بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

माहे रजब और वाक़या-ए-मेराज

इस्लामी साल का सातवां महीना रजब है। रजब उन चार महीनों में से एक है जिन्हें अल्लाह तआला ने हुरमत वाले महीने क़रार दिया है ’’अल्लाह के नज़दीक महीनों की तादाद बारह महीने हैं, जो अल्लाह किताब (लौहि महफूज़) के मुताबिक़ उस दिन नाफिज हैं जिस दिन अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया। उन (बारह महीनों) में से चार हुरमत वाले हैं।“ (सूरह तौबा 36) इन चार महीनों की तहदीद क़ुरान करीम में नहीं है बल्कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इनको बयान फरमाया है और वह यह हैं जुल कायदा, जुलहिज्जा, मुहर्रम और रजब। मालूम हुआ कि हदीसे नबवी के बेगैर क़ुरान करीम नहीं समझा जा सकता है। इन चार महीनों को अशहुर हरम कहा जाता है। इन महीनों को हुरमत वाले महीने इसलिए कहते हैं कि इनमें हर ऐसे काम जो फितना व फसाद, क़त्ल व गारत गरी और अमन व सुकून की खराबी का बाइस हो से मना फरमाया गया है, अगरचे लड़ाई झगड़ा साल के दूसरे महीनों में भी हराम है मगर इन चार महीनों में लड़ाई झगड़ा करने से खास तौर पर मना किया गया है। इन चार महीनों की हुरमत व अजमत पहली शरीअतों में भी मुसल्लम रही है हत्ताकि ज़माना जाहिलियत में भी इन चारों महीनों का एहतेराम किया जाता था।
रजब का महीना शुरू होने पर हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह तआला से यह दुआ मांगा करते थे। ’’ऐ अल्लाह! रजब और शाबान के महीनों में हमें बरकत अता फरमा और माहे रमज़ान तक हमें पहुंचा।“ (मुसनद अहमद, बज़्ज़ार, तबरानी, बैहक़ी) लिहाज़ा माहे रजब के शुरू होने पर हम यह दुआ या उस मफहुम पर मुशतमिल दुआ मांग सकते हैं। इस दुआ से अंदाजा होता है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नज़दीक रमज़ान की कितनी अहमियत थी कि माहे रमज़ान की इबादत को हासिल करने के लिए आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रमज़ान से दो महीने पहले दुआओं का सिलसिला शुरू फरमा देते थे। माहे रजब को भी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की दुआए बरकत हासिल हुई, जिससे माहे रजब का किसी हद तक मुबारक होना साबित होता है।
माहे रजब में किसी खास नमाज़ पढ़ने का या किसी मुअय्यन दिन के रोजे रखने की खास फज़ीलत का कोई सबूत अहादीस से नहीं मिलता है। नमाज़ व रोज़ा के एतेबार से यह महीना दूसरों महीना की तरह ही है। अलबत्ता रमज़ान के पूरे रोजे रखना हर बालिग मुसलमान मर्द व औरत पर फर्ज़ हैं और माहे शाबान में कसरत से रोजे रखने की तर्गीब आदीस में मौज़ूद है।
माहे रजब में नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कोई उमरह अदा किया या नहीं? इस बारे में उलमा व मुअर्रेखीन की राय मुख्तलिफ हैं। अलबत्ता दूसरे महीनों की तरह माहे रजब में भी उमरह अदा किया जा सकता है। असलाफ से भी इस माह में उमरह अदा करने के सबूत मिलते हैं। अलबत्ता रमज़ान के अलावा किसी और माह में उमरह अदा करने की कोई खास फज़ीलत अहादीस में मौज़ूद नहीं है।

