जुनबी और हाइज़ा औरत के लिए क़ुरान की तिलावत नाजाएज़

अगर किसी मर्द या औरत को गूसल की जरूरत पड़ जाए यानी औरत हैज (माहवारी) की हालत में हो तो क़ुरान व हदीस की रौशनी मेंजमहूर मुहद्देसीन, मुफस्सिरीन, फुकहा और उलमा--कराम का इत्तिफाक है कि उसके लिए जाएज़ नहीं कि वह क़ुरान करीम को छुए या छू कर तिलावत करे। बहुत से सहाबा--कराम, ताबेईन--एज़ाम और चारों अईम्मा (इमाम अबु हनीफा, इमाम मालिक, इमाम शाफई और इमाम अहमद बिन हमबल) ने भी क़ुरान व हदीस की रौशनी में यही फरमाया है। उलमा--अहनाफ, उलमा--कराम और सउदी अरब के मशाइख ने भी यही लिखा है कि नापाक मर्द व औरत इसी तरह वह औरत जिसको माहवारी आ रही हो उसके लिए जाएज़ नहीं कि वह क़ुरान करीम छुए या क़ुरान छू कर इसकी तिलावत करे। जमहूर उलमा ने इसके लिए क़ुरान व हदीस से बहुत सी दलीलें पेश की हैं। इन दलीलों में क़ुरान करीम में अल्लाह तआला का इरशाद है ‘‘इसको (यानी क़ुरान करीम को) वही लोग छू सकते हैं जो पाक हों‘‘ (सूरह अलवाकिआ आयत 79) इस आयत से मुफस्सिरीन ने दो मफ़हूम मुराद लिए हैं।

(1) क़ुरान करीम को लौहे महफूज़ में पाक फरिशतों के सिवा कोई और छू नहीं सकता है।

(2) जो क़ुरान करीम हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु आलैहि वसल्लम पर नाज़िल हुआ है यानी वह मुसहफ जो हमारे हाथों में है इसको सिर्फ पाकी की हालत में ही छूआ जा सकता है।

दूसरी तफसीर के मुताबिक वाज़ेह तौर पर मालूम हुआ कि नापाकी (यानी ऐसी नापाकी जो बड़ी और छोटी दोनों हों) की हालत में क़ुरान छूना जाएज़ नहीं है। पहली तफसीर में जिसको मुफस्सिरीन ने राजेह करार दिया है अगरचे एक खबर दी जारही है कि क़ुरान करीम को लौहे महफूज़ में पाक फरिशतों के सिवा कोई और छू नहीं सकता मगर हमारे लिए वाज़ेह तौर पर यह पैगाम है कि जब लौहे महफूज़ में पाक फरिशते ही इसको छू सकते हैं तो हम दुनिया में नापाकी की हालत में क़ुरान करीम को कैसे छू सकते हैं। नीज़ क़ुरान करीम के पहले मुफस्सिर और सारी इंसानियत में सबसे अफज़ल व आला हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इरशादात में भी यही तालीम मिलती है कि नापाकी की हालत में वजू के बेगैर क़ुरान करीम को न छुए और न छूकर तिलावत करें।

हज़रत उमर बिन हज़म (रज़ी अल्लाहु अन्हु) ने यमन वालों को लिखा कि क़ुरान करीम को पाकी के बेगैर न छुआ जाए। (मुअत्ता मालिक) और (दारमी में) यह हदीस मुख्तलिफ सनदों से अहादीस की बहुत सी किताबों में लिखी हुई है और जमहूर मुहद्देसीन ने इसको सही करार दिया है।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ी अल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया ‘‘हाइज़ा (वह औरत जिसको माहवारी आ रही हो) और जुंबी (जिसपर गुसल वाजिब हो गया है) क़ुरान करीम से कुछ भी न पढ़े(तिर्मीज़ी 131, इबने माजा 595, दारे कुतनी 1/117 और बैहिकी 1/89)

