहुंची है) के एतेबार से हदीस की मुख्तलिफ क़िस्में बयान की गई हैं, जिनमें से तीन अहम अक़साम नीचे लिखे हैं।
सही - वह हदीसे मरफू जिसकी सनद में हर रावी इल्म व तक़वा दोनों में कमाल को पहुंचा हुआ हो और रह रावी ने अपने शैख से हदीस सुनी हो, नीज़ हदीस के मतन में से किसी दूसरे मज़बूत रावी की रिवायत से कोई तआरूज़ न हो और कोई दूसरी इल्लत (नुक़्स) भी न हो।
सही का हुकुम - जमहूर मुहद्दिसीन व मुफस्सेरीन व फुक़हा व उलमा का इन अहादीस से अक़ाएद व अहकाम साबित करने में इत्तिफाक़ है।
हसन - वह हदीसे मरफू जिसकी सनद में हर रावी तक़वा में तो कमाल को पहुंचा हुआ हो और हर रावी ने अपने शैख से हदीस भी सुनी हो, नीज़ हदीस के मतन में किसी दूसरे मज़बूत रावी की रिवायत से कोई तआरूज़ भी न हो, लेकिन कोई एक रावी इल्म में आला पैमाने का न हो।
हसन का हुकुम - जमहूर मुहद्दिसीन व मुफस्सेरीन व उलमा का इन अहादीस से अक़ाएद व अहकाम साबित करने में इत्तिफाक़ है, अलबत्ता इसका दर्जा सही से कम है।
ज़ईफ - हदीसे हसन की शराएत में से कोई एक शर्त मफक़ूद हो।
ज़ईफ का हुकुम - अहादीस ज़ईफा से अहकाम व फज़ाइल में इस्तिदलाल के लिए फुक़हा व उलमा व मुहद्दिसीन की तीन राय हैं।
1) अहादीसे ज़ईफा से अहकाम व फज़ाइल दोनों में इस्तिदलाल किया जा सकता है।
2) अहादीसे ज़ईफा से अहकाम व फज़ाइल दोनों में इस्तिदलाल नहीं किया जा सकता है।
3) अक़ाएद या अहकाम तो साबित नहीं होते, अलबत्ता क़ुरान या आहादीसे सहीहा से साबित शुदा आमाल की फज़ीलत के लिए अहादीसे ज़ईफा क़बूल की जाती हैं। जमहूर मुहद्दिसीन व मुफस्सेरीन व फुक़हा व उलमा की यही राय है, मशहूर मुहद्दिस इमाम नववी ने उलमा उम्मत का इस पर इजमा होने का ज़िक्र किया है।
(नोट) हदीस की इस्तिलाह में सही, गलत या बातिल के मुक़ाबला में इस्तेमाल नहीं होता है, बल्कि सही का मतलब ऐसी हदीस जिसकी सनद में ज़र्रा बराबर किसी क़िस्म की कोई कमी न हो और तमाम रावी इल्म व तक़वा में कमाल को पहुंचे हुए हों, जबकि हदीस हसन का मतलब है कि जो सही के मुक़ाबले दर्जा में कुछ कम हो, ज़ईफ का मतलब यह है कि उसकी सनद के किसी रावी में कुछ ज़ोफ हो जैसा कि ऊपर बयान किया गया। गरज़ ये कि ज़ईफ हदीस सही हदीस की एक क़िस्म है। ज़ईफ हदीस में ज़ोफ आम तौर पर मामूली दर्जा का ही होता है। हदीस के ज़ख़ीरे में अगरचे कुछ मौज़ूआत भी शामिल हो गई हैं, लेकिन वह तादाद में बहुत ज़्यादा नहीं हैं, नीज़ मुहद्दिसीन व उलमा ने दिन रात की कोशिश से इनकी निशानदही भी कर दी है।
ज़ईफ हदीस भी सही हदीस की एक क़िस्म है
खैरुल क़ुरून से आज तक इस्तिलाहे हदीस में सही के मुक़ाबले में मौज़ू इस्तेमाल होता है, यानी वह मनघड़त बात जो हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तरफ गलत मनसूब कर दी गई हो, मुहद्दिसीन व उलमा ने दिन रात की कोशिश से उनकी निशानदही भी कर दी है और हदीस के ज़ख़ीरे में उनकी तादाद बहुत ज़्यादा नहीं है, जबकि ज़ईफ हदीस सही हदीस की ही एक क़िस्म है, लेकिन इसकी सनद में कुछ कमज़ोरी की वजह से जमहूर उलमा इसको फज़ाइल के बाब में क़बूल करते हैं। मसलन सनद में अगर कोई