بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

फितनों के दौर में औरतों का ईद की नमाज़ के लिए ईदगाह जाना मुनासिब नहीं
इसमें कोई शक नहीं है कि हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जमाना में औरतें नमाज़े ईद के लिए ईदगाह जाया करती थीं जैसा कि अहादीस में मजकूर है। लेकिन बाज हकायक को हमें नजर अंदाज नहीं करना चाहिए। मसलन मदीना मुनव्वरा की हिजरत के दूसरे साल रमजान के रोजे फर्ज़ हुए। यानी 2 हिजरी से नमाज़े ईद की इब्तिदा हुई जबकि परदा का हूकुम 5 या 6 हिजरी में नाजिल हुआ। यानी तकरीबन इब्तिदाई पांच साल की नमाज़ में औरतें के जाने में कोई मसअला ही नहीं था क्योंकि परदा का हूकुम ही नाजिल नहीं हुआ था। नीज शरई अहकाम थोड़े थोड़े नाजिल हो रहे थे और किसी फितना की कोई उम्मीद थी नहीं थी, लिहाजा जरूरत थी कि औरतें भी नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सोहबत से बराहे रास्त मुस्तफीज हो कर दीनी रहनुमाई हासिल करें। उम्मुल मोमेनीन हजरत आईशा रजी अल्लाहु अन्हा जिनके जरिया शरीअते इस्लामिया का एक काबिले कदर हिस्सा उम्मते मुस्लिमा को पहुंचा है, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात के बाद तकरीबन 48 साल हयात रहीं। सिर्फ 48 साल के दौर में औरतों के तअल्लुक से मुआशरा में जो तब्दिलियां उन्होंने अपनी जिन्दगी में देखीं तो फरमाया कि औरतो ने जो तजईन का तरीका इख्तियार कर लिया है और फितना के मौके बढ़ गए हैं, अगर हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जिन्दा होते तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम औरतों को मस्जिदों में जाने से रोक देते, जैसा कि बनी इसराइल की औरतों को रोक दिया गया था। (मुस्लिम) नीज हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जमाना में यकीनन औरतों को मस्जिदों में जाने की इजाजत थी मगर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मस्जिदे नबवी में नमाज़ पढ़ने के बजाए वक्तन फवक्तन उनको घरों में नमाज़ पढ़ने की तरगीब देते थे। चुनांचे हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि औरतों के घर (नमाज़ के वास्ते) उनके हक में ज्यादा बेहतर हैं। यानी मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के मुकाबला में उनके लिए घर में नमाज़ पढ़ना ज्यादा सवाब का बाइस है। (अबु दाउद) इसी लिए हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि औरत की नमाज़ अपने घर के अन्दर घर के सेहन की नमाज़ से बेहतर है। और उसकी नमाज़ घर की छोटी कोठरी में घर की नमाज़ से बेहतर है। (अबु दाउद) यानी औरत जिस कदर पोशीदा हो कर नमाज़ अदा करेगी उसी एतिबार से ज्यादा मुस्तहिक सवाब होगी। हजरत आईशा रजी अल्लाहु अन्हा ने अपनी जिन्दगी में यह महसूस कर लिया था कि औरतों के लिए बेहतर यही है कि वह अपने घरों में नमाज़ अदा फरमाए, अब 1400 साल के बाद जबकि फितनों का दौर है, हर तरफ उरयानियत, बेहायाई और बेपरदगी आम हो चुकी है। हजरत आईशा रजी अल्लाहु अन्हा के जमाना की औरतें हमारे जमाना की औरतों के मुकाबला में हजार दरजा इल्म व तकवा में बढ़ी हुई थीं, लेकिन इसके बावजूद हजरत आईशा रजी अल्लाहु अन्हा ने उनके मस्जिदों में जाने से अपने तहफ्फुजात जिक्र किए। इहतियात का तकाजा भी यही है कि औरतें नमाज़े ईद के लिए ईदगाह न जायें। जिन फुकहा व उलमा ने औरतों को नमाज़े ईद के लिए जाने की इजाजत दी है उन्होंने नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तालीमात के मुताबिक चंद शरायत (मसलन परदा का मुकम्मल इहतिमाम, खुशबु के इस्तिमाल से इजतिनाब, जेब व जीनत के बेगैर जाना, किसी तरह के फितने का इमकान न होना और मर्द और औरत का इखतिलात न होना) को जरूरी करार दिया है।