सहाबा--कराम व ताबेईन के दरमायान यह बात अच्छी तरह मालूम थी कि नापाकी की हालत में और बेवज़ू क़ुरान करीम को नहीं छुआ जा सकता है। चुनांचे बाज़ सहाबा-- कराम और ताबेईन के अकवाल हदीस की मशहूर किताबों में लिखी हुई है। गरज़ ये कि क़ुरान व हदीस की रौशनी में खैरूल कुरून से असरे हाजि़र तक के जमहूर मुहद्देसीन, मुफस्सिरीन, फुकहा व उलमा--कराम और चारों अईम्मा ने यही कहा है कि बेगैर वजू, इसी तरह नापाकी की हालत में क़ुरान करीम का छूना दुरुस्त नहीं है। हाँ हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अकवाल की रौशनी में फुकहा व उलमा ने लिखा है कि अगर कोई शख्स क़ुरान करीम को छुए बेगैर सिर्फ ज़बानी पढ़ना चाहता है तो उसके लिए वजू जरूरी नहीं है। लेकिन नापाकी की हालत में यानी अगर किसी मर्द या औरत पर गुसल वाजिब हो गया है तो क़ुरान व हदीस की रौशनी में जमहूर उलमा का इस बात पर इत्तिफाक है कि फिर क़ुरान करीम की ज़बानी भी तिलावत नहीं की जा सकती है।

हाइज़ा (वह औरत जिसको माहवारी आ रही हो) के बारे में 80 हिजरी में पैदा हुए मुहद्दिस व फकीह शैख नोमान बिन साबित (रहमतुल्लाह अलैह) (इमाम अबु हनिफा), उलमा--अहनाफ, हिन्द व पाक के उलमा और दूसरे मुहद्देसीन व मुफस्सिरीन ने हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फरमान (हाइज़ा और जुनबी क़ुरान करीम से कुछ भी नह पढ़े) और दूसरे दलिलों की रौशनी में फरमाया है कि जुनबी या हाइज़ा भी क़ुरान करीम को ज़बानी नहीं पढ़ सकती है। बाज़ उलमा--कराम ने जिक्र किए हुए हदीस को कमज़ोर कहकर इज़ाजत दी है कि हाइज़ा औरत सिर्फ ज़बानी क़ुरान करीम की तिलावत कर सकती है मगर गौर तलब बात यह है कि जुनबी और हाइज़ा औरतों के बहुत से मसलों में एक ही हुकुम है। मसलन मस्जिद में दाखिल होना या बैठना, नमाज़ पढ़ना और तवाफ करना और क़ुरान करीम छूकर तिलावत करना दोनों के लिए जाएज़ नहीं हैं वगैरह वगैरह तो इस मज़कूरह हदीस को कमज़ोर करार देकर हाइज़ा औरत के लिए ज़बानी तौर पर लितावत की इजाजत देना महल्ले नज़र है। हाँ अगर कोई औरत क़ुरान की आयत को दुआ के तौर पर पढ़ रही है तो जाएज़ है।

खुलासा कलाम खैरूल कुरून से असर हाजि़र तक जमहूर मुहद्देसीन, मुफस्सिरीन व फुकहा व उलमा--कराम का इत्तिफाक है कि जुनबी की तरह हाइज़ा औरत के लिए क़ुरान करीम की छूकर लितावत करना जाएज़ नहीं है बल्कि बेगैर वजू के किसी भी मर्द या औरत के लिए क़ुरान करीम को छूना या छूकर तिलावत करना जाएज़ नहीं है। इमाम अबु हनीफा और दूसरे उलमा की राय में हदीस की मशहूर व मारूफ किताबों (तिर्मीज़ी, इबने माजा, दारे कुतनी, बैहिकी और दूसरे कूतूबे हदीस) में वारिद हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि विसल्लम के फरमान (हाइज़ा और जुनबी क़ुरान करीम से कुछ भी नह पढ़े) की रौशनी में जुनबी और हाइज़ा औरत के लिए ज़बानी भी क़ुरान करीम की तिलावत करना जाएज़ नहीं है।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)