रावी गैर मारूफ साबित हुआ, यानी यह मालूम नहीं कि वह कौन है या उसने किसी एक मौक़ा पर झूट बोला है या सनद में इंक़िताअ है (यानी दो रावियों के दरमियान किसी रावी का ज़िक्र न किया जाए मसलन, ज़ैद ने कहा कि अमर ने रिवायत की है, हालांकि ज़ैद ने अमर का ज़माना नहीं पाया, मालूम हुआ कि यक़ीनन इन दोनों के दरमियान कोई वास्ता छूटा हुआ है) तो इस क़िस्म के शक व शुबहा से मुहद्दिसीन व फुक़हा व उलमा इहतियात के तौर पर उस रावी की हदीस को अक़ाएद और अहकाम में क़बूल नहीं करते हैं, बल्कि जो अक़ाएद या अहकाम क़ुरान करीम या सही अहादीस से साबित हुए हैं उनके फज़ाइल के लिए क़बूल करते हैं, चुनांचे बुखारी व मुस्लिम के अलावा हदीस की मशहूर व मारूफ तमाम ही किताबों में ज़ईफ अहादीस की अच्छी खासी तादाद मौजूद है और उम्मते मुस्लिमा इन किताबों को क़दीम ज़माने से क़बूलियत का शरफ दिए हुए है, हत्ताकि बाज़ उलमा की तहक़ीक़ के मुताबिक़ बुखारी की तआलीक़ और मुस्लिम की शवाहिद में भी चंद ज़ईफ अहादीस मौजूद हैं। इमाम बुखारी ने हदीस की बहुत सी किताबें लिखी हैं, बुखारी के अलावा उनकी भी तमाम किताब में ज़ईफ अहादीस कसरत से मौजूद हैं। सही बुखारी व सही मुस्लिम से पहले और बाद में अहादीस पर मुशतमिल किताबें लिखी गईं, मगर हर मुहद्दिस ने अपनी किताब में ज़ईफ हदीसें ज़िक्र फरमाई हैं। इसी तरह बाज़ मुहद्दिस ने सिर्फ सही अहादीस को ज़िक्र करने का अपने ऊपर इल्तिज़ाम किया, मसलन सही इब्ने खुज़ैमा और सही इब्ने हिब्बान वगैरह, मगर इसके बावजूद उन्होंने अपनी किताब में अहादीसे ज़ईफा भी ज़िक्र फरमाई हैं जो इस बात की वाज़ेह दलील है कि खैरुल क़ुरून से आज तक तमाम मुहद्दिसीन ने अहादीस ज़ईफा को क़बूल किया है। सबसे मशहूर व मारूफ तफसीरे क़ुरान (तफसीर इब्ने कसीर) में अच्छी खासी तादाद में ज़ईफ अहादीस हैं, लेकिन उसके बावजूद तक़रीबन 700 साल से पूरी उम्मते मुस्लिमा ने इसको क़बूल किया है और सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली तफसीर है और इसके बाद में लिखी जाने वाली तफसीरों के लिए मम्बा व माखज़ है।
अगर ज़ईफ हदीस क़ाबिले एतेबार नहीं है तो सवाल यह है कि मुहद्दिसीन ने अपनी किताबों में उन्हें क्यूं जमा क्या? और उनके लिए तवील सफर क्यूं किए? नीज़ यह बात भी ज़ेहन में रखें कि अगर ज़ईफ हदीस को क़ाबिले एतेबार नहीं समझा जाएगा तो सीरते नबवी और तारीखे इस्लाम का एक बड़ा हिस्सा दफन करना पड़ेगा, क्यूंकि सीरत और तारीखे इस्लाम का वाफिर हिस्सा ऐसी रिवायत पर मबनी है जिसकी सनद में ज़ोफ हो। क़दीम ज़माने से जमहूर मुहद्दिसीन का उसूल यही है कि ज़ईफ हदीस फज़ाइल में मोतबर है और उन्होंने ज़ईफ हदीस को सही हदीस के अक़साम के ज़िम्न में ही शुमार किया है। मुस्लिम शरीफ की सबसे ज़्यादा मक़बूल शरह लिखने वाले इमाम नववी (मुअल्लिफ रियाजुस सालेहीन) फरमाते हैं: “मुहद्दिसीन, फुक़हा, और जमहूर उलमा ने फरमाया है कि ज़ईफ हदीस पर अमल करना फज़ाइल और तरगीब व तरहीब में जाएज़ और मुस्तहब है।” (अल अज़कार पेज 7,8) इसी उसूल को दूसरे उलमा व मुहद्दिसीन ने लिखा है जिन में से बाज़ के नाम यह हैं, शैख