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بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

सही बुखारी व उलमा-ए-देवबन्द की खिदमात
सबसे पहले सही बुखारी के मुसन्निफ इमाम बुखारी की मुख्तसर ज़िन्दगी के हालात लिख रहा हूं।
नाम व नसब
नाम मोहम्मद बिन इसमाइल और कुन्नियत अबू अब्दुल्लाह है। अजबकिस्तान के शहर बुखारा मे पैदाइश की वजह से बुखारी कहलाए गए।
विलादत और वफात
आप 13 शैव्वाल 194 हिजरी जुमा के दिन पैदा हुए और तक़रीबन 62 साल की उम्र में इदुल फितर की चांद रात को मग़रिब व इशा के दरमियान 256 हिजरी में आप की वफात हुई और इदुल फितर के दिन बादे नमाज़े ज़ुहर समरकंद के करीब खरेतंग नामी जगह में दफन किए गए।
तालीम व तरबीयत
आपके बचपन में ही वालिदे मुहतरम (इसमाइल) का साया सर से उठ गया, आपकी तालीम व तरबीयत मां की गोद में हुई। सिर्फ 16 साल की उम्र में अहादीस की बेशतर किताबें पढ़कर आपने तक़रीबन 70 हज़ार हदीसें ज़बानी याद कर ली थीं।
आप बचपन में ही देखने से महरूम हो गए थे। एक मरतबा आपकी वालिदा ने ख्वाब में देखा कि हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम फरमा रहे थे ऐ औरत! अल्लाह तआला ने तेरी दुआ की बरकत से तेरे बेटे की बीनाइ वापस कर दी है, चुनांचे सुबह हुई तो इमाम बुखारी बिल्कुल देखने लगे थे।
आपके वालिद मुहतरम ने वफात के वक़्त फरमाया था कि मेरे तमाम माल में न कोई दिरहम हराम का है और न मुशतबा कमाई का, इससे मालूम होता है कि आपकी परवरिश बिल्कुल हलाल रिज़्क़ से हुई थी और आखिरी उम्र तक ईमाम बुखारी भी अपने वालिद के नक़्शे कदम पर चले, गरज़ ये कि आपने कभी हराम लुक़मा नहीं खाया।
इल्मे हदीस की तहसील
इब्तिदा में अपने ही इलाक़े के बेशतर शूयुख से अहादीस पढ़ी, वालिदा और भाई के साथ हज की अदाएगी के लिए मक्का गए, वालिदा और भाई तो अपने वतन वापस आ गए मगर, हज से फरागत के बाद आप मक्का और मदीना के शूयुख से अहादीस सुनते रहे। उसके बाद हदीस के हुसूल के लिए बहुत से सफर करके मिश्र, शाम, इराक और दूसरे मुल्कों के शूयुख से आपने अहादीस पढ़ी। इस तरह आप कम उमरी ही में हदीस के इमाम बन कर सामने आए।
क़ुव्वते हाफ़िज़ा
अल्लाह तआा ने इमाम बुखारी को खुसूसी क़ुव्वते हाफ़िज़ा अता फरमाई थी, चुनांचे वह एक बात सुनने के बाद हमेशा याद रखते थे। आपके उस्ताद इमाम मोहम्मद बिन बश्शार फरमाते हैं कि इस वक़्त दुनिया में खुसूसी हाफ़िज़ा रखने वाले चार शख्स हैं, इमाम बुखारी, इमाम मुस्लिम, इमाम अबू ज़िरा राज़ी और इमाम अब्दुल्लाह बिन अब्दुर रहमान समर कंदी। शारेह सही बुखारी अल्लामा इब्ने हजर असकलानी कहते हैं कि इन चारों में इमाम बुखारी को खास फज़ीलत हासिल थी।
आपके असातिज़ा-ए-किराम