वाक़या-ए-मेराजुन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
इस वाक़या की तारीख और साल के मुतअल्लिक़ मुअररेखीन और सीरतों के जानने वाले की राय मुख्तलिफ हैं, उनमें से एक राय यह है कि नुबूवत के बारहवीं साल 27 रजब को 51 साल 5 महीना की उम्र में नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मेराज हुई जैसा कि अल्लामा क़ाजी मोहम्मद सुलैमान सलमान मंसूरपुरी ने अपनी किताब ’’मुहरे नुबूवत” में लिखा है।
इसरा के मानी रात को ले जाने के हैं। मस्जिदे हराम (मक्का) से मस्जिदे अकसा का सफर जिसका तजकिरा सूरह बनी इसराइल में किया गया है, इसको इसरा कहते हैं। और यहां से जो सफर आसमानों की तरफ हुआ उसका नाम मेराज है, मेराज ओरूज से निकला है जिसके मानी चढ़ने के हैं। हदीस में ’’अरज बीहि” यानी मुझको ऊपर चढ़ाया गया का लफ्ज़ इस्तेमाल हुआ है, इस लिए इस सफर का नाम मेराज हो गया। इस मुक़द्दस वाक़या को इसरा और मेराज दोनों नामों से याद किया जाता है।
इस वाक़या का ज़िक्र सूरह नजम की आयात में भी है ’’फिर वह क़रीब आया और झुक पड़ा, यहां तक कि वह दो कमानों के फासले के बराबर क़रीब आ गया, बल्कि उससे भी ज़्यादा नज़दीक इस तरह अल्लाह को अपने बन्दे पर जो वही नाज़िल फामानी थी वह नाज़िल फरमाई।
सूरह नजम की आयात 13-18 में वज़ाहत है कि हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने (इस मौक़ा पर) बड़ी बड़ी निशानियां मुलाहिजा फरमाऐं ’’और हक़ीक़त यह है कि उन्होंने इस (फरिश्ते) को एक और मरतबा देखा है। उस बेरी के दरखत के पास जिसका नाम सिदरतुल मुंतहा है, उसी के पास जन्नतुल मावा है, उस वक़्त बेरी के दरखत पर वह चीजें छाई हुई थीं जो भी उसपर छाई हुई थीं। (नबी की) आंख न तो चकराई और न हद से आगे बढ़ी, सच तो है कि उन्होंने अपने परवरदिगार की बड़ी बड़ी निशानियों में से बहुत कुछ देखा है।
अहादीस मुतवातिर से साबित है, यानी सहाबा, ताबेईन और तबे ताबेईन की एक बड़ी तादाद से मेराज के वाक़या से मुतअल्लिक़ अहादीस मरवी हैं।

इंसानी तारीख का सबसे लम्बा सफर
क़ुरान करीम और अहादीस मुतवातिर से साबित है कि इसरा मेराज का तमाम सफर सिर्फ रूहानी नहीं बल्कि जिस्मानी था, यानी नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का यह सफर कोई खाब नहीं था बल्कि एक जिस्मानी सफर और एैनी मुशाहिदा था। यह एक मोजज़ा था कि मुख्तलिफ मराहिल से गुज़र कर इतना बड़ा सफर अल्लाह तआला ने अपनी कुदरत से सिर्फ रात के एक हिस्सा में पूरा कर दिया। अल्लाह तआला जो इस पूरी कायनात का पैदा करने वाला है उसके लिए कोई भी काम मुश्किल नहीं है, क्योंकि वह तो कादिरे मुतलक है जो चाहता है करता है, उसके तो इरादा करने पर चीज का वज़ूद हो जाता है। मेराज का वाक़या पूरी इंसानी तारीख का एक ऐसा अज़ीम, मुबारक और बेनजीर मोजज़ा है जिसकी मिसाल तारीख पेश करने से कासिर है। खालिक़े कायनात ने अपने महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को दावत दे कर अपना मेहमान बनाने का वह शर्फ अज़ीम अता फरमाया जो न किसी इंसान को कभी हासिल हुआ है और न किसी मुकर्रब तरीन फरिश्ते को।

वाक़या मेराज का मक़सद
वाक़या मेराज के मकासिद में जो सबसे मुख्तसर और अज़ीम बात क़ुरान करीम (सूरह बनी इसराइल) में ज़िक्र की गई है वह यह है कि हम (अल्लाह तआला) ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अपनी कुछ निशानियां दिखलाईं। उसके मकासिद में से एक अहम मक़सद अपने हबीब मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को वह अजीमुश शान मक़ाम व मरतबा देना है जो किसी भी इंसान हत्ता कि किसी मुकर्रब तरीन फरिश्ता को नहीं मिला है और न मिलेगा। नीज़ उसके मकासिद में उम्मते मुस्लिमा को यह पैगाम देना है कि नमाज़ ऐसा बड़ा अमल और अज़ीम इबादत है कि उसकी फर्ज़ियत का इलान ज़मीन पर नहीं बल्कि सातों आसमानों के ऊपर बुलंद व आला मक़ाम पर मेराज की रात में हुआ। नीज़ उसका हुकुम हज़रत जिबरइल अलैहिस्सलाम के ज़रिया नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तक नहीं पहुंचा बल्कि अल्लाह तआला ने फर्जीयते नमाज़ का तोहफा बजाते खुद अपने हबीब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अता फरमाया। नमाज़ अल्लाह तआला से तअल्लुक़ क़ायम करने और अपनी ज़रूरतों और हाजतों को मांगने का सबसे बड़ा ज़रिया है। नमाज़ में अल्लाह तआला से मुनाजात होती है।

