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بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم

اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

निकाह एक नेमत, तलाक एक ज़रूरत और इद्दत हुकमे इलाही
‘निकाह (नेमत)
निकाह अल्लाह की एक अज़ीम नेमत है, जब यह रिशता क़ायम किया जाता है तो इसमें पायेदारी व दवाम मक़सूद होता है। अल्लाह तआला निकाह के मक़सद को इस तरह बयान फरमाता है ‘‘और उसी की निशानियों में है कि उसने तुम्हारे ही जिन्स की बीवियाँ बनाईं ताकि तुम उनसे सुकून हासिल करो, और उसने तुम्हारे (यानी मियाँ बीवी के दरमियान) मोहब्बत पैदा कर दी’ (सूरह अल रूम 21)।
अल्लाह तआला ने बहुत सी हिकमतों और मसलेहतों के पेशे नज़र निकाह को जाएज़ क़रार दिया, मिन जुमला इन मसालेह व हिकम के एक हिकमत यह भी है कि इस रूए ज़मीन पर नौऐ इंसानी, इसलाहे अरज़ और इक़ामते शराये के लिए उसकी नायब बन कर क़यामत तक बाक़ी रहे और यह मसलेहतें उसी वक्त सच हो सकती है जबकि उनकी बुनियाद मज़बूत और मुस्तहकम सतूनों पर हों, और वह है निकाह। वैसे तो नस्ले इंसानी का वजूद मर्द व औरत के मिलाप से मुमकिन था, ख्वाह वह मिलाप किसी भी तरह का होता, लेकिन इस मिलाप से जो नस्ल वजूद में आती वह इसलाहे अरज़ और इक़ामते शराये के लिए मौज़ू और मुनासिब न होती, न कनसल से ही वजूद में आ सकती है।
इस्लामी तालीमात का तक़ाजा है कि निकाह का मामला उम्र भर के लिए किया जाये और इसको तोड़ने और खतम करने की नौबत ही न आये क्योंकि इस मामला के टूटने का असर न सिर्फ मियां बीवी पर ही पड़ता है बल्कि औलाद की बरबादी और बाज़ खान्दानों में झगड़े का सबब बनता है। जिससे पूरा मुआशरा मुतअस्सिर होता है। इसलिए शरीअते इस्लामिया ने दोनों मियां बीवी को हिदायत दी हैं जिन पर अमल पैरा होने से यह रिश्ता ज़्यादा मज़बूत और मुस्तहकम होता है।
अगर मियां बीवी के दरमियान इख्तेलाफ रूनुमा हों तो सबसे पहले दोनों को मिल कर इख्तेलाफ दूर करने चाहिए। अगर बीवी की तरफ से कोई ऐसी सूरत पेश आये जो शौहर के मिज़ाज के खिलाफ हो तो शौहर को हूकुम दिया गया कि इफहाम व तफहीम और तम्बीह से काम ले। दूसरी तरफ शौहर से भी कहा गया कि बीवी को महज़ नौकरानी और खादमा न समझे बल्कि उसके भी कुछ हुकूक़ हैं जिनकी पासदारी शरीअत में ज़रूरी है। इन हुकूक़ में जहाँ नान व नफ्का और रिहाइश का इंतिज़ाम शामिल है वहीं उसकी दिलदारी और राहत रसानी का ख्याल रखना भी जरूरी है। इसी लिए रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि तुम में सबसे अच्छा आदमी वह है जो अपने घर वालों (यानी बीवी बच्चों) की नज़र में अच्छा हो। और ज़ाहिर है कि उन की नज़र में अच्छा वही होगा जो उनके हुकूक की अदाएगी करने वाला हो।
तलाक़ (ज़रूरत)
अगर मियाँ बीवी के दरमियान इख्तेलाफ दूर न हों तो दोनों खान्दान के चन्द अफराद को हकम बना कर मामला तैय करना चाहिए। गर्जकि हर मुमकिन कोशिश की जानी चाहिए कि अज़दवाजी रिश्ता टूटने न पाये, लेकिन बाज औकात मियाँ बीवी में सुलह मुश्किल हो जाती है जिसकी वजह से दोनों का मिलकर रहना एक अज़ाब बन जाता है तो ऐसी सूरत में अज़दवाजी तअल्लुक को खत्म करना ही तरफैन के लिए मुनासिब मालूम होता है। इसी लिए शरीअते इस्लामिया ने तलाक को जायज़ करार दिया है। तलाक मियाँ बीवी के दरमियन निकाह के मुआहिदा को तोड़ने का नाम है। जिसके लिए सबसे बेहतर तरीका यह है कि दो अहम शरायत के साथ सिर्फ एक तलाक दे दी जाये।