अल्लामा इब्ने हजर असकलानी फरमाते हैं कि इमाम बुखारी के उस्‍तादों की तादाद का कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। खुद इमाम बुखारी का अपना बयान है कि ‘‘मैंने अस्सी हज़ार हज़रात से रिवायत की है जो सब बुलंद पाया असहाबे हदीस में शुमार होते थे”।
आपके शागिर्द
आपके शागिर्द की कसरत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अल्लामा फरबरी फरमाते हैं कि जब मैं इमाम बुखारी की शोहरत सुन कर आपकी शागिर्दी का शरफ हासिल करने आपकी खिदमत में पहुंचा तो उस वक़्त तक़रीबन 90 हज़ार आदमी आपके शागिर्द हो चुके थे। नामवर शागिर्दों में इमाम तिर्मीज़ी और अल्लामा दारमी भी शामिल हैं।
तालिफाते इमाम बुखारी
इमाम बुखारी की तसानीफ मे आठ किताबें ज़्यादा मशहूर हैं।
1) अलअदबुल मुफरद
2) अत्तारीखुस सगीर-अलअवसत
3) अत्तारीखुल कबीर
4) अज़ज़ुफाउस सगीर
5) क़ुरतुल एैनैन बिरफइल यदैन फीससलात
6) खलक़े अफआलुल इबाद
7) अलकिरातुल खलफिल इमाम
8) और सबसे मायानाज किताब सही बुखारी
सही बुखारी का पूरा नाम यह है
अलजामिउल मसनदुस सहीहुल मुख्तसर मिन उमूरे रसूलिल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम व सुननहि व अैयामेहि
बाज़ हज़रात ने अल्फ़ाज़ के मामूली इख्तिलाफ के साथ इसका नाम इस तरह लिखा है।
अलजामिउस सहीहिल मुसनद मिन हदीसे रसूलिल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम व सुननहि व अैयामेहि
सही बुखारी के लिखने की वजह
इमाम बुखारी ने हिजाज़ के तीसरे सफर में मस्जिदे नबवी से मुत्तसिल एक रात ख्वाब में देखा कि मेरे हाथ में एक बहुत ही खुबसूरत पंखा है और मैं इसको निहायत इतमिनान से झल रहा हूं। सुबह को नमाज़ से फारिग हो कर इमाम बुखारी ने उलमा से अपने ख्वाब की ताबीर दरयाफ्त फरमाई, उन्होंने जवाब दिया कि आप सही हदीसों को ज़ईफ़ व मौज़ू हदीसों से अलाहिदा करेंगे, इस ताबीर ने इमाम बुखारी के दिल में सही अहादीस पर मुशतमिल एक किताब की तालीफ का एहसास पैदा किया। इसके अलावा इस इरादा को मज़ीद तक़वियत इस बात से पहुंची कि आपके उस्ताद शैख इसहाक़ बिन राहवियह ने एक मरतबा आपसे फरमाया कि क्या ही अच्छा होता कि तुम ऐसी किताब तालीफ फरमाते जो सही आहादीस की जामे होती। ख्वाब की ताबीर और उसताद के इरशाद के बाद इमाम बुखारी सही बुखारी लिखने में हमातन मशगूल हो गए। सही बुखारी लिखे जाने तक हदीस की तक़रीबन तमाम ही किताबों में सही, हसन और ज़ईफ़ तमाम क़िस्म की अहादीस जमा की जाती थीं, नीज़ सही बुखारी लिखे जाने तक इल्मे हदीस की बज़ाहिर तदवीन भी नहीं हुई थी जिसकी वजह से उसूल भी आम तौर पर सामने नहीं आए थे जो सही और गैरे सही में इमतियाज़ पैदा करते। सही बुखारी की तसनीफ के बाद भी हदीस की अक्सर किताबें सही, हसन और ज़ईफ़ पर मुशतमिल हैं।
सही बुखारी लिखने में वक़्त
