بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

अल्लाह तआला हमसे क़र्ज़ हसन का मुतालबा करता है

बावज़ूद कि अल्लाह तआला ही पूरी कायनात का खालिक, मालिक और राजिक है, उसीने हमें और तमाम इंसान और जिन्नात को पैदा किया है, वही माल देने वाला और माल के ज़रिया दुनियावी ज़रूरतों को पूरा करने वाला है मगर उसका फजल व करम व इहसान है कि माल दे कर वह हमसे मुतालबा करता है कि हम उसको क़र्ज़ हसन अदा करें। अल्लाह तआला ने क़ुरान करीम की छः आयात में बारह मकामात पर क़र्ज़ का ज़िक्र फरमाया है और हर आयत में क़र्ज़ को हसन के साथ बयान किया है। इन आयात में अल्लाह तआला ने क़र्ज़ हसन के मुख्तलिफ बदले ज़िक्र किए हैं, दुनिया में बेहतरीन बदला, दुनिया व आखिरत में बेहतरीन बदला, आखिरत में अज़ीम बदला, गुनाहों की माफी और जन्नत में दाखिला।
क़र्ज़ के मानी काटने के हैं यानी अपने माल में से कुछ माल काट कर अल्लाह तआला के रास्ते में दिया जाए तो अल्लाह तआला इसका कई गुना बदला अता फरमाएगा। मोहताज लोगों की मदद करने से माल में कमी वाक़े नहीं होती है बल्कि अल्लाह तआला की रज़ा के लिए जो माल गरीबों, मिसकीनों और ज़रूरत मंदों का दिया जाता है अल्लाह तआला इसमें कई गुना इजाफा फरमाता है कभी जाहिरी तौर पर कभी मानवी व रूहानी तौर पर इसमें बरकत डाल देता है और आखिरत में तो यक़ीनन इसमें हैरान कुन इजाफा होगा। हसन के मानी बेहतर, खुबसूरत और अच्छे के हैं। क़र्ज़ हसन से मुतअल्लिक़ 6 आयाते कुरानिया हसबे जैल हैं।
कौन शख्स है जो अल्लाह तआला को क़र्ज़ हसन दे ताकि उसे कई गुना बढ़ा चढ़ा कर वापस करे, माल का घटाना और बढ़ाना सब अल्लाह ही के इख्तियार में है और इसी की तरफ तुम्हें पलट कर जाना है। (सूरह बक़रह 245) और तुम अल्लाह तआला की क़र्ज़ हसन देते रहे तो यक़ीन रखो कि मैं तुम्हारी बुराईयों तुम से दूर कर दुंगा और तुम्हें ऐसी जिन्नतों में दाखिल करूंगा जिनके नीचे नहरे बहती होंगी। (सूरह माइदा 12) कौन शख्स है जो अल्लाह तआला को क़र्ज़ हसन दे ताकि अल्लाह तआला उसे बढ़ा चढ़ा कर वापस करे। और उसके लिए बेहतरीन अजर है। (सूरह हदीद 11) मर्द और औरत में से जो लोग सदकात देने वाले हैं और जिन्होंने अल्लाह तआला को क़र्ज़ हसन दिया है उनको यक़ीनन कई गुना बढ़ा दिया जाएगा और उनके लिए बेहतरीन अजर है। (सूरह हदीद 18) अगर तुम अल्लाह तआला को क़र्ज़ हसन दो तो वह तुम्हें कई गुना बढ़ा कर देगा और तुम्हारे गुनाहों को माफ फरमाएगा। अल्लाह तआला बड़ा कदरदां और बुर्दबार है। (सूरह तगाबून 17) और अल्लाह तआला को क़र्ज़ हसन दो जो कुछ नेक आमाल तुम अपने लिए आगे भेजोगे उसे अल्लाह के यहां मौज़ूद पाओगे वही ज़्यादा बेहतर है और इसका अजर बहुत बड़ा है। (सूरह मुजम्मिल 20)
क़र्ज़ हसन से क्या मुराद है?
