بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

इल्मे मीरास और उसके मसाइल

लुगवी मानी
मीरास की जमा मवारीस आती है जिसके मानी “तरका” हैं, यानी वह माल व जायदाद जो मय्यत छोड़ कर मरे। इल्मे मीरास को इल्मे फरायज़ भी कहा जाता है, फरायज़ फरीज़ा की जमा है जो फर्ज़ से लिया गया है जिसके मानी “मुतअय्यन” हैं, क्योंकि वारिसों के हिस्से शरीअते इस्लामिया की जानिब से मुतअय्यन हैं इसलिए इसको इल्मे फरायज़ भी कहते हैं।

इस्तेलाही मानी
इस इल्म के ज़रिये यह जाना जाता है कि किसी शख्स के इंतिक़ाल के बाद उसका वारिस कौन बनेगा और कौन नहीं, नीज़ वारिसीन को कितना कितना हिस्सा मिलेगा।
क़ुरान करीम में बहुत सी जगहों पर मीरास के अहकाम बयान किए गए हैं, लेकिन तीन आयात (सूरह निसा 11, 12 व 127) में इख्तेसार के साथ बेशतर अहकाम जमा कर दिए गए हैं। मीरास के मसाइल में फुक़हा व उलमा का इख्तेलाफ बहुत कम है।

इल्मे मीरास की अहमियत
दीने इस्लाम में इस इल्म की बहुत ज़्यादा अहमियत है, चुनांचे नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस इल्म को पढ़ने पढ़ाने की बहुत दफा तर्गीब दी है।
― नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया इल्मे फरायज़ सीखो और लोगों को सिखाओ, क्योंकि यह निस्फ (आधा) इल्म है, इसके मसाइल लोग जल्दी भूल जाते हैं, यह पहला इल्म है जो मेरी उम्मत से उठा लिया जाएगा। (इब्ने माजा)
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इल्मे फरायज़ को निस्फ इल्म क़रार दिया है। इसकी मुख्तलिफ तौजिहात ज़िक्र की गई हैं जिनमें से एक यह है कि इंसान की दो हालतें होती हैं, एक ज़िन्दगी की हालत और दूसरी मरने की हालत। इल्मे मीरास में ज़्यादातर मसाइल मौत की हालत के मुतअल्लिक़ होते हैं, जबकि दूसरे उलूम में ज़िन्दगी के मसाइल से बहस होती है, लिहाज़ा इस मानी को सामने रख कर इल्मे मीरास निस्फ इल्म हुआ।
― नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया मुझे भी एक दिन दुनिया से रूख्सत होना है, इल्म उठा लिया जाएगा और फितने ज़ाहिर होंगे यहां तक कि मीरास के मामले में दो शख्स इख्तेलाफ करेंगे तो कोई शख्स उनके दरमियान फैसला करने वाला नहीं मिलेगा। (तिर्मिज़ी, मुसनद अहमद)
― हज़रत उमर फारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने फरमाया मीरास के मसाइल को सीखा करो, क्योंकि यह तुम्हारे दीन का एक हिस्सा है। (अद्दारमी 2851)
― हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहु अन्हु ने फरमाया जो शख्स क़ुरान करीम सीखे उसको चाहिए कि वह इल्मे मीरास को भी सीखे। (बैहक़ी)

इल्मे मीरास के तीन अहम हिस्से हैं
मुवर्रस - वह मय्यत जिसका साज़ व सामान व जायदाद दूसरों की तरफ मुंतक़िल हो रही है।
वारिस - वह शख्स जिसकी तरफ मय्यत का साज व सामान व जायदाद मुंतक़िल हो रही है। वारिस की जमा वुरसा आती है।
मौरूस - तरका यानी वह जायदाद या साज व सामान जो मरने वाला छोड़ कर मरा है।

