بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

अमामा अमामा या टोपी पहनना नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत व आदते करीमा
हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हर हर अदा एक सच्चे और शैदाई उम्मती के लिये सिर्फ क़ाबिले इत्तिबा ही नही बल्कि मर मिटने के क़ाबिल है, चाहे उस का ताल्लुक़ इबादत से हो या रोज़मर्रा के आदात व अतवार मसलन खाना या लिबास वगैरह से। हर उम्मती को हत्तल इमकान कोशिश करनी चाहिए कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हर सुन्नत को अपनी ज़िन्दगी में दाखिल करे और जिन सुन्नतों पर अमल करना मुशकिल हो उनको भी अच्छी और मोहब्बत भरी निगाह से देखे और अमल न करने पर अफसोस करे।
उम्मते मुस्लिमा मुत्तफिक़ है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम आम तौर पर अमामा या टोपी का इस्तेमाल फरमाते थे जैसा कि नीचे की अहादीस में उलमा-ए-उम्मत के अक़वाल मौजूद हैं।
अमामा से मुतअल्लिक़ अहादीस
हज़रत अमर बिन हुरैस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने लोगों को खुतबा दिया तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के (सर के) ऊपर काला अमामा था। (मुस्लिम)
बहुत से सहाबा-ए-किराम मसलन हज़रत जाबिर और हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फतहे मक्का के दिन मक्का में दाखिल हुए तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सर पर काला अमामा था। (मुस्लिम, तिर्मिज़ी, इब्ने माजा)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने (मरज़ुल वफात) में खुतबा दिया तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम (के सर) पर काला अमामा था। (शमाइले तिर्मिज़ी, बुखारी)
हज़रत अबू सईद खुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब नया कपड़ा पहनते तो इसका नाम रखते अमामा या क़मीस या चादर, फिर यह दुआ पढ़ते “ऐ मेरे अल्लाह! तेरा शुक्र है कि तूने मुझे यह पहनाया, मैं इस कपड़े की खैर और जिसके लिए यह बनाया गया है उसकी खैर मांगता हूं और उसकी और जिसके लिए यह बनाया गया है उसके शर से पनाह मांगता हूं।” (तिर्मिज़ी) मालूम हुआ कि अमामा भी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिबास में शामिल था।
हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को वज़ू करते देखा, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर क़ितरी अमामा था। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अमामा के नीचे अपना हाथ दाखिल फरमाया और सर के अगले हिस्से का मसह फरमाया और अमामा को नहीं खोला। (अबू दाउद)
क़ितरी - यह एक क़िस्म की मोटी खुरदुरी चादर होती है, सफेद ज़मीन पर सुर्ख धागे के मुस्ततील बने होते हैं।
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया मुहरिम (यानी हज या उमरह का इहराम बांधने वाला मर्द) कुर्ता, अमामा, पाजामा और टोपी नहीं पहन सकता है। (बुखारी व मुस्लिम) मालूम हुआ कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़माना में अमामा आम तौर पर पहना जाता था।
गरज़ ये कि हदीस की कोई भी मशहूर किताब दुनिया में ऐसी मौजूद नहीं है, जिसमें आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अमामा का ज़िक्र कई मरतबा वारिद न हुआ हो।
अमामा का साइज़
अमामा के साइज़ के मुतअल्लिक़ मुख्तलिफ अक़वाल मिलते हैं, अलबत्ता ज़्यादा तहक़ीक़ी बात यही है कि अमामा का कोई मुअय्यन साइज़ मसनून नहीं है, फिर भी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का अमामा आम तौर पर 5 या 7 गज़ लम्बा हुआ करता था, 12 गज़ तक का सुबूत मिलता है।