इमाम बुखारी ने सबसे पहले तक़रीबन 6 लाख अहादीस के मुसव्वदात तरतीब दिए, इसमें कई साल लग गए, इससे फारिग हो कर आपने अहादीस की जांच शुरू की और इस अहम ज़ख़ीरे से एक एक गौहर चुन कर सही बुखारी में जमा करना शुरू कर दिया। आप खुद फरमाते हैं कि हर हदीस को सही बुखारी में लिखने से पहले गुस्ल फरमा कर दो रिकात नफल अदा करता हूं। आपको जब किसी हदीस की सनद मे इतमिनान नहीं होता तो आप मस्जिदे हराम या मस्जिदे नबवी में नियत करके इस्तिखारा की दो रिकात नमाज़ पढ़ते और फिर दिल के सुकून के बाद ही इस हदीस को अपनी किताब मे तहरीर फरमाते। गरज़ उन्होंने 16 साल दिन रात मेहनत करके यह किताब तहरीर फरमाई।
सही बुखारी मे अहादीस की तादाद
सही बुखारी मे सात हज़ार से कुछ ज़्यादा अहादीस हैं जो सबकी सब सही सही हैं, अलबत्ता बाज़ मुहद्दिसीन ने 7 या 8 अहादीस की सनद पर कलाम किया है, मगर सही बात यह है कि तमाम अहादीस सही हैं। बहुत सी अहादीस मुख्तलिफ अबवाब में बार बार मज़कूर हैं, मसलन हदीस इन्नमल आमालु बिन्नियात मुख्तलिफ अबवाब के तहत कई बार ज़िक्र की गई। तक़रीबन तीन हज़ार अहादीस इस किताब में गैर मुकर्ररा हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तमाम ही सही अहादीस इस किताब में जमा हो गई है बल्कि सही अहादीस की एक अच्छी खासी तादाद ऐसी भी है जो इमाम बुखारी के अलावा दूसरे मुहद्दिसीन ने अपनी किताबों में ज़िक्र की हैं जैसा कि इमाम बुखारी ने खुद इसका एतेराफ किया है ।
मुअल्लक़ात सही बुखारी
इमाम बुखारी ने अपनी किताब में बाज़ अहादीस सनद के बेगैर या इब्तिदाई सनद में से किसी एक या चंद रावी को ज़िक्र किए बेगैर लिखे हैं, इन को मुअल्लकाते बुखारी कहा जाता है। सबसे पहले इमाम अबुल हसन दारे क़ुतनी ने मुअल्लक़ात की इस्तिलाह उम्मत के सामने पेश की है।
इमाम बुखारी ने बाज़ मुअल्लक़ात को यक़ीन के सेगा के साथ ज़िक्र किया है जिनके सही होने पर उम्मते मुस्लिमा मुत्तफिक़ हैं जबकि बाज़ मुअल्लक़ात शक के सेगा के साथ ज़िक्र की हैं जिन पर बाज़ मुहद्दिसीन ने कलाम किया है।
इमाम बुखारी ने यह मुअल्लक़ात उमूमन 2 वजहों में से किसी एक वजह से अपनी किताब में ज़िक्र फरमाई है।
1) वह हदीस उन शराएत पर न उतरती हो जो इमाम बुखारी ने अपनी किताब के लिए तैय की थी मगर किसी खास फायदा के मद्देनजर वह हदीस मुअल्लक ज़िक्र कर दी।
2) सिर्फ इख्तिसार की वजह से सनद के बेगैर या इब्तिदाई सनद में किसी एक या चंद रावी को ज़िक्र किए बेगैर तहरीर फरमा दी।
मुअल्लक़ात सही बुखारी की तादाद
अल्लामा इब्ने हजर ने फतहुल बारी में लिखा है कि बुखारी में मुअल्लक़ात की तादाद 1341 है जिनमें से अक्सर बहुत सी बार ज़िक्र की गई हैं, बाज़ मुहद्दिसीन ने उससे भी ज़्यादा तादाद ज़िक्र की है, अलबत्ता सही मुस्लिम में मुअल्लक़ात बहुत कम हैं। इसी वजह से बाज़ मुहद्दिसीन ने मुस्लिम को बुखारी पर फौक़ियत दी है।
