بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

मियां बीवी की जिम्मेदारियां

हक़ के मानी
हक़ के मानी साबित होने यानी वाजिब होने के हैं, उसकी जमा हुक़ूक़ आती है जैसा कि अल्लाह तआला का फरमान है ‘‘उनमें से अक्सर लोगों पर बात साबित हो चुकी है, सो यह लोग ईमान नह लाऐंगे।“ (सूरह यासीन 7) हक़ बातिल के मुक़ाबला में भी इस्तेमाल होता है, जैसा कि अल्लाह तआला का फरमान ‘‘और इलाम कर दो कि हक़ और बातिल मिट गया यक़ीनन बातिल को मिटना ही था।“ (सूरह इसरा 81)
हुक़ूक़ की अदाएगी
शरीअते इस्लामिया ने हर उस शख्स को इस बात पर मुतवज्जह किया है कि वह अपने फराइज अदा करे, अपनी जिम्मेदारियों को सही तरीक़ा पर अंजाम दे और लोगों के हुक़ूक़ की पूरी अदाएगी करे। शरीअते इस्लामिया ने हर उस शख्स को मुकल्लफ बनाया है कि वह अल्लाह के साथ बन्दों के हुक़ूक़ की पूरी तौर पर अदाएगी करे हत्ताकि बाज़ वजुह से हुकूकुल इबाद को ज़्यादा एहतेमाम से अदा करने की तालीम दी गई।
आज हम दूसरों के हुक़ूक़ तो अदा नहीं करते अलबत्ता अपने हुक़ूक़ का झंडा उठाए रहते हैं। दूसरों के हुक़ूक़ की अदाएगी की कोई फिक्र नहीं करते हैं, अपने हुक़ूक़ को हासिल करने के लिए मुतालबात किए जा रहे हैं, तहरीकें चलाई जा रही हैं, मुजाहिरे किए जा रहे हैं, हड़ताल की जा रही है, हुक़ूक़ के नाम से अंजूमनें और तंजिमें बनाई जा रही हैं। लेकिन दुनिया में ऐसी अंजूमनें या तहरीकें या कौशिशें मौज़ूद नहीं है कि जिनमें यह तालीम दी जाए कि अपने फराइज, अपनी जिम्मेदारियां और दूसरों के हुक़ूक़ जो हमारे जिम्मे हैं वह हम कैसे अदा करें? शरीअते इस्लामिया का असल मुतालबा भी यही है कि हममें से हर एक अपनी जिम्मेदारियों यानी दूसरों के हुक़ूक़ अदा करने की ज़्यादा कोशिश करे।
मियां बीवी के आपसी तअल्लुकात में भी अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यही तरीक़ा इख्तियार किया है कि दोनों को उनके फराइज यानी जिम्मेदारियां बता दें। शौहर को बता दिया कि तुम्हारे फराइज और जिम्मेदारियां क्या हैं और बीवी को बता दिया कि तुम्हारी जिम्मेदारियां क्या हैं, हर एक अपने फराइज और जिम्मेदारियों को अदा करने की कोशिश करे। ज़िन्दगी की गाड़ी इसी तरह चलती है कि दोनों अपने फराइज और अपनी जिम्मेदारियां अदा करते रहें। दूसरों के हुक़ूक़ अदा करने की फिक्र अपने हुक़ूक़ हासिल करने की फिक्र से ज़्यादा हो। अगर यह जज़्बा पैदा हो जाए तो फिर ज़िन्दगी बहुत उमदा खुशगवार हो जाती है।
मियां बीवी
दो अजनबी मर्द व औरत के दरमियान शौहर और बीवी का रिश्ता उसी वक़्त क़ायम हो सकता है जबकि दोनों के दरमियान शरई निकाह अमल में आए। निकाहे शरई के बाद दो अजनबी मर्द व औरत रफीके हयात बन जाते हैं, एक दूसरे के रंज व खुशी, तकलिफ व राहत और सेहत व बीमारी गरज़ ये कि ज़िन्दगी के हर गोशा में शरीक हो जाते हैं। अकदे निकाह को क़ुरान करीम में मिसाके गलीज़ का नाम दिया गया है यानी निहायत बज़बूत रिश्ता। निकाह की वजह से बेशुमार हराम काम एक दूसरे के लिए हलाल हो जाते हैं यहां तक कि अल्लाह तआला ने क़ुरान करीम में एक दूसरे को लिबास से ताबीर किया है यानी शौहर अपनी बीवी के लिए और बीवी अपने शौहर के लिए लिबास की तरह है। शरई निकाह के बाद जब आदमी शौहर और औरत बीवी बन जाती है तो एक दूसरे का जिस्मानी और रूहानी तौर पर लुत्फ अंदोज हो जाना जाएज़ हो जाता है और एक दूसरे के जिम्मे जिस्मानी और रूहानी हुक़ूक़ वाजिब हो जाते हैं। शरई अहकाम की पाबन्दी करते हुए शौहर और बीवी का जिस्मानी तौर पर लुत्फ अंदोज होना नीज़ एक दूसरे के हुक़ूक़ की अदाएगी करना यह सब शरीअते इस्लामिया का हिस्सा है और उन पर भी सवाब मिलेगा, इंशाअल्लाह।