मुल्ला अली क़ारी (मौज़ूआते कबीरा पेज 5, शरहुल अक़ारिया जिल्द 1 पेज 9, फतहु बाबिल इनाया 1/49), शैख इमाम हाकिम अबू अब्दुल्लाह नीशापूरी (मुस्तदक हाकिम जिल्द1 पेज 490), शैख इब्ने हजर अलहैसमी (फतहुल मुबीन पेज 32), शैख अबू मोहम्मद बिन क़ुदामा (अलमुगनी 1/1044), शैख अल्लामा शौकानी (नैलुल औतार 3/48), शैख हाफिज इब्ने रजब हमबली (शरह इलल अत तिर्मिज़ी 1/72,74), शैख अल्लामा इब्ने तैमिया हमबली (फतावा 1 पेज 39), शैख नवाब सिद्दीक़ हसन खां (दलीलुत तालिब अलल मतालिब पेज 889)।
असरे हाज़िर में बाज़ हज़रात जो मुसलमानों की आबादी का एक फीसद भी नहीं हैं अपनी राय को उम्मते मुस्लिमा के सामने इस तरह पेश करते हैं कि वह जो कहते हैं वही सिर्फ अहादीसे सहीहा पर मबनी है और पूरी उम्मते मुस्लिमा के अक़वाल अहादीसे ज़ईफा पर मबनी हैं। उनके नुक़तए नज़र में हदीस के सही या ज़ईफ होने का मेयार सिर्फ यह है कि जो वह कहें वही सिर्फ सही है, हालांकि अहादीस की किताबें लिखने के बाद हदीस बयान करने वाले रावियों पर बाक़ाएदा बहस हुई, जिसको असमाउर रिजाल की बहस कहा जाता है। अहकामे शरइया में उलमा व फुक़हा के इख्तिलाफ की तरह बल्कि इससे भी कहीं ज़्यादा शदीद इख्तिलाफ मुहद्दिसीन का रावियों को ज़ईफ और सिकह क़रार देने में है, यानी एक हदीस एक मुहद्दिस के नुक़तए नज़र में ज़ईफ और दूसरे मुहद्दिसीन की राय में सही हो सकती है, लिहाज़ा अगर कोई हदीस पेश की जाए तो फौरन आम लोगों को बेगैर तहक़ीक़ किए हुए यह तबसिरा नहीं करना चाहिए कि यह हदीस सही नहीं है, इसलिए कि बहुत ज़्यादा मुमकिन है कि वह हदीस हो जिससे नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के क़ौल का इंकार लाज़िम आए और अगर कोई आलिम किसी हदीस को क़ाबिले अमल नहीं समझता है तो वह उस पर अमल न करे लेकिन अगर कोई दूसरा मकतबे फिक्र उस हदीस को क़ाबिले अमल समझता है और उस हदीस पर अमल करना क़ुरान व हदीस के किसी हुकुम के मुखालिफ भी नहीं है तो हमें चाहिए कि हम तमाम मकातिबे फिक्र की राय का एहतेराम करें, मसलन रजब के शुरू महीने पर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से “अल्लाहुम्मा बारिक लना फी रजबिन व शाबाना व बल्लिगना रमज़ान” पढ़ना साबित है और यह हदीस मुसनद अहमद, बज़्ज़ार, तबरानी और बैहक़ी जैसी किताबों में मौजूद है जिनको पूरी उम्मते मुस्लिमा ने क़बूल किया है तो जो उलमा इस हदीस की सनद पर एतेराज़ करते हैं वह यह दुआ न पढ़ें, बल्कि अगर उलमा की एक जमाअत इस हदीस को क़ाबिले अमल समझ कर यह दुआ मांगती है तो उनके बिदअती होने का फतवा सादिर करना कौन सी अकलमंदी है। इसी तरह उलमा, फुक़हा और मुहद्दिसीन की एक बड़ी जमाअत की राय है कि 15वीं शाबान से मुतअल्लिक़ अहादीस के क़ाबिले क़बूल और उम्मते मुस्लिमा का अमल इब्तिदा से इस पर होने की वजह से 15वीं शाबान की रात में इंफिरादी तौर पर नफल नमाजों की अदाएगी, क़ुरान करीम की तिलावत, ज़िक्र और दुआओं का किसी हद तक एहतेमाम करना चाहिए। लिहाज़ा इस तरह से 15वीं शाबान की रात में इबादत करना बिदअत नहीं बल्कि इस्लामी तालीमात के एैन मुताबिक़ है। गरज़ ये कि ज़ईफ हदीस भी सहीहे हदीस की एक क़िस्म है और उम्मते मुस्लिमा ने फज़ाइले आमाल के लिए हमेशा उनको क़बूल किया है।
