بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

इस्लाम में क़त्ल की संगीनी और उसकी सजा

क़त्ल की हुरमत क़ुरान करीम में
शरीअते इस्लामिया में जितनी ताकीद के साथ इंसान के क़त्ल की हुरमत को बयान किया गया है असर हाज़िर में उसकी इतनी ही बेहूरमती हो रही है, चुनांचे मामूली मामूली बातों पर क़त्ल के वाक़यात रोज अखबारों की सुर्खियां बनते हैं। अफसोस की बात यह है कि इन दिनों बाज़ मुसलमान भी इस जुर्म का इरतिकाब कभी कभी दीनी खिदमत समझ कर कर जाते हैं, हालांकि क़ुरान व हदीस में किसी इंसान को नाहक़ क़त्ल करने पर ऐसी सख्त वईदें बयान की गई हैं जो किसी और जुर्म पर बयान नहीं हुईं। इस्लामी तालीमात के मुताबिक़ किसी इंसान का नाहक़ क़त्ल करना शिर्क के बाद सबसे बड़ा गुनाह है बल्कि बाज़ उलमा ने सूरह निसा 92 की रौशनी में फरमाया है कि किसी मुसलमान को नाहक़ क़त्ल करने वाला मिल्लते इस्लामिया से ही निकल जाता है। ’’और जो शख्स किसी मुसलमान को जानबुझ कर क़त्ल करे तो उसकी सजा जहन्नम है जिसमें वह हमेशा रहेगा और अल्लाह उस पर गजब नाज़िल करेगा और लानत भेजेगा और अल्लाह ने उसके लिए बड़ा अज़ाब तैयार कर रखा है। अगरचे जमहूर उलमा ने क़ुरान व हदीस की रौशनी में लिखा है कि किसी को नाहक़ क़त्ल करने वाला बहुत बड़ा गुनाह का मुरतकिब तो ज़रूर है मगर वह इस जुर्म की वजह से काफिर नहीं होता और एक लम्बे अरसा तक जहन्नम में दर्दनाक अज़ाब की सजा पाकर आखिरकार वह जहन्नम से निकल जाएगा क्योंकि मज़कूरा आयत में ’’खालिदन फीहा” से एक लम्बे मुद्दत है। नीज़ क़ुरान व हदीस की रौशनी में उलमा-ए-उम्मत का इत्तेफाक़ है कि किसी को नाहक़ क़त्ल करने वाले की आखिरत में बज़ाहिर माफी नहीं है और उसे अपने जुर्म की सजा आखिरत में ज़रूर मिलेगी अगरचे मकतूल के वुरसा कातिल से बदला न लेकर दियत वसूल कर लें या उसे माफ कर दें।
क़ुरान करीम में दूसरी जगह अल्लाह तआला ने एक शख्स के क़त्ल को तमाम इंसानों का क़त्ल क़रार दिया ’’इसी वजह बनी इसराइल को यह फरमान लिख दिया था कि जो कोई किसी को क़त्ल करे जबकि यह क़त्ल नह किसी और जान का बदला लेने के लिए हो और न किसी के ज़मीन में फसाद फैलाने की वजह से हो तो यह ऐसा है जैसे उसने तमाम इंसानों को क़त्ल कर दिया और जो शख्स किसी की जान बचा ले तो यह ऐसा है जैसे उसने तमाम इंसानों की जान बचाली। गरज़ ये कि अल्लाह तआला ने एक शख्स के क़त्ल को पूरी इंसानियत का क़त्ल क़रार दिया क्योंकि कोई शख्स क़त्ल नाहक़ का इरतिकाब उसी वक़्त करता है जब उसके दिल से इंसान की हुरमत का इहसास मिट जाए नीज़ अगर किसी नाहक़ क़त्ल करने का चलन आम हो जाए तो तमाम इंसान गैर महफूज हो जाऐंगे, लिहाज़ा क़त्ल नाहक़ का इरतिकाब चाहे किसी के खिलाफ किया गया हो तमाम इंसानों को यह समझना चाहिए कि यह जुर्म हम सब के खिलाफ किया गया है। क़त्ल की हुरमत के मुतअल्लिक़ फरमाने इलाही है ’’जिस जान को अल्लाह ने हुरमत अता की है उसे क़त्ल न करो मगर यह कि तुम्हें (शरअन) उसका हक़ पहुंचता हो और जो शख्स मजलूमाना तौर पर क़त्ल हो जाए तो हमने उसके वली को (किसास का) इख्तियार दिया है। चुनांचे उस पर लाज़िम है कि वह क़त्ल करने में हद से तजावुज न करे। यक़ीनन वह इस लायक है कि उसकी मदद की जाए।“ (सूरह इसरा 33)
