बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन, वस्सलातु वस्सलामु अला नबिय्यिल करीम व अला अलिहि व अस्हाबिहि अजमईन

सब्र की तौफ़ीक सबसे बेहतर और वसीअतर अतिया

सब्र इन्सान में एक ऐसी दाख़िली क़ुदरत का नाम है जो ईमानी क़ुव्वत से पैदा होती है, जिसके ज़रिए अपनी ख़्वाहिशात पर क़ाबू पाने और अल्लाह तआला के फ़ैसलों पर क़नाअत करने का मलका हासिल होता है। सब्र का मतलब यह नहीं है कि इन्सान किसी तकलीफ़ या सदमे पर रोये भी नहीं। किसी तकलीफ़ या सदमे पर रंज व अफ़सोस करना इन्सान की फ़ितरत में दाख़िल है, इसीलिए शरीअते इस्लामिया ने किसी तकलीफ़ या मुसीबत के वक़्त रोने पर कोई पाबंदी नहीं लगाई, क्योंकि जो रोना बेइख़्तियार आ जाये वह बे सबरी में दाख़िल नहीं, अलबत्ता सब्र का मतलब यह है कि किसी तकलीफ़ या सदमे या हादसे पर अल्लाह तआला से कोई शिकवा ना किया जाये बल्कि अल्लाह तआला के फ़ैसले पर रज़ामंदी का इज़हार करके उसको तसलीम किया जाये। वैसे तो हर शख़्स अपनी ज़िन्दगी में बेशुमार मर्तबा सब्र करता है, मगर अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाने की सूरत में ही सब्र करना इबादत बनेगा, वरना मजबूरी।

जलीलुल क़द्र नबी हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम का मुसीबतों और तकलीफ़ों पर सब्र करना सब्रेअय्यूबी के नाम से मशहूर है। आपकी औलाद के इन्तक़ाल के अलावा आप का तमाम माल भी ख़त्म हो गया था, नीज़ मुतअद्दद बीमारियाँ आपको लग गयी थीं, जिनकी वजह से लोगों ने आपको अलग थलग कर दिया था, मगर हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम की बीवी ने आपकी बेमिसाल ख़िदमात कीं। जब बीवी को भी आपकी वजह से बहुत ज़्यादा तकालीफ़ का सामना करना पड़ा तो हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम ने अल्लाह तआला से अपनी तकलीफ़ों की दूरी के लिए दुआ फ़रमायी, चुनांचे आपको मुकम्मल सेहत अता कर दी गयी।

सब्र की मुतअद्दद अक़साम हैं। 1) अल्लाह तआला ने जिन आमाल के करने का हुक्म दिया है उनको बजा लाना ख़्वाह बज़ाहिर मिज़ाज के ख़िलाफ हो। मसलन गर्म बिस्तर छोड़ कर नमाज़े फ़ज्र की अदायगी करना। माल की मुहब्बत और उसकी ज़रूरत के बावजूद ज़कात के फ़र्ज़ होने पर ज़कात की अदायगी करना। 2) अल्लाह तआला ने जिन चीज़ों को हराम क़रार दिया है उनसे बचना ख़्वाह नफ़्स की ख़्वाहिश हो। मसलन शराब पीने और रिश्वत लेने से बचना। 3) अल्लाह तआला के फ़ैसलों पर सब्र करना, यानि जो भी हालात आयें उन पर सब्र करके अल्लाह तआला की तरफ़ रुजूअ करना।

