بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

दुआ मोमिन का अज़ीम हथयार है

दुआ की हक़ीक़त
दुआ के लूगवी मानी हैं पुकारना और बुलाना, शरीअत की इस्तिलाह में अल्लाह तआला के हुजूर इल्तिजा और दरख्वास्त करने को दुआ कहते हैं। इंसान की फितरत में है कि वह मुश्किलात और परेशानियों में अल्लाह तआला को पुकारता है जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है ’’जब इंसान को तकलिफ पहुंचती है तो अपने रब को पुकारता है और दिल से उसकी तरफ रुजू करता है।“ (सूरह जमरा 8) हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दुआ को इबादत की रूह क़रार दिया है, यानी दुआ इबदात की रूह और उसका मगज़ है (तिर्मिज़ी) नीज़ हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया दुआ इबादत है। (तिर्मिज़ी)
अल्लाह तआला ने अम्बिया-ए-किराम व सालिहीन की दुआओं का ज़िक्र अपने पाक कलाम (क़ुरान करीम) में बहुत सी जगहों पर फरमाया है।

दुआ की ज़रूरत
हर शख्स मोहताज है और ज़मीन व आसमान के सारे खजाने अल्लाह तआला ही के कब्जा में है, वही साइलों को अता करता है, इरशादे बारी है ’’अल्लाह बेनियाज है और तुम सब मोहताज हो” (सूरह मोहम्मद 38) इंसान की मुहताजी और फकीरी का तकाजा यही है कि बन्दा अपने मौला से अपनी हाजत व ज़रूरत को मांगे और अपने किसी भी अमल के ज़रिया अल्लाह से बेनियाजी का शाइबा भी न होने दे क्योंकि यह मकामे अब्दियत और दुआ के मुनाफी है।

दुआ की अहमियत
दुआ की अहमियत के लिए सिर्फ यही काफी है कि अल्लाह तआला ने सूरह फातिहा में अपने बन्दों को न सिर्फ दुआ मांगने की तालीम दी है बल्कि दुआ मांगने का तरीक़ा भी बताया है। नीज़ इरशाद बारी है ’’(ऐ पैगम्बर) जब आपसे मेरे बन्दे मेरे मुतअल्लिक़ पूछा करें तो (फरमा दीजिए कि) मैं क़रीब ही हुं, जब कोई मुझे पुकारता है तो मैं पुकारने वाले की पुकार सुनता हुं।“ (सूरह बक़रह 186) गरज़ ये कि दुआ क़बूल करने वाला खुद जमानत दे रहा है कि दुआ क़बूल की जाती है, इससे बढ़ कर दुआ की अहमियत किया हो सकती है। नीज़ अल्लाह तआला ने बन्दों को हुकुम देते हुए फरमाया ’’तुम्हारे परवरदिगार ने कहा कि तुम मुझसे दुआ करो, मैं तुम्हारी दुआ क़बूल करूंगा।“ (सूरह मोमिन 60)
हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भी सिर्फ अल्लाह तआला से दुआ करने की तर्गीब दी है, बल्कि उसके फज़ाइल और आदाब भी बयान फरमाए हैं, चुनांचे हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया ’’अल्लाह के यहां दुआ से ज़्यादा कोई अमल अज़ीज़ नहीं है।“ (इनबे माजा) यानी इंसानों के आमाल में दुआ ही को अल्लाह तआला की रहमत व इनायत को खींचने की सबसे ज़्यादा ताकत है।
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया तुममें से जिसके लिए दुआ का दरवाजा खुल गया उसके लिए रहमत के दरवाजे खुल गए और अल्लाह को सबसे ज़्यादा महबूब यह है कि बन्दा उससे आफियत की दुआ करे।“(तिर्मिज़ी)
हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दुआ को मोमिन का खास हथयार यानी उसकी ताकत बताया है। दुआ को हथयार से तशबीह देने की खास हिकमत यही हो सकती है कि जिस तरह हथयार दुशमन के हमला वगैरह से बचाओ का ज़रिया है इसी तरह दुआ भी आफात से हिफाज़त का ज़रिया है।
हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि तुम्हारे परवरदिगार में बदरजा गायत हया और करम की सिफत है, जब बन्दा उसके आगे मांगने के लिए हाथ फैलाता है तो उसको हया (शर्म) आती है कि उनको खाली हाथ वापस कर दे, यानी कुछ न कुछ अता फरमाने का फैसला ज़रूर फरमाता है। (सुनन अबू दाउद) हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का यह इरशाद दरहक़ीक़त साइल के लिए उम्मीद की किरन है कि अल्लाह तआला ऐसा करीम है जो मांगने वालों को कभी महरूम नहीं करता और बन्दा की मसलेहत के मुताबिक ज़रूर अता करता है।
क़ुरान व हदीस से जहां दुआ की अहमियत व फज़ीलत और पसंदीदगी मालूम होती है, वहीं अहादीस में दुआ न करने पर अल्लाह तआला की नाराज़गी की भी वईद आई है, चुनांचे हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो बन्दा अल्लाह तआला से न मांगे उस पर अल्लाह तआला नाराज होता है। (तिर्मिज़ी) दुनिया में ऐसा कोई नहीं है जो सवाल न करने से नाराज होता हो हत्ताकि वालिदैन भी औलाद के हर वक़्त मांगने और सवाल करने से चिढ़ जाते हैं मगर अल्लाह तआला इतना मेहरबान है कि जो बन्दा उससे न मांगे वह उससे नाराज होता है क्योंकि अल्लाह तआला से दुआ न करना तकब्बुर की अलामत है और मांगने पर उसे प्यार आता है।

