بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

इल्म की रौशनी, मदारिस का निसाबे तालीम और अज़ीम खिदमात

इल्म की अहमियत क़ुरान व हदीस की रौशनी में
इंसान ने जब से शऊर की आंखें खोली हैं इल्म की अहमियत मुसल्लम रही है, कायनात की तमाम मखलूकात पर हज़रत इंसान की बरतरी इल्म की वजह से ही है। अल्लाह तआला ने क़ुरान करीम की पहली वही की इब्तिदा लफ्जे ’’इकरा” से फरमा कर क़यामत तक आने वाले तमाम इंसानों को जेवर इल्म से आरास्ता होने का पैगाम दिया और ‘‘बिस मिकल्लजी खलक” और उसके बाद की आयात से उस इल्म के मुतअल्लिक़ वज़ाहत भी फरमा दी कि असल इल्म वह है जिसके ज़रिया इंसान अपने हकीकी खालिक व मालिक व राजिक को पहचाने जिसने एक नापाक कतरा से हज़रत इंसान को एक खुबसूरत शकल में पैदा फरमाया। गर्ज यह कि पहली वही से अल्लाह तआला ने इंसान को यह तालीम दी है कि इल्म का सबसे पहला और बुनियादी मक़सद मौलाए हकीकी को मान कर रब चाही ज़िन्दगी गुज़ारना है।
इसी तरह ’’नून वल कलम वमा यसतुरून” (सूरह कलम) में अल्लाह तआला ने कलम की कसम खा कर लिखने पढ़ने की खास अहमियत को रहती दुनिया तक वाज़ेह कर दिया। ’’वल कलम” में कलम से मुराद तकदीर का कलम है और ’’वमा यसतुरून” से वह फैसले मुराद हैं जो फरशिते लिखते हैं। मालूम हुआ कि असल इल्म वह है जो तकदीर पर ईमान की तालीम देता हो और ज़ाहिर है कि क़ुरान व हदीस और इन दोनों से माखुज उलूम में ही तकदीर पर ईमान लाने की तालीमात मिलती हैं।
सूरह जमर आयत 9 में अल्लाह तआला फरमाता है ’’क्या अहले इल्म और न जानने वाले बराबर हो सकते हैं? मज़कूरा आयत के इब्तिदाई हिस्सा और उससे कबल आयत में अल्लाह तआला ने फरमाया कि क्या काफिर उस मोमिन के बराबर हो सकता है जो की घडि़यों में इबादत करता है और आखिरत की ज़िन्दगी को सामने रख कर यह दुनियावी व फानी ज़िन्दगी गुज़ारता है। इसके बाद आने वाली आयत में अल्लाह तआला ने फरमाया ’’ऐ मेरे ईमान वाले बन्दो! अपने रब से डरो।“ मालूम हुआ कि जानने वाले की न जानने वाले पर फज़ीलत उस वक़्त होगी जब कि जानने वाला अल्लाह को मान कर ज़िन्दगी गुज़ारने वाला बने।
अल्लाह तआला का फरमान है ’’तुम में से जो लोग ईमान लाए हैं और जिनको अल्म अता किया गया है अल्लाह के दरजों को बुलंद करेगा।“ (सूरह मुजादिला 11) मालूम हुआ कि इल्म इसी सूरत में बाइसे इज़्ज़त व रफत है जब कि जानने वाला ईमान की अज़ीम दौलत से माला माल हो।