निकाह के दो अहम मक़सद
अल्लाह तआला ने क़ुरान करीम में निकाह के मकासिद में से दो अहम मक़सद नीचे की आयात में लिखे हैं।
“और उसकी निशानियों में से है कि तुम्हारी ही जिंस से बीवियां पैदा कीं ताकि तुम उनसे आराम पाओ और उसने तुम्हारे दरमियान मोहब्बत और हमदर्दी क़ायम करदी, यक़ीनन गौर व फिक्र करने वालों के लिए उसमें बहुत सी निशानियां हैं।“ (सूरह रूम 21) गरज़ ये कि इस आयत में निकाह के दो अहम मकासिद बयान किए गए।
1) मियां बीवी को एक दूसरे से कल्बी व जिस्मानी सुकून हासिल होता है।
2) मियां बीवी के दरमियान एक ऐसी मोहब्बत, उलफत, तअल्लुक़, रिश्ता और हमदर्दी पैदा हो जाती है जो दुनिया में किसी भी दो शख्सियतों के दरमियान नहीं होती।
मियां बीवी की जिम्मेदारियों की तीन किसमें
इंसान सिर्फ इंफरादी ज़िन्दगी नहीं रखता बल्कि वह फतरतन मुआशरती मिज़ाज रखने वाली मख्लूक है, उसका वज़ूद खानदान के एक रूकन और मुआशरे के एक फर्द की हैसियत से ही पाया जाता है। मुआशरा और खानदान की तशकील में बुनियादी एकाई मियां बीवी हैं जिनके एक दूसरे पर कुछ हुक़ूक़ हैं।
1) शौहर की जिम्मेदारियां यानी बीवी के हुक़ूक़ शौहर पर।
2) बीवी की जिम्मेदारियां यानी शौहर के हुक़ूक़ पर।
3) दोनों की मुशतरका जिम्मेदारियां यानी मुशतरका हुक़ूक़।
शौहर की जिम्मेदारियां यानी बीवी के हुक़ूक़ शौहर पर
अल्लाह तआला ने क़ुरान करीम में इरशाद फरमाया ‘‘औरतों का हक़ है जैसा कि (मर्द का) औरतों पर हक़ है, मारूफ तरीक़ा पर।“ (सूरह बक़रह 228) इस आयत में मियां बीवी के तअल्लुकात का ऐसा जामि दस्तुर पेश किया गया है जिससे बेहतर कोई दस्तुर नहीं हो सकता और अगर इस जामि हिदायत की रौशनी में अज़वाजी ज़िन्दगी गुजारी जाए तो इस रिश्ता में कभी भी तल्खी और कड़वाहट पैदा नह होगी, इंशाअल्लाह। वाकई यह क़ुरान करीम का इजाज है कि अल्फाज़ के इख्तिसार के बावज़ूद मानी का समुन्द्र में समो दिया गया है। यह आयत बता रही है कि बीवी को महज नौकरानी और खादमा मत समझना बल्कि यह याद रखना कि उसके भी कुछ हुक़ूक़ हैं जिनकी पासदारी शरीयत में ज़रूरी है। इन हुक़ूक़ में जहां नान व नफ्का और रिहाईश का इंतिज़ाम शामिल है वहीं उसकी दिल दारी और राहत रिसानी का ख्याल रखना भी ज़रूरी है। इसी लिए रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि तुममें सबसे अच्छा आदमी वह है जो अपने घर वालों (बीवी बच्चों) की नज़र में अच्छा हो। और ज़ाहिर है कि उनकी नज़र में अच्छा वही होगा जो उनके हुक़ूक़ की अदाएगी करने वाला हो। दूसरी तरफ इस आयत में बीवी को भी आगाह किया कि उसपर भी हुक़ूक़ की अदाएगी लाज़िम है। कोई बीवी उस वक़्त तक पसंदीदा नहीं हो सकती जब तक कि वह अपने शौहर की ताबिदार और खिदमत गुज़ार हों और उनसे बहुत ज़्यादा मोहब्बत करने वाली हों और ऐसी औरतों की मुजम्मत की गई है जो शौहरों की नाफरमानी करने वाली हों।
शौहर की चंद अहम जिम्मेदारियां हसबे जैल हैं
1) मुकम्मल मुहर की अदाएगी- अल्लाह तआला का इरशाद है ‘‘औरतों को उनका महर राजी व खुशी से अदा कर दो। निकाह के वक़्त महर की ताईन और शबे जुफाफ से पहले उसकी अदाएगी होनी चाहिए, अगरचे तरफैन के इत्तेफाक़ से महर की अदाएगी को बाद में भी अदा कर सकते हैं। महर सिर्फ औरत का हक़ है, लिहाज़ा शौहर या उसके वालिदैन या भाई बहन के लिए महर की रकम में से कुछ भी लेना जाएज़ नहीं है।