अल्लाह तआला ने अपने पाक कलाम “कु़रआन करीम’’ में जगह जगह सब्र करने की तालीम दी है। चंद आयात पेश हैं: ऐ ईमान वालो! सब्र और नमाज़ से मदद हासिल करो। बेशक अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है और जो लोग अल्लाह के रास्ते में क़त्ल हों उनको मुर्दा ना कहो। दरअसल वह ज़िन्दा हैं, मगर तुमको (उनकी ज़िन्दगी का) एहसास नहीं होता और देखो हम तुम्हें आज़मायेंगे ज़रूर, (कभी) ख़ौफ़ सेऔर (कभी) भूख सेऔर (कभी) माल व जान और फलों में कमी करके और जो लोग (ऐसे हालात में) सब्र से काम लें उनको ख़ुशख़बरी सुना दो। (सूरह अलबक़रा 153-155) इसी तरह फ़रमाने इलाही है: ऐ ईमान वालो! सब्र करो और दुश्मन के मुक़ाबले में डटे रहो। (सूरह आले इमरान 200) सब्र करने वालों को बेहिसाब अज्र व सवाब अता किया जायेगा जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है: जो लोग सब्र से काम लेते हैं उनका सवाब उन्हें बेहिसाब दिया जायेगा। (सूरह अज़्ज़ुमर 10) हालात पर सब्र करने को अल्लाह तआला ने हिम्मत वाला काम क़रार दिया, चुनांचे फ़रमाने इलाही है: जो शख़्स सब्र से काम ले और दरगुज़र कर जाये तो यह हिम्मत के कामों में से है। सूरह अल अस्र में ख़ालिक़े कायनात ने इन्सान की कामयाबी के लिए सब्र और सब्र की तलक़ीन को लाज़िम क़रार दिया।

क़यामत तक आने वाले इन्सानों व जिनों के आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भी अपने क़ौल व अमल से सब्र करने की तरग़ीब दी, चुनांचे नबी बनाये जाने से लेकर वफ़ात तक आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को बेशुमार तकलीफ़ें दी गयीं। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ऊपर ऊंटनी की ओझड़ी डाली गयी। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ऊपर घर का कूड़ा डाला गया। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को काहिन, जादूगर और मजनू कहकर मज़ाक उड़ाया गया। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बेटियों को तलाक़ दी गयी। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का तीन साल तक बायकाट किया गया। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर पत्थर बरसाये गये। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अपना शहर छोड़ना पड़ा। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम गज़वा-ए-उहद के मौक़े पर ज़ख्मी किये गये। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को जहर देकर मारने की कोशिश की गयी। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कभी एक दिन में दोनों वक़्त पेट भरकर खाना नहीं खाया। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भूख की शिद्दत की वजह से अपने पेट पर दो पत्थर बांधे। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के घर में दो दो महीने तक चूल्हा नहीं जला। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ऊपर पत्थर की चट्टान गिराकर मारने की कोशिश की गयी। हज़रत फ़ातमा रज़िअल्लाहु अन्हा के सिवा आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सारी औलाद की आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने वफ़ात हुई। ग़र्ज़ कि सय्यिदुल अंबिया व सय्यिदुल बशर को मुख़्तिलफ़ तरीक़ों से सताया गया, मगर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कभी सब्र का दामन नहीं छोड़ा, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रिसालत की अहम ज़िम्मेदारी को इस्तक़ामत के साथ बहुस्न ख़ूबी अन्ज़ाम देते रहे। हमें आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़िन्दगी से यह सबक़ लेना चाहिए कि घरेलू या मुल्की या आलमी सतह पर जैसे भी हालात हमारे ऊपर आयें, हम उन पर सब्र करें और अपने नबी के नक़्शे कदम पर चलते हुए अल्लाह से अपना ताल्लुक़ मज़बूत करें।

हुजू़रे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: मुसलमान को जो भी थकावट, बीमारी, ग़म, रंज, दुख और तकलीफ़ पहुंचती है हत्ता कि वह कांटा भी जो उसको चुभता है, उसकी वजह से अल्लाह तआला उसकी ग़लतियाँ माफ़ फ़रमाते हैं। (सहीह बुख़ारी व सहीह मुस्लिम) हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: जो शख़्स सवाल से बचने की कोशिश करता है अल्लाह उसे बचा लेते हैं और जो बेनियाज़ी तलब करता है अल्लाह तआला उसको बेनियाज़ कर देते हैं। जो सब्र इख़्तियार करता है अल्लाह तआला उसको सब्र अता करते हैं। सब्र से ज़्यादा बेहतर और वसीअतर अतिया किसी को नहीं दिया गया। (सहीह बुख़ारी व सहीह मुस्लिम) हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: मोमिन का सारा मामला ही अजीब है कि उसके तमाम काम उसके लिए ख़ैर हैं। मोमिन के अलावा किसी को यह चीज़ (अल्लाह की अज़ीम नेमत) हासिल नहीं। अगर उसको ख़ुशहाली मयस्सर आती है तो शुक्र करता है तो यह शुक्र करना उसके लिए बेहतर है और अगर उसको तंगदस्ती आ जाये तो सब्र करता है तो यह सब्र करना उसके लिए बेहतर है। (सहीह मुस्लिम)