क़ुरान करीम में इस्तेमाल हुई इस्तिलाह (क़र्ज़ हसन) से अल्लाह तआला के रास्ते में खर्च करना, गरीबों और मोहताजों की मदद करना, यतीमों और बेवाओं की किफालत करना, मुकरूजीन के क़र्ज़ की अदाएगी करना, नीज़ अपने बच्चों पर खर्च करना मुराद है गरज़ ये कि इंसानियत के काम आने वाली तमाम शकलें इसमें दाखिल हैं जैसा कि मुफस्सेरीन क़ुरान ने अपनी तफसीरों में लिखा है। इसी तरह क़र्ज़ हसन में यह शकल भी दाखिल है कि किसी परेशान हाल शख्स को इस नियत के साथ क़र्ज़ दिया जाए कि अगर वह अपनी परेशानियों की वजह से वापस न कर सका तो उससे मुतालबा नहीं किया जाएगा।
अल्लाह ने बन्दों की ज़रूरत में खर्च करने को क़र्ज़ हसन से क्यों ताबीर किया?
अल्लाह तआला ने मोहताज बन्दों की ज़रूरतों में खर्च करने को अल्लाह तआला को क़र्ज़ देना क़रार दिया, हालांकि अल्लाह तआला बेनियाज है वह न सिर्फ माल व दौलत और सारी ज़रूरतों का पैदा करने वाला है बल्कि वह तो पूरी कायनात का खालिक, मालिक और राजिक है, हम सब उसी के खजाने से खा पी रहे हैं ताकि हम बढ़ चढ़ कर इंसानों के काम आऐं, यतीम बच्चों और बेवा औरतों की किफालत करें, गरीब मोहताजों के लिए रोटी कपड़ा और मकान के इंतिज़ाम के साथ उनकी दीनी व असरी तालिमी ज़रूरतों को पूरा करने में एक दूसरे से मुसाबक़त करें, जिसकी वजह से अल्लाह तआला हमारे गुनाहों को माफ फरमाए, दोनों जहां में उसका बेहतरीन बदला अता फरमाए और अपने मेहमान खाना जन्नतुल फिदौस में मकाम अता फरमाए, आमीन।

हज़रत अबुल दहदा रज़ियल्लाहु अन्हु का वाक़या
हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि जब क़र्ज़ हसन से मुतअल्लिक़ आयत क़ुरान करीम में नाज़िल हुई तो हज़रत अबुल दहदा अंसारी रज़ियल्लाहु अन्हु हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया या रसूलुल्लाह! क्या अल्लाह तआला हमसे क़र्ज़ तलब फरमाता है। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया हां। वह अर्ज़ करने लगे अपना दस्ते मुबारक मुझे पकड़वा दीजिए (ताकि मैं आप के दस्ते मुबारक पर एक अहद करूं)। हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपना हाथ बढ़ा दिया। हज़रत अबुल दहदा रज़ियल्लाहु अन्हु ने मुआहिदा के तौर पर हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का हाथ पकड़ कर अर्ज़ किया या रसूलुल्लाह! मैंने अपना बाग अपने अल्लाह को क़र्ज़ दे दिया। उनके बाग में खजूर के 600 दरखत थे और इसी बाग में उनके बीवी बच्चे रहते थे। यहां से उठ कर अपने बाग गए और अपनी बीवी उम्मुद दुहदा से आवाज़ दे कर कहा चलो इस बाग से निकल चलो, यह बाग मैंने अपने रब को क़र्ज़ दे दिया। (तफसीर इब्ने कसीर) यह है वह कीमती सौदा जो हज़रत अबुल दहदा रज़ियल्लाहु अन्हु ने किया, उनके पास दो बाग थे उनमें से एक बाग बहुत कीमती था जिसमें खजूर के 600 दरखत थे जिसको वह बहुत पसंद करते थे और इसी में वह और उनके बच्चे रहते थे लेकिन मज़कूरा आयत के नजूल के बाद यह कीमती बाग ज़रूरत मदं लोगों के लिए अल्लाह तआला को क़र्ज़ दे दिया। ऐसे ही लोगों की तारीफ में अल्लाह तआला ने अपने कलाम में इरशाद फरमाया ’’अपने ऊपर दूसरों को तरजीह देते हैं चाहे खुद उनको कितनी ही सख्त ज़रूरत हो।“ (सूरह हशर 9)