दुआ के चंद अहम आदाब
दुआ चूंकि एक अहम इबादत है इसलिए इसके आदाब भी काबिले लिहाज हैं। हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दुआ के बारे में कुछ हिदायत दी हैं, दुआ करने वाले के लिए ज़रूरी है कि उनका ख्याल रखे। अहादीस में दुआ के लिए दर्ज जैल आदाब की तालीम फरमाई गई है जिनको मलहुज रख कर दुआ करना बिलाशुबहा कबूलियत की अलामत है लेकिन अगर कोई शख्स किसी वक़्त बाज़ आदाब को जमा न कर सके तो ऐसा न करे कि दुआ ही को छोड़ दे, दुआ इंशाअल्लाह हर हाल में मुफीद है। आदाबे दुआ में बाज़ को रूकन या शर्त या वाजिब का दरजा हासिल है जबकि कुछ चीजें मुस्तहबात दुआ के जुमरा में आती हैं और कुछ चीजें वह हैं जिन से दुआ के मौक़ा पर मना किया गया हैं, जो मुंहियात व मकरूहात कहलाती हैं जो हसबे जैल हैं

दुआ के चंद अहम अरकान, शरायत और वाजिबात
1) अल्लाह तआला से इखलास के साथ दुआ करना यानी यह यक़ीन हो कि अल्लाह तआला ही हमारी ज़रूरतों को पूरी करने वाला है, इरशाद बारी है ’’तुम लोग अल्लाह को खालिस इतिकाद करके पुकारो।“ (सूरह मोमिन 14)
2) दुआ के क़बूल होने की पूरी उम्मीद रखना और यह यक़ीन रखना कि अल्लाह तआला ने क़बूल करने का वादा किया है वह बिला शुबहा क़बूल करेगा, हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया ’’अल्लाह से इस तरह दुआ करो कि तुम्हें कबूलियत का यक़ीन हो।“ (तिर्मिज़ी)
3) दुआ के वक़्त दिल को अल्लाह तआला की तरफ हाज़िर और मुतवज्जह रखना क्योंकि हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया ‘‘बेशक अल्लाह तआला उस बन्दा की दुआ क़बूल नहीं करता जो सिर्फ ऊपरी दिल से और तवज्जह के बेगैर दुआ करता है।“ (तिर्मिज़ी) गरज़ ये कि दुआ के वक़्त जिस कदर मुमकिन हो हुजूर कल्ब की कोशिश करे और खुशू व खुजू और सुकून कल्ब के साथ अल्लाह तआला की तरफ मुतवज्जह हो।
4) दुआ करने वाले की गिजा और लिबास हलाल कमाई से होना। हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो शख्स दूर दराज का सफर करे और निहायत परेशानी व प्रागंदगी के साथ हाथ उठा कर या रब या रब कहते हुए दुआ करे जबकि उसकी गिजा और लिबास सब हराम से हो और हराम कमाई ही इस्तेमाल करता हो तो उसकी दुआ कैसे क़बूल हो सकती है?(सही मुस्लिम)