मय्यत के साज व सामान और जायदाद में चार हुक़ूक़ हैं
1) मय्यत के माल व जायदाद में सबसे पहले उसके कफन व दफन का इंतिज़ाम किया जाए।
2) दूसरे नम्बर पर जो क़र्ज़ मय्यत के ऊपर है उसको अदा किया जाए।
अल्लाह तआला ने अहमियत की वजह से क़ुरान करीम में वसीयत को क़र्ज़ पर मुक़द्दम किया है, लेकिन उम्मत का इजमा है कि हुकुम के एतेबार से क़र्ज़ वसीयत पर मुक़द्दम है, यानी अगर मय्यत के जिम्मे क़र्ज़ हो तो सबसे पहले मय्यत के तरके में से वह अदा किया जाएगा, फिर वसीयत पूरी की जाएगी और उसके बाद मीरास तक़सीम होगी।
अगर मय्यत ज़कात वाजिब होने के बावज़ूद ज़कात की अदाएगी न कर सका या हज फर्ज़ होने के बावज़ूद हज की अदाएगी न कर सका या बीवी का महर अभी तक अदा नहीं किया गया तो यह चीज़ें भी मय्यत के जिम्मे क़र्ज़ की तरह हैं।
3) तीसरा हक़ यह है कि एक तिहाई हिस्से तक उसकी जाएज़ वसीयतों को नाफिज़ किया जाए।

वसीयत का क़ानून
शरीअते इस्लामिया में वसीयत का क़ानून बनाया गया ताकि क़ानूने मीरास की रू से जिन अज़ीज़ों को मीरास में हिस्सा नहीं पहुंच रहा है और वह मदद के मुस्तहिक़ हैं मसलन कोई यतीम पोता या पोती मौज़ूद है या किसी बेटे की बेवा मुसीबत में है या कोई भाई या बहन या कोई दूसरा अज़ीज़ सहारे का मोहताज है तो वसीयत के ज़रिये उस शख्स की मदद की जाए। वसीयत करना और न करना दोनों अगरचे जाएज़ हैं, लेकिन बाज़ औक़ात में वसीयत करना अफज़ल व बेहतर है। वारिसों के लिए एक तिहाई जायदाद में वसीयत का नाफिज़ करना वाजिब है यानी अगर किसी शख्स के कफन दफन के अखराजात और क़र्ज़ की अदाएगी के बाद 9 लाख रूपये की जायदाद बचती है तो 3 लाख तक वसीयत नाफिज़ करना वारिसीन के लिए ज़रूरी है। एक तिहाई से ज़्यादा वसीयत नाफिज़ करने और न करने में वारिसीन को इख्तियार है।
(नोट) किसी वारिस या तमाम वारिसीन को महरूम करने के लिए अगर कोई शख्स वसीयत करे तो यह गुनाहे कबीरा है जैसा कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जिस शख्स ने वारिस को मीरास से महरूम किया अल्लाह तआला क़यामत के दिन जन्नत से उसको (कुछ अरसे के लिए) महरूम रखेगा। (इब्ने माजा)
4) चौथा हक़ यह है कि बाक़ी साज़ व सामान और जायदाद को शरीअत के मुताबिक़ वारिसीन में तक़सीम कर दिया जाए। “नसीबम मफ्रूज़ा” (सूरह निसा 7) “फरीज़तम मिनल्लाहि” (सूरह निसा 11) “वसीयतम मिनल्लाहि” (सूरह निसा 12) “तिलका हुदूदुल्लहि” (सूरह निसा 13) से मालूम हुआ कि क़ुरान व सुन्नत में ज़िक्र किए गए हिस्सों के एतेबार से वारिसीन को मीरास तक़सीम करना वाजिब है।

वुरसा की तीन किसमें
1) साहिबुल फर्ज़ - वह वुरसा जो शरई एतेबार से ऐसा मुअय्यन हिस्सा हासिल करते हैं जिसमें कोई कमी या बेशी नहीं हो सकती है। ऐसे मुअय्यन हिस्से जो क़ुरान करीम में ज़िक्र किए गए हैं वह छः हैं: 1/2, 1/4, 1/8, 2/3, 1/3, 1/6
क़ुरान व सुन्नत में जिन हज़रात के हिस्से मुतअय्यन किए गए हैं वह यह हैं:
― बेटी (बेटी न होने की सूरत में में पोती)
― मां बाप (मां बाप न होने की सूरत में दादा दादी)
― शौहर
― बीवी
― भाई
― बहन
2) असबा - वह वुरसा जो मीरास में गैर मुअय्यन हिस्से के हक़दार बनते हैं, यानी असहाबुल फरूज़ के हिस्सों की अदाएगी के बाद बाक़ी सारी जायदाद के मालिक बन जाते हैं, मसलन बेटा। नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कुरान व सुन्नत में जिन वुरसा के हिस्से मुतअय्यन किए गए हैं उनको देने के बाद जो बचेगा वह क़रीब तरीन रिशतेदार को दिया जाएगा। (बुखारी व मुस्लिम)
3) ज़विल अरहाम - वह रिशतेदार जो नम्बर 1 (साहिबुल फर्ज़) और नम्बर 2 (असबा) में से कोई वारिस न होने पर मीरास में शरीक होते हैं, जैसे चाचा, भतीजे और चचाज़ाद भाई वगैरह।