हज़रत अनस रज़िअल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का गुज़र एक औरत के पास से हुआ जो क़ब्र पर बैठी रो रही थी। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: तू अल्लाह से डर और सब्र कर। उसने कहा मुझसे हट जाओ। तुम्हें मेरी वाली मुसीबत नहीं पहुंची और ना तुम उसको जानते हो। उस औरत ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को नहीं पहचाना था। जब उसको बता गया कि वह हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम थे, तो वह हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दरवाज़े पर हाज़िर हुई और वहां किसी दरबान को ना देखा तो कहने लगी। मैंने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को नहींपहचाना। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: बिलाशुबह सब्र वही है जो तकलीफ़ के आगाज़ में किया जाये। (सहीह बुख़ारी व सहीह मुस्लिम) यानि किसी मुसीबत या परेशानी के आने पर शुरू से ही सब्र करना चाहिए। हुजू़रे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम  ने इरशाद फ़रमाया: जिससे अल्लाह तआला भलाई का इरादा फ़रमाता है उसको तकलीफ़ में मुबतला कर दिया जाता है। (सहीह बुख़ारी) हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: तुम में से कोई शख़्स तकलीफ़ में मुबतला होने की वजह से मौत की ना तमन्ना करे। अगर उसे करना ही हो तो यूं कहे: ऐ अल्लाह! मुझे ज़िन्दा रख जब तक ज़िन्दगी में मेरे लिए ख़ैर है और मुझे मौत दे जब मौत में मेरे लिए बेहतरी हो। (सहीह बुख़ारी व सहीह मुस्लिम)

हुजू़रे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: जब अल्लाह तआला किसी बंदे के साथ भलाई का इरादा फ़रमाता है तो उसको दुनिया में भी गुनाह की सज़ा जल्द दे देता है और जब अल्लाह तआला किसी बन्दे से बुराई का इरादा फ़रमाता है तो गुनाह के बावजूद सज़ा को रोक देता है ताकि पूरी सज़ा क़यामत के दिन दे। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मज़ीद फ़रमाया: बड़ा बदला बड़ी आज़माइश के साथ है। अल्लाह तआला जब किसी क़ौम को पंसद फ़रमाता है तो उनको किसी आज़माइश में डाल देता है। जो उस आज़माइश से राज़ी हो उसके लिए अल्लाह की रज़ामंदी है और जो नाराज़ हो उसके लिए अल्लाह की नाराज़गी है। (तिर्मिज़ी) हुजू़रे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: तुम में बहादुर वह नहीं जो दूसरों को पछाड़ दे। बहादुर वह है जो गुस्से के वक़्त अपने नफ़्स पर कंट्रोल करे। (सहीह बुख़ारी व सहीह मुस्लिम) हुजू़रे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: मोमिन मर्द व औरत की जान, औलाद और माल पर आज़माइश आती रहती है यहां तक कि वह अल्लाह तआला से जा मिलता है कि उस पर कोई गुनाह नहीं होता। (तिर्मिज़ी)