अल्लाह तआला अपने हबीब हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मुखातब करते हुए फरमाता है ‘‘ऐ पैगम्बर! जब क़ुरान वही के ज़रिया नाज़िल हो रहा हो तो उसके मुकम्मल होने से पहले जल्दी न किया करो और यह दुआ करते रहा करो कि ’’ऐ मेरे परवादिगार! मेरे इल्म में तरक्की अता फरमा।“ (सूरह ताहा 114) इस आयत से जहां यह मालूम हुआ कि इल्म एक ऐसा समुन्दर है जिसका कोई किनारा नहीं और इंसान को हर वक़्त इल्म में तरक्की की कोशिश करते रहना चाहिए खाह वह इल्म की बुलंदियों पर पहुंच जाए, वहीं यह रहनुमाई भी मिली कि क़ुरान व हदीस और इन दोनों से माखुज इल्म ही असल इल्म है।
इल्म की अहमियत के साथ अल्लाह तआला ने उलमाए किराम के मुतअल्लिक़ यह इलान फरमा दिया ’’अल्लाह से उसके बन्दों में से वही लोग डरते हैं जो इल्म रखते हैं।“ (सूरह फातिर 28) इब्तिदा-ए-इस्लाम से अब तक जितनी भी मशहूर व मारूफ तफसीरें लिखी गई हैं उनमें लिखा है कि इस मज़कूरा आयत में उलमा से मुराद वह उलमा हैं जो अल्लाह के कलाम को पढ़ते पढ़ाते हैं, अल्लाह की जात व सिफात का इल्म रखते हैं, अल्लाह की मखलूकात में गौर व फिक्र करके अल्लाह तआला की अजमत, किबरीयाई व बड़ाई का एतेराफ करते हैं और जात बारी से खौफ व खशीयत रखते हैं। मालूम हुआ कि इसी इल्म से दोनों जहां में बुलंद व आला मक़ाम मिलेगा जिसके ज़रिया अल्लाह का खौफ पैदा और ज़ाहिर है कि यह कैफियत क़ुरान व हदीस और इन दोनों उलूम से माखुज इल्म से ही पैदा होती है।
जिस तरह बारी तआला ने इल्म और उलमा की खास फज़ीलत अपने पाक कलाम में ज़िक्र फरमाई है, रहमतुल लिल आलिमीन हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भी इल्म की खास अहमियत व फज़ीलत को बार बार ज़िक्र फरमाया है मैं सिर्फ एक हदीस पेश कर रहा हुं। रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया जो शख्स तलबे इल्म की राह में चलता है अल्लाह तआला उसके लिए जन्नत का रास्ता आसान कर देता है और जो लोग जब कभी किसी खाना खुदा में जमा हो कर किताबुल्लाह की तिलावत करें और उसके दरस व तदरीस में मशगूल हों तो उनपर अल्लाह की रहमत नाज़िल होती है और फरिश्ते उन्हें घेर लेते हैं और अल्लाह तआला अपने पास वालां में उनका ज़िक्र करता है। (सही मुस्लिम) हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने इस मुख्तसर मगर जामे कलाम में फरमाया कि इल्म उसी वक़्त काबिले कदर व बाइसे रहमत होगा जबकि वह जानने वाले को जन्नत तक पहुंचाने वाला हो। उसके बाद कुरानी हल्कों का ज़िक्र फरमा कर हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने वाज़ेह तौर पर फरमा दिया कि असल इल्म वह है जो कुरानी तालीमात पर मुशतमिल हो।

ख्वातीन हज़रात!