(1) औरत पाकी की हालत में हो।
(2) शौहर औरत की ऐसी पाकी की हालत में तलाक दे रहा हो कि उसने बीवी से हमबिस्तरी न की हो। सिर्फ एक तलाक देने पर इद्दत के दौरान रजअत भी की जा सकती है, यानी मियाँ बीवी वाले तअल्लुकात किसी निकाह के बेगैर दोबारा बहाल किये जा सकते हैं। इद्दत गुजरने के बाद अगर मियाँ बीवी दोबारा निकाह करना चाहें तो निकाह भी हो सकता है। नीज़ औरत इद्दत के बाद किसी दूसरे शख्स से निकाह भी कर सकती है। गर्जकि इस तरह तलाक वाके होने के बाद भी अज़दवाजी सिलसिला को बहाल करना मुमकिन है और औरत इद्दत के बाद दूसरे शख्स से निकाह करने का मुकम्मल इख्तियार भी रखती है।
तलाक का इख्तियार मर्द को
मर्द में आदतन व तबअन औरत की ब निसबत फिक्र व तदब्बुर और बरदाशत व तहम्मुल की कुव्वत ज़्यादा होती है, नीज़ इंसानी खिलकत, फितरत, कुव्वत और सलाहियत के लिहाज़ से और अकल के ज़रिया इंसान गौर व खौज़ करे तो यही नज़र आयेगा कि अल्लाह तआला ने जो कुव्वत मर्द को अता की है, बड़े बड़े काम करने की जो सलाहियत मर्द को अता फरमाई है वह औरत को नहीं दी गई। लिहाजा इमारत और सरबराही का काम सही तौर पर मर्द ही अंजाम दे सकता है। इस मसअला के लिए अपनी अकल से फैसला करने के बजाये उस ज़ात से पूछें जिसने इन दोनों को पैदा किया है। चुनांचे खालिके काएनात ने कुरान करीम में वाजेह अल्फाज़ के साथ इस मसअला का हल पेश कर दिया है। इन आयात में अल्लाह तआला ने वाजेह अल्फाज़ में जिक्र फरमा दिया कि मर्द ही जिन्दगी के सफर का सरबराह रहेगा और फैसला करने का हक मर्द ही को हासिल है अगरचे मर्द को चाहिए कि औरत को अपने फैसलों में शामिल करे। इसी वजह से शरीअते इस्लामिया ने तलाक देने का इख्तियार मर्द को दिया है।
खुला- लेकिन औरत को मजबूर नहीं बनाया कि अगर शौहर बीवी के हुकूक का पूरा हक अदा नहीं कर रहा है या बीवी किसी वजह से उसके साथ अज़दवाजी रिश्ता को जारी नहीं रखना चाहती तो औरत को शरीअते इस्लामिया ने यह इख्तियार दिया है कि वह शौहर से तलाक का मुतालबा करे। अगर औरत वाकई मज़लूमा है तो शौहर की शरई जिम्मेदारी है कि उसके हुकूक की अदाएगी करे वरना औरत के मुतालबा पर उसे तलाक दे दे ख्वाह माल के बदले या बेगैर माल के। लेकिन अगर शौहर तलाक देने से इंकार कर रहा है तो बीवी को शरई अदालत में जाने का हक़ हासिल है ताकि मसअला का हल न होने पर काज़ी शौहर को तलाक देने पर मजबूर करे। इस तरह अदालत के जरिया तलाक वाके हो जायेगी और औरत इद्दत गुजार कर दूसरी शादी कर सकती है। खुला का शकल में तलाके बायन पड़ती है यानी अगर दोनों मियाँ बीवी दोबारा एक साथ रहना चाहें तो रजअत नहीं हो सकती बल्कि दोबारा निकाह ही करना होगा जिसके लिए तरफैन की इजाज़त जरूरी है।
तलाक की किसमें
आम तौर पर तलाक की तीन किसमें की जाती हैं।