तरजुमतुल अबवाब
इमाम बुखारी ने अपनी किताब सही बुखारी को मुख्तलिफ अबवाब में मुरत्तब किया है और हर बाब के तहत बहुत सी अहादीस ज़िक्र की हैं, मगर सही बुखारी में हर बाब के तहत मज़कूरा अहादीस की बाब से मुनासबत उमूमन मुशकिल से समझ में आती है जिस पर मुहद्दिसीन व उलमा बहस करते हैं जो एक मुस्तक़िल इल्म की हैसियत इख्तियार कर गई है जिसको तरजुमतुल अबवाब कहा जाता है।
किताब की इल्मी हैसियत
इमाम बुखारी पहले शख्स हैं जिन्होंने सिर्फ अहादीसे सहीहा पर इकतिफा फरमा कर सही बुखारी लिखी। इससे पहले जो किताबें लिखी गईं वह सही, हसन और ज़ईफ वगैरह जुमला अहादीस पर मुशतमिल हुआ करती थी। इमाम बुखारी के बाद बाज़ मुहद्दिसीन मसलन इमाम मुस्लिम ने इस सिलसिला को जारी रखा, मगर जमहूर उलमा-ए-उम्मत ने सही बुखारी को दूसरे तमाम अहादीस की किताबों पर फौक़ियत दी है। सही बुखारी के बाद भी तहरीर करदा ज़्यादातर अहादीस की मशहूर व मारूफ किताबें (तिर्मीज़ी, इब्ने माजा, नसइ, अबू दाऊद वगैरह) हदीस की तमाम ही अकसाम (सही, हसन, ज़ईफ़ वगैरह) पर मुशतमिल है।
सुलासियाते इमाम बुखारी
सही बुखारी में 22 हदीसें सुलासियात है, सुलासियात के मानी सिर्फ तीन वास्तों (मसलन सहाबी, ताबई और तबे ताबई) से मुहद्दिसे हदीस ज़िक्र करे। ‘‘सुलासी” हदीस की सनद में रावियों की तादाद के एतबार से आला सनद होती है, यानी तीन वास्तों से कम कोई भी हदीस हदीस की किताबों में मौजूद नहीं है। इन 22 अहादीसे सुलासियात में 20 हदीसें इमाम बुखारी ने इमाम अबू हनीफा के शागिर्दों से रिवायत की है। इमाम अबू हनीफा के शागिर्द शैख अलमक्की बिन इब्राहिम से 11, इमाम अबू आसिम से 6 और इमाम अबू हनीफा के शागिर्द इमाम ज़ुफ़र के शागिर्द इमाम मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह अंसारी से 3 रिवायत अपनी किताब में ज़िक्र की हैं। मालूम हुआ कि इमाम बुखारी, इमाम अबू हनीफा के शागिर्दों के शागिर्द हैं।
सही बुखारी की शरह
मुहद्दिसीन व उलमा ने सही बुखारी की बहुत सी शरह लिखी है जिनमें अहादीस की वज़ाहत के साथ तरजुमतुल अबवाब और रावियों पर लफसीली बहस फरमाई है नीज़ अहकाम मुस्तंबत किए हैं, लेकिन इन शरह में अल्लामा इब्ने हजर असकलानी की फतहुल बारी बेशरह सहीहुल बुखारी सबसे ज़्यादा मशहूर है, जिसकी 14 जिल्दें हैं।
सही बुखारी व उलमा-ए-देवबन्द की खिदमात