(वज़ाहत) शरीअत ने कोई भी खर्च औरतों पर नहीं रखा है, शादी से पहले उसके तमाम खर्च वालिद के जिम्मा हैं और शादी के बाद औरत के खाने, पीने, रहने, सोने और लिबास के तमाम खर्च शौहर के जिम्मा हैं, लिहाज़ा महर की रकम औरत खालिस मिल्कियत है उसको जहां चाहे और जैसे चाहे इस्तमाल करे, शौहर या वालिद मशविरा दे सकते हैं मगर उस रकम में खर्च करने का पूरा इख्तियार सिर्फ औरत को है, इसी तरह अगर औरत को कोई चीज विरासत में मिली है तो वह औरत की मिल्कियत होगी, वालिद या शौहर को वह रकम या जाइदाद लेने का कोई हक़ नहीं है।
2) बीवी के तमाम खर्चे- अल्लाह तआला का इरशाद है ‘‘बच्चों के बाप (शौहर) पर औरतों (बीवी) का खाना और कपड़ा लाज़िम है दस्तुर के मुताबिक़।“ (सूरह बक़रह 233)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया औरतों के सिलसिला में अल्लाह तआला से डरो क्योंकि अल्लाह तआला की अमान में तुमने उनको लिया है। अल्लाह तआला के हुकुम की वजह से उनकी शर्मगाहों को तुम्हारे लिए हलाल किया गया है। दस्तुर के मुताबिक़ उनके पूरे खाने पीने का खर्च और कपड़ों का खर्चा तुम्हारे जिम्मा है। (मुस्लिम)
3) बीवी के लिए रिहाईश का इंतिज़ाम- अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है ‘‘तुम अपनी ताकत के मुताबिक़ जहां तुम रहते हो वहां उन औरतों को रखो।“ (सूरह तलाक़ 6) इस आयत में मुतल्लक़ा औरतों का हुकुम बयान किया जा रहा है कि इद्दत के दौरान उनकी रिहाईश का इंतिज़ाम भी शौहर के जिम्मा है। जब शरीअत नेक मुतल्लक़ा औरतों की रिहाईश का इंतिज़ाम शौहर के जिम्मा रखा है तो हसबे इस्तिताअत बीवी की मुनासिब रिहाईश की ज़िम्मेदारी बदर्जा औला शौहर के जिम्मा होगी।
4) बीवी के साथ हुसने मुआशिरत- शौहर को चाहिए कि वह बीवी के साथ अच्छा सुलूक करे। अल्लाह तआला फरमान ‘‘उनके साथ अच्छे तरीके से पेश आओ यानी औरतों के साथ गूफतगु और मामलात में हूसने इखलाक के साथ मामला रखोगो तुम उन्हें नापसंद करो लेकिन बहुत मुमकिन है कि तुम किसी चीज को बुरा जानो और अल्लाह तआला उसमें बहुत ही भलाई करदे।“ (सूरह निसा 19)
शौहर की चैथी ज़िम्मेदारी ‘‘बीवी के साथ हूसने मुआशिरत” बहुत ज़्यादा अहमियत रखती है, उसकी अदाएगी के मुख्तलिफ तरीके हसबे जैल हैं।
1) हसबे इस्तिताअत बीवी और बच्चों पर खर्च करने में फराख दिली से काम लिना चाहिए जैसा कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया अगर कोई शख्स अल्लाह तआला से अजर की उम्मीद के साथ अपने घर वालों पर खर्च करता है तो वह सदका होगा यानी अल्लाह तआला उसपर अजर अता फरमाएगा।
2) बीवी से मशविरा- इसमें कोई शक नहीं है कि घर के इंतिज़ाम को चलाने की ज़िम्मेदारी मर्द के जिम्मा रखी गई है जैसा कि क़ुरान करीम में मर्द के कौवाम का लफ्ज़ इस्तेमाल किया गया है यानी मर्द औरतों पर निगहबान और मुंतजिम हैं। लेकिन हूसने मुआशिरत के तौर पर औरत से भी घर के निज़ाम को चलाने के लिए मशविरा लेना चाहिए जैसा कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया यानी बेटियों के रिशतें के लिए अपनी बीवी से मशविरा किया करो।
3) बीवी की बाज़ कमजोरियों से चशम पोशी करें, खास तौर पर जबकि दूसरी खुबियां व महासिन उनके अंदर मौज़ूद हों, याद रखें कि अल्लाह तआला ने आम तौर हर औरत में कुछ नह कुछ खुबियां ज़रूरी रखी हैं। नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया अगर औरत की कोई बात या अमल नापसंद आए तो मर्द औरत पर गुस्सा नह करे क्योंकि उसके अंदर दूसरी खुबियां मौज़ूद हैं जो तुम्हें अच्छी लगती हैं। (मुस्लिम)