(1) तलाके रजई (2) तलाके बायन (3) तलाके मुगल्लज़ा
तलाके रजई
वाजेह अल्फाज के जरिया बीवी को एक या दो तलाक दे दी जाये। मसलन शौहर ने बीवी से कह दिया कि मैंने तुझे तलाक दी। यह वह तलाक है जिससे निकाह फौरन नहीं टूटता बल्कि इद्दत पूरी होने तक बाकी रहता है। इद्दत के दौरान मर्द जब चाहे तलाक से रुजू करके औरत को फिर से बेगैर किसी निकाह के बीवी बना सकता है। याद रहे कि शरअन रजअत के लिए बीवी की रजामंदी ज़रूरी नहीं है।
तलाके बायन
ऐसे अल्फाज के जरिया जो सराहतन तलाक के मानी पर दलालत करने वाले न हों। जैसे किसी शख्स ने अपनी बीवी से कहा कि तु अपने मैके चली जा, मैंने तुझे छोड़ दिया। इस तरह के अल्फाज से तलाक उसी वक्त वाके होगी जबकि शौहर ने इन अल्फाज के जरिया तलाक देने का इरादा किया हो वरना नहीं। इन अल्फाज के जरिया तलाके बायन पड़ती है। यानी निकाह फौरन खत्म हो जाता है, अब निकाह करके ही दोनों मियाँ बीवी एक दूसरे के लिए हलाल हो सकते हैं।
तलाके मुगल्लजा
एक साथ या अलग अलग तौर पर तीन तलाक देना तलाके मुगल्लजा (सख्त) है। ख्वाह एक ही मजलिस में हों या एक ही पाकी में दी गई हों। ऐसी सूरत में न तो मर्द को रुजू का हक़ हासिल है और न ही दोनों मियाँ बीवी निकाह कर सकते हैं, मगर यह कि औरत अपनी मर्जी से किसी दूसरे शख्स से बाकायदा निकाह करे ओर दोनों ने सोहबत भी की हो फिर या तो दूसरे शौहर का इंतिकाल हो जाये या दूसरा शौहर अपनी मर्जी से उसे तलाक दे दे तो फिर यह औरत दूसरे शौहर की तलाक या मौत की इद्दत के बाद पहले शौहर से दोबारा निकाह कर सकती है। इसको अल्लाह तआला ने अपने पाक कलाम में इसी तरह ब्यान फरमाया है। ‘‘फिर अगर शौहर (तीसरी) तलाक दे दे तो वह औरत उसके लिए उस वक्त तक हलाल नहीं होगी जब तक वह किसी और शौहर से निकाह न करे। हाँ! अगर (दूसरा शौहर भी) उसे तलाक दे दे तो इन दोनों पर कोई गुनाह नहीं कि वह एक दूसरे के पास (नया निकाह करके) दोबारा वापस आ जायें, बशर्ते कि उन्हें यह गालिब गुमान हो कि वह अब अल्लाह की हुदूद कायम रखेंगे। इसी को हलाला कहा जाता है। जिसका जिक्र कुरान करीम में है। इसके सही होने के लिए चन्द शर्तें हैं। दूसरा निकाह सही तरीका से मुंअकिद हुआ हो। दूसरे शौहर ने हमबिस्तरी भी की हो। दूसरा शौहर अपनी मर्जी से तलाक दे या वफात पा जाये और दूसरी इद्दत भी गुजर गई हो। हलाला के लिए मशरूत निकाह करना हराम है।
एक साथ तीन तलाक
तलाके रजई और तलाके बायन की शकलो में आम तौर पर इख्तेलाफ नहीं है। लेकिन अगर किसी शख्स ने बुरे तरीके से तलाक के सही तरीका को छोड़ कर गैर मशरू तौर पर तलाक दे दी जैसे तीन तलाकें औरत की नापाकी के दिनों में दे दीं या एक ही पाकी में अलग अलग वक्त में तीन तलाकें दे दीं या अलग अलग तीन तलाकें ऐसे तीन पाकी के दिनों में दी जिसमें कोई सोहबत की हो, या एक ही वक्त में तीन तलाक दे दे तो ऊपर की तमाम सूरतों में तीन ही तलाके पड़ने पर पूरी उम्मते मुस्लिमा मुत्तफिक है सिवाये एक सूरत के, कि अगर कोई शख्स एक मजलिस में तीन तलाके दे दे तो क्या एक वाके होगी या तीन? जमहूर फुकहा व उलमा की राय के मुताबिक तीन तलाक वाके