इसी तरह सूरह फुरकान आयत 68 और 69 में अल्लाह तआला फरमाता है ’’और जो अल्लाह के साथ किसी भी दूसरे माबूद की इबादत नहीं करते और जिस जान को अल्लाह ने हुरमत बखशी है उसे नाहक़ क़त्ल नहीं करते और न वह जिना करते हैं और जो शख्स भी यह काम करेगा उसे अपने गुनाह के वबाल का सामना करना पड़ेगा। क़यामत के दिन उसका अज़ाब बढ़ा बढ़ा कर दो गुना कर दिया जाएगा और वह जलील हो कर उस अज़ाब में हमेशा हमेशा रहेगा।“
आखिरी तीनों आयात में सिर्फ मुलसमानों के क़त्ल की मुमानअत नहीं है बल्कि हर उस शख्स के क़त्ल की मुमानअत है जिसकी जान को अल्लाह तआला ने हुरमत बखशी है।

क़त्ल पर सख्त वईदें रहमतुल लिल आलिमीन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जबानी
हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रहमतुल लिल आलिमीन बना कर मबऊस हुए मगर इसके बावज़ूद हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने किसी को नाहक़ क़त्ल करने पर सख्त वईदें इरशाद फरमाई हैं और उम्मत को इस संगीन गुनाह से बाज़ रहने की बार बार तलकीन फरमाई है। पांच अहादीस पेश है।
हज्जतुल विदा के मौक़ा पर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने अज़ीम खुतबा में इस बात पर जोर दिया कि किसी का खून न बहाया जाए, चुनांचे इरशाद फरमाया तुम्हारे खून, तुम्हारे माल और तुम्हारी आबरूऐं एक दूसरे के लिए ऐसी हुरमत रखती है जैसे तुम्हारे इस महीने (जिलहिज्जा) में तुम्हारे इस शहर (मक्का) और तुम्हारे इस दिन की हुरमत है। तुम सब अपने परवरदिगार से जा कर मिलोगे फिर वह तुमसे तुम्हारे आमाल के बारे में पूछेगा। लिहाज़ा मेरे बाद पलट कर ऐसे काफिर या गुमराह न हो जाना कि एक दूसरे की गरदनें मारने लगो। (सही बुखारी व सही मुस्लिम) यानी किसी शख्स को नाहक़ क़त्ल करना कफिरों और गुमराहों का काम है नीज़ एक दूसरे को काफिर या गुमराह कह कर क़त्ल न करना।
हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कबीरा गुनाहों में से सबसे बड़ा गुनाह यह है कि अल्लाह के साथ किसी शरीक ठहराना, किसी इंसान को क़त्ल करना, वालिदैन की नाफरमानी और झूठी बात कहना। (सही बुखारी)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया एक मुसलमान को अपने दीन के मामले में उस वक़्त तक (माफी की) गुनजाईश रहती है जब तक वह हराम तरीके से किसी का खून न बहा। (सही बुखारी)
सही बुखारी की सबसे मशहूर शरह लिखने वाले अल्लामा इब्ने हजर अस्क़लानी इस हदीस का मतलब बयान करते हुए लिखते हैं कि किसी का नाहक़ खून बहाने के बाद माफी का इमकान बहुत दूर हो जाता है। (फतहुल बारी)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया अल्लाह तआला के नज़दीक एक मुसलमान शख्स के क़त्ल से पूरी दुनिया का नापैद (और तबाह) हो जाना हलका (वाक़या) है। (तिर्मिज़ी, नसई, इब्ने माजा)