दरसे हदीस को गौर व फिक्र और तदब्बुर व मानी से पढ़ने पढ़ाने का जो पौदा बर्रेसगीर में शैख अब्दुल हक़ मुद्दिस देहलवी ने लगाया था उलमा-ए-देवबन्द ने इसकी भरपूर आबयारी करके उसे तनावर दरख्त बना दिया। चुनांचे बर्रेसगीर के चप्पे चप्पे से तालिबाने उलूमे हदीस का ठाठे मारता हुआ समुन्दर उमड़ पड़ा और सिर्फ 150 साल की तारीख में दारूल उलूम देवबन्द और इस तर्ज़ पर क़ायम मदारिस के लाखों फ़ुज़ला उलूमे हदीस पढ़कर दुनिया के चप्पे चप्पे मे उलूमे नबूवत की इशाअत में मशगूल हो गए, उलमा-ए-देवबन्द की हदीस की नुमाया खिदमात का एतेराफ अरब उलमा ने भी किया है, चुनांचे कुवैत के एक वज़ीर ‘‘यूसुफ सैयद हाशिम अररिफाइ” ने लिखा है कि हाफिज़ ज़हबी और हाफिज़ इब्ने हजर असकलानी जैसे मेयार के उलमा दारूल उलूम देवबन्द मे मौजूद है।
बर्रेसगीर के उलमा खास तौर पर उलमा-ए-देवबन्द ने सही बुखारी की बहुत सी शरह लिखी है जिनमें से अल्लामा मोहम्मद अनवर शाह कश्मीरी की शरह फैज़ुलबारी अला सहीहिल बुखारी को बड़ी शोहरत हासिल हुई है।
उलमा देवबन्द की तहरीर करदा सही बुखारी की बाज़ अहम शरह
फैज़ुलबारी अला सहीहिल बुखारी
यह मुहद्दिसे कबीर शैख मोहम्मद अनवर शाह कश्मीरी का दरसे बुखारी है जिसको उनके शागिरदे रशीद शैख बदरे आलम मेरठी मुहाजिर मदनी ने अरबी ज़बान में तरतीब दिया है, सबसे पहले यह शरह मिश्र से शाये हुई, उसके बाद दुनिया के कई मुल्कों से लाखों की तादाद में शाये हो चुकी है, चुनांचे आज अरब व अजम में इस शरह को सही बुखारी की अहम शरह मे शुमार किया जाता है, इसकी चार ज़खीम ज़िल्दें हैं, बाज़ नाशेरीन ने छः जिल्दों में शाये किया है, अरब व अजम मे अल्लामा मोहम्मद अनवर शाह कश्मीरी का शुमार मुस्तनद व मोतबर महद्दिसीन में किया जाता है, मशरिक व मग़रिब के तमाम इल्मी हलक़ों ने अल्लामा मोहम्मद अनवर शाह कश्मीरी की सलाहियतो का एतेराफ किया है।
तालीक़ात जामिअह अला सहीहिल बुखारी (अरबी)
शैखुल हदीस अहमद अली सहारनपुरी ने बुखारी के 25 अजज़ा पर तालीक़ात की, बाकी पांच हिस्सों पर उनके शागिर्द शैख मोहम्मद क़ासिम नानौतवी ने तालीक़ की।
अल अबवाब वत तराजिम लिल बुखारी
इस किताब में बुखारी शरीफ के अबवाब की वज़ाहत की गई है, सही बुखारी में अहादीस के मजमूआ के उनवानात पर एक बहस मुस्तक़िल इल्म की हैसियत रखती है जिसे तरजुमतुल अबवाब कहते है, शैखुल हदीस मौलाना मोहम्मद ज़करिया ने इस किताब में शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी और अल्लामा इब्ने हजर असकलानी जैसे उलमा के ज़रिया बुखारी के अबवाब के बारे में की गई वज़ाहत ज़िक्र करने के बाद अपनी तहक़ीक़ी राय पेश की है, यह किताब अरबी ज़बान में है और इसकी 6 जिल्दें हैं।
लामेउद्दरारी अला जामे सहीहिल बुखारी
यह मजमूआ दरअसल शैख रशीद अहमद गंगोही का दरसे बुखारी है जो शैख मोहम्मद ज़करिया के वालिद शैख मोहम्मद यहया ने उर्दू ज़बान में लिखा था शैखुल हदीस मौलाना ज़करिया ने इसका अरबी ज़बान में तरजुमा किया और कुछ हज़फ व इज़ाफात करके किताब की तालीक़ और हवाशी खुद तहरीर फरमाए, इस तरह शैखुल हदीस की 12 साल की इंतिहाई कोशिश और मेहनत की वजह से यह अजमी किताब मंजरे आम पर आई, इस किताब पर शैखुल हदीस का मुक़द्दमा बेशुमार खूबियों का हामिल है, यह किताब अरबी ज़बान में है और इसकी 10 जिल्दें हैं।