4) मर्द बीवी के सामने अपनी जात को काबिले तवज्जह यानी स्मार्ट बना कर रखे क्योंकि तुम जिस तरह अपनी बीवी को खुबसूरत देखना चाहते हो वह भी तुम्हें अच्छा देखना चाहती है। सहाबी रसूल व मुफस्सीरे क़ुरान हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि मैं अपनी बीवी के लिए वैसा ही सजता हूं जैसा वह मेरे लिए जेब व जिनत इख्तियार करती है। (तफसीरे क़ुर्तुबी)
5) घर के काम व काज में औरत की मदद की जाए, खासकर जब वह बीमार हो। हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा फरमाती हैं कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम घर के तमाम काम कर लिया करते थे, झाड़ु भी खुद लगा लिया करते थे, कपड़ों में पैवंद भी खुद लगाया करते थे और अपने जुतों की मरम्मत भी खुद कर लिया करते थे। (बुखारी)
बीवी की जिम्मेदारियां यानी शौहर के हुक़ूक़ बीवी पर
1) शौहर की इताअत- अल्लाह तआला ने क़ुरान करीम में इरशाद फरमाया ‘‘मर्द औरतों पर हाकिम हैं इस वजह से कि अल्लाह तआला ने एक दूसरे पर फज़ीलत दी है और इस वजह से कि मर्द ने अपने माल खर्च किए हैं।“ (सूरह निसा 34) जो औरतें नेक हैं वह अपने शौहरों का कहना मानती हैं और अल्लाह के हुकुम के मुवाफिक नेक औरतें शौहर की अदमे मौज़ूदगी में अपने नफस और शौहर के माल की हिफाज़त करती हैं यानी अपने नफस और शौहर के माल में किसी किसम की ख्यानत नहीं करती हैं।
इस आयत में अल्लाह तआला ने मर्द को औरत पर फौकियत व फज़ीलत देने की दो वजह ज़िक्र फरमाई हैं।
1) मर्द व औरत व सारी कायनात को पैदा करने वाले अल्लाह तआला ने मर्द को औरत पर फज़ीलत दी है।
2) मर्द अपने और बीवी व बच्चों के तमाम खर्चे बर्दाशत करता है।
इसी तरह दूसरी आयत में अल्लाह तआला ने फरमाया ‘‘मर्द को औरतों पर फज़ीलत हासिल है।: (सूरह बक़रह 228)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया अगर औरत ने (खास तौर पर) पांच नमाजों की पाबंदी की, रमज़ान के महीने के रोजे एहतेमाम से रखे, अपनी शरमगाह की हिफाज़त की और अपने शौहर की इताअत की तो गोया वह जन्नत में दाखिल होगी। (मुसनद अहमद)
एक औरत ने नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कहा कि मुझे औरतों की एक जमाअत ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से एक सवाल करने के लिए भेजा है और वह यह है कि अल्लाह तआला ने जिहाद का हुकुम मर्द को दिया है चुनांचे अगर उनको जिहाद में तकलिफ पहुंचती है तो उसपर उनको अजर दिया जाता है और अगर वह शहीद हो जाते हैं तो अल्लाह तआला के खुसूसी बन्दों में शुमार हो जाते हैं मरने के बावज़ूद वह जिन्दा रहते हैं और अल्लाह तआला की तरफ से खुसूसी रिज़्क़ उनको दिया जाता है। (जैसा कि सूरह आले इमरान 169 में लिखा है) हम औरतें उनकी खिदमत करती हैं, हमारे लिए क्या अजर है? तो नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जिन औरतों की तरफ से तुम भेजी गई हो उनको बता दो कि शौहर की इताअत और उसके हक़ का एतेराफ तुम्हारे लिए अल्लाह के रास्ते में जिहाद के बराबर है लेकिन तुममें से कम ही औरतें इस ज़िम्मेदारी को बखुबी अंजाम देती हैं। (बज़्ज़ार, तबरानी)