क़र्ज़ हसन और अल्लाह के रास्ते में खर्च करने की फज़ीलत
मज़कूरा तफसील से मालूम हुआ कि क़र्ज़ हसन से मुराद अल्लाह तआला की खुशनूदी के लिए बन्दों की मदद करना है यानी अल्लाह तआला के रास्ते में खर्च करना है लिहाज़ा अल्लाह तआला के रास्ते में खर्च करने के चंद फज़ाइल लिखे हैं। जो लोग अपना माल अल्लाह तआला के रास्ते में खर्च करते हैं उसकी मिसाल उस दाने जैसी है जिसमें सात बालियां निकलें और हर बाली में सौ दाने हों और अल्लाह तआला जिसको चाहे बढ़ा चढ़ा कर दे और अल्लाह तआला कुशादगी वाला और इल्म वाला है। (सूरह बक़रह 261) उन लोगों की मिसाल जो अपना माल अल्लाह तआला की रज़ामंदी की तलब में दिल की खुशी और यक़ीन के साथ खर्च करते हैं उस बाग जैसी है जो ऊंची ज़मीन पर हो और जोरदार बारिश उसपर बरसे और वह अपना फल दो गुना लावे और अगर उसपर बारिश न भी बरसे तो फौवारा ही काफी है और अल्लाह तआला तुम्हारे काम देख रहा है। (सूरह बक़रह 265) जिस कदर खुलूस के साथ हम अल्लाह तआला के रास्ते में माल खर्च करेंगे उतना ही अल्लाह तआला की तरफ से उसका अजर व सवाब ज़्यादा होगा। एक रूपय भी अगर अल्लाह तआला की खुशनूदी के लिए किसी मोहताज को दिया जाएगा तो अल्लाह तआला 700 गुना बल्कि उससे भी ज़्यादा सवाब देगा। मज़कूरा आयात के आखिर में अल्लाह तआला की दो सिफात ज़िक्र की गई है, वसी और अलीम यानी उसका हाथ तंग नहीं है कि जितने अजर का अमल मुस्तहिक़ है वह ही दे बल्कि उससे भी ज़्यादा देगा। दूसरे यह कि वह अलीम है कि जो कुछ खर्च किया जाता है और जिस जज़्बा से किया जाता है उससे बेखबर नहीं है बल्कि उसका अजर ज़रूर देगा।
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया मैं और यतीम की किफालत करने वाला दोनों जन्नत में इस तरह होंगे जैसे दो अंगूलियां आपस में मिली हुई होती हैं। (बुखारी)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया मिसकीन और बेवा औरत की मदद करने वाला अल्लाह तआला के रास्ते में जिहाद करने वाले की तरह है। (बुखारी व मुस्लिम)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो शख्स किसी मुसलमान को ज़रूरत के वक़्त कपड़ा पहनाएगा अल्लाह तआला उसको जन्नत के सब्ज लिबास पहनाएगा। जो शख्स किसी मुसलमान को भुक की हालत में कुछ खिलाएगा अल्लाह तआला उसको जन्नत के फल खिलाएगा। जो शख्स किसी मुसलमान को प्यास की हालत में पानी पिलाएगा अल्लाह तआला उसको जन्नत की ऐसी शराब पिलाएगा जिस पर वह महर लगी हुई होगी। (अबू दाउद, तिर्मिज़ी)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया तुम्हें अपने कमजोर के तुफैल से रिज़्क़ दिया जाता है और तुम्हारी मदद की जाती है। (बुखारी)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया सदका करने से माल में कमी नहीं होती है। (मुस्लिम)
