بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

बच्चे की पैदाइश के वक़्त कान में अज़ान और इक़ामत

शरीअते इस्लामिया ने बच्चे की पैदाइश के वक़्त जिन अहकामे शरईया से उम्मते मुस्लिमा को आगाह किया है उनमें से एक विलादत के फौरन बाद बच्चे के दाएं कान में अज़ान और बाएं कान में इक़ामत कहना है।
हज़रत अबू राफे रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं जब हज़रत हसन बिन अली रज़ियल्लाहु अन्हु की पैदाइश हुई तो मैने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को देखा कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत हसन बिन अली रज़ियल्लाहु अन्हु के कान में अज़ान कही। (तिर्मिज़ी, अबू दाउद)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत हसन बिन अली रज़ियल्लाहु अन्हु की पैदाइश के वक़्त उनके दाएं कान में अज़ान और बाएं कान में इक़ामत कही। (बैहक़ी)
हज़रत हसन बिन अली रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया बच्चे की पैदाइश के वक़्त दाएं कान में अज़ान और बाएं कान में इक़ामत कही जाए तो उम्मे सिबयान से हिफाज़त होती है। (बैहक़ी) उम्मे सिबयान से मुराद एक हवा है जिससे बच्चे को नुक़्सान पहुंच सकता है। बाज़ हज़रात ने इससे मुराद जिन लिया है और कहा है कि बच्चे के कान में अज़ान और इक़ामत कहने पर अल्लाह तआला के हुकुम से इससे हिफाज़त हो जाती है।

अज़ान और इक़ामत कहने की बाज़ हिकमतें
1) विलादत के वक़्त अज़ान कहने का एक फायदा यह है कि बच्चे के कानों में सबसे पहले उस ज़ाते अक़दस का नामे नामी दाखिल होता है जिसने एक हक़ीर क़तरे से एक ऐसा खूबसूरत इंसान बना दिया है जिसे अशरफुल मखलूक़ात कहा जाता है।
2) अहादीस (बुखारी व मुस्लिम) में आता है कि अज़ान और इक़ामत के कलेमात सुन कर शैतान दूर भागता है। चूंकि बच्चे की पैदाइश के वक़्त शैतान भी घात लगा कर बैठता है तो अज़ान और इक़ामत की आवाज़ सुनते ही उसके असर में कमी वाक़े होती है।
3) दुनिया दारुल इमतिहान है, इसलिए यहां आते ही बच्चे को सबसे पहले दीने इस्लाम और इबादते इलाही का दर्स दिया जाता है।
नोट - बच्चे के कान में अज़ान और इक़ामत कहने के मुतअल्लिक़ रिवायात में ज़ोफ मौज़ूद है, लेकिन बहुत से शवाहिद के बिना पर इन अहादीस को तक़वीयत मिल जाती है। नीज़ शुरू से ही उम्मते मुस्लिमा का अमल इस पर रहा है। इमाम तिर्मिज़ी ने हदीस को सही क़रार देकर फरमाया कि उम्मते मुस्लिमा का अमल भी इस पर चला आ रहा है। लिहाज़ा मालूम हुआ कि हमें बच्चे की पैदाइश के वक़्त हत्तल इमकान दाएं कान में अज़ान और बाएं कान में इक़ामत ज़रूर कहनी चाहिए जैसा कि अल्लामा इबनुल कैम ने अपनी मशहूर व मारूफ किताब ‘‘तुहफतुल वदूद फी अहकामिल मौलूद” में तफसील से ज़िक्र किया है। नीज़ शैख अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ व दूसरे उलमा ने तहरीर फरमाया है।
मसअला - अगर किसी बच्चे की पैदाइश के वक़्त अज़ान और इक़ामत के कलेमात नहीं कहे गए तो बाद में भी यह कलेमात कहे जा सकते हैं लेकिन अगर ज़्यादा ही अरसा गुज़र गया तो फिर अज़ान और इक़ामत के कलेमात कहने की ज़रूरत नहीं।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)