अमामा का रंग
आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का अमामा अक्सर सफेद या सियाह हुआ करता था, अलबत्ता कभी कभी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम किसी दूसरे रंग का भी अमामा इस्तेमाल करते थे। सियाह अमामा से मुतअल्लिक़ बाज़ अहादीस मज़मून में गुज़र चुकी हैं, जबकि मुस्तदरक हाकिम और तबरानी वगैरह में नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सफेद अमामा का तज़किरा मौजूद है, नीज़ आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सफेद कपड़ों को बहुत पसंद फरमाते थे, बहुत सी अहादीस में इसका तज़किरा मौजूद है।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु रिवायत करते हैं कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कपड़ों में से सफेद को इख्तियार किया करो, क्यूंकि वह तुम्हारे कपड़ों में बेहतरीन कपड़े हैं और सफेद कपड़ों में ही अपने मुर्दे को कफन दिया करो। (तिर्मिज़ी, अबू दाउद, इब्ने माजा, मुसनद अहमद व सही इब्ने हिब्बान)
हज़रत समरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया सफेद लिबास पहनो, क्यूंकि वह बहुत पाकीज़ा, बहुत साफ और बहुत अच्छा है और इसी में अपने मुर्दे को कफन दिया करो। (नसई, तिर्मिज़ी, इब्ने माजा)
अमामा में शिमला लटकाना
शिमला लटकाना मुस्तहब है और सुनने ज़वाएद में से है। शिमला की मिक़दार के सिलसिला में बाज़ अहादीस से मालूम होता है कि यह 4 अंगुल हो तो बेहतर है।
हज़रत अमर बिन हुरैस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब अमामा बांधते तो उसे दोनों कंधों के दरमियान डालते थे। यानी अमामा का शिमला दोनों कंधों के दरमियान लटका रहता था। हज़रत नाफे (हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु के शागिर्द) फरमाते हैं कि हज़रत अब्दुल्लाह भी ऐसा ही किया करते थे। (तिर्मिज़ी)
हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाती हैं कि एक आदमी तुर्की घोड़े पर सवार अमामा पहने हुए हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु के पास आया। उसने दोनों कंधों के दरमियान अमामा का किनारा लटका रखा था। मैंने उनके मुतअल्लिक़ हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा तो फरमाया तुमने उनको देख लिया था, वह जिबरइल अलैहिस्सलाम थे। (मुस्तदरक हाकिम)
अमामा और नमाज़
अमामा पहन कर नमाज़ पढ़ने की क्या खास फज़ीलत है? इस बारे में बहुत सी अहादीस हदीस की किताबों में ज़िक्र की गई हैं, मगर वह आम तौर पर ज़ईफ या मौज़ू हैं मसलन अमामा पहनना अरबों का ताज है। (दैलमी) अमामा बांधा करो, तुम्हारी बुरदबारी बढ़ जाएगी। (बैहक़ी, मुस्तदरक हाकिम) अमामा लाज़िम पकड़ लो, यह फरिशतों की निशानी है और पीछे लटकाया करो। (बैहक़ी, तबारी, दैलमी) अमामा के साथ 2 रिकातें बेगैर अमामा के 70 रिकातों से अफज़ल हैं। (दैलमी) अमामा के साथ जुमा बेगैर अमामा के 70 जुमा से अफज़ल है। (दैलमी)
उलमा व फुक़हा ने लिखा है कि अमामा पहन कर नमाज़ पढ़ने की अगरचे कोई खास फज़ीलत अहादीसे सहीहा में नहीं आई है, लेकिन चूंकि अमामा पहनना नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत व आदते करीमा है और सहाबा-ए-किराम व ताबेईन व तबे ताबईन भी आम तौर पर अमामा पहना करते थे, नीज़ यह किसी दूसरी क़ौम का लिबास नहीं बल्कि मुसलमानों का शेआर है और इंसानों के लिए ज़ीनत है। लिहाज़ा हमें अमामा उतार कर नमाज़ पढ़ने का एहतेमाम नहीं करना चाहिए, बल्कि आम हालात में भी अमामा या टोपी पहननी चाहिए और अमामा या टोपी पहन कर ही नमाज़ अदा करनी चाहिए, अगरचे अमामा या टोपी पहनना वाजिब या सुनन्ते मुअक्कदा नहीं है।