इंसान तीन जराये में से किसी एक ज़रिया से इल्म हासिल करता हे, एक इंसान के हवास यानी आंख, कान, मुंह और हाथ पांव, दूसरा ज़रिया अकल और तीसरा ज़रिया वही है। इंसान को बहुत सी बातें अपने हवास के ज़रिया मालूम होती है, जबकि बहुत सी अकल के ज़रिया और जो बातें उन दोनों जराये से मालूम नहीं हो सकतीं उनका इल्म वही के ज़रिया अता होता है। हवास और अकल के ज़रिया हासिल शुदा इल्म में गलती के इमकान होते हैं लेकिन वही के ज़रिया हासिल शुदा इल्म में गलती के इमकान बिल्कुल नहीं होते, क्योंकि यह इल्म खालिक़े कायनात की जानिब से अम्बिया के ज़रिया इंसानों को पहुंचता है। गर्ज वही इलाही इंसान के लिए वह आला तरीन ज़रिया इल्म है जो उसे उसकी ज़िन्दगी से मुतअल्लिक़ उन सवालात के जवाब मुहैया करता है जो अकल व हवास के ज़रिया हल नहीं हो सकते यानी सिर्फ अकल और मुशाहिदा इंसान की रहनुमाई के लिए काफी नहीं है बल्कि उसकी हिदायत के लिए वही इलाही एक नागुज़ीर ज़रूरत है। चूंकि वही अकल और मुशाहिदे से बढ़ कर इल्म है लिहाज़ा ज़रूरी नहीं कि वही की हर बात का इदराक अकल से हो सके। इस्लाम ने पहले दोनों जराये से हासिल होने वाले इल्म के हुसूल से मना नहीं किया है बल्कि इन उलूम को भी हासिल करने की तर्गीब दी है मगर इन दोनों जराये से हासिल होने वाले इल्म यक़ीनी नहीं बल्कि इसमें गलतियों के इमकानात होते हैं जबकि वही यानी क़ुरान व हदीस का इल्म यक़ीनी है।
हमारा यह ईमान है कि उलूमे क़ुरान व सुन्नत सबसे आला इल्म हैं लेकिन हमें हवास खमसा और अकल के ज़रिया भी इल्म हासिल करने की हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए, तारीख इस बात की शाहिद है कि मुलसमानों ने हर दौर में तालीम के हर मैदान में अपना प्रचम बुलंद रखा है, इसके हर गोशे को अपनी नाकाबिले फरामोश खिदमात मुनव्वर किया है। मगर अफसोस की बात है कि असर हाज़िर में मुलसमानों की बड़ी तादाद ने क़ुरान व हदीस की तालीम को छोड़ दिया और हवासे खमसा व अकल के ज़रिया हासिल होने वाले उलूम में भी पीछे रह गए, चुनांचे ज़रूरत इस बात की है कि हम अपना खोया हुआ वकार दोबारा हासिल करें जिसके लिए हमें अपना रिश्ता क़ुरान व हदीस से मज़बूती के साथ जोड़ कर दूसरे उलूम में भी सबकत हासिल करनी होगी।

मदारिस का क़याम
आईए सबसे पहले उन मसाजिद व मदारिस, दीनी एदारों व खानकाहों व तरबियत गाहों और कज़ा व फतवा की खिदमात हासिल करने वाले एदारों की बात करते हैं जो अपनी दीनी खिदमात में मसरूफ हैं और मिल्लते इस्लामिया की रहबरी व रहनुमाई का फरीजा बहुसन व खुबी अंजाम दे रहे हैं। मदारिस के क़याम की इब्तिदा चौथी सदी हिजरी के आखिर से मंसूब की जाती है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि मुलसमानों में दीनी तालीम के एहतेमाम का सिलसिला अहदे नबवी ही में शुरू हो चुका था। दारे अरकम, दरसगाह मस्जिदे कुबा, मस्जिदे नबवी और असहाबे सुफ्फा के चबूतरा में तालीम व तरबियत की मसरूफियात उसके वाज़ेह सबूत हैं। चौथी व पांचवीं सदी हिजरी की मारूफ दीनी दरसगाहों में मिश्र का जामे अजहर, असफहान का मदरसा अबू बकर अल असफहानी, नीशापुर का मदरसा अबुल इसहाक अल असफर ऐयनी और बगदाद का मदरसा निजामिया शामिल हैं। गरज़ ये कि मदारिस की तारीख व तासीस की कड़ी अहदे रिसालत से जा कर मिलती है और मदारिस में पढ़ाई जाने वाली हदीस की किताबों की सनद का सिलसिला हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तक पहुंचता है। जुनूबी हिन्द के साहिली इलाकों (मालाबार) में अरब ताजिरों की नौ आबादियात में मसाजिद का क़याम व दीनी तालिम के एहतेमाम का सिलसिला सातवीं सदी हिजरी ईसवी में शुरू हो चुका था लेकिन बर्रे सगीर में मदारिस का क़याम दूसरी सदी हिजरी यानी आठवीं सदी ईसवी में हुआ। जहां तक शिमाली हिन्द में मदारिस के दाग बैल पड़ने का तअल्लुक़ है तो उसकी इब्तिदा तुर्क की फतुहात के ज़माना में हो गई थी मगर 1206 ईसवी में जब दिल्ली में मुस्लिम हुकुमत क़ायम हुई तो दिल्ली के अलावा दूसरे शहरों व कसबों व देहातों में कसीर तादाद में मकातिब व मदारिस क़ायम हुए।

मदारिस के क़याम का मक़सद
मदारिस के क़याम का बुनियादी मक़सद किताब व सुन्नत और उनसे माखूज उलूम व फनून की तालीम व तअल्लुम, तौजीह व तशरीह, तामिल व इत्तिबा, तबलीग व दावत के साथ ऐसे रिजाल कार पैदा करना है जो इस तसलसुल को क़ायम व जारी रख सकें, नीज़ इंसानों की दुनियावी ज़िन्दगी की रहनुमाई के साथ ऐसी कोशिश करना है कि हर हर इंसान जहन्नम से बच कर जन्नत में जाने वाला बन जाए।

मदारिस में क्या पढ़ाया जाता है?