5) दुआ के शुरू में अल्लाह तआला की हमद व सना करना और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर दरूद भेजना। हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया तुममें से जब कोई दुआ मांगे तो पहले अल्लाह तआला की बुर्जगी व सना से दुआ का आगाज़ करे फिर मुझ पर दुरूद भेजे, फिर जो चाहे मांगे। (तिर्मिज़ी) हज़रत उमर फारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने फरमाया कि दुआ आसमान व ज़मीन के दरमियान मुअल्लक रहती है यानी दरज-ए-कबूलियत को नहीं पहुंचती जब तक कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर दरूद न भेजे। (तिर्मिज़ी)
6) दुआ के वक़्त गुनाह का इक़रार करना, यानी पहले गुनाह से बाहर निकलना, उस पर निदामत करना और आईन्दा न करने का इरादा करना।
7) दुआ आहिस्ता और पस्त आवाज़ से करना यानी दुआ में आवाज़ बुलंद न करना। अल्लाह तआला का इरशाद है ’’तुम लोग अपने परवरदिगार से दुआ किया करो गिर गिरा कर और आहिस्ता।“ (सूरह आराफ 55) (अलबत्ता इजतिमाई दुआ थोड़ी आवाज़ के साथ करें)

दुआ केक चंद अहम मुस्तहबात (वह उमूर जिनका दुआ के वक़्त एहतेमाम करना बेहतर है)
1) दुआ से पहले कोई नेक काम मसलन नमाज़, रोज़ा और सदका वगैरह का एहतेमाम करना।
2) किबला की तरफ रूख करके दो जानु हो कर बैठना और दोनों हाथों का मुढ़ों तक इस तरह उठाना कि हाथ मिले रहें और अंगूलियां भी मिली हों और किबला की तरफ मुतवज्जह हों।
3) अल्लाह तआला के असमा-ए-हुसना और सिफाते आलिया ज़िक्र करके दुआ करना।
4) इस बात की कोशिश करना कि दुआ दिल से निकले।
5) दुआ में अपने खालिक व मालिक के सामने गिड़गिड़ाना यानी रो रो कर दुआऐं मांगना या कम से कम रोने की सूरत बनाना।
6) दुआ को तीन तीन मरतबा मांगना।
7) दुआ के वह अल्फाज़ इख्तियार करना जो क़ुरान करीम में आए हैं या जो हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मंकूल हैं क्योंकि जो दुआऐं क़ुरान करीम में आई हैं उनके अल्फाज़ खुद कबूलियत की दलील हैं और अहादीस में भी उनकी फज़ीलत मज़कूर है और जो दुआऐं हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़बान मुबारक से निकली हैं वह ज़रूर अल्लाह तआला को प्यारी होंगी।
8) तमाम छोटी और बड़ी हाजतें सब अल्लाह तआला ही से मांगना।
9) नमाज़ के बाद और बिलखुसूस फर्ज़ नमाज़ के बाद दुआ मांगना।
10) दुआ करने वाले के बाद आमीन कहना और आखिर में दोनों हाथ अपने चेहरा पर फेर लेना।