किसी क़रीबी रिश्तेदार के इन्तक़ाल पर दिल का ग़मगीन होना और आंखों से आंसू का बहना एक फ़ितरी तकाज़ा है। मगर बुलन्द आवाज़ से मरहूम के औसाफ बयान करके रोने पीटने, कपड़ों के फाड़ने से हमारे नबी हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मना फ़रमाया है। हमें ऐसे मौक़े पर सब्र से काम लेना चाहिए। हज़रत उम्मे सलमा रज़िअल्लाहु अन्हा फ़रमाती हैं कि मैं ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को इरशाद फ़रमाते हुए सुना: कोई बन्दा भी अपनी मुसीबत में यह कहे “इन्ना लिल्लाहि वइन्ना इलैइहि राजिऊन, अलहुम्मा अजिरनी फ़ी मुसीबती वख़्लुफ़ ली ख़ैइरम्मिन्हा’’ तो अल्लाह तआला उसे उसकी मुसीबत में उसका सवाब अता करता है और उससे बेहतर चीज़ उसे अता करता है। चुनांचे जब अबू सलमा रज़िअल्लाहु अन्हु का इन्तक़ाल हुआ तो मैंने भी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के हुक्म के मुताबिक़ यह दुआ पढ़ी, हालांकि मैं सोच रही थी कि उनसे बेहतर कौन होगा? अल्लाह तआला ने मुझे उनसे बेहतर दौलत यानि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अता किया। (सहीह मुस्लिम) हज़रत उम्मे सलमा रज़िअल्लाहु अन्हा का पहला निकाह हज़रत अबू सलमा रज़िअल्लाहु अन्हु से हुआ थाजो नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फूफीज़ाद भाई थे। उन्होंने अपने शौहर के साथ हबशा और फिर मदीना की तरफ़ हिजरत की थी। आपको आप के ख़ानदान वालों ने हज़रत अबू सलमा रज़िअल्लाहु अन्हु के साथ मदीना मुनव्वरा हिजरत करने से रोक दिया था और गोद का बच्चा भी छीन लिया था। बाद में हज़रत उम्मे सलमा रज़िअल्लाहु अन्हा की हालत पर तरस खाकर ख़ानदान वालों ने बच्चे को दे दिया था और मदीना मुनव्वरा हिजरत करने की भी इज़ाजत दे दी थी। आप पहली मुहाजिर ख़ातून थीं। उनके शौहर हज़रत अबू सलमा रज़िअल्लाहु अन्हु की जंगे उहद के ज़ख्मों से वफ़ात हो गयी थी। चार बच्चे यतीम छोड़े। जब कोई बज़ाहिर दुनियावी सहारा ना रहा तो नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बेकस बच्चों और उनकी हालत पर रहम खाकर उनसे निकाह कर लिया।

ख़ुलासाए कलाम यह है कि दुनिया में कोई भी बशर ऐसा नहीं है जिसको परेशानियों, मुसीबतों, तकलीफ़ों और दुश्वारियों का सामना ना करना पड़े। ख़ालिक़े कायनात ने क़ुरआने करीम (सूरह अल बलद) में चार चीज़ों की क़सम खाकर क़यामत तक के लिए उसूल व ज़ाब्ता बयान फ़रमा दिया कि दुनिया में इन्सान को इस तरह पैदा किया गया है कि उसे ज़िन्दा रहने के लिए किसी ना किसी शकल में मशक़्कत ज़रूर उठानी पड़ती है चाहे वह कितना ही बड़ा हाकिम या दौलतमंद शख़्स क्यों ना हो। अंबिया, सहाबा, उलमा और सालेहीन को भी दुश्वारकुन मराहिल से गुज़रना पड़ा है। हमारे ऊपर जो परेशानियाँ और दुश्वारियाँ आती हैं वह या तो हमारे आमाल की सज़ा होती हैं या अल्लाह तआला की जानिब से हमारी आज़माइश होती है। लिहाज़ा मुसीबत या परेशानी के वक़्त गुनाहों से तौबा इस्तग़फार करके हमें अल्लाह तआला की तरफ़ रुजूअ करना चाहिए, उसी में हमारी कामयाबी पोशीदा है। दुश्वारियों और परेशानियों के वक़्त रब्बुल आलमीन ने हमें सब्र करने और नमाज़ क़ायम करने का हुकम दिया और फ़रमाया कि अल्लाह तआला सब्र करने वालों के साथ है, यानि सब्र करने वालों को अल्लाह की मइय्यत का शर्फ़ हासिल होता है। इन दिनों मुसलमानों के सामने इलाक़ाई व आलमी सतह पर बेशुमार मसाइल दरपेश हैं, जिनके हल के लिए मुतअद्दद फार्मूले पेश किये जा सकते हैं, लेकिन सबसे अहम फार्मूला यह है कि हम अपना ताल्लुक़ ख़ालिक़े कायनात से मज़बूत करें और ख़ालिक़े कायनात के हुक्म की रोशनी में हालात पर सब्र करके नमाज़ के ज़रिए अल्लाह तआला से मदद चाहें।

डॉ॰ मुहम्मद नजीब क़ासमी संभली (www.najeebqasmi.com)