(वज़ाहत) इन दिनों मर्द व औरत के दरमियान मुसावात और आज़ादी-ए-निसवां का बड़ा शऊर है और बाज़ हमारे भाई भी इस प्रोपेगन्डे में शरीक हो जाते हैं। हक़ीक़त यह है कि मर्द व औरत ज़िन्दगी के गाड़ी के दो पहिये हैं, ज़िन्दगी का सफर दोनों को एक साथ तैय करना है, अब ज़िन्दगी के सफर को तैय करने में इतिजाम की खातिर यह लाजमी बात है कि दोनों में से कोई एक सफर का जिम्मेदार हो ताकि ज़िन्दगी का निज़ाम सही चल सके। लिहाज़ा तीन रास्ते हैं। (1) दोनों को ही अमीर बनाया जाए। (2) औरत को इस ज़िन्दगी के सफर का अमीर बनाया जाए। (3) मर्द को इस ज़िन्दगी के सफर का अमीर बनाया जाए। पहली शकल में इख्तेलाफ की सूरत में मसअला हल होने के बजाए पेचिदा होता जाएगा। दूसरी शकल भी मुमकिन नहीं है क्योंकि मर्द व औरत को पैदा करने वाले ने सिन्फे नाजूक को ऐसी औसाफ से मुत्तसिफ पैदा किया है कि वह मर्द पर हाकिम बन कर ज़िन्दगी नहीं गुज़ार सकती है। लिहाज़ा अब एक ही सूरत बची और वह यह है कि मर्द इस ज़िन्दगी के सफर का अमीर बन कर रहे। मर्द में आदतन व तबअन औरत की बनिस्बत फिक्र व तदब्बुर और बर्दाशत व तुहम्मुल की क़ुव्वत ज़्यादा होती है, नीज़ इंसानी खिलकत, फितरत, क़ुव्वत और सलाहियत के लिहाज से और अकल के ज़रिया इंसान गौर व खौज करे तो यही नज़र आएगा कि अल्लाह तआला ने जो क़ुव्वत मर्द को अता की है, बड़े बड़े काम करने की जो सलाहियत मर्द को अता की है वह औरत को नहीं दी गई। लिहाज़ा इमारत और सरबराही का काम सही तौर मर्द ही अंजाम दे सकता है। इस मसअला के लिए अपनी अकल से फैसला करने के बजाए उस जात से पूछें जिसने इन दोनों को पैदा किया है। चुनांचे खालिक़े कायनात ने क़ुरान करीम में वाज़ेह अल्फाज़ के साथ इस मसअला का हल पेश कर दिया। इन आयात में अल्लाह तआला ने वाज़ेह अल्फाज़ में ज़िक्र फरमा दिया कि मर्द वही ज़िन्दगी के सफर का सरबराह रहेगा और फैसला करने का हक़ मर्द ही को हासिल है अगरचे मर्द को चाहिए कि औरत को अपने फैसलों में शामिल करे। मर्द हज़रात भी इस बात को अच्छी तरह जहन नशीन कर लें कि बेशक मर्द औरत के लिए कवाम यानी अमीर की हैसियत रखता है लेकिन साथ ही दोनों के दरमियान दोस्ती का भी तअल्लुक़ है यानी इंतिजामी तौर पर तो मर्द कवाम यानी अमीर है लेकिन आपसी तअल्लुक़ दोस्ती जैसा है ऐसा तअल्लुक़ नहीं है जैसा मालिक और नौकरानी के दरमियान होता है।
एक मरतबा हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से फरमाया कि जब तुम मुझसे राजी होती हो और जब तुम मुझसे नाराज होती हो, दोनों हालतों में मुझे इल्म हो जाता है। हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने पूछा या रसूलुल्लाह! किस तरह इल्म हो जाता है? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जब तुम मुझसे राजी होती हो रब्बे मोहम्मद के अल्फाज़ के साथ कसम खाती हो और जब तुम मुझसे नाराज होती हो रब्बे इब्राहिम के अल्फाज़ के साथ कसम खाती हो। उस वक़्त तुम मेरा नाम नहीं लेती बल्कि हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम का नाम लेती हो। हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने फरमाया कि या रसूलुल्लाह मैं सिर्फ आपका नाम छोड़ती हूं, नाम के अलावा कुछ नहीं छोड़ती। (बुखारी)
अब आप अंदाजा लगाऐं कि कौन नाराज हो रहा है? हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा। और किससे नाराज हो रही हैं? हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से। मालूम हुआ कि अगर बीवी नाराज़गी का इज़हार कर रही है तो मर्द की कवामियत यानी इमारत के खिलाफ नहीं है क्योंकि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बड़ी खुशी तबई के साथ उसका ज़िक्र फरमाया कि मुझे तुम्हारी नाराज़गी का पता चल जाता है।