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़माने में हदीस लिखने की आम इजाज़त नहीं थी, ताकि क़ुरान व हदीस में इख्तिलात न पैदा हो जाए, अलबत्ता इंफिरादी तौर पर सहाबा-ए-किराम की एक जमाअत ने नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इजाज़त से अहादीस के सहीफे तैयार कर रखे थे। खुलफाए राशेदीन के ज़माने में भी हदीस लिखने का नज़्म इंफिरादी तौर पर जारी रहा। हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ ने अपनी खिलाफत के ज़माने में अहादीस को जमा कराने का खास एहतेमाम किया। इस तरह हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रहमतुल्लाह अलैह की खुसूसी तवज्जोह से पहली सदी हिजरी के इख्तिताम पर अहादीस का एक बड़ा ज़खीरा जमा कर लिया गया था जो बाद में तहरीर की गई किताबों के लिए अहम मसदर बना।
200 हिजरी से 300 हिजरी के दरमियान अहादीस लिखने का खास एहतेमाम हुआ, चुनांचे हदीस की मशहूर व मारूफ किताबें बुखारी, मुस्लिम, तिर्मिज़ी, अबू दाउद, इब्ने माजा, नसई वगैरह (जिनको सिहाए सित्तह कहा जाता है) इसी दौर में तहरीर की गई हैं, जबकि मोअत्ता इमाम मालिक 60 हिजरी के क़रीब तहरीर हुई। इन अहादीस की किताबों की तहरीर से पहले ही 50 हिजरी में हज़रत इमाम अबू हनीफा (शैख नोमान बिन साबित) की वफात हो चुकी थी। इमाम मोहम्मद रहमतुल्लाह अलैह की रिवायत से इमाम अबू हनीफा की हदीस की किताब (किताबुल आसार) इन अहादीस की किताबों की तहरीर से पहले मुरत्तब हो गई थी। यह बात अच्छी तरह ज़ेहन में रखें कि पूरी दुनिया में बाक़ाएदा लिखने के आम मामूल 200 हिजरी के बाद ही शुरू हुआ है, यानी हदीस की तरह तफसीर, सीरत और इस्लामी तारीख जैसे दीनी उलूम की बाक़ाएदा किताबत 200 हिजरी के बाद ही शुरू हुई है। इसी तरह असरी उलूम और शेर व शायरी भी 200 हिजरी से पहले दुनिया में उमूमी तौर पर तहरीरी शकल में मौजूद नहीं थी, क्यूंकि कम तादाद ही पढ़ना लिखना जानती थी। 200 हिजरी तक तमाम उलूम ही हत्ताकि शायरों के बड़े बड़े दीवान भी सिर्फ ज़बानी तौर पर एक दूसरे से मुंतक़िल होते चले आ रहे थे। अगर यह एतेराज़ किया जाए कि हदीस की बाक़ाएदा किताबें 200 हिजरी के बाद सामने आई हैं तो इस क़िस्म के एतेराज़ तफसीरे क़ुरान, सीरत की किताबों और इस्लामी तारीख और शायरों के दीवानों बल्कि यह एतेराज़ दूसरे असरी उलूम पर भी किया जा सकता है, क्यूंकि बाक़ाएदा उनकी किताबत 200 हिजरी के बाद ही शुरू हुई है। 200 हिजरी तक अगरचे बहुत सी किताबें मनज़रे आम पर आ चुकी थीं, मगर आम तौर पर तमाम उलूम सिर्फ ज़बानी ही पढ़े और पढ़ाए जाते थे।
खुलासए कलाम यह है कि क़ुरान के बाद हदीस इस्लामी क़ानून का दूसरा अहम बुनियादी माखज़ है और हदीसे नबवी भी क़ुरान करीम की तरह शरीअते इस्लामिया में क़तई दलील और हुज्जत है। हदीस के बेगैर हम क़ुरान को समझना तो दरकिनार इस्लाम के पांच बुनियादी अहम रुक्न को भी नहीं समझ सकते हैं।
मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)