वाक़या मेराज की मुख्तसर तफसील
इस वाक़या की मुख्तसर तफसील यह है कि हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास सोने का तशत लाया गया जो हिकमत और ईमान से पुर था। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का सीना चाक किया गया फिर उसे जमजम के पानी से धोया गया फिर उसे हिकमत और ईमान से भर दिया गया और फिर बिजली की रफ्तार से ज़्यादा चलने वाली एक सवारी यानी बुराक लाया गया जो लम्बा सफेद रंग का चैपाया था, उसका कद गधे से बड़ा और खच्चर से छोटा था वह अपना क़दम वहां रखता था जहां तक उसकी नज़र पड़ती थी। उसपर सवार करके हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को बैतुल मुक़द्दस ले जाया गया और वहां तमाम अम्बिया-ए-किराम ने हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इक़्तिदा में नमाज़ पढ़ी। फिर आसमानों की तरफ ले जाया गया। पहले आसमान पर हज़रत आदम अलैहिस्सलाम, दूसरे आमसान पर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम और हज़रत यहया अलैहिस्सलाम, तीसरे आसमान पर हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम, चैथे आसमान पर हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम, पांचवीं आसमान पर हज़रत हारून अलैहिस्सलाम, छठे आमसान पर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और सातवीं आसमान पर हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम से मुलाक़ात हुई। उसके बाद बैतुल मामूर हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सामने कर दिया गया जहां रोज़ाना सत्तर हज़ार फरिश्ते अल्लाह तआला की इबादत के लिए दाखिल होते हैं जो दोबारह उसमें लौट कर नहीं आते। फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को सिदरतुल मुंतहा तक ले जाया गया। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने देखा कि उसके पत्ते इतने बड़े हैं जैसे हाथी के कान हों और उसके फल इतने बड़े बड़े हैं जैसे मटके हों। जब सिदरतुल मुंतहा को अल्लाह के हुकुम से ढांकने वाली चीजों ने ढांक लिया तो उसका हाल बदल गया, अल्लाह की किसी भी मख्लूक में इतनी ताकत नहीं कि उसके हूसन को बयान कर सके। सिदरतुल मुंतहा की जड़ में चार नहरें नज़र आऐं, दो बातनी नहरें और दो जाहिरी नहरें। हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पूछने पर हज़रत जिबरइल अलैहिस्सलाम ने बताया कि बातनी दो नहरे जन्नत की नहरें हैं और जाहिरी दो नहरें फुरात और नील हैं (फुरात इराक और मिश्र में है)।

नमाज़ की फर्ज़ियत
उस वक़्त अल्लाह तआला ने उन चीजों की वही फरमाई जिनकी वही उस वक़्त फरमाना था और पच्चास नमाजें फर्ज़ कीं। वापसी पर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से मुलाक़ात हुई। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के कहने पर हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम चंद मरतबा अल्लाह तआला के दरबार में हाज़िर हुए और नमाज़ की तख्फीफ की दरख्वास्त की। हर मरतबा पांच नमाजों माफ कर दी गई। यहां तक कि सिर्फ पांच नमाजें रह गईं। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने इस पर मजीद तख्फीफ की बात कही लेकिन उसके बाद हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा कि मुझे इससे ज़्यादा तख्फीफ का सवाल करने में शर्म महसूस होती है और मैं अल्लाह के इस हुकुम को तसलीम करता हुं। इस पर अल्लाह तआला की तरफ से यह आवाज़ आई कि मेरे पास बात बदली नहीं जाती है यानी मैंने अपने फरीजा का हुकुम बाकी रखा और अपने बन्दों से तख्फीफ कर दी और मैं एक नेकी का बदला दस बना कर देता हुं। गरज़ ये कि अदा करने में पांच हैं और सवाब में पचास ही हैं।