इसी तरह वाक़या उफ्क को याद करें, जिसमें हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा पर तुहमत लगाई गई थी जिसकी वजह से हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा पर क़यामत सुगरा बरपा हो गई थी। हत्ताकि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को भी शुबहा हो गया था कि कहीं हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से वाकई गलती तो नहीं हो गई है। जब आयते बराअत नाज़िल हुई जिसमें अल्लाह तआला ने हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की बराअत का इलान किया तो हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ बहुत खुश हुए और हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ ने हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से कहा खड़ी हो जाओ और नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को सलाम करो। हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा बिस्तर पर लेटी हुई थीं और बराअत की आयात सुन लीं और लेटे लेटे फरमाया कि यह तो अल्लाह तआला का करम है कि उसने मेरी बराअत (अपने पाक कलाम में) नाज़िल फरमा दी लेकिन अल्लाह तआला के सिवा किसी का शुक्र अदा नहीं करती क्योंकि आप लोगों ने तो अपने दिल में यह इहतिमाल पैदा कर लिया था कि शायद मुझसे गलती हो गई है। (बुखारी)
बज़ाहिर हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने खड़े होने से इराज फरमाया लेकिन हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इसको बुरा नहीं समझा इसलिए कि यह नाज की बात है। यह नाज दर हक़ीक़त इसी दोस्ती का तकाजा है जो मियां बीवी के दरमियान होती है। मालूम हुआ कि मियां बीवी के दरमियान हाकिमयत और महकूमियत का रिश्ता नहीं बल्कि दोस्ती भी रिश्ता है और इस दोस्ती का हक़ यह है कि इस किसम के नाज को बर्दाशत किया जाए।
बहरे हाल! अल्लाह तआला ने मर्द को कवाम बनाया है इसलिए फैसला उसका मानना होगा। हां बीवी अपनी राय और मशविरा दे सकती है और शरीअत ने मर्द को यह हिदायत भी दी है कि वह हत्तल इमकान बीवी की दिलदारी का ख्याल भी करे लेकिन फैसला उसी का होगा। लिहाज़ा अगर बीवी चाहे कि हर मामला में फैसला उनका चले और मर्द कवाम नह बने तो यह सूरत फितरत के खिलाफ है, शरीअत के खिलाफ है, अकल के खिलाफ है और इंसाफ के खिलाफ है और इसका नतीजा घर की बरबादी के सिवा और कुछ नहीं है।
2) शौहर के माल व आबरू की हिफाज़त
अल्लाह तआला ने इरशाद फरमाया ‘‘जो औरतें नेक हैं वह अपने शौहरों की ताबिदारी करती हैं और अल्लाह के हुकुम के मुवाफिक नेक औरतें शौहर की गैर हाजरी में अपने नफस और शौहर के माल की हिफाज़त करती हैं यानी अपने नफस और शौहर के माल में किसी किसम की ख्यानत नहीं करती हैं।
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया मैं तुम्हें मर्द का सबसे बेहतरीन खजाना नह बताऊं? वह नेक औरत है, जब शौहर उसकी तरफ देखे तो वह शौहर को खुश करदे, जब शौहर उसको कोई हुकुम करे तो शौहर का कहना माने। अगर शौहर कहीं बाहर सफर में चला जाए तो उसके माल और अपने नफस की हिफाज़त करे। (अबू दाउद, नसई)