अब आप खुद ही फैसला करें कि हमारे मौजूदा मुआशरा में औरतों का नमाज़े ईद के लिए जाने में क्या यह शर्त पूरे हो सकते हैं? जवाब यकीनन मनफी में ही होगा। एक तरफ औरतों का नमाज़े ईद के लिए जाने की ज्यादा गुंजाइश नजर आती है जबकि दूसरी तरफ बहुत से मुंकरात यकीनी तौर पर मौजूद हैं लिहाजा इसी में भलाई है कि फितनों के इस दौर में औरतें नमाज़े ईद के लिए ईदगाह न जायें।
अगर हम सिर्फ पचीस तीस साल पहले की बात करें तो हिन्दुस्तान में भी औरतें बेगैर परदा के बाहर नहीं निकलती थीं जबकि पहली और दूसरी सदी हिजरी में ही औरतों के तअल्लुक से फुकहा व उलमा की एक जमात का यह मौकिफ रहा है कि औरतों का मस्जिद में नमाज़ की अदाएगी के लिए जाना मुनासिब नहीं है। मशहूर मुहद्दिस इमाम तिरमिजी ने अपनी हदीस की मशहूर किताब (तिरमिजी) में इस मौजू से मुतअल्लिक अहादीस जिक्र करने के बाद लिखा है कि शैख सुफयान सौरी और शैख अब्दुल्लाह बिन मुबारक का मौकिफ है कि औरतों का नमाज़े ईद के लिए जाना मकरूह है। यानी इब्तिदाए इस्लाम से ही यह मौकिफ सामने आ गया था कि औरतों के लिए नमाज़े ईद के लिए जाना मुनासिब नहीं है। हजरत इमाम तिरमिजी ने हजरत आईशा रजी अल्लाहु अन्हा वाली हदीस भी जिक्र फरमाई। उलमाए अहनाफ का भी यही मौकिफ है कि औरतों का नमाज़े ईद के लिए जाना मकरूह है। हिन्द व पाक के जम्हुर उलमा जो 80 हिजरी में पैदा हुए मशहूर मुहद्दिस व फकीह हजरत इमाम अबु हनीफा की कुरान व हदीस पर मबनी राय को तरजीह देते हैं की भी यही राय है कि औरतें नमाज़े ईद के लिए न जायें। गर्जकि इब्तिदाए इस्लाम से ही मसअला मजकूर में इख्तिलाफ है और मुहद्दिसीन व फुकहा व उलमा की एक बड़ी जमात की हमेशा यह राय रही है कि औरतों को नमाज़े ईद के लिए न जाने में खैर व भलाई व बेहतरी है, अब जबकि फितनों का दौर है तो हमें उम्मुल मोमेनीन हजरत आईशा रजी अल्लाहु अन्हा वाला मौकिफ ही इख्तियार करना चाहिए।
मजकूरा मजमून पर एक साहब के एतिराज का जवाब
अससलामु अलैकुम वरहमतुल्लाहि वबरकातुहु
आप तो एतिराजात इस तरह थोपते हैं कि गोया आपको दीने इस्लाम का ठीकेदार बना दिया गया है और मैं सिर्फ और सिर्फ आप जैसे हजरात के लिए अपनी जिन्दगी वक्फ किए हुए बैठा हूं। बात समझ में आती है तो ठीक है वरना जहां आप मुतमईन हो सकते हैं रुजू करें। कुरान व हदीस की रौशनी में जो सही समझता हूं तहरीर करता हूं ख्वाह आप जैसे हजरात तसलीम करें या न करें। मुस्लिम औरतों की आम बुराईयों को किसी शख्स या मक्तबे फिक्र पर थोपना ऐसा ही है जैसा कि बाज इंसानों का दूसरें इंसनों पर ज़ुल्म व ज्यादती करने की बिना पर पूरी इंसानियत को ही जिम्मेदार ठहरा कर सबको सूली पर लटका दिया जाये।