नमाज़ की फर्ज़ियत के अलावा दूसरे दो इनाम
इस मौक़ा पर हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अल्लाह तआला से इंसान का रिश्ता जोड़ने का सबसे अहम ज़रिया यानी नमाज़ की फर्ज़ियत का तुहफा मिला और हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का अपनी उम्मत की फिक्र और अल्लाह के फजल व करम की वजह से पांच नमाज़ की अदाएगी पर पचास नमाजों का सवाब दिया जाएगा।
1) सूरह बक़रह की आखरी आयत ’’आमनर रसूलु आखिर तक” इनायत फरमाई गई।
2) इस क़ानून का इलान किया गया कि हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के उम्मतियों के शिर्क के अलावा तमाम गुनाहों की माफी मुमकिन है यानी कबीरा गुनाहों की वजह से हमेशा अज़ाब में नहीं रहेंगे बल्कि तौबा से माफ हो जाऐंगे या अज़ाब भुगत कर छुटकारा मिल जाएगा अलबत्ता काफिर और मशरिक हमेशा जहन्नम में रहेंगे।

मेराज में दीदारे इलाही
ज़माना क़दीम से इख्तेलाफ चला आ रहा है कि हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम शबे मेराज में दीदारे खुदावंदी से मुशर्रफ हुए या नहीं और अगर दीदार हुई तो वह दीदार बसरी थी या कल्बी थी अलबत्ता हमारे लिए इतना मान लेना इंशाअल्लाह काफी है कि यह वाक़या बरहक़ है, यह वाक़या रात के सिर्फ एक हिस्सा में हुआ नीज़ बेदारी की हालत में हुआ है और हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का यह एक बड़ा मोजज़ा है।

कुरैश की तकजीब और उनपर हुज्जत क़ायम होना
रात के सिर्फ एक हिस्सा में मक्का से बतुल मुक़द्दस जाना अम्बिया की इमामत में वहां नमाज़ पढ़ना फिर वहां से आसमानों तक तशरीफ ले जाना, अम्बिया से मुलाक़ात और फिर अल्लाह तआला की दरबार में हाजिरी, जन्नत व दोजख को देखना, मक्का तक वापस आना और वापसी पर कुरैश के एक तिजारती काफला से मुलाक़ात होना जो मुल्के शाम से वापस आ रहा था। जब हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सूबह को मेराज का वाक़या बयान किया तो कुरैश तअज्जुब करने लगे और झुठलाने लगे और हज़रत अबू बकर रज़ियल्लाहु अन्हु के पास गए। हज़रत अबू बकर रज़ियल्लाहु अन्हु ने फरमाया कि अगर उन्हों ने यह बात कही है तो सच फरमाया है। इस पर कुरैश के लोग कहने लगे कि क्या तुम इस बात की भी तसदीक करते हो? उन्होंने फरमाया कि मैं इससे भी ज़्यादा अजीब बातों की तसदीक करता हूं और वह यह कि आसमानों से आपके पास खबर आती है। इसी वजह से उनका लक़ब सिद्दीक़ पड़ गया। उसके बाद जब कुरैश मक्का की जानिब से हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बैतुल मुक़द्दस के अहवाल दरयाफ्त किए गए तो अल्लाह तआला ने बैतुल मुक़द्दस को हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए रौशन फरमा दिया उस वक़्त आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हतीम में तशरीफ फरमा थे। कुरैश मक्का सवाल करते जा रहे थे और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जवाब देते जा रहे थे।

सफरे मेराज के बाज़ मुशाहिदात
इस अहम व अज़ीम सफर में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को जन्नत व दोजख के मुशाहिदा के साथ मुख्तलिफ गुनहगारों के अहवाल भी दिखाए गए जिनमें से बाज़ गुनहगारों के अहवाल इस जज़्बा से लिख रहा हुं कि उन गुनाहों से हम खुद भी बचें और दूसरों को भी बचने की तर्गीब दें।

कुछ लोग अपने सीनों को नाखूनों से छील रहे थे
हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि जिस रात मुझे मेराज कराई गई मैं ऐसे लोगों पर गुजरा जिन के नाखून ताम्बे के थे और वह अपने चेहरों और सीनों को छील रहे थे। मैंने जिबरइल अलैहिस्सलाम से दरयाफ्त किया कि यह कौन लोग हैं? उन्होंने जवाब दिया कि वह लोग हैं जो लोगों के गोश्त खाते हैं (यानी उनकी गीबत करते हैं) और उनकी बेआबरूई करने में पड़े रहते हैं। (अबू दाउद)