शौहर के माल की हिफाज़त में यह है कि औरत शौहर की इजाज़त के बेगैर शौहर के माल में कूछ नह ले और उसकी इजाज़त के बेगैर किसी को नह दे। हां अगर शौहर वाकई बीवी बीवी के अखराजात में कमी करता है तो बीवी अपने और औलाद के खर्चे को पूरा करने के लिए शौहर की इजाज़त के बेगैर माल ले सकती है। जैसा कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हिन्द बिंत उतबा से कहा था जब उन्होंने अपने शौहर अबू सुफयान के ज़्यादा बखील होने की शिकायत की थी। इतना माल ले लिया करो जो तुम्हारे और तुम्हारी औलाद के मुतवस्सित खर्चे के लिए काफी हो। (बुखारी व मुस्लिम)
शौहर की आबरू की हिफाज़त में यह है कि औरत शौहर की इजाज़त के बेगैर किसी को घर में दाखिल नह होने दे, किसी नामहरम से बिला ज़रूरत बा तनह करे। शौहर की इजाज़त के बेगैर घर से बाहर नह निकले।
3) घर के अंदरूनी निज़ाम को चलाना और बच्चों की तरबियत करना-यह औरतों की वह ज़िम्मेदारी है जो इनकी खिलकत के मकासिद में से एक अहम मक़सद है बल्कि यह वह बुनियादी ज़िम्मेदारी है जिसकी अदाएगी औरतों पर लाज़िम है। औरतों को इस ज़िम्मेदारी के अंजाम देने में कोई कमी नहीं छोड़नी चाहिए क्योंकि इसी ज़िम्मेदारी को सही तरीक़ा पर अंजाम देने से फैमली में आराम व सुकून पैदा होगा नीज़ औलाद दोनों जहां की कामयाबी व कामरानी से सरफराज होगी। हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि जब सहाबा अपनी बेटी या बहन को रूख्सत करते थे तो उसको शौहर की खिदमत और बच्चों की बेहतरीन तरबियत की खुसूसी ताकीद करते थे। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया औरत अपने शौहर के घर में निगहबान और जिम्मेदार है और उससे उसके बच्चों की तरबियत वगैरह के मुतअल्लिक़ सवाल किया जाएगा।
बीवी की चंद अहम और दूसरी जिम्मेदारियां
4) बीवी शौहर की इजाज़त के बेगैर नफली रोज़ा नह रख- हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया किसी औरत के लिए हलाल नहीं कि वह अपने शौहर की इजाज़त से यानी किसी औरत के लिए नफली रोज़ा रखना शौहर की इजाज़त के बेगैर हलाल नहीं।
5) औरत के दिल में शौहर के पैसे का दर्द हो- औरत के दिल में शौहर के पैसे का दर्द होना चाहिए ताकि शौहर का पैसा फजूल खर्ची में खर्च नह हो। घर को नौकरानियों पर नहीं छोड़ना चाहिए कि वह जिस तरह चाहें करती रहें बल्कि औरत की ज़िम्मेदारी है कि वह घर के दाखिली तमाम कामों पर निगाह रखे।
चंद मुशतरका हुक़ूक़ और जिम्मेदारियां
जहां तक मुमकिन हो खुशी व राहत व सुकून को हासिल करने और रंज व गम को दूर करने के लिए एक दूसरे का मदद करना चाहिए।
एक दूसरे के राज लोगों के सामने ज़िक्र नह किए जाऐं। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया क़यामत के दिन अल्लाह की नजरांे में सबसे बदबख्त इंसान वह होगा जो मियां बीवी के आपसी राज को दूसरों के सामने बयान करे। (मुस्लिम)

शौहर बाहर के काम और बीवी घरैलू काम अंजाम दे
क़ुरान व सुन्नत में वाज़ेह तौर पर ऐसा कोई कतई उसूल नहीं मिलता जिसकी बुनियाद पर कहा जाए कि खाना पकाना औरतों के जिम्मा है, अलबत्ता हज़रत फातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा की शादी के बाद हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु और हज़रत फातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा के दरमियान काम की जो तक़सीम की वह इस तरह थी कि बाहर का काम हज़रत अली देखते थे, घरैलू काम मसलन खाना बनाना, घर की सफाई करना वगैरह हज़रत फातिमा के जिम्मा था। लेकिन याद रखें कि ज़िन्दगी कानूनी पेचीदगियों से नहीं चला करती, लिहाज़ा जिस तरह क़ुरान व हदीस में मज़कूर नहीं है कि खाना पकाना औरत के जिम्मा है इसी तरह क़ुरान व सुन्नत में कहीं वाज़ेह तौर पर यह मौज़ूद नहीं है कि शौहर के जिम्मा बीवी का इलाज कराना लाज़िम है, इसी तरह क़ुरान व सुन्नत में मर्द के जिम्मा नहीं है कि वह बीवी को उसके वालिदैन के घरैलू मुलाक़ात के लिए ले जाया करे। इसी तरह अगर बीवी के वालिदैन या भाई भहन उसके घर आऐ ंतो मर्द के जिम्मा नहीं है कि मुर्ग मुसल्लम व कुफते व कबाब वगैरह ले कर आए। मालूम हुआ कि दोनों एक दूसरे की खिदमत के जज़्बा से रहें। बाहर के काम मर्द अंजाम दे और औरत घर के मामलात को बखुबी अंजाम दे।