जिन हज़रात को क़र्ज़ हसन और सदकात दिए जा सकते हैं उनमें से बाज़ यह हैं गरीब रिशतेदार, यतीम, बेवा, फकीर, मिसकीन, साइल, क़र्ज़दार यानी वह शख्स जिसके जिम्मा लोगों का क़र्ज़ हो और वह मुसाफिर जो हालते सफर में तंगदस्त हो गया हो जैसा कि अल्लाह तआला फरमाता है जो माल से मोहब्बत करने के बावज़ूद रिशतेदारों, यतीमों, मिसकीनों, मुसाफिरों और सवाल करने वाले को दे। (सूरह बक़रह 177) उनके माल में मांगने वाले महरूम का हक़ है। (सूरह जारियात 19)

क़र्ज़ हसन और अल्लाह के रास्ता में पसंदीदा चीजें खर्च करें
जब तक तुम अपनी पसंदीदा चीज अल्लाह तआला की राह में खर्च नहीं करोगे हरगिज भलाई नहीं पाओगे। (सूरह आले इमरान 92) ऐ इमान वालो! अपनी पाकिज़ा कमाई में से खर्च करो। (सूरह बक़रह 267) जब यह आयत नाज़िल हुई तो हज़रत अबू तल्हा रज़ियल्लाहु अन्हु हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत हाज़िर हुए और अर्ज़ किया या रसूलुल्लाह! अल्लाह तआला ने महबूब चीज के खर्च करने का ज़िक्र फरमाया है और मुझे सारी चीजों में अपना बाग (बीरे हा) सबसे ज़्यादा महबूब है, मैं उसको अल्लाह के लिए सदका करता हुं और उसके अजर व सवाब की अल्लाह तआला से उम्मीद रखता हुं। हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया ऐ तल्हा! तुमने बहुत ही नफा का सौदा किया। एक दूसरी हदीस में है कि हजर अबू तल्हा रज़ियल्लाहु अन्हु ने अर्ज़ किया या रसूलुल्लाह! मेरा बाग जो इतनी मालियत का है वह सदका हे और अगर मै उसकी ताकत रखता कि किसी को उसकी खबर न हो तो ऐसा ही करता मगर यह ऐसी चीज नहीं है जो मख्फी रह सके। (तफसीर इब्ने कसीर)
इस आयत के नाज़िल होने के बाद हज़रत उमर फारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु भी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाज़िर हुए और कहा कि मुझे अपने तमाम माल में सबसे ज़्यादा पसंदीदा माल खैबर की ज़मीन का हिस्सा है, मैं उसे अल्लाह तआला की राह में देना चाहता हु। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया उसे फक्फ कर दो। असल रोक लो और फल वगैरह अल्लाह की राह में दे दो। (बुखारी व मुस्लिम)
हज़रत मोहम्मद बिन मुनकिदर रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि जब यह आयत नाज़िल हुई तो हज़रत जैद बिन हारिसा रज़ियल्लाहु अन्हु के पास एक घोड़ा जो उनको अपनी सारी चीजों में सबसे ज़्यादा महबूब था। (उस ज़माना में घोड़े की हैसियत तक़रीबन वही थी जो उस ज़माना में गाड़ी की है) वह उसको लेकर हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया कि यह सदका है, हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने क़बूल फरमा लिया और लेकर उनके साहबजादा हज़रत उसामा रज़ियल्लाहु अन्हु को दे दिया। हज़रत जैद रज़ियल्लाहु अन्हु के चेहरा पर कुछ गिरानी के आसार ज़ाहिर हुए (कि घर में ही रहा, बाप के बजाए बेटे का हो गया) हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि अल्लाह तआला ने तुम्हारा सदका क़बूल कर लिया, अब चाहे इसको तुम्हारे बेटे को दुं या किसी और रिशतेदार को या अजनबी को। गरज़ ये कि इस आयत के नाज़िल होने के बाद सहाबए किराम की एक जमाअत ने अपनी अपनी महबूब चीजें अल्लाह तआला के रास्ते में दीं, जिनको नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ज़रूरतमंद लोगों के दरमियान तक़सीम कीं।