अब आईए एक नज़र इसपर भी डालें कि मदारिस में किया पढ़ाया जाता है। मदारिस में यह उलूम पढ़ाए जाते हैं, इल्मे तज्वीद, इल्मे तफसीर, इल्मे उसूल तफसीर, इल्मे हदीस, इल्मे असूले हदीस, इल्मे फिकह, इल्मे असूले फिकह, इल्मे मीरास, इल्के अकायद, इल्मे नहव, इल्मे सर्फ, इल्मे मंतिक, इल्मे बलागत और ज़माना की ज़रूरत के मुताबिक़ बाज़ दूसरे उलूम।

मदारिस के निसाब में तब्दीली
वक़्तन फवक़्तन मदारिस के निसाब में तब्दीली की बात उठती रहती है, इसपर गौर व खौज करने के बाद मालूम हुआ कि मदारिस में निसाब की तब्दीली के लिए आम तौर पर तीन मौक़िफ हैं
एक मौक़िफ उन हज़रात का है जो इस निसाब को मौज़ूदा ज़माने में बेकार समझते हैं, ऐसे लोगों का ख्याल है कि मदारिस के निसाब में बड़े पैमाने पर तब्दीली करने की ज़रूरत है जिसमें असरी उलूम इस हद तक शामिल किए जाऐं कि मदारिस के फुजला कालेज और यूनिवर्सिटियों के फारेगीन के साथ क़दम से क़दम मिला कर दुनियावी ज़िन्दगी में एक दूसरे से आगे बढ़ने की कोशिश में लग जाऐं। यह अमूमन वह हज़रात हैं जिन्होंने मदारिस में न तो तालीम हासिल की है और न ही मदारिस के निसाब से बखुबी वाकिफ हैं। हैरत की बात है कि यह हज़रात एक या दो फीसद तलबा जो मजहबी तालीम हासिल कर रहे हैं उनकी दुनियावी तालीम की तो फिक्र कर रहे हैं मगर 98 या 99 फीसद बच्चे जो असरी तालीम के शुबों में हैं उनकी दीनी तालीम व तरबियत की कोई फिक्र नहीं करते।
एक तबका वह हैं जो इस निसाब में अदना सी तब्दीली भी गवारा नहीं करना चाहता बल्कि जो लोग तब्दिलीयों का मशविरा देते हैं उनकी राय पर तवज्जह भी देने के लिए तैयार नहीं है।
जहिर है कि यह दोनों ही नुकता-ए-नज़र गलत हैं, पहला इसलिए कि मदारिस की तालीम का बुनियादी मक़सद उलूमे क़ुरान व सुन्नत की तरवीज, इशाअत और हिफाज़त है, नीज़ उम्मते मोहम्मदीया की दुनियावी ज़िन्दगी में रहनुमाई के साथ इस बात की कोशिश व फिक्र करना है कि उम्मते मोहम्मदीया का हर हर फर्द उखरवी ज़िन्दगी में कामयाबी हासिल करे। उखरवी ज़िन्दगी को नज़र अंदाज़ करके डाक्टर या इंजीनियर या डिजाईनर बनाना मदारिस के क़याम का मक़सद नहीं। जिस तरह दुनियावी तालीम में भी इंजीनियरिंग करने वाले तालिबे इल्म को मेडिकल की तालीम नहीं दी जाती, वकालत की तालीम हासिल करने वाले तालिबे इल्म को नक्शा नहीं सिखाया जाता क्योंकि मैदान मुख्तलिफ हैं, इसी तरह क़ुरान व हदीस की तालीम में तख्ससूस करने वाले तालिबे इल्म को अंग्रेजी व हिसाब व साइंस वगैरह के सब्जेक्ट जिमनन ही पढ़ाए जा सकते हैं। दूसरा तबका भी गलत सोच रखता है क्योंकि मदारिस के बुनियादी मक़सद (क़ुरान व हदीस की तालीम) पर क़ायम रहते हुए ज़माना की ज़रूरत और उसके तकाजों के मुताबिक़ बाज़ उलूम का हजफ व इजाफा किया जाना चाहिए।