मियां बीवी की मुशतरका जिम्मेदारियों में से एक अहम ज़िम्मेदारी यह है कि दोनों एक दूसरे की जिंसी ज़रूरत को पूरा करें। हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु रिवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि जब मर्द अपनी तरफ बुलाए (यह मियां बीवी के मखसूस तअल्लुकात से किनाया है, कि शौहर अपनी बीवी को उन तअल्लुकात को क़ायम करने के लिए बुलाए) और वह औरत नह आए या ऐसा तरज इख्तियार करे कि जिससे शौहर का वह मंशा पूरा नह हो और उसकी वजह से शौहर नाराज हो जाए तो सारी रात सूबह तक फरिश्ते उस औरत पर लानत भेजते रहते हैं, यानी उस औरत पर खुदा की लानत हो और लानत के मानी यह है कि अल्लाह तआला की रहमत को उसको हासिल नहीं होगी। (बुखारी व मुस्लिम)
जिंसी ख्वाहिशात की तकमील पर अजर सवाब- हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया मियां बीवी के जो आपसी तअल्लुकात होते हैं अल्लाह तआला उनपर भी अजर अता फरमाएगा। सहाबा ने सवाल किया या रसूलुल्लाह! वह इंसान अपनी नफसानी ख्वाहिशात के तिहत करता है, उसपर क्या अजर? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया अगर वह नफसानी ख्वाहिश को नाजाएज़ तरीके से पूरा करता है तो उसपर गुनाह होता है या नहीं? सहाबा ने अर्ज़ किया या रसूलुल्लाह! गुनाह ज़रूर होता है। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया चूंकि मियां बीवी नाजाएज़ तरीक़ा को छोड़ कर जाएज़ तरीके से नफसानी ख्वाहिशात को अल्लाह के हुकुम की वजह से कर रहे हैं, इसलिए इसपर भी सवाब होगा। (मुसनद अहमद)
अपने अहल व अयाल को जहन्नम की आग से बचाने के लिए मुशतरका फिक्र व कोशिश
अल्लाह तआला ने इरशाद फरमाया ‘‘ऐ ईमान वालो! तुम अपने आपको और अपने घर वालों को उस आग से बचाओ जिसका इंधन इंसान है और पत्थर जिसपर सख्त दिल मज़बूत फरिश्ते मुक़र्रर हैं जिन्हें जो हुकुम अल्लाह तआला देता है उसकी नाफरमानी नहीं करते बल्कि जो हुकुम दिया जाए बजालाते हैं।
जब मज़कूरा आयत नाज़िल हुई तो हज़रत उमर फारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में तशरीफ लाए और फरमाया कि हम अपने आपको तो जहन्नम की आग से बचा सकते हैं मगर घर वालों का क्या करें? तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया तुम उनको बुराईयों से रोकते रहो और अच्छाईयों का हुकुम करते रहो, इंशाअल्लाह यह अमल उनको जहन्नम की आग से बचाने वाला बनेगा।
विरासत में शिर्कत
दोनों में से किसी एक के इंतिक़ाल होने पर दूसरा उसकी विरासत में शरीक होगा।
शौहर और बीवी की विरासत में चार शकलें बनती हैं। (सूरह निसा 12)
बीवी के इंतिक़ाल पर औलाद मौज़ूद नह होने की सूरत में
(शौहर को 1/2 मिलेगा)
बीवी के इंतिक़ाल पर औलाद मौज़ूद होने की सूरत में
(शौहर को 1/4 मिलेगा)
शौहर के इंतिक़ाल पर औलाद मौज़ूद नह होने की सूरत में
(बीवी को 1/4 मिलेगा)
शौहर के इंतिक़ाल पर औलाद मौज़ूद होने की सूरत में
(बीवी को 1/8 मिलेगा)
मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)