मीरास किस को मिलेगी?
तीन वजहों में से कोई एक वजह पाए जाने पर ही विरासत मिल सकती है।
1) खूनी रिश्तेदारी - यह दो इंसानों के दरमियान विलादत का रिश्ता है, अलबत्ता क़रीबी रिश्तेदार की मौज़ूदगी में दूर के रिश्तेदारों को मीरास नहीं मिलेगी, मसलन मय्यत के भाई बहन उसी सूरत में मीरास में शरीक हो सकते हैं जबकि मय्यत की औलाद या वालिदैन में से कोई एक भी जिन्दा न हो। यह खूनी रिश्ते उसूल व फुरू व हवाशी पर मुशतमिल होते हैं। उसूल (जैसे वालिदैन, दादा दादी वगैरह) और फुरू (जैसे औलाद, पोते पोती वगैरह) और हवाशी (जैसे भाई, बहन, भतीजे, भांजे, चाचा और चचाज़ाद भाई वगैरह)।

(वज़ाहत) सूरह निसा आयत 7 से यह बात मालूम होती है कि मीरास की तक़सीम ज़रूरत के मेयार से नहीं बल्कि क़राबत के मेयार से होती है, इस लिए ज़रूरी नहीं कि रिश्तेदारों में जो ज़्यादा हाजतमंद हो उसको मीरास का ज़्यादा मुस्तहिक़ समझा जाए, बल्कि जो मय्यत के साथ रिश्ते में ज़्यादा क़रीब होगा वह दूर के बनिसबत ज़्यादा मुस्तहिक़ होगा। गरज़ ये कि मीरास की तक़सीम क़रीब से क़रीब तर के उसूल पर होती है चाहे मर्द हो या औरत, बालिग हो या नाबालिग।
2) निकाह - मियां बीवी एक दूसरे के मीरास में शरीक होते हैं।
3) गुलामियत से छुटकारा - इसका वज़ूद अब दुनिया में नहीं रहा, इस लिए मज़मून में इससे मुतअल्लिक़ कोई बहस नहीं की गई है।
शरीअते इस्लामिया ने औरतों और बच्चों के हुक़ूक़ की पूरी हिफाज़त की है और ज़मानए जाहिलीयत की रस्म व रिवाज के बरखिलाफ उन्हें भी मीरास में शामिल किया है जैसा कि अल्लाह तआला ने क़ुरान करीम (सूरह निसा आयत 7) में ज़िक्र फरमाया है।
मर्दों में से यह रिश्तेदार वारिस बन सकते हैं
― बेटा
― पोता
― बाप
― दादा
― भाई
― भतीजा
― चाचा
― चाचज़ाद भाई
― शौहर
औरतों में से यह रिशतेदार वारिस बन सकते हैं
― बेटी
― पोती
― मां
― दादी
― बहन
― बीवी
(नोट) उसूल व फरू में तीसरी पुशत (मसलन पड़ दादा या पड़ पोता) या जिन रिश्तेदारों तक आम तौर विरासत की तक़सीम की नौबत नहीं आती है उनके अहकाम यहां बयान नहीं किए गए हैं, तफसीलात के लिए उलमा से रुजू फरमाएं।