क़ुरान व हदीस की रौशनी में ज़िक्र किया गया है कि किसी शख्स को क़त्ल करना शिर्क के बाद सबसे बड़ा गुनाह है और कातिल की सजा जहन्नम है जिसमें वह एक लम्बे अरसा तक रहेगा, अल्लाह उस पर गजब नाज़िल करेगा और लानत भेजेगा और अल्लाह ताला ने कातिल के लिए बड़ा अज़ाब तैयार कर रखा है। लिहाज़ा हर शख्स को चाहिए कि वह क़त्ल जैसे बड़े गुनाह से हमेशा बचे और वह किसी भी हाल में किसी भी जान का जाये करने वाला न बने क्योंकि बसाऔक़ात एक शख्स के क़त्ल से न सिर्फ उसकी बीवी बच्चों की ज़िन्दगी बल्कि खानदान के मुख्तलिफ अफराद की ज़िन्दगी बाद में दो भर हो जाती है और इस तरह खुशहाल खानदान के अफराद बेवा, यतीम और मोहताज बन कर तकलिफों और परेशानियों में ज़िन्दगी गुज़ारने वाला बन जाते हैं।

क़त्ल की अकसान और उनकी सजा
अगर कोई शख्स किसी दूसरे शख्स को क़त्ल कर दे तो आखिरत में दर्दनाक अज़ाब के साथ दुनिया में भी उसे सजा मिलेगी जिसको क़ुरान व हदीस की रौशनी में इख्तिसार के साथ ज़िक्र कर रहा हुं। सबसे पहले समझें कि क़त्ल की तीन किसमें हैं।
1) कतले अमद- कतले अमद वह है कि इरादा करके किसी शख्स को मज़बूत हथयार से या ऐसी चीज से जिससे आम तौर पर क़त्ल किया जाता है, क़त्ल किया जाए। मसलन किसी शख्स को तलवार या गोली से मारा।
2) कतले शुबहा अमद- वह है जो जानबुझ कर तो हो मगर ऐसा हथयार से न हो जिससे आम तौर पर क़त्ल किया जाता है। मसलन किसी शख्स को एक पत्थर फेंक कर मारा और वह उसकी वजह से मर गया।
3) कतले खता- कोई शख्स किसी शख्स के अमल की वजह से गलती से मर जाए। मसलन जानवर का शिकार कर रहा था मगर वह तीर या गोली गलती से किसी शख्स के लग गई और वह मर गया।

जनबुझ कर किसी को नाहक़ क़त्ल करने का हूकम
शिर्क के बाद सबसे बड़ा गुनाह- अल्लाह तआला का इरशाद फरमाता है ’’और जो शख्स किसी मुसलमान को जानबुझ कर क़त्ल करे तो उसकी सजा जहन्नम है जिसमें वह हमेशा रहेगा और अल्लाह उसपर गजब नाज़िल करेगा और लानत भेजेगा और अल्लाह ने उसके लिए बड़ा अज़ाब तैयार कर रखा है।“ (सूरह निसा 93) क़ुरान करीम में दूसरी जगह अल्लाह तआला ने ’’एक शख्स के क़त्ल को पूरी इंसानियत का क़त्ल क़रार दिया है।“ (सूरह माइदा 32)
मरने के बाद दर्दनाक अज़ाब- फरमाने इलाही ’’और जो शख्स भी यह काम (किसी को नाहक़ क़त्ल) करेगा उसे अपने गुनाह के वबाल का सामना करना पड़ेगा। क़यामत के दिन उसका अज़ाब बढ़ा बढ़ा कर दो गुना कर दिया जाएगा और वह जलील हो कर उस अज़ाब में हमेशा हमेशा रहेगा।“ (सूरह कुरकान 68 और 69) इसी तरह सूरह निसा आयत 93 में ज़िक्र किया गया कि जो शख्स किसी मुसलमान को जानबुझ कर क़त्ल करे तो उसकी सजा जहन्नम है जिसमें वह हमेशा रहेगा, अल्लाह उसपर गजब नाज़िल करेगा और लानत भेजेगा और अल्लाह ने उसके लिए बड़ा अज़ाब तैयार कर रखा है।
किसास या दियत या माफी- क़त्ल साबित होने पर मकतूल के वुरसा को इख्तियार है कि वह इस्लामी हुकुमत की निगरानी में कातिल से किसास लें यानी हुकुमत कातिल को किसासन क़त्ल करे। शरीअते इस्लामिया ने मकतूल के वुरसा को यह भी इख्तियार दिया है कि वह कातिल को किसासन न कराके कातिल के औलिया से दीयत यानी सौ ऊंट की क़ीमत या उससे कुछ कम या ज़्यादा पैसा ले लें। किसास या दीयत या माफी में मकतूल के वुरसा के लिए जिसमें ज़्यादा फायदा हो उसको इख्तियार करना चाहिए।