मंहियात व मकरूहाते दुआ (वह उमूर जिनका दुआ के वक़्त करना ममनू या मकरूह है)
1) दुआ के वक़्त असबाब की तरफ नज़र न हो बल्कि असबाब व तदाबीर से कता तअल्लुक़ हो कर मुसब्बिबुल असबाब की जात पर यक़ीन रखना।
2) दुआ में हद से तजावुज करना गलत है यानी किसी ऐसे काम की दुआ न करना जो शरअन या आदतन महाल हो या जो बात पहले ही तैय हो चुकी हो मसलन यूं न कहे कि फ्ला मुर्दा को जिन्दा कर दे या औरत यह दुआ करे कि मुझे मर्द बना दे, ऐसी दुआ हरगिज नहीं करनी चाहिए।
3) दुआ में किसी किसम का तकल्लुफ या काफिया बन्दी न करे क्योंकि यह मामला हुजूरे कल्ब से बाज़ रखता है और अगर खुद बखुद बमुकतजा-ए-तबीअत काफिया बन्दी हो जाए तो मजाइका नहीं।
4) अपनी जान व माल और औलाद के लिए बद दुआ न करे मुमकिन है कि कबूलियत की घड़ी में यह बद दुआ निकले और बाद कबूलियत पशेमानी उठानी पड़े।
5) दुआ की अदम कबूलियत पर मायूस हो कर दुआ करना न छोड़ना बल्कि हत्तल इमकान पूर उम्मीद रहना और दुआ क़बूल हो या न हो अपने मालिक के रूबरू हाथ फैलाते रहना, अजब नहीं कि अल्लाह तआला को रहम आ जाए और दुआ क़बूल हो जाए।

क़बूलियते दुआ के बाज़ औक़ात व हालात
यू तो दुआ हर वक़्त क़बूल हो सकती है मगर कुछ औक़ात व हालात ऐसे हैं जिनमें दुआ के क़बूल होने की उम्मीद ज़्यादा है, इसलिए इन औक़ात व हालात को बरबाद नहीं करना चाहिए।
1) शबे क़दर यानी रमज़ानुल मुबारक के अखीर अशरा की रातें। (तिर्मिज़ी)
2) माहि रमज़ानुल मुबारक के तमाम दिन व रात और ईदुल फितर की रात।
3) अरफा का दिन (9 जिलहिज्जा को जवाले आफताब के बाद गुरूबे आफताब तक)। (तिर्मिज़ी)
4) मुज्दलफा में 10 जिलहिज्जा को फजर की नमाज़ पढ़ने के बाद से तुलू आफताब से पहले तक।
5) जुमा की रात और दिन। (तिर्मिज़ी, नसई)
6) आधी रात के बाद से सूबह सादिक तक।
7) जुमा के वक़्त- अहादीस में है कि जुमा के दिन एक घड़ी ऐसी आती है जिसमें दुआ की जाए क़बूल होती है। (बुखारी व मुस्लिम) मगर उस घड़ी की ताईन में रिवायत और उलमा के अक़वाल मुख्तलिफ हैं। रिवायत और अक़वाल सहाबा व ताबईन से दो वक्तों की तरजीह साबित है, पहला इमाम के खुतबा के लिए मिम्बर पर जाने से ले कर नमाज़े जुमा से फारिग होने तक (मुस्लिम) खास कर दोनों खुतबों के दरमियान का वक़्त। खुतबा के दरमियान ज़बान से दुआ नह करें अलबत्ता दिल में दुआ मांगें, इसी तरह खतीब खुतबा में जो दुआऐं करता है उपर भी दिल ही दिल में अमीन कह लें। कबूलियत दुआ का दूसरा वक़्त जुमा के दिन नमाज़े असर के बाद से गुरूबे आफताब तक है। (तिर्मिज़ी)
8) अज़ान व इक़ामत के दरमियान। (तिर्मिज़ी)
9) फर्ज़ नमाज़ के बाद। (नसई)
10) सज्दा की हालत में। (मुस्लिम)
11) तिलावते क़ुरान के बाद। (तिर्मिज़ी)
12) आबे जमजम पीने के बाद। (मुस्तदरक हाकिम)
13) जिहाद में एैन लड़ाई के वक़्त (अबू दाउद)
14) मुलसमानों के इजतिमा के वक़्त। (सिहाये सित्ता)
15) बारिश के वक़्त। (अबू दाउद)
16) बैतुल्लाह पर पहली निगहा पड़ते वक़्त। (तिर्मिज़ी)