जब नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से अमामा का इस्तेमाल करना साबित है जिस पर उम्मते मुस्लिमा मुत्तफिक़ हैं तो कोई खास फज़ीलत साबित न भी हो तब भी महज़ नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सहाबा-ए-किराम का अमल करना भी उसकी फज़ीलत के लिए काफी है, मसलन सफेद लिबास नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को पसंद था, इसलिए सफेद लिबास पहनना अफज़ल होगा, खाह किसी खास फज़ीलत और सवाब की कसरत का सुबूत मिलता हो या न हो।
अमामा को टोपी पर बांधना
हज़रत रुकाना रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि मैंने नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को सुना फरमा रहे थे कि हमारे और मुशरेकीन के दरमियान फ़र्क़ टोपी पर अमामा बांधना है। (तिर्मिज़ी) बाज़ मुहद्दिसीन ने इस हदीस की सनद में आए एक रावी को ज़ईफ क़रार दिया है।
टोपी से मुतअल्लिक़ अहादीस
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सफेद टोपी पहनते थे। (तबरानी) अल्लामा सुयूति ने अलजामिउस सगीर में लिखा है कि इस हदीस की सनद हसन है। अलजामिउस सगीर की शरह लिखने वाले शैख अली अज़ीज़ी ने लिखा है कि कि इस हदीस की सनद हसन है। (अस सिराजुल मुनीर लिशरहिल जामिउस सगीर जिल्द 4 पेज 112)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सफेद टोपी पहनते थे। (अलमोजमुल कुबरा लित तबरानी) इस हदीस की सनद में आए एक रावी हज़रत अब्दुल्लाह बिन खेराश हैं, इब्ने हिब्बान ने इनकी तौसीक़ की है नीज़ फरमाया कि बसा औक़ात गलती करते हैं। (मजमउज़ ज़वाएद जिल्द 2 पेज 124)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया मुहरिम (यानी हज या उमरह का इहराम बांधने वाला मर्द) कुर्ता, पाजामा और टोपी पहन सकता है। (बुखारी व मुस्लिम) मालूम हुआ कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़माने में टोपी आम तौर पर पहनी जाती थी।
हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सफर में कान वाली टोपी पहनते थे और हज़र में पतली यानी शामी टोपी। (अबू शैख असबहानी ने इसको रिवायत किया है) शैख अब्दुर रऊफ मनावी ने लिखा है कि टोपी के बाब में यह सब से उमदा सनद है। (फैजुल क़दीर शरहुल जामे अस सगीर जिल्द 5 पेज 246)
अबू कबशा अनमारी रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि सहाबा-ए-किराम की टोपीयां फैली हुई और चिपकी हुई होती थीं। (तिर्मिज़ी)
हज़रत खालिद बिन वलीद रज़ियल्लाहु अन्हु जंगे यरमूक के मौक़ा पर टोपी गुम हो गई तो हज़रत खालिद बिन वलीद रज़ियल्लाहु अन्हु ने अपने साथियों से कहा कि मेरी टोपी तलाश करो। तलाश करने के बावजूद भी टोपी न मिल सकी। हज़रत खालिद बिन वलीद रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा कि दोबारा तलाश करो, चुनांचे टोपी मिल गई। तब हज़रत खालिद बिन वलीद रज़ियल्लाहु अन्हु ने फरमाया कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उमरह की अदाएगी के बाद बाल मुंडवाए तो सब सहाबा आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बाल लेने के लिए टूट पड़े तो मैंने नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सर के अगले हिस्से के बाल तेज़ी से ले लिए और उन्हें अपनी इस टोपी में रख लिया, चुनांचे मैं जब भी लड़ाई में शरीक होता हूं तो यह टोपी मेरे साथ रहती है, इन्हीं की बरकत से मुझे फतह मिलती है (अल्लाह तआला के हुकुम से)। (रवाहु हाफिज अलबैहक़ी फी दलाइलिन नबूवत जिल्द 3 पेज 229)