इन दोनों नुक्ता-ए-नज़र के दरमियान एक मुतदिल नज़रया भी है कि मदारिस इस्लामिया को मौज़ूदा रायज निज़ाम के तिहत ही चलना चाहिए, यानी उलूम क़ुरान व सुन्नत को ही बुनियादी तौर पर पढ़ाया जाए और ज़ाहिर है कि क़ुरान हदीस को तब्दील नहीं किया जा सकता, लिहाज़ा क़ुरान व हदीस की वही किताबें पढ़ाई जाऐं जिनके तालीम व तअल्लुम का सिलसिला सैकड़ों सालों से जारी है मगर तफसीर क़ुरान, शरह हदीस और फिकह वगैरह पर कुछ किताबें दौरे हाज़िर के असलूब में अजसिरे नौ मरत्तब करके शामिल की जाऐं, नीज़ नहव व सर्फ व अरबी अदब व बलागत पर आसान व मुख्तसर किताबं लिखी जाऐं, मंतिक और फलसफा जैसे उलूम की बाज़ किताबों को हजफ करके अंग्रेजी, हिसाब और कम्प्यूटर जैसे जदीद उलूम पर मुशतमिल कुछ किताबें निसाब में शामिल की जाऐं। गरज़ ये कि उलूमे किताब व सुन्नत की बाला दस्ती को क़ायम रखते हुए तकाजा-ए-वक़्त के मुनासिब बाज़ उलूम वफनून का इजाफा कर लिया जाए लेकिन मदारिस के निसाब में इस किसम की तब्दीली न की जाए कि असल मक़सद ही फौत हो जाए जैसा कि शायर मश्रिक अल्लामा इकबाल ने फरमाया इन मक्तबों को इसी हाल में रहने दो, गरीब मुलसमानों के बच्चे को इन्हीं मदारिस में पढ़ने दो, अगर यह मुल्ला और दरवेश न रहे तो जानते हो क्या होगा? जो कुछ होगा मैं उन्हें अपनी आंखों से देख आया हुं अगर हिन्दुस्तानी मुसलमान इन मदरसों के असर से महरूम हो गए तो बिल्कुल इस तरह होगा जिस तरह उंदुलूस में मुलसमानों की आठ सौ बरस की हुकुमत के बावज़ूद आज गरनाता और कुर्तबा के खंडरात और अलहमरा के निशानात के सिवा इस्लाम के पैरूओं और इस्लामी तहजीब के आसार का कोई नक्श नहीं मिलता, हिन्दुस्तान में भी आगरा के ताज महल और दिल्ली के लाल किला के सिवा मुलसमानों की आठ सौ साला हुकुमत और उनकी तहजीब का कोई निशान नहीं मिलेगा। (माहनामा दरूल उलूम दिसम्बर 94 बहवाला दीनी मदारिस)
इसी तरह मशहूर व मारूफ आलिमे दीन अल्लामा सैयद सुलैमान नदवी ने फरमाया हमको यह साफ कहना है कि अरबी मदरसों की जितनी ज़रूरत आज है, कल जब हिन्दुस्तान की दूसरी शकल होगी उससे बढ़ कर उनकी ज़रूरत होगी, वह हिन्दुस्तान में इस्लाम की बुनियाद और मरकज होंगे, लोग आज कल अहदों और मुलाज़िमतों के फेर और अरबाब इक़्तिदार की चापलोसी में लगे होंगे और यही दीवाने मुल्ला आज की तरह कल भी होशियार होंगे। इसलिए यह मदरसे जहां भी हों जैसे भी हों उनको संभालना और चलाना मुलसमानों का सबसे बड़ा फर्ज़ है। (महनामा फिक्र वउली उल्लाह मार्च 2003)।

मदारिस की चंद अहम खिदमात
मदारिसे इस्लामिया की दरजनों खिदमात हैं यहां सिर्फ एक दरजन खिमात पेश हैं-