शौहर और बीवी के हिस्से
शौहर और बीवी की विरासत में चार शकलें बनती हैं। (सूरह निसा 12)
― बीवी के इंतिक़ाल पर औलाद मौज़ूद न होने की सूरत में शौहर को 1/2 मिलेगा।
― बीवी के इंतिक़ाल पर औलाद मौज़ूद होने की सूरत में शौहर को 1/4 मिलेगा।
― शौहर के इंतिक़ाल पर औलाद मौज़ूद न होने की सूरत में बीवी को 1/4 मिलेगा।
― शौहर के इंतिक़ाल पर औलाद मौज़ूद होने की सूरत में बीवी को 1/8 मिलेगा।
(वज़ाहत) अगर एक से ज़्यादा बीवियां हैं तो यही मुतअय्यन हिस्सा (1/4 या 1/8) बइजमाए उम्मत उनके दरमियान तक़सीम किया जाएगा।

बाप का हिस्सा
― अगर किसी शख्स की मौत के वक़्त उसके वालिद ज़िन्दा हैं और मय्यत का बेटा या पोता भी मौज़ूद है तो मय्यत के वालिद को 1/6 मिलेगा।
― अगर किसी शख्स की मौत के वक़्त उसके वालिद ज़िन्दा हैं अलबत्ता मय्यत की कोई भी औलाद या औलाद की औलाद ज़िन्दा नहीं है तो मय्यत के वालिद असबा में शुमार होंगे, यानी मुअय्यन हिस्सों की अदाएगी के बाद बाकी सारी जायदाद मय्यत के वालिद की हो जाएगी।
― अगर किसी शख्स की मौत के वक़्त उसके वालिद ज़िन्दा हैं और मय्यत की एक या ज़्यादा बेटी या पोती ज़िन्दा है अलबत्ता मय्यत का कोई एक बेटा या पोता ज़िन्दा नहीं है तो मय्यत के वालिद को 1/6 मिलेगा। नीज़ मय्यत के वालिद असबा में भी होंगे, यानी मुअय्यन हिस्सों की अदाएगी के बाद बाकी सब मय्यत के वालिद का होगा।

मां का हिस्सा
― अगर किसी शख्स की मौत के वक़्त उसकी मां ज़िन्दा है अलबत्ता मय्यत की कोई औलाद नीज़ मय्यत का कोई भाई बहन ज़िन्दा नहीं है तो मय्यत की मां को 1/3 मिलेगा।
― अगर किसी शख्स की मौत के वक़्त उसकी मां ज़िन्दा हैं और मय्यत की औलाद में से कोई एक या मय्यत के दो या दो से ज़्यादा भाई मौज़ूद हैं तो मय्यत की मां को 1/6 मिलेगा।
― अगर किसी शख्स की मौत के वक़्त उसकी मां ज़िन्दा है, अलबत्ता मय्यत की कोई औलाद नीज़ मय्यत का कोई भाई बहन ज़िन्दा नहीं है, लेकिन मय्यत की बीवी ज़िन्दा है तो सबसे पहले बीवी को 1/4 मिलेगा। हज़रत उमर फारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने इसी तरह फैसला फरमाया था।
औलाद के हिस्से
― अगर किसी शख्स की मौत के वक़्त उसके एक या ज़्यादा बेटे ज़िन्दा हैं लेकिन कोई बेटी ज़िन्दा नहीं है तो ज़विल फुरूज़ में से जो शख्स (मसलन मय्यत के वालिद या वालिदा या शौहर या बीवी) ज़िन्दा हैं उनके हिस्से अदा करने के बाद बाकी सारी जायदाद बेटों में बराबर तक़सीम की जाएगी।
― अगर किसी शख्स की मौत के वक़्त उसके बेटे और बेटियां ज़िन्दा हैं तो ज़विल फुरूज़ में से जो शख्स (मसलन मय्यत के वालिद या वालिदा या शौहर या बीवी) ज़िन्दा हैं उनके हिस्से अदा करने के बाकी सारी जायदाद बेटों और बेटियों में क़ुरान करीम के उसूल (लड़के का हिस्सा दो लड़कियों के बराबर) की बुनियाद तक़सीम की जाएगी।
― अगर किसी शख्स की मौत के वक़्त सिर्फ उसकी बेटियां ज़िन्दा हैं बेटे ज़िन्दा नहीं हैं तो एक बेटी की सूरत में उसे 1/2 मिलेगा और दो या दो से ज़्यादा बेटियां होने की सूरत में उन्हें 2/3 मिलेगा।
(वज़ाहत) अल्लाह तआला ने सूरह निसा आयत 11 में मीरास का एक अहम उसूल बयान किया है “अल्लाह तआला तुम्हें तुम्हारी औलाद के मुतअल्लिक़ हुकुम करता है कि एक मर्द का हिस्सा दो औरतों के बराबर है।”
शरीअते इस्लामिया में मर्द पर सारी मआशी जिम्मेदारियां आयद की हैं, चुनांचे बीवी और बच्चों के पूरे अखराजात औरत के बजाए मर्द के ज़िम्मे रखे हैं यहां तक कि औरत के ज़िम्मे खुद उसका खर्च भी नहीं रखा, शादी से पहले वालिद और शादी के बाद शौहर के ज़िम्मे औरत का खर्च रखा गया है। इस लिए मर्द का हिस्सा औरत से दोगुना रखा गया है।
अल्लाह तआला ने लड़कियों को मीरास दिलाने का इस कदर एहतेमाम किया है कि हिस्सा को असल क़रार दे कर उसके एतेबार से लड़कों का हिस्सा बताया कि लड़को हिस्सा दो लड़कियों के बराबर है।