इमाम बुखारी ने अपनी किताब में एक बाब बांधा हैं “बाबुस सुजूद अलस सौब फी शिद्दतिल हर्र” यानी सख्त गर्मी में कपड़े पर सजदा करने का हुकुम जिसमें हज़रत हसन बसरी का क़ौल ज़िक्र किया है कि गर्मी की शिद्दत की वजह से सहाबा किराम अपनी टोपी और अमामा पर सजदा किया करते थे।
हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि एक शहीद वह है जिसका ईमान उमदा हो और दुशमन से मुलाकात के वक़्त अल्लाह तआला के वादों की तसदीक़ करते हुए बहादुरी से लड़े और शहीद हो जाए उसका दर्जा इतना बुलंद होगा कि लोग क़यामत के दिन उसकी तरफ अपनी निगाह इस तरह उठाएंगे। यह कह कर हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने या हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने जो हदीस के रावी हैं अपना सर उठाया यहां तक कि सर से टोपी गिर गई। (तिर्मिज़ी)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने अपने गुलाम नाफे को नंगे सर नमाज़ पढ़ते देखा तो बहुत गुस्सा हुए और कहा कि अल्लाह तआला ज़्यादा मुस्तहिक़ है कि हम उसके सामने ज़ीनत के साथ हाज़िर हों।
हज़रत ज़ैद बिन जुबैर और हज़रत हिशाम बिन उरवह रहमतुल्लाह अलैहिम फरमाते हैं कि उन्होंने हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर (के सर) पर टोपी देखी। (मुसन्नफ इब्ने अबी शैबा)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन सईद रहमुतुल्लाह अलैह फरमाते हैं कि उन्होंने हज़रत अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु (के सर) पर सफेद मिस्री टोपी देखी। (मुसन्नफ इब्ने अबी शैबा)
हज़रत अशअस रहमतुल्लाह अलैह के वालिद फरमाते हैं कि हज़रत मुसा अशअरी रज़ियल्लाहु अन्हु बैतुल खला से निकले और उन (के सर) पर टोपी थी। (मुसन्नफ इब्ने अबी शैबा)
(वज़ाहत) हदीस की इस मशहूर किताब “मुसन्निफ इब्ने अबी शैबा” में बहुत से सहाबा-ए-किराम की टोपीयों का तज़किरा किया गया है, इनमें से इख्तिसार की वजह से मैंने सिर्फ तीन सहाबा-ए-किराम की टोपी का तज़किरा यहां किया है।

टोपी से मुतअल्लिक़ बाज़ उलमा-ए-उम्मत के अक़वाल
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सहाबा-ए-किराम की टोपियों का तज़किरा इस मुख्तसर मज़मून में करना मुशकिल है लिहाज़ा इन्ही चंद अहादीस पर इकतिफा करता हूं, अलबत्ता बाज़ उलमा व फुक़हा के अक़वाल का ज़िक्र करना मुनासिब समझता हूं।
हज़रत इमाम अबू हनीफा की राय है कि नंगे सर नमाज़ पढ़ने से नमाज़ तो अदा हो जाएगी मगर ऐसा करना मकरूह है। फिक़ह हनफी की बेशुमार किताबों में यह मसअला मज़कूर है। अल्लामा इबनुल क़य्यिम रमतुल्लाह अलैह ने लिखा है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अमामा बांधते थे और उसके नीचे टोपी भी पहनते थे, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अमामा के बेगैर भी टोपी पहनते थे और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम टोपी पहने बेगैर भी अमामा बांधते थे। (ज़ादुल मआद फी हदयि खैरिल इबाद)
शैख नासिरुद्ददीन अलबानी रहमतुल्लाह अलैह की राय है कि नंगे सर नमाज़ पढ़ने से नमाज़ तो अदा हो जाएगी, मगर ऐसा करना मकरूह है। (तमामुल मिन्नह पेज 164)
शैख इबनुल अरबी रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं कि टोपी अम्बिया और सालेहीन के लिबास से है। सर की हिफाज़त करती है और अमामा को जमाती है। (फैज़ुल क़दीर)
