बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन, वस्सलातु वस्सलामु अला नबिय्यिल करीम व अला अलिहि व अस्हाबिहि अजमईन

कौसर जन्नत की एक नहर हैजिससे क़यामत के दिन नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के उम्मती सैराब होंगे

तर्जुमा सूरह अलकौसर:

(ऐ पैग़म्बर!) यक़ीन जानो हम ने तुम्हें कौसर अता कर दी है। लिहाज़ा तुम अपने परवरदिगार (की ख़ुशनूदी) के लिए नमाज़़ पढ़ो और क़ुर्बानी करो। यक़ीन जाने तुम्हारा दुश्मन ही वह है जिसकी जड़ कटी हुई है (मक़तूउन्नस्ल) यानि तुम्हारे दुश्मन का नाम लेने वाला कोई नहीं होगा।

शाने नुज़ूल:

जिस वक़्त हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साहबज़ादे (हज़रत क़ासिम रज़िअल्लाहु अन्हु) का बचपन में इन्तेक़ाल हुआ तो कुफ़्फ़ारे मक्का ख़ासकर आस बिन वाइल आपको अबतर’’ कहकर ताना देने लगा। अबतर का मतलब जिसकी नस्ल आगे न चले (मक़तूउन्नस्ल) यानि जिसको कोई लड़का ना हो। उस पर अल्लाह तआला ने अपने हबीब के इत्मिनान के लिए यह सूरह नाज़िल फ़रमाई कि आपको तो अल्लाह तआला ने एक ऐसी अज़ीम नेमत से नवाज़ा है जो किसी नबी या रसूल को भी नहीं अता की गयी, यानि हौज़े कौसर। आपका नाम लेने वाले और आप के दीन पर अमल करने वाले बेशुमार लोग होंगे।अबतर’’ तो तुम्हारा दुश्मन है जिसका नाम लेने वाला भी कोई नहीं होगा। चुनांचे ऐसा ही हुआ कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की क़ीमती ज़िन्दगी का एक एक लम्हा किताबों में महफूज़़ है। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की एक एक सुन्नत आज तक ज़िन्दा है। आपका नाम लेने वाले और आपकी सुन्नतों पर मर मिटने वाले बेशुमार लोग दुनिया में मौजूद हैं और इंशाअल्लाह रहेंगे। ताना देने वाले को कोई जानता भी नहीं और अगर कोई तज़किरा भी करता है तो बुराई के साथ।

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का ज़िक्रे मुबारक:

अल्लाह तआला ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़िक्रे मुबारक को कैसा आली व बुलन्द मक़ाम अता फ़रमाया कि चौदह सौ साल गुज़रने के बाद भी दुनिया के चप्पे चप्पे पर हर हर लम्हा अल्लाह तआला की बड़ाई के साथ नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का नामे मुबारक मस्जिदों के मिनारों से पुकारा जाता है। अल्लाह की वहदानियत की शहादत के साथ नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के रसूल होने की शहादत दी जाती है। कोई शख़्स उस वक़्त तक मोमिन नहीं हो सकता है जब तक वह अल्लाह की वहदानियत के इक़रार के साथ मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अपना नबी और रसूल तसलीम ना कर ले। कोई एक सिकंड भी ऐसा नहीं गुज़रता जिसमें नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर दरूद व सलाम ना भेजा जाता हो। क़यामत तक आने वाले इन्सानों व जिनों के नबी को यह बुलन्द मक़ाम सिर्फ दुनिया में नहीं बल्कि आख़िरत में भी हासिल होगा, चुनांचे आख़िरत में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को शफाअते कुबरा का मक़ाम महमूद हासिल होगा। जिसके ज़रिये कल क़यामत के दिन आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम लोगों की शफ़ाअत फरमायेंगे। सूरह अलइसरा आयत 79 से मालूम होता है कि नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शफ़ाअत के हुसूल के लिए हमें नमाज़े तहज्जुद का एहतमाम करना चाहिए।

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की नस्ल:

नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सारी औलाद आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पहली बीवी हज़रत ख़दीजा रज़िअल्लाहु अन्हा से मक्का मुकर्रमा में हुई, सिवाय आपके बेटे हज़रत इब्राहिम रज़िअल्लाहुअन्हु के, वह हज़रत मारिया क़िबतियह रज़िअल्लाहु अन्हा से मदीना मुनव्वरा में पैदा हुए। हज़रत ख़दीजा रज़िअल्लाहुअन्हा की उम्र निकाह के वक़्त 40 साल थी, यानि हज़रत खदीज़ा आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से उमर में 15 साल बड़ी थीं। नीज़ वह नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ निकाह करने से पहले दो शादियाँ कर चुकी थींऔर उनके पहले शोहरों से बच्चे भी थे। जब नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की उमर 50 साल की हुई तो हज़रत ख़दीजा रज़िअल्लाहुअन्हा का इन्तेकाल हो गया। इसी तरह नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी पूरी जवानी (25 से 50 साल की उमर) सिर्फ एक बेवा औरत हज़रत ख़दीजा रज़िअल्लाहुअन्हा के साथ गुज़ार दी।

नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तीन बेटे:

1. हज़रत क़ासिम रज़िअल्लाहुअन्हु

2. हज़रत अब्दुल्लाह रज़िअल्लाहु अन्हु

3. हज़रत इब्राहिम रज़िअल्लाहुअन्हु।

नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की चार बेटियाँ:

1. हज़रत जै़नब रज़िअल्लाहु अन्हा

2. हज़रत रुक़य्या रज़िअल्लाहु अन्हा

3. हज़रत उम्मे कुलसूम रज़िअल्लाहु अन्हा

4. हज़रत फ़ातिमा रज़िअल्लाहु अन्हा।

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की नस्ल आप की साहबज़ादियों से चली और इंशाअल्लाह कल क़यामत तक आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की नस्ल बाक़ी रहेगी। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मानने वालेजो आप की औलाद के दर्जे में हैं, वह तो इस कसरत से होंगे कि पिछले तमाम अम्बियाए किराम की उम्मतों से भी बढ़ जायेंगे और उनका एज़ाज़ व इकराम भी दीगर उम्मतों के मुक़ाबले में ज़्यादा होगा।

कौसर के लफ़्ज़ी मायने बहुत ज़्यादा भलाई’’ के हैं और कौसर जन्नत की उस हौज़ का नाम भी है जो हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तसर्रुफ में दी जायेगी और आप की उम्मत के लोग इससे सैराब होंगे। एक रोज़ जबकि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मस्जिद में हमारे दरमियान थे, अचानक आप पर एक क़िस्म की नींद या बेहोशी की की कैफ़ियत तारी हुई, फिर हंसते हुए आप ने सरे मुबारक उठाया। हमने पूछा या रसूलुल्लाह! आप के हंसने की वजह क्या है? तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि मुझ पर इसी वक़्त एक सूरह नाज़िल हुई है, फिर आप ने बिस्मिल्लाह के साथ सूरह अलकौसर पढ़ी। फिर फ़रमाया: तुम जानते हो कौसर क्या चीज़ है? हमने अर्ज़ किया: अल्लाह और उसके रसूल ज़्यादा जानते हैं। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि यह जन्नत की एक नहर है, जिसका मेरे रब ने मुझसे वादा फ़रमाया है, जिसमें बहुत ख़ैर है और वह हौज़ है जिस पर मेरी उम्मत क़यामत के रोज़ पानी के लिए आयेगी, उसके पानी पीने के बर्तन सितारों की तादाद की तरह बहुत ज़्याद होंगे। उस वक़्त कुछ लोगों को फरिश्ते हौज़ से हटा देंगे तो मैं कहूंगा कि मेरे परवरदिगार यह तो मेरे उम्मती हैं। अल्लाह तआला फ़रमायेगा कि आप नहीं जानते कि उन्होंने आपके बाद क्या नया दीन इख़्तियार किया है। (बुख़ारी व मुस्लिम)

हौज़ कौसर क्या है?

अहादीस में मज़कूर है कि नहरे कौसर असल में जन्नत में हैजिसकी दो नालियों से हौज़े कौसर में पानी आता रहेगा। हौज़े कौसर क़यामत के मैदान में होगा। हौज़े कौसर पर नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की उम्मत जन्नत में दाखिल होने से पहले पानी पियेगी। नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस हौज़ के वस्त में तशरीफ फ़रमा होंगे। उसकी लम्बाई ऐल (उर्दुन और फलस्तीन के दर्मियान एक इलाक़ा) से सनआ (यमन) तक होगीऔर उसकी चैड़ाई इतनी होगी जितना ऐला से जहफ़ा (जद्दा और राबिग़ के दर्मियान एक मक़ाम) तक फ़ासला है। हौज़े कौसर का पानी दूध से ज़्यादा सफेद, बर्फ़ से ज़्यादा ठण्डा, शहद से ज़्यादा मीठा होगा। उसकी तह की मिट्टी मुश्क से ज़्यादा ख़ुशबूदार होगी। जो इसका पानी पीलेगा उसे फिर कभी प्यास ना लगेगी।