होंगी। फुकहा सहाबा-ए-किराम हज़रत उमर फारूक, हज़रत उसमान, हज़रत अली, हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास, हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर, हज़रत अब्दुल्लाह बिन अमर, हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रजी अल्लाहु अन्हुम तीन ही तलाक पड़ने के कायल थे। नीज़ चारों इमाम (इमाम अबु हनीफा, इमाम मालिक, इमाम शाफइ और इमाम अहमद बिन हम्बल रहमतुल्लाह अलैहिम) की मुत्तफक अलैह राय भी यही है कि एक मजलिस में तीन तलाक देने पर तीन ही वाके होगी, हिन्द, पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान के उलमा की भी यही राय है। 1393 हिजरी में सउदी अरब के बड़े बड़े उलमा की अक्सरियत ने बहस व मुबाहसा के बाद कुरान व हदीस की रौशनी में सहाबा, ताबेईन और तबेताबेईन के अकवाल को सामने रख कर यही फैसला किया था कि एक वक्त में दी गई तीन तलाके तीन ही शुमार होंगी। सिर्फ उलमा की एक छोटी सी जमाअत यानी अहले हदीस (गैर मुकल्लिदीन) की राय है कि एक वाके होगी। उन हज़रात ने जिन दलाएल को बुन्यिाद बना कर एक मजलिस में तीन तलाक देने पर एक वाके होने का फैसला फरमाया है जमहूर फुकहा व उलमा व मुहद्दिसीन ने उनको गैर मोतबर करार दिया है।
लिहाजा मालूम हुआ कि कुरान व हदीस की रौशनी में चौदह सौ (1400) साल से उम्मते मुस्लिमा की बहुत बड़ी तादाद इसी बात पर मुत्तफिक है कि एक मजलिस की तीन तलाकें तीन ही शुमार की जायेंगी, लिहाजा अगर किसी शख्स ने एक मजलिस में तीन तलाकें दे दीं तो इख्तियारे रजअत खत्म हो जायेगा नीज़ मियाँ बीवी अगर आपस में रजामंदी से भी दोबारा निकाह करना चाहें तो यह निकाह दुरुस्त और हलाल नहीं होगा यहां तक कि यह औरत तलाक की इद्दत गुजारने के बाद दूसरे मर्द से निकाह करे, दूसरे शौहर के साथ रहे, दोनों एक दूसरे से सोहबत करें। फिर अगर इत्तिफाक से यह दूसरा शौहर भी तलाक दे दे या वफात पा जाये तो इसकी इद्दत पूरी करने के बाद पहले शौहर से निकाह हो सकता है। यही वह जायज़ हलाला है जिसका जिक्र कुरान करीम में आया है। खलीफा सानी हज़रत उमर फारूक रजी अल्लाहु अन्हु के जमाना खिलाफत में एक मजलिस में तीन तलाकें देने पर बहुत से जगहों पर बाकायेदा तौर पर तीन ही तलाक का फैसला सादिर किया जाता रहा, किसी एक सहाबी का कोई इख्तेलाफ भी किताबों में मज़कूर नहीं है। लिहाजा कुरान व हदीस की रौशनी में जम्हूर फुकहा खास कर (इमाम अबु हनीफा, इमाम मालिक, इमाम शाफइ और इमाम अहमद बिन हम्बल रहमतुल्लाह अलैहिम) और उनके तमाम शागिर्दों की मुत्तफक अलैह राय भी यही है कि एक मजलिस में तीन तलाक देने पर तीन ही वाके होगी। मजमून की तिवालत से बचने के लिए दलाएल पर बहस नहीं की है, लेकिन मेरे दूसरे मजमून (तीन तलाक का मसइला) और सउदी अरब के उलमा के फैसला में तमाम दलाएल पर तफसीली बहस की गई है।
इद्दत, हुकुमे इलाही