हिन्द व पाकिस्तान व बंगलादेश व अफगानिस्तान के जमहूर उलमा फरमाते हैं कि नंगे सर नमाज़ पढ़ने से नमाज़ तो अदा हो जाएगी मगर ऐसा करना मकरूह है।
एक अहले हदीस आलिमे दीन ने लिखा है कि नंगे सर नमाज़ हो जाती है, सहाबा-ए-किराम से जवाज़ मिलता है मगर बतौर फैशन लापरवाही और तअस्सुब की बिना पर मुस्तक़िल के लिए यह आदत बना लेना जैसा कि आज कल धड़ल्ले से किया जा रहा है हमारे नज़दीक सही नहीं है। नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खुद यह अमल नहीं किया। (मजल्ला अहले हदीस सुहदरा, पाकिस्तान जिल्द 15 शुमारा 22, बहावाला किताब “टोपी व पकगड़ी से या नंगे सर नमाज़”)
अहले हदीस आलिम मौलाना सैयद मोहम्मद दाउद गज़नवी ने लिखा है कि सर आज़ाए सतर में से नहीं है, लेकिन नमाज़ में सर नंगे रखने के मसअला को इस लिहाज़ से बल्कि आदाबे नमाज़ के लिहाज़ से देखना चाहिए और आगे कंधों को ढांकने पर दलालत करने वाली बुखारी व मोअत्ता इमाम मालिक की रिवायत और मोअत्ता की शरह ज़रकानी (व तमहीद), इब्ने अब्दुल बर, बुखारी की शरह फतहुल बारी, ऐसे ही शैखुल इस्लाम इमाम इब्ने तैमिया की किताबुल अखयारात और इमाम इब्ने क़ुदामा की अलमुगनी से तसरीहात व इक़तिबासात नक़ल करके साबित किया है कि कंधे भी अगरचे आज़ाए सतर में से नहीं हैं, इसके बावजूद नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक कपड़ा होने की शकल में नंगे कंधों से नमाज़ पढ़ने से मना फरमाया है। इसी तरह सर भी अगरचे आज़ाए सतर में से न सही लेकिन आदाबे नमाज़ में से यह भी एक अदब है कि बिला वजह नंगे सर नमाज़ न पढ़ी जाए और इसे ही ज़ीनत का तकाज़ा क़रार दिया है। इब्तिदाए अहदे इस्लाम को छोड़ कर जब कि कपड़ों की क़िल्लत थी उसके बाद इस आजिज़ की नज़र से कोई ऐसी रिवायत नहीं गुज़री जिसमें सराहतन मज़कूर हो कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने या सहाबा-ए-किराम ने मस्जिद में और वह भी नमाज़ बाजमाअत में नंगे सर नमाज़ पढ़ी हो, चेजाएकि मामूल बना लिया हो। इस रस्म को जो फैल रही है बन्द करना चाहिए। अगर फैशन की वजह से नंगे सर नमाज़ पढ़ी जाए तो नमाज़ मकरूह होगी। (फतावा उलमाए अहले हदीस, जिल्द 4 पेज 290-291, बहावाला किताब टोपी व पकगड़ी से या नंगे सर नमाज़)
एक दूसरे अहले हदीस आलिम मौलाना मोहम्मद इसमाइल सलफी ने लिखा है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, सहाबा-ए-किराम और अहले इल्म का तरीक़ वही है जो अब तक मसाजिद में मुतवारिस है और मामूल बिहा है। कोई मरफू हदीस सही मेरी नज़र से नहीं गुज़री जिससे नंगे सर नमाज़ की आदत का जवाज़ साबित हो, खुसूसन बाजमाअत फराएज़ में बल्कि आदत मुबारक यही थी कि पूरे लिबास से नमाज़ अदा फरमाते थे। सर नंगा रखने की आदत और बिला वजह ऐसा करना अच्छा काम नहीं है। यह काम फैशन के तौर पर रोज़ बरोज़ बढ़ रहा है और यह भी नामुनासिब है। अगर लतीफ हिस से तबीअत महरूम न हो तो नंगे सर नमाज़ वैसे ही मकरूह मालूम होती है। ज़रूरत और इज़तिरार का बाब इससे अलग है। (फतावा उलमाए अहले हदीस, जिल्द 4 पेज 286-289, बहावाला किताब टोपी व पकगड़ी से या नंगे सर नमाज़)