सूद खुरों की बदहाली
हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि जिस रात मुझे सैर कराई गई मैं ऐसे लोगों पर भी गुजरा जिनके पेट इतने बड़े बड़े थे जैसे (इंसानों के रहने के) घर होते हैं उनमें सांप थे जो बाहर से उनके पेटों में नज़र आ रहे थे। मैंने कहा कहा कि ऐ जिबरइल! यह कौन लोग हैं? उन्होंने कहा यह सूद खाने वाले हैं। (मिशकात)

कुछ लोगों के सर पत्थरों से कुचले जा रहे थे
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का गुज़र ऐसे लोगों के पास से भी हुआ जिनके सर पत्थर से कुचले चा रहे थे, कुचल जाने के बाद फिर वैसे ही हो जाते थे जैसे पहले थे। इसी तरह यह सिलसिला जारी था, खत्म नहीं हो रहा था। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पूछा यह कौन लोग हैं? जिबरइल अलैहिस्सलाम ने कहा कि यह लोग नमाज़ में सुस्ती करने वाले हैं।(अनवारूस सिराज)

ज़कात न देने वालों की बदहाली
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का गुज़र ऐसे लोगों के पास से भी हुआ जिनकी शर्मगाहों पर आगे और पीछे चितड़े लिपटे हुए हैं और ऊंट व बैल की तरह चरते हैं और कांटेदार खबीस दरखत और जहन्नम के पत्थर खा रहे हैं, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पूछा यह कौन लोग हैं? जिबरइल अलैहिस्सलाम ने कहा कि यह वह लोग हैं जो अपने मालों की ज़कात अदा नहीं करते हैं। (अनवारूस सिराज)

सड़ा हुआ गोश्त खाने वाले लोग
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का गुज़र ऐसे लोगों के पास से भी हुआ जिनके सामने एक हांडी में पका हुआ गोश्त है और एक हांडी में कच्चा और सड़ा हुआ गोश्त रखा है यह लोग सड़ा गोश्त खा रहे हैं और पका हुआ गोश्त नहीं खा रहे हैं, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दरयाफ्त किया कि यह कौन लोग हैं? जिबरइल अलैहिस्सलाम ने कहा कि यह वह लोग हैं जिनके पास हलाल और पाकिज़ा औरत मौज़ूद है मगर जानिया और फाहिशा औरत के साथ रात गुज़ारती हैं। (अनवारूस सिराज)

सिदरतुल मुंतहा क्या है?
अहादीस में सिदरतुल मुंतहा और अस सिदरतुल मुंतहा दोनों तरह इस्तेमाल हुआ है। क़ुरान करीम में सिदरतुल मुंतहा इस्तेमाल हुआ है। सिदरह के मानी बैर के हैं और मुंतहा के मानी इंतिहा होने की जगह के हैं। इस दरख्त का यह नाम रखने की वजह सही मुस्लिम में इस तरह है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि ऊपर से जो अहकाम नाज़िल होते हैं वह इसी पर मुंतहा हो जाते हैं और बन्दों के आमाल नीचे से ऊपर जाते हैं वह वहां पर ठहरे जाते हैं यानी आने वाले अहकाम पहले वहां आते हैं फिर वहां से नाज़िल होते हैं और नीचे से जाने वाले जो आमाल हैं वह वहां ठहरे जाते हैं फिर ऊपर उठाए जाते हैं।
(वज़ाहत) वाक़या मेराजुन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मुतअल्लिक़ कोई खास इबादत हर साल हमारे लिए मसनून या ज़रूरी नहीं है। तारीख के इस बेमिसाल वाक़या को बयान करने का अहम मक़सद यह है कि हम इस अजीमुशशान वाक़या की किसी हद तक तफसीलात से वाकिफ हों और हम उन गुनाहों से बचें जिनका इरतिकाब करने वालों का बुरा अंजाम नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस सफर में अपनी आंखों से देखा और फिर उम्मत को बयान फरमाया।
अल्लाह तआला हम सबका खात्मा ईमान पर फरमा और दोनों जहां की कामयाबी व कामरानी अता फरमा, आमीन।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)