दुआ क़बूल होने के चंद अहम मुकामात
यू तो दुआ हर जगह क़बूल हो सकती है मगर कुछ मकामात ऐसे हैं जहां दुआ के क़बूल होने की उम्मीद ज़्यादा है।
1) तवाफ करते वक़्त।
2) मुलजिम पर चिमट कर। (मुल्तजिम उस जगह को कहते हैं जो हजरे असवद और बैतुल्लाह के दरवाजा के दरमियान है, मुल्तजिम अरबी में चिमटने की जगह को कहा जाता है, चूंकि इस जगह चिमट कर दुआ की जाती है इसलिए इसको मुल्तजिम कहते हैं)।
3) हतीम में खास कर मीजाब रहमत के नीचे।
4) बैतुल्लाह शरीफ के अंदर।
5) सफा व मरवा और सफा व मरवा के दरमियान सई करते वक़्त।
6) मकामे इब्राहिम के पीछे।
7) मशाइर मुकद्दसा (अरफात, मुज्दलफा और मिना) में।
8) जमरा ऊला और जमरा वुस्ता की रमी करने के बाद वहां से जरा दाऐं या बाएं जानिब हट कर।

मुस्तजाबुद दावात बन्दे
वह हज़रात जिनकी दुआऐं क़बूल होती हैं और अहादीस में जिनकी दुआओं के क़बूल होने की बशारत दी गई है
1) मजलूम की दुआ यानी ऐसा शख्स जिसपर किसी तरह का जुल्म हुआ हो। (बुखारी व मुस्लिम)
2) मुजतिर यानी मुसीबत जदा की दुआ। (बुखारी व मुस्लिम)
3) वालिदैन की दुआऐं औलाद के हक़ में तेजी के साथ असर करती है, लिहाज़ा हमेशा उनकी दुआऐं लेते रहना चाहिए और उनकी बद दुआ से हमेशा बचना चाहिए। (मुस्लिम)
4) इसी तरह वह औलाद जो वालिदैन के साथ हुसने सुलूक करे और दिल व जान से उनकी खिदमत करे उनकी दुआओं में भी शाने कबूलियत पैदा हो जाती है।
5) मुसाफिर यानी जो अपने घर बार अहल व अयाल से दूर हो, मुसाफिर चूंकि अपने मक़ाम से दूर होता है, आराम न मिलने की वजह से मजबूर और परेशान होता है जब अपनी बीवी और हाजतमंदी की वजह से दुआ करता है तो उसकी दुआ इखलास से भरी हुई होती है और सिदक दिल से निकलने की वजह से क़बूल होती है। (अबू दाउद)
6) इफतार के वक़्त रोज़ेदार की दुआ क्योंकि यह वक़्त लम्बी भुक प्यास के बाद खाने पीने के लिए नफस के शदीद तकाजे का होता है, चूंकि इसने अल्लाह तआला के एक फरीजा को अंजाम दिया है और अल्लाह तआला की खुशनूदी के लिए भुक प्यास बर्दाशत की है इसलिए कि रोजे इख्तिताम पर बन्दों को यह मक़ाम दिया जाता है कि अगर वह उस वक़्त दुआ करे तो ज़रूर क़बूल की जाएगी। (तिर्मिज़ी)
7) एक मुसलमान की दूसरे मुसलमान के लिए गाइबाना दुआ भी मक़बूल है अपने लिए तो सब दुआ करते हैं मगर उसके साथ अपने मुसलमान भाईयों के लिए भी खुसूसी और अमूमी दुआ करनी चाहिए, खाह कोई दुआ के लिए कहे या नह कहे, दूसरों के लिए दुआ करते रहें क्योंकि एक हदीस में है कि सब दुआओं से बढ़ कर जल्द से जल्द क़बूल होने वाली दुआ वह है जो गाइब की गाइब के लिए हो। (तिर्मिज़ी) क्योंकि यह दुआ रियाकारी से पाक होती है महज खुलूस और मोहब्बत की बुनियाद पर की जाती है और इसमें इखलास भी ज़्यादा होता है। एक दूसरी हदीस में है कि एक मुसलमान की अपने मुसलमान भाई की गैर हाजरी में की जाने वाली दुआ क़बूल होती है और उसके सर के पास एक फरिश्ता मुक़र्रर होता है जब वह अपने भाई के लिए दुआ करता है तो फरिश्ता आमीन कहता है और यह भी कहता है कि (भाई के हक़ में तुने जो दुआ की है) तेरे लिए भी इस जैसी नेमत व दौलत की खुशखबरी है। (मुस्लिम)
8) हुज्जाज व मुतमेरीन की दुआ, जो शख्स हजर या उमरह के सफर पर निकला हो उसकी दुआ क़बूल होने का वादा हदीस में है, चुनांचे हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि हजर व उमरह के मुसाफिर बारगाहि इलाही के खुसूसी मेहमान हैं अगर यह अल्लाह तआला से दुआ करें तो क़बूल फरमाए और अगर उससे मगफिरत तलब करें तो उनकी बखशिश फरमा दे। (इब्ने माजा)
9) मरीज़ और मुजाहिद फी सबीलिल्लाह की दुआ, अहादीस से साबित है कि मरीज़ जब तक शिफायाब न हो और मुजाहिद जब तक जिहाद से वापस न हो उनकी दुआ भी क़बूल होती है। एक हदीस में है कि जब तुम बीमार के पास जाओ तो उसे दुआ के लिए कहो। (इब्ने माजा) अल्लाह के रास्ते में अपनी जान व माल की क़ुर्बानी देने के लिए निकल खड़ा हुआ तो जब मुजाहिद दुआ करता है तो अल्लाह तआला उसकी दुआ क़बूल फरमाते हैं।