अनवारूल बारी फी शरहिल बुखारी
यह मुहद्दिसे कबीर शैख अल्लामा मोहम्मद अनवर शाह कश्मीरी का दरसे बुखारी है जिसको शैख अहमद रज़ा बिजनौरी ने उर्दू ज़बान में तरतीब दिया है।
ईज़ाहुल बुखारी
यह शैख फखरूद्दीन अहमद मुरादाबादी का दरसे बुखारी है जो शैख रियासत अली बिजनौरी साहब ने उर्दू ज़बान में तरतीब दिया है।
शरह तराजिमुल बुखारी
शैखुल हिन्द मौलाना महमुदूल हसन देवबन्दी।
शरह तराजिमुल बुखारी
शैख मौलाना मोहम्मद इदरीस कांधलवी।
अत्तक़रीर अला सहीहिल बुखारी
शैख मोहम्मद ज़करिया कांधलवी, शैख मोहम्मद यूनुस।
इरशादुल क़ारी इला सहीहिल बुखारी
शैख मुफती रशीद अहमद लुधयानवी।
तल्खीसुल बुखारी शरह सही अलबुखारी
शैख शमसुज़्ज़ुहा मज़ाहिरी।
तूहफतुल क़ारी फी हल्लि मुश्किलातिल बुखारी
शैख मोहम्मद इदरीस कांधलवी।
इमदादुल बारी फी शरहिल बुखारी
शैख अब्दुल जब्बार आज़मी।
जमेउद्दरारी फी शरहिल बुखारी
शैख अब्दुल जब्बार आज़मी।
अत्तसवीबात लिमा फी हवाशिल बुखारी मिनत तसहीफात
शैख अब्दुल जब्बार आज़मी।
अलखैरूल जारी अला सहीहिल बुखारी
शैख खैर मोहम्मद मुजफ्फरगढी।
अन्नूरूस्सारी अला सहीहिल बुखारी
शैख खैर मोहम्मद मुजफ्फरगढी।
इहसानुल बारी लिफहमिल बुखारी
शैख मोहम्मद सरफराज खां सफदर।
जवाहिरूल बुखारी अला अतराफिल बुखारी
शैख क़ाज़ी ज़ाहिद हुसैनी।
इनमामुल बुखारी फी शरहिल बुखारी
शैख आशिक इलाही बुलन्दशहरी व मुहाजिर मदनी।
दुरूसे बुखारी
शैख हुसैन अहमद मदनी का दरसे बुखारी है जिसको शैख नेमतुल्लाह आज़मी मुरत्तब कर रहे हैं, बाज़ जिल्दें शाये हो चुकी हैं।
तरजुमा सही बुखारी
शैख शब्बीर अहमद उसमानी।
फजलुल बारी शरह सहीहिल बुखारी
शैख शब्बीर अहमद उसमानी।
अन्नबरासुस्सारी फी अतराफिल बुखारी
यह शैख अब्दुल अज़ीज़ गोजरानवाला की अरबी ज़बान में बुखारी की शरह है जो 2 जिल्दों पर मुशतमिल है, इनका हाशिया ‘‘मिक़यासुल वारी अलन्नबरासुस्सारी” भी काफी अहमियत का हामिल है।
तहकीक व तालिक लामिउद्दारारी अला जामेइल बुखारी
शैख मोहम्मद ज़करिया कांधलवी।
इनामुल बारी शरह बुखारी
शैख मोहम्मद अमीन चाटगामी
नसरूल बारी शरह अलबुखारी
यह सही बुखारी की शरह है जो शैख उसमान गनी ने तालिफ की है जिसकी 14 जिल्दें हैं।
तफ्हीमुल बुखारी
यह सही बुखारी का उर्दू तरजुमा है जो शैख जहूरूल बारी आज़मी क़ासमी ने किया है, जिसकी अरबी मतन के साथ 3 जिल्दें हैं।
हमदुल मुतआली अला तराजिमि सहीहिल बुखारी
यह शैख सैयद बादशाह गुल की किताब है जो शैख हुसैन अहमद मदनी के शागिर्द हैं।
फ़ज़लुल बुखारी फी फिक़हिल बुखारी
यह शैख अब्दुररऊफ हज़ारवी की किताब है जो शैख मोहम्मद अनवर शाह कश्मीरी के शागिर्द हैं।