(वज़ाहत) सहाबए किराम की तरबियत खुद हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाई थी और उनका ईमान और तवक्कुल कामिल था, लिहाज़ा उनके लिए अपनी पसंदीदा चीजों का अल्लाह तआला के रास्ते में खर्च करना बहुत आसान था जैसा कि सहाबए किराम के वाक़यात तारीखी किताबों में महफूज़ हैं। जंगे खैबर के मौक़ा पर हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु का अपना सारा सामान अल्लाह तआला के रास्ते में खर्च करना, हज़रत उसमान गनी रज़ियल्लाहु अन्हु का हर ज़रूरत के वक़्त अपने माल के वाफिर हिस्सा को अल्लाह तआला की खुशनूदी हासिल करने के लिए खर्च करना वगैरह वगैरह। आज हम ईमान व अमल के एतेबार से कमजोर हैं और हम ’’लन तनालूल आखिर तक” का मिसदाक बज़ाहिर बन सकते हैं तो कम से कम ’’या एैयहल्लजीन आमनु आखिर तक” पर अमल करके अपनी रोजी सिर्फ हलाल तरीक़ा से हासिल करने पर इकतिफा करें और इसी हलाल रिज़्क़ में से अल्लाह तआला की खुशनूदी के लिए ज़रूरतमंद लोगों पर खर्च करें।

क़र्ज़ हसन या अल्लाह के रास्ते में खर्च को बरबाद करने वाले असबाब
अल्लाह तआला की रज़ा का हुसूल मतलूब न हो बल्कि रिया यानी शोहरत मतलूब हो या इहसान जताना मकसूद हो। इसी तरह क़र्ज़ हसन या सदका दे कर लेने वाले को ताना वगैरह दे कर तकलिफ पहुंचाई जाए। लिहाज़ा सिर्फ और सिर्फ अल्लाह तआला की रज़ा के हुसूल के लिए किसी की मदद की जाए जैसा कि अल्लाह तआला ने क़ुरान करीम में इरशाद फरमाया ’’ऐ ईमान वालो! अपनी खैरात को इहसान जता कर और ईजा पहुंचा कर बरबाद नह करो, जिस तरह वह शख्स जो अपना माल लोगों के दिखावे के लिए खर्च करे। (सूरह बक़रह 264) जो लोग अपना माल अल्लाह तआला की राह में खर्च करते हैं फिर उसके बाद न तो इहसान जताते हैं न ईजा देते हैं उनका अजर उनके रब के पास है, उनपर न तो कुछ खौफ है न वह उदास होंगे। (सूरह बक़रह 262) उन लोगों की मिसाल जो अपना माल अल्लाह तआला की रज़ामंदी की तलब में दिल की खुशी से खर्च करते हैं। (सूरह बक़रह 265)

तंगदस्ती और हाजत के वक़्त में भी अल्लाह के रास्ते में खर्च करें
क़र्ज़ हसन या सदकात के लिए ज़रूरी नहीं है कि हम बड़ी रकम ही खर्च करें या इसी वक़्त लोगों की मदद करें जब हमारे पास दुनियावी मसाइल बिल्कुल ही न हों बल्कि तंगदस्ती के दिनों में भी हसबे इस्तिताअत लोगों की मदद करने में हमें कोशां रहना चाहिए जैसा कि अल्लाह तआला फरमाता है जो महज खुशहाली में ही नहीं बल्कि तंगदस्ती के मौक़ा पर भी खर्च करते हैं उनके रब की तरफ से उसके बदला में गुनाहों की माफी है और ऐसी जन्नतें हैं जिनके नीचे नहरे बहती हैं। (सूरह आले इमरान 134) जो माल से मोहब्बत करने के बावज़ूद रिशतेदारों, यतीमों, मिसकीनों, मुसाफिरों और सवाल करने वाले को दे। मुफस्सेरीन ने लिखा है कि माल की मोहब्बत से मुराद माल की ज़रूरत है। यानी हमें माल की ज़रूरत है, उसके बावज़ूद हम दूसरों की मदद के लिए कोशां हैं। (सूरह बक़रह 177) नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सबसे बेहतर सदका के मुतअल्लिक़ सवाल किया गया। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया इस हाल में भी खर्च करो कि तुम सही सालिम हो और ज़िन्दगी की उम्मीद भी हो, अपने गरीब हो जाने का डर और अपने मालदार होने की तमन्ना भी हो। यानी तुम अपनी ज़रूरतों के साथ दूसरों की ज़रूरतों का पूरा करने की फिक्र करो। (बुखारी, मुस्लिम)