मौजू बहस मसअला में सिर्फ एक बात अर्ज है कि जब हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने औरतों को ईदगाह में नमाज़ पढ़ने की आम इजाजत दे रखी थी और जैसे हजरात नुक्ता-ए-नजर में औरतों का ईदगाह जाए बेगैर औरतों की इसलाह मुमकिन नहीं है तो उम्मुल मोमेनीन हजरत आईशा रजी अल्लाहु अन्हा ने खुल्फा-ए-राशिदीन के जमाना में सहाबा-ए-कराम की मौजूदगी में यह क्यों फरमाया गया कि अगर हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उस वक्त हयात होते तो आप सल्लल्लहु अलैहि वसल्लम औरतों को मस्जिदों में जाने से रोक देते जैसा कि बनी इसराइल की औरतों को रोक दिया गया था। हजरत आईशा रजी अल्लाहु अन्हा से पूछा गया कि क्या बनी इसराइल की औरतों को मस्जिदों से रोक दिया गया था? हजरत आईशा रजी अल्लाहु अन्हा ने जवाब दिया हाँ, बनी इसराइल की औरतों को मस्जिदों से रोक दिया गया था। उम्मुल मोमेनीन हजरत आईशा रजी अल्लाहु अन्हा का यह फरमान खुल्फा-ए-राशिदीन के जमाना में सहाबा-ए-कराम की मौजूदगी में सामने आया और जमहूर मुहद्दिसीन यहां तक कि हजरत इमाम बुखारी और हजरत इमाम मुस्लिम ने अपनी किताब (सही बुखारी व सही मुस्लिम) में जिक्र फरमाया है।
गर्जकि हदीस की तकरीबन हर मशहूर व मारूफ किताब में हजरत आईशा रजी अल्लाहु अन्हा का यह कौल मजकूर है। हजरत आईशा रजी अल्लाहु अन्हा के इस फरमान और दूसरे अहादीस नबविया की रौशनी में, नीज औरतों में आए तब्दिलियों के पेशे नजर पहली सदी हिजरी के फुकहा व उलमा व मुहद्दिसीन व मुफस्सेरीन की एक जमात ने बाकायदा यह फतवा जारी किया कि औरतों का नमाज़े ईद के लिए ईदगाह जाना सही नहीं है। सवाल यह है कि हजरत आईशा रजी अल्लाहु अन्हा ने ऐसा क्यों कहा और अगर वह हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मंशा के खिलाफ था तो किसी सहाबी या ताबई ने हजरत आईशा रजी अल्लाहु अन्हा पर कोई तंकीद क्यों नहीं की। दुनिया की किसी भी किताब में हजरत आईशा रजी अल्लाहु अन्हा के इस फरमान पर कोई तरदीद किसी भी सहाबा या ताबई से मौजूद नहीं है। हजरत इमाम तिरमिजी ने अपनी मशहूर व मारूफ हदीस की किताब तिरमिजी में पहली सदी हिजरी के फुकहा व मुहद्दिसीन के अकवाल को जिक्र करके हजरत आईशा रजी अल्लाहु अन्हा का कौल भी जिक्र फरमाया। जिससे साफ जाहिर होता है कि हजरत आईशा रजी अल्लाहु अन्हा का मौकिफ वाजेह था कि अब औरतें ईदगाह न जायें, इसी लिए हजरत आईशा रजी अल्लाहु अन्हा से जिन्दगी में एक मरतबा औरतों के नमाज़े ईद के लिए ईदगाह जाने की कोई तरगीब मजकूर नहीं है।
गर्जकि आप मुझसे जवाब तलब न करें बल्कि कयामत तक आने वाले मुस्लमानों की माँ हजरत आईशा रजी अल्लाहु अन्हा और उन ताबेईन और तबेताबेईन से जवाब तलब करें जिन्होंने हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात के चंद सालों के बाद ही सहाबा-ए-कराम की मौजूदगी में औरतों को ईदगाह जाने की तरगीब देने के बजाये इस बात पर जोर दिया कि औरतें नमाज़े ईद के लिए ईदगाह न जायें, नीज उन तमाम मुहद्दिसीन से सवाल करें कि उन्होंने हजरत आईशा रजी अल्लाहु अन्हा के कौल को अपनी हदीस की मशहूर व मारूफ किताबों में क्यों जिक्र किया तो इस पर तरदीद क्यों नहीं की। नीज हजरत इमाम तिरमिजी ने पहली सदी हिजरी के बाज फुकहा व मुहद्दिसीन के कौल को अपनी हदीस की मशहूर किताब तिरमिजी में जिक्र करके आप हजरात की तरह उन पर फतवा क्यों नहीं लगाया।
मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)