1) क़ुरान व हदीस की खिदमत में मदारिस ने जो किरदार अदा किया वह तारीख का एक नाकाबिले फरामोश हिस्सा है, बर्रे सगीर में क़ुरान व हदीस की मुख्तलिफ तरीकों से बिलवास्ता या बिला वास्ता खिदमत अंजाम देने में उन्हें मदारिस इस्लामिया का रोल है और यह वह शर्फ है जो किसी और इदारा को नसीब नहीं हुआ, अगर यह कहा जाए कि बर्रे सगीर में मदारिस इस्लामिया के वज़ूद के बेगैर उलूम क़ुरान व हदीस का फरूग नामुमकिन था तो बिल्कुल मुबालगा न होगा।
2) इन्हीं मदारिस के फारेगीन में वह लोग भी हैं, जिन्होंने अपनी दूर अंदेशी और बालिग नजरी का सबूत देते हुए मुलसमानों की असरी तालीम के लिए स्कूल, कालेज और यूनिवर्सीटी की बुनियाद रखी, चुनांचे जामिआ मिल्लीया इस्लामिया की बुनियाद ‘‘शैखुल हिन्द” मौलाना महमूदुल हसन ने ही रखी थी, मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने इस एदारा की नशु व नुमा में अहम रोल अदा किया। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सीटी के लिए अल्लामा शिब्ली नुमानी की अज़ीम खिदमात को तारीख नज़र अंदाज़ नहीं कर सकती। उनके अलावा और भी बहुत से उलमा हैं जिन्होंने न सिर्फ मुलसमानों की दीनी तालीम की तरफ तवज्जह दी बल्कि उनको असरी तालीम से भी आरास्ता करने के लिए गैर सरकारी स्कूलों और कालेजों को क़ायम किया। असरे हाज़िर में मुफक्किर मिल्लत मौलाना मोहम्मद वली रहमानी दामत बरकातुहूम ने ’’रहमानी 30’’ के नाम से एक एदारा क़ायम किया है, यह एदारा रोज अव्वल से ही अपने अजायम व मकासिद की तरफ कामयाबी के साथ रवां दवां है चूनांचे बेशुमार तलबा इस एदारा से इस्तिफादा करके अपने मुल्क और कौम का नाम रौशन कर रहे हैं। इसी तरह मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तावनी साहब की खिदमात तालीम से अदना सी वाक़फियत रखने वाले शख्स से भी छुपी हुई नहीं हैं।
3) मदारिस का एक खास इमतियाज यह है कि उसने अपना फैज पहुंचाने में किसी खास तबका या किसी खास जमाअत को दूसरे तबका या जमाअत पर फौकियत नहीं दी बल्कि उसने अपने दरवाजे अमीर और गरीब सबके लिए यकसां तौर पर खुले रखे, इतना ही नहीं बल्कि गरीबों में तालीम को आम करने में सबसे बड़ा किरदार मदारिस ही का है, चुनांचे अगर सर्वे किया जाए तो यही नतीजा निकलेगा कि आज स्कूलों की बनिसबत मदारिस में गरीब तलबा की तादाद बहुत ज़्यादा है।
4) देहात के इलाकों में तालीम व तअल्लुम का नज्म जितना मदारिस ने किया है इतना किसी दूसरे सरकारी या गैर सरकारी एदारों ने नहीं किया, मदारिस के फारेगीन ने इस्लामी तालीम को आम करने, मुलसमानों से जिहालत को दूर करने और मुस्लिम घरानों को इल्म की रौशनी से मुनव्वर करने के लिए न सिर्फ बड़े शहरों या कसबों पर तवज्जह दी है बल्कि गाओं और देहातों का भी रूख किया है ताकि कोई भी गोशा इल्म दीन से खाली न रह जाए। इतना ही नहीं बल्कि बंगाल और यूपी के बाज़ इलाकों में मदारिस में गैर मुस्लिम बच्चे भी तालीम हासिल कर रहे हैं।