खुलासा बहस
अल्लाह तआला ने माल व दौलत को इंसान की ऐसी दुनियावी ज़रूरत बनाई है कि अमूमन इसके बेगैर इंसान की ज़िन्दगी दो भर रहती है। माल व दौलत के हुसूल के लिए अल्लाह तआला ने इंसान को जाएज़ कोशिशें करने का मुकल्लफ तो बनाया है मगर इंसान की जद्दु व जिहद और दौड़ व धूप के बावज़ूद उसकी अता अल्लाह तआला ने अपने इख्तियार में रखी है चाहे तो वह किसी के रिज़्क़ में कुशादगी कर दे और चाहे तो किसी के रिज़्क़ में तमाम दुनियावी असबाब के बावज़ूद तंगी पैदा कर दे।
माल व दौलत के हुसूल के लिए इंसान को खालिक़े कायनात ने यूंही आजाद नहीं छोड़ दिया कि जैसे चाहो कमाओ खाओ। बल्कि उसके उसूल व जवाबित बनाए ताकि इस दुनियावी ज़िन्दगी का निज़ाम भी सही चल सके और उसके मुताबिक़ आखिरत में जजा व सजा का फैसला हो सके। इन्हीं उसूल व जवाबित को शरीअत कहा जाता है जिसमें इंसान को यह रहनुमाई भी दी जाती है कि माल किस तरह कमाया जाए और कहा कहां खर्च किया जाए।
अपने और बाल बच्चों के अखराजात के बाद शरायत पाए जाने पर माल व दौलत में ज़कात की अदाएगी फर्ज़ की गई है। इस्लाम ने ज़कात के अलावा भी मुख्तलिफ शकलों से मोहताज लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने की तर्गीब दी है ताकि जिस मुआशरा में हम रह हैं उसमें एक दूसरे के रंज व गम में शरीक हो सकें। उन्हीं शकलों में एक शकल क़र्ज़ हसन भी है कि हम गरीबों और मोहताजों की मदद करें, यतीमों और बेवाओं की किफालत करें, मकरूजीन के क़र्ज़ की अदाएगी करें और आपस में एक दूसरे को ज़रूरत के वक़्त क़र्ज़ हसन भी दें ताकि अल्लाह तआला दुनिया में भी हमारे माल में इजाफा करे और आखिरत में भी इसका अजर व सवाब दे।
इस फानी दुनियावी ज़िन्दगी का असल मतलूब व मकसूद उखरवी ज़िन्दगी में कामयाबी हासिल करना है, जहां हमेशा हमेशा रहना है मौत को भी वहां मौत आ जाएगी और जहां की कामयाबी हमेशा की कामयाबी व कामरानी है। लिहाज़ा हम अल्लाह तआला के अहकामात नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तरीक़ा पर बजा लाऐं। सिर्फ हलाल रिज़्क़ पर इकतिफा करें खाह बज़ाहिर कम ही क्यों न हो। हत्तल इमकान मुशतबह चीजों से बचें। ज़कात के वाजिब होने की सूरत में ज़कात की अदाएगी करें। अपने और बाल बच्चों के अखराजात के साथ वक़्तन फवक़्तन क़र्ज़ हसन और मुख्तलिफ सदकात के ज़रिया मोहताज लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने की कोशिश करें। इस बात का हमेशा ख्याल रखें कि कल क़यामत के दिन हमारे क़दम हमारे परवरदिगार के सामने से हट नहीं सकते जब तक कि हम माल के मुतअल्लिक़ सवाला का जवाब न दे दें कि कहां से कमाया और कहां खर्च किया।
मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)