फ़सल्लिलि रब्बिका वनहर:

तुम अपने परवरदिगार (की ख़ुशनूदी) के लिए नमाज़़ पढ़ो और क़ु़र्बानी करो। सूरह की पहली आयत में बताया गया कि आप को एक अज़ीम नेमत यानि हौज़े कौसर से नवाजा गया है और उसके शुक्रिया के लिए आप को दो चीज़ों का हुक्म दिया गया। एक: नमाज़़ की अदायगीऔर दूसरे क़ुर्बानी करना। क़ुरआन व हदीस की रोशनी में पूरी उम्मते मुस्लिमा का इत्तेफाक़ है कि ईमान के बाद सबसे अहम इबादत नमाज़़ की अदायगी है। चुनांचे अल्लाह तआला ने अपने पाक कलाम (क़ुरआन मजीद) में सबसे ज़्यादा नमाज़़ का ही ज़िक्र फ़रमाया है। मोहसिने इन्सानियत के फ़रमान केमुताबिककल क़यामत के दिन सबसे पहले नमाज़़ ही का हिसाब लिया जायेगा। नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की आख़िरी वसीयत भी नमाज़़ की पाबंदी के मुताअल्लिक़ है। नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की 23 साला नबूवत वाली क़ीमती ज़िन्दगी का वाफिर हिस्सा नमाज़़ की अदायगी में ही लगा। लिहाज़ा हमें पांचों नमाज़ों की पाबंदी के साथ सुनन व नवाफ़िल का भी एहतमाम करना चाहिए।

कुर्बानी भी एक अज़ीम इबादत है, चुनांचेहुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज्जतुल विदाअ के मौके पर सौ ऊंटों की कु़र्बानी पेश फ़रमायी थी जिसमें से 63 ऊंटों की क़ुर्बानी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने मुबारक हाथों से की थी और बक़िया 37 ऊंट हज़रत अली रज़िअल्लाहु अन्हु ने नहर (यानि ज़िबह) फ़रमाये।इसी तरह हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि ज़ुल हिज्जा की 10 तारीख़ को कोई नेक अमल अल्लाह तआला के नज़दीक क़ुर्बानी का ख़ून बहाने से बढ़कर महबूब और पसंदीदा नहीं। क़ुरआने करीम की दूसरी आयत में नमाज़़ के साथ कुर्बानी का ज़िक्र किया गया है। (इन्ना सलाती व नुसुकी व महयाया व ममाती लिल्लाहि रब्बिल आलमीन)

इन्ना शानिअका हुवलअब्तर: तुम्हारा दुश्मन ही मक़तूउन्नस्ल होगा, यानि उसका कोई नाम लेने वाला नहीं होगा। आपकी औलाद इंशाअल्लाह कल क़यामत तक चलेगी अगरचे दुख़्तरी औलाद से हो। आपके मानने वाले कल क़यामत तक बेशुमार होंगे। और क़यामत के दिन आप की उम्मत सारे नबियों की उम्मतों से ज़्यादा तादाद में होगी।

इस सूरह में हमारे लिए सबक़:

1) हौज़े कौसर पर ईमान लाना कि वह बरहक़ है और नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के उम्मती इससे सैराब होंगे। तक़रीबन पचास साहबाए किराम से हौज़े कौसर की अहादीस मरवी हैं।

2) पांचो वक़्त की नमाज़़ की पाबंदी।

3) हस्बे इस्तताअत क़ुरबानी के अय्याम में ज़्यादा से ज़्यादा क़ुरबानी करना।

4) अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को दुनिया और आख़िरत में बुलन्द आला मक़ाम अता किया है। हमारे नबी के दुश्मनों का दोनों जहां में ख़सारा और नुक़सान हैऔर उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है।

5) दीने इस्लाम में नयी बातें पैदा करने वालों को हौज़े कौसर से दूर कर दिया जायेगा, लिहाज़ा हम अपनी तरफ से कोई नया अमल दीने इस्लाम में शुरू ना करें।

डॉ॰ मुहम्मद नजीब क़ासमी संभली