5) उर्दू ज़बान की तरवीज व इशाअत में मदारिस ने भरपूर हिस्सा ले कर उर्दू ज़बान की खामोश खिदमत की है और आज भी यह सिलसिला जारी है। मदारिस और मकातिब की तादाद लाखों में है और उनका ज़रिया तालीम उर्दू है। इस्लामियात का बड़ा सरमाया उर्दू ज़बान में है बल्कि उर्दू ज़बान में सबसे ज़्यादा किताबें इस्लामियात की ही हैं।
6) हिन्दुस्तान की आज़ादी के हवाले से देखा जाए तो उसमें भी मदरसों का एक अहम किरदार सामने आता है, चुनांचे हिन्दुस्तान को आजाद कराने में जिन मुलसमानों ने नुमायां किरदार अदा किया है उनमें से एक बड़ी तादाद मदारिस के फुजला की थी।
7) बड़े बड़े शहरों और कसबों में मदारिस के जेरे इंतिज़ाम दारूल कज़ा और दारूल इफता क़ायम किए गए हैं जहां मुलसमानों के आयली मसाइल क़ुरान व सुन्नत की रौशनी में हल किए जाते हैं। दारूल इफता का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि लाखों लोग अदालतों और कोर्ट कचहरियों का चक्कर लगाने से बच गए। इसी के साथ दूसरा अहम फायदा असहाब मामला को यह हुआ कि किसी मुआवजा के बेगैर दारूल इफता के ज़रिया उनके मसाइल जल्द हल हो गए।
8) हर कौम की एक तहजीब होती है और यह तहजीब ही उस कौम की पहचान और उसके वज़ूद का सबब होती है। मदारिस इस्लामिया ने मुलसमानों को इस्लामी तहजीब व तमद्दुन पर क़ायम रहने की न सिर्फ तल्कीन की है बल्कि अमल करके उसको महफूज़ रखने में अहम किरदाद अदा किया है। आज आलमी सतह पर दुशमनाने इस्लाम का मक़सद है कि इस्लामी तहजीब को खत्म करके मुलसमानों पर अपनी तहजीब थोप दें। मदारिस इस्लामिया और उलमाए किराम उनके मकासिद की तकमील में रुकावट बने हुए हैं, लिहाज़ा दुशमनाने इस्लाम मदारिस को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन फुंकों से यह चिराग बुझाया न जाएगा।
9) दुनिया के अतराफ व अकनाफ में मुलसमानों की फलाह व बबहुद के लिए मुख्तलिफ नामों से चलने वाली जमाअतों और तंजीमों में भी मदारिस का अहम रोल है। आज मुलसमानों की सियासी, समाजी और तालिमी सतह पर खिदमत अंजाम देने वाली तंजीमों की सरप्रस्ती ज़्यादा तर फुजला मदारिस ही कर रहे हैं।