इद्दत के लुगवी मानी शुमार करने के हैं, जबकि शरई इस्तिलाह में इद्दत उस मुअय्यन मुद्दत को कहते हैं जिसमें शौहर की मौत या तलाक या खुला की वजह से मियाँ बीवी के दरमियान अलाहिदा होने पर औरत के लिए बाज़ शरई अहकामात की पाबन्दी लाजि़म हो जाती है। औरत के फितरी अहवाल के इख्तेलाफ की वजह से इद्दत की मुद्दत मुख्तलिफ होती है। कुरान व सुन्नत की रौशनी में उम्मते मुस्लिमा मुत्तफिक है कि शौहर की मौत या तलाक या खुला की वजह से मियाँ बीवी के दरमियान जुदाएगी होने पर औरत के लिए इद्दत वाजिब (फर्ज) है। इद्दत दो सूरतों से वाजिब होती है।
इद्दत शौहर की मौत की वजह से
अगर शौहर के इंतिकाल के वक्त बीवी हामला है तो बच्चा पैदा होने तक इद्दत रहेगी, ख्वाह उसका वक्त चार माह और दस दिन से कम हो या ज़्यादा, जैसा कि अल्लाह तआला ने कुरान करीम में इरशाद फरमाया ‘‘हामला औरतों की इद्दत उनके बच्चा पैदा होने तक है। इस आयत के जाहिर से यही मालूम होता है कि हर हामला औरत की इद्दत यही है ख्वाह वह तलाक याफ्ता हो या बेवा, जैसा कि अहादीस की किताबों (किताबुत तलाक) में वजाहत मौजूद है। हमल न होने की सूरत में शौहर के इंतिकाल की वजह से इद्दत चार माह और दस दिन की होगी ख्वाह औरत को माहवारी आती हो या नहीं, खलवते सहीहा (सोहबत) हुई हो या नहीं जैसा कि अल्लाह तआला ने कुरान करीम में इरशाद फरमाया ‘‘तुम में से जो लोग फौत हो जायें और बीवियाँ छोड़ जाये तो वह औरतें अपने आपको चार माह और दस दिन इद्दत में रखें। (सूरह बकरा 234)
इद्दत तलाक या खुला की वजह से
अगर तलाक या खुला के वक्त बीवी हामला है तो बच्चा होने तक इद्दत रहेगी ख्वाह तीन माह से कम मुद्दत में ही विलादत हो जाये। जैसा कि अल्लाह तआला ने कुरान करीम में इरशाद फरमाया ‘‘हामला औरतों की इद्दत उनके बच्चा पैदा होने तक है (सूरह तलाक 4)। अगर शौहर के इंतिकाल या तलाक के कुद दिनों बाद हमल का इल्म हो तो इद्दत बच्चा पैदा होने तक रहेगी ख्वाह यह मुद्दत नौ महीने से कम ही क्यों न हो। अगर तलाक या खुला के वक्त औरत हामला नहीं है तो माहवारी आने वाली औरत के इद्दत तीन हैज़ रहेगी। जैसा कि अल्लाह तआला ने कुरान करीम में इरशाद फरमाया ‘‘मुतल्लाका औरतें अपने आपको तीन हैज़ तक रोके रखें (सूरह बकरा 228)। तीसरी माहवारी खत्म होने के बाद इद्दत पूरी होगी। औरतों के अहवाल की वजह से यह इद्दत तीन माह से ज़्यादा या तीन माह से कम भी हो सकती है।
जिन औरतों को उम्र ज़्यादा होने की वजह से हैज़ आना बन्द हो गया हो जिन्हें हैज़ आना शुरू ही न हुआ हो तो तलाक की सूरत में उनकी इद्दत तीन महीने होगी। जैसा कि अल्लाह तआला ने कुरान करीम में इरशाद फरमाया ’’तुम्हारी औरतों में से जो औरतें हैज़ से नाउम्मीद हो चुकी हैं, अगर तुम उनकी इद्दत की ताईन में शुब्हा हो रहा है तो उनकी इद्दत तीन माह है और इसी तरह जिन औरतों को हैज़ आया ही नहीं है उनकी इद्दत भी तीन माह है (सूरह तलाक 4)।
निकाह के बाद लेकिन खलवते सहीहा (सोहबत) से पहले अगर किसी औरत को तलाक दे दी जाये तो उसके लिए कोई इद्दत नहीं है जैसा कि अल्लाह तआला ने कुरान करीम में इरशाद फरमाया ‘‘ऐ ईमान वालो! जब तुम मोमिन औरतों से निकाह करो फिर हाथ लगाने (यानी सोहबत करने) से पहले ही तलाक दे दो तो उन औरतों पर तुम्हारा कोई हक इद्दत का नहीं है जिसे तुम शुमार करो (सूरह अहजाब 49)। यानी खलवते सहीहा से पहले तलाक की सूरत में औरत के लिए कोई इद्दत नहीं है। लेकिन खलवते सहीहा (सोहबत) से पहले शौहर के इंतिकाल की सूरत में औरत के लिए इद्दत है। सूरह बकरा की आयत 234 के आम व दूसरे अहादीस की रौशनी में उम्मते मुस्लिमा इसपर मुत्तफिक है। निकाह के बाद लेकिन खलवते सहीहा से पहले तलाक देने की सूरत में आधे महर की अदाएगी करनी होगी। (सूरह बकरा 237)