सउदी अरब के तमाम शैख का फतवा भी यही है कि टोपी नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत और तमाम मुहद्दिसीन व मुफस्सेरीन व उलमा व सालेहीन का तरीक़ा है, नीज़ टोपी पहनना इंसान की ज़ीनत है और क़ुरान करीम (सूरह आराफ 31) की रौशनी में नमाज़ में ज़ीनत मतलूब है, लिहाज़ा हमें टोपी पहन कर ही नमाज़ पढ़नी चाहिए। यह फतावे सउदी अरब के शैख की वेबसाइट पर पढ़े और सुने जा सकते हैं। सउदी अरब की मौजूदा हुकूमत के निज़ाम के तहत किसी भी हुकूमत के दफ्तर में किसी भी सउदी बाशिन्दा का मामला उसी वक़्त क़बूल किया जाता है जबकि वह टोपी और रुमाल के ज़रिये सर ढांककर हुकूमत के दफ्तर में जाए। सउदी अरब के खास और आम का मामूल भी यही है कि वह आम तौर सर ढांक कर ही नमाज़ अदा करते हैं।
(पहला नुक्ता)
इन दिनों उम्मते मुस्लिमा की एक छोटी सी जमाअत हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु की एक हदीस को बुनियाद बना कर नंगे सर नमाज़ पढ़ने की बज़ाहिर तरगीब देने लगती है “नबी अकरम सल्लललाहु अलैहि वसल्लम कभी कभी अपनी टोपी उतार कर उसे अपने सामने बतौर सुतरा रख लेते थे।” (इब्ने असाकिर) इस हदीस से दर्जे ज़ैल असबाब की बिना पर नंगे सर नमाज़ पढ़ने की किसी भी फज़ीलत पर इस्तिदलाल नहीं किया जा सकता है।
1) यह रिवायत ज़ईफ है नीज़ इस रिवायत को ज़िक्र करने में इब्ने असाकर अकेले हैं यानी हदीस की मशहूर व मारूफ किसी किताब में भी यह हदीस मज़कूर नहीं है।
2) और अगर “अला वजहित तनज़्ज़ुल” इस रिवायत को सही मान भी लिया जाए तब भी यह मुतलक नंगे सर नमाज़ पढ़ने के जवाज़ के लिए दलील नहीं बन सकती, बल्कि इस हदीस के ज़ाहिरी अल्फाज़ बता रहे हैं कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ऐसा एक अहम ज़रूरत के वक़्त किया, जब ऐसी कोई चीज़ मुयस्सर न आई जिसे बतौर सुतरा आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने सामने रख लेते और अहादीस में सुतरा की काफी अहमियत आई है।
इस हदीस से ज़्यादा से ज़्यादा यह साबित हो सकता है कि मर्द हज़रात के लिए नमाज़ में टोपी या अमामा से सर का ढांकना वाजिब नहीं है जिस पर उम्मते मुस्लिमा मुत्तफिक़ है।
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से नंगे सर सिर्फ हज या उमरह के इहराम की सूरत में ही नमाज़ पढ़ना साबित है। रहा कोई चीज़ न मिलने की वजह से सुतरा के लिए अपने आगे टोपी का रखना तो पहली बात यह अमल आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दूसरे अहम हुकुम को पूरा करने के लिए किया। दूसरी बात इस हदीस में इसका ज़िक्र नहीं कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नंगे सर नमाज़ पढ़ी। मुमकिन है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ऊंची वाली टोपी जो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सफर में पहनते थे इसको सुतरा के तौर पर इस्तेमाल किया हो और अमामा या सर से चिपकी हुई टोपी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सर पर हो, क्यूंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की दो या तीन क़िस्म की टोपी का तज़किरा अहादीस व सीरत व तारीख की किताबों में आता है।
इस हदीस के अलावा इब्ने असाकिर में वारिद एक मक़ूला से भी इस छोटी से जमाअत ने इस्तिदलाल किया है “मसाजिद में नंगे सर आओ और अमामा बांध कर आओ, बेशक अमामा तो मुसलमानों का ताज हैं” लेकिन मुहद्दिसीन ने इस मक़ूला को हदीस नहीं बल्कि मौज़ू व मदघड़त बात शुमार किया है और अगर यह मक़ूला हदीस मान भी लिया जाए तो इसका बुनियादी मक़सद यही है कि हमें मस्जिद में अमामा बांधकर आना चाहिए।
(दूसरा नुक्ता)