दुआ के क़बूल होने की अलामत
दुआ क़बूल होने की अलामत यह है कि दुआ मांगते वक़्त अपने गुनाहों को याद करना, अल्लाह का खौफ तारी होना, बेइख्तियार रोना आ जाना, बदन के रूऐं खड़े हो जाना, उसके बाद इतिमनान कल्ब और एक किसम की फरहत महसूस होना, बदन हलकान मालूम होने लगना, गोया कंढ़ों पर से किसी ने बुझ उतार लिया हो। जब ऐसी हालत पैदा हो तो अल्लाह की तरफ खुशू व खुजू कल्ब के साथ मुतवज्जह हो कर उसकी खुब हमद व सना और दरूद के बाद अपने लिए, अपने वालिदैन, रिशतेदारों, असातिज़ा और मुलसमानों के लिए गिड़गिड़ा कर दुआऐं करें। इंशाअल्लाह इस कैफियत के साथ की जाने वाली दुआ ज़रूर क़बूल होगी। दुआ की कबूलियत में जल्दी नहीं करनी चाहिए क्योंकि दुआ की कबूलियत का वक़्त मुअय्यन है और नाउम्मीद भी नहीं होना चाहिए और यूं नहीं कहना चाहिए कि मैंने दुआ की थी मगर क़बूल न हुई, अल्लाह तआला के फजल से नाउम्मीद होना मुलसमानों का शेवा नहीं। दुआ की कबूलियत में अल्लाह तआला कभी कभी मतलूब से बेहतर कोई दूसरी चीज इंसान को अता फरमाता है या कोई आने वाली मुसीबत दूर कर देता है।
खुलासा कलाम यह है कि दुआ मतहरे अब्दियत और एक अहम इबादत है। दुआ मुजतरिब कुलूब के लिए सामाने सुकून, गुमराहों के लिए ज़रिया-ए-हिदायत, मुत्तकियों के लिए कुर्बे इलाही का वसीला और गुनाहगारों के लिए अल्लाह की बखशिश व मगफिरत की बादे बहार है। इसलिए हमें दुआ में हरगिज काहिली व सुसती नहीं करनी चाहिए यह बड़ी महरूमी की बात है कि हम दुशमनों से निजात और तरह तरह की मुसीबतों के दूर होने के लिए बहुत सी तदबीरें करते हैं मगर वह नहीं करते जो हर तदबीर से आसान और हर तदबीर से बढ़ कर मुफीद है (यानी दुआ), इसलिए हमें चाहिए कि इस अहम और मुहतम बिश शाम इबादत के अरकान व शरायत व वाजिबात व मुस्तहबात के साथ और मनहियात व मकरूहात से बचते हुए अपने खालिक व मालिक के सामने थोड़े थोड़े वक़्त पर खुब दुआऐं करें।
अल्लाह तआला हमें सही मानी में अपने से मांगने की तौफीक़ अता फरमाऐं, आमीन।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)