इद्दत की मसलेहतें
इद्दत की बहुत सी दुनियावी और उखरवी मसलेहतें हैं। जिनमें से बाज़ यह हैं।
(1) इद्दत से अल्लाह तआला की रजामंदी का हुसूल होता है क्योंकि अल्लाह तआला के हुकुम को बजालाना इबादत है और इबादत से अल्लाह का कुर्ब हासिल होता है।
(2) इद्दत को वाजिब करार देने की अहम मसलेहत इस बात का यकीन हासिल करना है ताकि पहले शौहर का कोई भी असर बच्चा दानी में न रहे और बच्चे के नसब में कोई शुब्हा बाकी न रहे।
(3) निकाह चूंकि अल्लाह तआला की एक अजीम नेमत है इसलिए इसके जवाल पर इद्दत वाजिब करार दी गई।
(4) निकाह के बुलन्द व बाला मक़सद की मारफत के लिए इद्दत वाजिब करार दी गई ताकि इंसान इसको बच्चों का खेल न बनाले।
(5) शौहर के इंतिकाल की वजह से घर, खान्दान में जो एक खला पैदा हुआ है उसकी याद कुछ मुद्दत तक बाकी रखने की गर्ज से औरत के लिए इद्दत जरूरी करार दी गई।
मुतफर्रिक (जुदा जुदा) मसाइल
शौहर की वफात या तलाक देने से इद्दत शुरू हो जाती है ख्वाह औरत को शौहर के इंतिकाल या तलाक की खबर बाद में पहुंची हो। मुतल्लका या बेवा औरत को इद्दत के दौरान बिला किसी मजबूरी के घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए। किसी वजह से शौहर के घर इद्दत गुजारना मुश्किल हो तो औरत अपने मैके या किसी दूसरे घर में भी इद्दत गुजार सकती है (सूरह तलाक 1)। औरत के लिए इद्दत के दौरान दूसरी शादी करना जायज़ नहीं है, अलबत्ता रिशता का पैगाम औरत को इशारतन दिया जा सकता है (सूरह बकरा 234-235)। जिस औरत के शौहर का इंतिकाल हो जाये तो उसको इद्दत के दौरान खुशबु लगाना, सिंघार करना, सुरमा और खुशबु का तेल बेगैर किसी जरूरत लगाना, मेंहदी लगाना और ज़्यादा चमक दमक वाले कपड़े पहनना दुरुस्त नहीं है। अगर चांद की पहली तारीख को शौहर का इंतिकाल हुआ है तब तो यह महीने ख्वाह 30 के हों या 29 के हों चांद के हिसाब से पूरे किये जाऐंगे और 11 तारीख को इद्दत खत्म हो जायेगी। अगर पहली तारीख के इलावा किसी दूसरी तारीख में शौहर का इंतिकाल हुआ है तो 130 दिन इद्दत रहेगी। उलमा की दूसरी राय यह है कि जिस तारीख में इंतिकाल हुआ है उस तारीख से चार माह के बाद 10 दिन बढ़ा दिए जायें मसलन 15 मुहर्रम को इंतिकाल हुआ है तो 26 जमादिल अव्वल को इद्दत खत्म हो जायेगी। अगर औरत शौहर के इंतिकाल या तलाक की सूरत में इद्दत न करे या इद्दत तो शुरू की मगर पूरी न की तो वह अल्लाह तआला के बनाये हुए कानून को तोड़ने वाली कहलाएगी जो बड़ा गुनाह है, लिहाजा अल्लाह तआला से तौबा व इस्तिगफार करके ऐसी औरत के लिए इद्दत को पूरा करना जरूरी है। इद्दत के दौरान औरत के पूरे नान व नफका का जिम्मेदार शौहर ही होगा।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)