10) तालीम के साथ साथ नौजवान तलबा की तरबियत और उनक इस्लाह में मदारिस का रोल अहम है, चुनांचे मदारिस में फजर के वक़्त जागने से लेकर ईशा के बाद सोने तक सभी तलबा के खाने पीने, पढ़ने लिखने, खेलने कूदने और दूसरी ज़रूरी कामों की पाबन्दी निहायत मुनज्जम तरीक़ा से कराई जाती है। शरीअत की तालीमात के मुताबिक़ उनकी तरबियत और जेहन साजी की जाती है और उनको मुआशरत के उसूल व आदाब भी बताए जाते हैं ताकि मदरसा से फारिग होने के बाद घर और समाज में एक बावक़ार और मिसाली ज़िन्दगी गुज़ार सकें।
11) मदारिस में जो कुछ पढ़ाया जाता है वह इस कदर जामे होता है कि इसको मजीद समझने के लिए तलबा को अलग से टूयुशन की ज़रूरत पेश नहीं आती और अगर दरस के दौरान कोई मसअला समझ में नहीं आता तो तलबा बाद में भी किसी मुआवजा के उस्ताज़ से रुजू कर लेते हैं।
12) बर्रे सगीर में क़ायम मदारिस व मकातिब में लाखों की तादाद में लोग रोजगार से जुड़े हुए हैं और वह कम तंख्वाह के बावज़ूद किनाअत करते हैं। गरज़ ये कि उलमाए किराम ने मसाजिद व मदारिस व माकतिब के ज़रिया बच्चा की विलादत के वक़्त कान में अज़ान देने से लेकर नमाज़े जनाजा पढ़ाने तक उम्मते मुस्लिमा की दीनी व तालिमी व समाजी रहनुमाई के लिए ऐसी खिदमात पेश की हैं कि एक मुसलमान भी ऐसा नहीं मिल सकता जो उन खिदमात से मुस्तफीज न हुआ हो।

असरी दरसगाहों में दीनी तालीम व तरबियत की ज़िम्मेदारी
जैसा कि ज़िक्र किया कि इस्लाम ने असरी उलूम को हासिल करने से मना नहीं किया है मगर यह हक़ीक़त है कि आज जो तलबा असरी दरसगाहों से पढ़कर निकलते हैं उनमें एक बड़ी तादाद दीन से बेबहरा लोगों की होती है और एक काबिल लिहाज तादाद तो दीन से बेजार लोगों की होती है। उसकी ज़िम्मेदारी उलमाए किराम पर भी आयद होती है। यह हक़ीक़त है कि आज भी मुस्लिम समाज पर उलमा की जो गिरफ्त है उसकी कोई मिसाल नहीं मिलती, मसाजिद का निज़ाम उलमा के हाथ में है, मदारिस की बहार उनही के दम से क़ायम है, बहुत सी दीनी जमाअतों और तंजीमों में वह किबला नुमा दरजा रखते हैं लेकिन मार्डन एजूकेशन और टेकनिकल तालीम की तरफ उन्होंने खातिर खाह तवज्जह नहीं की है। लिहाज़ा उलमाए किराम की ज़िम्मेदारी है कि वह खुद आगे बढ़ कर असरी तालीम व तरबियत का नज्म किया जाए ताकि दीनदार डाक्टर, दीनदार इंजिनीयर, दीनदार वकील बन कर मुख्तलिफ शुबों में इस्लामी फिक्र व अमल की तरजुमानी करें। मुस्लमानां के जेर एहतेमाम यूनिवर्सिटियों, कालेजों और स्कूलों के जिम्मेदारों से दरख्वास्त है कि दीनी तालीम व तरबियत को सिर्फ नाम के लिए न रखा जाए कि न असातज़ा उसे अहमियत दें और न तलबा व तालिबात, बल्कि शरई ज़िम्मेदारी समझ कर उनकी दीनी तालीम व तरबियत पर खास तवज्जह दी जाए। बच्चों के वालिदैन और सरपरस्तों की भी ज़िम्मेदारी है कि स्कूलों व कालेजों का इंतिखाब ईमान व अकीदे की हिफाज़त की फिक्र के साथ करें।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)