फरमान इलही है ’’ऐ ईमान वलो! जो लोग (जानबुझ कर नाहक़) क़त्ल कर दिए जाऐं उनके बारे में तुम पर किसास (का हुकुम) फर्ज़ कर दिया गया है। आजाद के बदले आजाद, गुलाम के बदले गुलाम और औरत के बदले औरत (ही को क़त्ल किया जाएगा), फिर अगर कातिल को उसके भाई (यानी मकतूल के वुरसा) की तरफ से कुछ माफी दे दी जाए तो मारूफ तरीके के मुताबिक़ (खून बहाने का) मुतालबा करना (वारिस का) हक़ है और उसे खुश उसलूबी से अदा करना (कातिल का) फर्ज़ है। यह तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से एक आसानी पैदा की गई है और एक रहमत है। उसके बाद भी कोई ज्यादती करे तो वह दर्दनाक अज़ाब का मुस्तहिक़ है। और ऐ अकल रखने वालो! तुम्हारे लिए किसास में ज़िन्दगी (का सामान है), उम्मीद है कि तुम (इसकी खिलाफ वरजी से) बचोगे।“ (सूरह बक़रह 78 और 179)
अल्लामा इब्ने कसीर ने लिखा है कि ज़माना इस्लाम से कुछ पहले दो अरब कबिलों में जंग शुरू हुई, तरफैन के बहुत से आदमी आजाद व गुलाम, मर्द व औरत क़त्ल हो गए, अभी उनके मामला का तसफीया होने नहीं पाया था कि इस्लाम शुरू हो गया और यह दोनों कबिले इस्लाम में दाखिल हो गए, इस्लाम लाने के बाद अपने अपने मकतूलों का किसास लेने की गूफतगू शुरू हुई तो एक कबिला (जो क़ुव्वत व शौकत वाला था) ने मुतालिबा किया कि हम उस वक़्त तक राजी न होंगे जब तक हमारे गुलाम के बदले में तुम्हारा आजाद और औरत के बदले में मर्द क़त्ल न किया जाए। उनके जालिमाना और जाहिलाना मुतालबा की तरदीद के लिए यह आयत नाज़िल हुई। जिसका हासिल उनके मुतालबा को रद्द करना था कि गुलाम के बदले आजाद को और औरत के बदले मर्द को क़त्ल नहीं किया जाएगा बल्कि सिर्फ कातिल का ही किसास में क़त्ल किया जाएगा। इस्लाम ने अपना आदिलाना क़ानून नाफिज कर दिया कि जिसने क़त्ल किया है वही किसास में क़त्ल किया जाएगा, अगर औरत कातिल है तो किसी बेगुनाह मर्द को उसके बदले में क़त्ल करना, इसी तरह कातिल अगर गुलाम है तो उसके बदले में किसी बेगुनाह आजाद को क़त्ल करना बहुत बड़ा गुनाह है जो इस्लाम में कतअन बर्दाशत नहीं है। गरज़ ये कि इस आयत का हासिल इसके सिवा कुछ नहीं कि जिसने क़त्ल किया है वही किसास में क़त्ल किया जाएगा।

विरासत से महरूमी
अगर कातिल ने अपने किसी करीबी रिशतेदार को क़त्ल कर दिया तो वह मकतूल की विरासत से महरूम हो जाएगा। मसलन किसी शख्स ने अपने वालिद को क़त्ल कर दिया तो वह वादिल की विरासत से महरूम हो जाएगा जैसा कि हज़रात सहाबए किराम का हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तालीमात की रौशनी में इजमा है। मशहूर व मारूफ वाक़या है कि हज़रत उमर फारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने इब्ने कतादा अलमुदलजी की दियत का पैसा कातिल बाप को न दे कर उसके भाई को दिया था। (सुनन कुबरा बैहक़ी) हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जिसने किसी शख्स को क़त्ल किया तो कातिल, मकतूल की विरासत में शरीक नहीं होगा खाह कातिल के अलावा मकतूल का कोई वारिस न हो। अगर बाप ने बेटे या बेटे ने बाप को क़त्ल कर दिया तो कातिल को मकतूल के माल में कोई विरासत नहीं। (दारे कुतनी)