तसहीलुल बारी फी हल्ले सहीहिल बुखारी
शैख सिद्दीक़ अहमद बांदवी।
कशफुल बारी फी शरहिल बुखारी
शैख सलीमुल्लाह खां साहब।
शरहुल बुखारी, तजरीदुल बुखारी
शैख मोहम्मद हयात सम्भली, यह शैख मुफती आशिक़ इलाही के उस्ताद हैं।
इनामुल बारी, दुरूसे बुखारी शरीफ
यह मौलाना मुफती मोहम्मद तक़ी उसमानी का दरसे बुखारी है जो मौलाना मुफती मोहम्मद अनवर हुसैन साहब ने उर्दू ज़बान में मुरत्तब किया, इसकी 16 जिल्दें हैं, जिनमें से सात ज़खीम जिल्दें शाये हो चुकी हैं, दूसरे बाक़ी शाये होने वाली हैं।
उलमा-ए-देवबन्द के बाज़ मुहद्दिसीने किराम के नाम
1866 मे दारूल उलूम देवबन्द और मज़ाहिरुल उलूम सहारनपूर के क़याम के बाद बर्रेसगीर में मादिरसे इस्लामिया का ऐसा अज़ीम जाल फैला दिया गया कि उससे बर्रेसगीर में रहने वाले करोड़ों मुसलमानों की दीनी तालीम व तरबियत का न सिर्फ माक़ूल इंतिज़ाम हुआ बल्कि मदारिसे इस्लामिया के तलबा व असातज़ा ने क़ुरान व हदीस की ऐसी खिदमात पेश कीं कि अरब व अजम में उनकी खिदमात का एतेराफ किया गया, चुनांचे मिश्र से शाये होने वाले मशहूर इल्मी रिसाले के एडिटर व मारूफ आलिमे दीन ‘‘शैख सैयद रशीद रज़ा” लिखते है ‘‘हिन्दुस्तानी उलमा की तवज्जोह उस ज़माना में इल्मुल हदीस की तरफ मुतवज्जह न होती तो मशरिक़ी मुल्कों से यह इल्म खत्म हो चुका होता, क्योंकि मिश्र, इराक़ और हिजाज़ में यह इल्म ज़ोफ की आखिरी मंज़िल तक पहुंच गया था”।
इन मदारिसे इस्लामिया के ज़रिये बर्रेसगीर में ऐसे बासलाहियत मुहद्दिसीन पैदा हुए जिन्होंने ज़िन्दगी का बेशतर हिस्सा हदीस खास कर सही बुखारी व सही मुस्लिम को पढ़ने पढ़ाने या उसकी शरह लिखने में सर्फ किया, इन मुहद्दिसीन में से चंद नुमायां नाम हस्बे ज़ैल हैं:
मौलाना मोहम्मद क़ासिम नानौतवी, शैखुल हिन्द महमूदुल हसन, मौलाना मोहम्मद अनवर शाह कश्मीरी, मौलाना रशीद अहमद गंगोही, मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना खलील अहमद सहरानपूरी, मौलाना शब्बीर अहमद उसमानी, मौलाना फखरूद्दीन अहमद मुरादाबादी, मौलाना मोहम्मद इदरीस कांधलवी, मौलाना मोहम्मद ज़करिया कांधलवी, मौलाना हबीबुर रहमान आज़मी, मौलाना मोहम्मद इसमाइल सम्भली (जो राक़िमुलहुरूफ के दादा है), मौलाना अब्दुल जब्बार आज़मी, मौलाना नसीर अहमद ख़ान, मौलाना उसमान गनी, मौलाना खुरशीद आलम, मौलाना मोहम्मद यूनूस आज़मी, मौलाना मोहम्मद तक़ी उसमानी, मौलाना नेमतुल्लाह आज़मी, मौलाना रियासत अली बिजनौरी और मौलाना सईद अहमद पालनपूरी दामत बरकातुहुम।
अल्लाह तआला से दुआ है कि मदारिसे इस्लामिया की हिफाज़त फरमाए और हमें क़ुरान व हदीस समझ कर पढ़ने वाला बनाए, उस पर अमल करने वाला बनाए और उसको दूसरों तक पहचाने वाला बनाए, आमीन।
मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)