भाई बहन के हिस्से
मय्यत के बहन भाई को इसी सूरत में मीरास मिलती है जबकि मय्यत के वालिदैन और औलाद में से कोई भी ज़िन्दा न हो। आम तौर पर ऐसा कम होता है इस लिए भाई बहन के हिस्से का तज़केरा यहां नहीं किया है। तफसीलात के लिए उलमा से रुजू फरमाएं।

खुसूसी हिदायत
मीरात की तक़सीम के वक़्त तमाम रिश्तेदारों की अखलाक़ी ज़िम्मेदारी है कि अगर मय्यत का कोई रिश्ता तंग दस्त है और ज़ाब्तए शरई से मीरास में उसका कोई हिस्सा नहीं है फिर भी उसको कुछ दे दें जैसा कि अल्लाह तआला ने सूरह निसा आयत 8 एवं 9 में इसकी तर्गीब दी है। 10 वीं आयत में अल्लाह तआला ने फरमाया कि जो लोग यतीमों का माल नाहक़ खाते हैं हक़ीक़त में वह अपने पेट आग से भरते हैं और वह जहन्नम की भड़कती हुई आग में झोंके जाएंगें।

तम्बीह
मीरास वह माल है जो इंसान मरते वक़्त छोड़ कर जाता है और उसमें सारे वुरसा अपने अपने हिस्से के मुताबिक़ हक़दार होते हैं। इंतिक़ाल के फौरन बाद मरने वाले की सारी जायदाद वुरसा में मुंतकिल हो जाती है। लिहाज़ा अगर किसी शख्स ने मीरास क़ुरान व सुन्नत के मुताबिक़ तक़सीम नहीं की तो वह जुल्म करने वाला होगा। अल्लाह तआला! हमें तक़सीम मीरास की काताहियों से बचने वाला बनाए और तमाम वारिसों को क़ुरान व सुन्नत के मुताबिक़ मीरास तक़सीम करने वाला बनाए।
नोट - इंसान अपनी ज़िन्दगी में अपने माल व सामान व जायदाद का खुद मालिक है। अपनी आम सेहत की ज़िन्दगी में अपनी औलाद में हत्तल इमकान बराबरी करते हुए जिस तरह चाहे अपनी जायदाद तक़सीम कर सकता है अलबत्ता मौत के बाद सिर्फ और सिर्फ क़ुरान व सुन्नत में मज़कूरा मीरास के तरीक़े से ही तरका तक़सीम किया जाएगा, क्योंकि मरते ही तरका के मालिक शरीअते इस्लामिया के हुसूल के मुताबिक़ बदल जाते हैं।
नोट - यहां मीरास के अहम अहम मसाइल इख्तिसार के साथ ज़िक्र किए गए हैं, तफसीलात के लिए उलमाए किराम से रुजू फरमाएं।
मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)