(नोट) कतले अमद में कफ्फारा (गुलाम की आज़ादी या 60 रोजे रखना) नहीं है, अगरचे बाज़ उलमा ने क़त्ल पर क़यास करके कतले अमद में भी कफ्फारा के वज़ूब का क़ौल इख्तियार किया है। किसास माफ होने की सूरत में कातिल की दुनिया में ज़िन्दगी तो महफूज़ हो जाएगी लेकिन आखिरत में उसे अपने जुर्म की सजा मिलेगी लिहाज़ा मौत तक उसे अल्लाह तआला से माफी मांगते रहना होगा।

कतले शिबहे अमद को हुकुम
अगर किसी शख्स ने किसी शख्स को ऐसी चीज मारी जिससे आम तौर पर क़त्ल नहीं किया जाता है मसलन पत्थर, ढंढा, घुंसा, कूड़ा वगैरह मगर वह उसकी वजह से मर गया तो यह भी क़त्ल होगा लेकिन इस क़त्ल पर किसास नहीं आएगा अलबत्ता यह भी बड़ा गुनाह है अगरचे कतले अमद से कम है क्योंकि इसमें कसद फिर भी है। इसके अलावा मकतूल के वुरसा को दियत लेने का हक़ हासिल होगा। अगर फरीकैन राजी है तो दियत कम या ज़्यादा क़ीमत पर भी सूलह कर सकते हैं।
(नोट) कतले शिबहे अमद में भी कफ्फारा (गुलाम की आज़ादी या 60 रोजे रखना) नहीं है अगरचे बाज़ उलमा ने क़त्ल खता पर क़यास करके कतले शिबहे अमद में भी कफ्फारा के वज़ूब का क़ौल इख्तियार किया है।

कतले खता का हुकुम
अगर किसी शख्स से गलती से किसी शख्स का क़त्ल हो जाए मसलन जानवर का शिकार कर रहा था मगर वह तीर या गोली गलती से किसी शख्स को लग गई और वह मर गया, उसमें किसास तो नहीं है अलबत्ता शरीअते इस्लामिया ने मकतूल के वुरसा को यह इख्तियार दिया है कि वह कातिल और उसके औलिया से दियत यानी सौ ऊंट की क़ीमत या उससे कुछ कम या ज़्यादा पैसा लें या माफ कर दें। मकतूल के वुरसा दियत लें या माफ कर दें लेकिन कातिल को अल्लाह तआला से माफी मांगने के साथ 60 दिन के मुसलसल रोजे भी रखने होंगे। अल्लाह तआला का इरशाद है ’’किसी मुसलमान का यह काम नहीं है कि वह किसी दूसरे मुसलमान को क़त्ल करे मगर यह कि गलती से ऐसा हो जाए। और जो शख्स किसी मुसलमान को गलती से क़त्ल कर बैठे तो उसपर फर्ज़ है कि वह एक मुसलमान गुलाम आजाद करे और दियत (यानी खून बहाने) मकतूल के वुरसा को पहुंचाए मगर यह कि वह माफ कर दें। और अगर मकतूल किसी ऐसे कौम से तअल्लुक़ रखता हो जो तुम्हारी दुशमन हो मगर वह खुद मुसलमान हो तो बस एक मुस्लामन गुलाम को आजाद करना फर्ज़ है (खून बहा देना वाजिब नहीं)। और अगर मकतूल उन लोगों में से है जो (मुसलमान नहीं मगर) उनके और तुम्हारे दरमियान कोई मुआहिदा है तो भी यह फर्ज़ है कि खून बहाने उसके वारिसों तक पहुंचाया जाए और एक मुसलमान गुलाम को आजाद किया जाए। हां अगर किसी के पास गुलाम नह हो तो उसपर फर्ज़ है कि दो महीने ताक मुसलसल रोजे रखे। यह तौबा का तरीक़ा है जो अल्लाह ने मुक़र्रर किया है और अल्लाह अलीम व हकीम है।“ (सूरह निसा 92)
(नोट) क़त्ल खता में भी बेइहतियाजी का गुनाह है कफ्फारा का वज़ूब और तौबा का लफ्ज़ इस पर दाल है अगरचे कतले शुबहे अमद के मुकाबिला में कम है।
(नोट) आम तौर पर गाडि़यों के हवादिस में मरने वाले अफराद भी कतले खता के जिमन में आते हैं मगर यह कि मरने वाली की खुद की गलती हो।