बाज़ हज़रात टोपी का इस्तेमाल तो करते हैं, मगर उनकी टोपियां पुरानी, बोसीदा और काफी मैली नज़र आती हैं। हम अपने लिबास व मकान और दूसरी चीजों पर अच्छी खासी रक़म खर्च करते हैं, मगर टोपियां पुरानी और बोसीदा ही इस्तेमाल करते हैं। मेरे अज़ीज़ भाई! सर को ढांकना ज़ीनत है जैसाकि मुफस्सेरीन व मुहद्दिसीन व उलमा ने किताबों में लिखा है और नमाज़ में अल्लाह तआला के हुकुम के मुताबिक़ ज़ीनत मतलूब है, नीज़ टोपी या अमामा का इस्तेमाल इस्लामी शेआर है, इससे आज भी मुसलमानों की पहचान होती है, लिहाज़ा हमें अच्छी व साफ सुथरी टोपी का ही इस्तेमाल करना चाहिए।
(तीसरा नुक्ता)
नमाज़ के वक़्त अमामा या टोपी पहननी चाहिए, लेकिन अमामा या टोपी पहनना वाजिब नहीं है, लिहाज़ा अगर किसी शख्स ने अमामा या टोपी के बेगैर नमाज़ शुरू कर दी तो नमाज़ पढ़ते हुए उस शख्स पर टोपी या रुमाल वगैरह नहीं रखना चाहिए, क्यूंकि इसकी वजह से आम तौर पर नमाज़ी की नमाज़ से तवज्जोह हटती है (चाहे थोड़े वक़्त के लिए ही क्यूं न हो) अलबत्ता नमाज़ शुरू करने से पहले उसको अमामा या टोपी पहनने की तरगीब देनी चाहिए।
(खुलासा कलाम)
अमामा या टोपी नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत है (क्यूंकि अहादीस व सीरत व तारीख की किताबों में जहां जहां भी आम ज़िन्दगी के मुतअल्लिक़ नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सर पर कपड़े होने या न होने का ज़िक्र आया है आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सर पर अमामा या टोपी का तज़किरा 99 फीसद वारिद हुआ है) सहाबा, ताबेईन, तबे ताबेईन, मुहद्दिसीन, फुक़हा और उलमा-ए-किराम अमामा या टोपी का इस्तेमाल फरमाते थे, नीज़ हमेशा से और आज भी यह मुसलमानों की पहचान है। लिहाज़ा हम सबको अमामा या टोपी या सिर्फ टोपी का इस्तेमाल हर वक़्त करना चाहिए। अगर हर वक़्त टोपी पहनना हमारे लिए दुशवार हो तो कम से कम नमाज़ के वक़्त टोपी लगा कर ही नमाज़ पढ़नी चाहिए। नंगे सर नमाज़ पढ़ने से नमाज़ अदा तो हो जाएगी, मगर फुक़हा व उलमा की एक बड़ी जमाअत की राय है कि नंगे सर नमाज़ पढ़ने की आदत बनाना सही नहीं है, हत्ताकि बाज़ फुक़हा व उलमा ने बहुत सी अहादीस, हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु जैसे जलीलु क़दर सहाबी का अपने शागिर्द हज़रत नाफे को तालीम और सहाबा-ए-किराम के ज़माना से उम्मते मुस्लिमा के मामूल की रौशनी में नंगे सर नमाज़ पढ़ने को मकरूह क़रार दिया है, जिनमें से शैख नोमान बिन साबित इमाम अबू हनीफा और शैख नासिरुद्दीन अलबानी का नाम क़ाबिले ज़िक्र है। आखिरुज़ ज़िक्र शैख अलबानी साहब का तज़किरा इस वजह से किया गया है कि इन दिनों जो हज़रात नंगे सर नमाज़ पढ़ने की बात करते हैं उनमें से बाज़ आम तौर पर अहकाम व मसाइल में शैख नासिरुद्दीन अलबानी के अक़वाल को हर्फे आखिर समझते हैं। नंगे सर नमाज़ के मुतअल्लिक़ उन्होंने वाज़ेह तौर पर लिखा है और उनके अक़वाल कैसिटों में रिकार्ड हैं कि नंगे सर नमाज़ पढ़ना मकरूह है।
हम हिन्द व पाक के रहने वाले सउदी अरब में मुक़ीम आम तौर पर फैशन की वजह से टोपी के बेगैर नमाज़ पढ़ते हैं, हालांकि सउदी अरब में 12,13 के क़याम के दौरान मैंने किसी भी सउदी आलिम या खतीब या मुफ्ती या मुस्तक़िल इमाम को सर खोल कर नमाज़ पढ़ते या खुतबा देते हुए नहीं देखा, बल्कि उनको हमेशा सर ढांकते हुए ही देखा। न सिर्फ खास बल्कि सउदी अरब की अवाम भी आम तौर पर सर ढांक ही नमाज़ अदा करती है।
(वज़ाहत)
यह मज़मून सिर्फ मर्द हज़रात के सर ढांकने के मुतअल्लिक़ लिखा गया है, रहा औरतों के सर ढ़ांकने का मसअला तो उम्मते मुस्लिमा मुत्तफिक़ है कि औरतों के लिए सर ढांकना ज़रूरी है, इसके बेगैर उनकी नमाज़ ही अदा नहीं होगी।
मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)