क़त्ल से मुतअल्लिक़ जुदा जुदा मसाइल
सूरह माइदा आयत 45 की रौशनी में फुक़हा व उलमा ने लिखा है कि अगर किसी शख्स ने किसी शख्स के जिस्म के किसी हिस्सों को नुक़्सान कर दिया मसलन आंख फोड़ दी तो उसे उसकी सजा दी जाएगी मगर यह कि मजरूह शख्स उसका बदला हासिल कर ले या वह नुक़्सान पहुंचाने वाले को माफ कर दे।
किसास के लफ्जी मानी बराबरी के हैं। इस्तिलाहे शरा में किसास कहा जाता है क़त्ल की उस सजा को जिसमें बराबरी की रिआयत की गई हो।
मकतूल की दियत सौ ऊंट या दस हज़ार दिरहम या एक हज़ार दीनार या उसके बराबर क़ीमत है या फरीकैन जो तैय कर लें। सउदी अरब में फील हाल दीयत की क़ीमत तीन लाख रियाल मुतअय्यन है।

अगर मकतूल औरत है तो आधी दीयत यानी पचास ऊंट या उसकी क़ीमत वाजिब होगी।
कफ्फारा में रोजे खुद कातिल को रखने होंगे अलबत्ता दीयत कातिल के अहले नुसरत पर ज़रूर होगी जिसे शरई इस्तिलाह में आकिला कहते हैं। दीयत की अदाएगी की ज़िम्मेदारी तमाम घर वालों बल्कि तमाम करीबी रिशतेदारों पर इसलिए रखी गई है ताकि मुआशरा का हर शख्स क़त्ल करने से न सिर्फ खुद बचे बल्कि हर मुमकिन कोशिश करे कि मुआशरा इस जुर्म अज़ीम से पाक व साफ रहे, इसी लिए अल्ला तआला ने क़ुरान करीम में एक शख्स के क़त्ल को पूरी इंसानियत का क़त्ल क़रार दिया और एक शख्स की ज़िन्दगी की हिफाज़त को पूरी इंसनियत की ज़िन्दगी क़रार दी। गरज़ ये कि दीयत की अदाएगी खानदान के तमाम अफराद पर रखी गई है ताकि दीयत के खौफ से हर शख्स मुआशरा को क़त्ल से महफूज़ करने की हर मुमकिन कोशिश करे।
कफ्फारा के रोजे में अगर मर्ज़ की वजह से तसलसुल बाकी न रहे तो शुरू से रखने पड़ेंगे। अलबत्ता औरत के हैज़ की वजह से तसलसुल खत्म नहीं होगा यानी अगर किसी औरत ने किसी शख्स को क़त्ल कर दिया और वह 60 रोजे कफ्फारा में रख रही है, 60 रोजे रखने के दौरान माहवारी के आने से कोई फर्क़ नहीं पड़ेगा वह माहवारी से फरागत के बाद 60 रोजों को जारी रखेगी। अगर कोई कातिल अपनी कमजोरी की वजह से 60 रोजे रखने की इस्तिताअत नहीं रखता है तो उसे कुदरत तक तौबा करते रहना होगा।
दियत में हासिल शुदा माल मकतूल के वुरसा में शरई एतेबार से तक़सीम होगा। जो वारिस अपना हिस्सा माफ कर देगा उस कदर माफ हो जाएगा और सबने माफ कर दिया तो सब माफ हो जाएगा। अगर किसी एक शरई वारिस ने भी अपनी हिस्सा की दीयत का मुतालिबा कर लिया या माफ कर दिया तो फिर किसास नहीं लिया जाएगा। अब दुसरे वुरसा के लिए दो ही इख्तियार होंगे या तो अपने हिस्से की दीयत लें या फिर माफ कर दें।
खुलासा कलाम यह है कि किसी भी इंसान को क़त्ल करना दरकिनार हम किसी भी हाल में किसी भी इंसान के क़त्ल में किसी भी किसम से मुआविन साबित न हों ताकि हम आखिरत में दर्दनाक अज़ाब से महफूज़ रहें। अगर किसी ने कोई क़त्ल किया है तो हुकुमत वक़्त ही को उसके किसासन क़त्ल करने का हक़ हासिल है। अल्लाह तआला हमें तमाम गुनाहों से महफूज़ रह कर यह दुनियावी फानी ज़िन्दगी गुज़ारने वाला बनाए और हमें दोनों जहां में कामयाबी अता फरमाए।
मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)