बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन, वस्सलातु वस्सलामु अला नबिय्यिल करीम व अला अलिहि व अस्हाबिहि अजमईन

आह! दारूल उलूम देवबंद के शेख़ुल हदीस मौलाना अब्दुल हक़ आज़मी रहमतुल्लाह अलैइह दुनिया में ना रहे

शेख़ुल इस्लाम हज़रत मौलाना सय्यद हुसैन अहमद मदनी रहमतुल्लाह अलैइह के शार्गिदे रशीद, मादरे इल्मी दारुल उलूम देवबंद के क़दीम तरीन उस्ताद, मेरे और दुनिया के चप्पे-चप्पे में फैले हज़ारों उलमाए दीन के मुशिफ़क़ उस्ताद हज़रत मौलाना अब्दुल हक़ आज़मी रहमतुल्लाह अलैइह मुख़्तसर अलालत के बाद 30 दिसम्बर 2016 बरोज़ जुमा नमाज़े इशा से कुछ क़ब्ल 88 साल की उम्र में अपने हक़ीक़ी मौला से जा मिले। इन्नाल्लिाहि वइन्ना इलैहि राजेऊन (हम सब अल्लाह ही के हैंऔर हम सब को अल्लाह ही की तरफ लौटकर जाना है)। हज़ारों तलामिज़ह जिस्मानी दूरी के बावजूद आपकी शफ़्क़त और मोहब्बत की वजह से अपने शेख़े सानी से ख़ुसूसी तअल्लुक़ रखते हैं, चुनांचे चंद घंटों में बिजली की तरह यह ख़बर दुनिया के कोने कोने में फैल गई। ख़बर सुनकर इन्तहाई अफ़सोस हुआ, लेकिन यह कहकर अपने आपको मुतमइन करने की कोशिश की कि मौत का मज़ा हर शख़्स को चखना है और कौन है जिसको मौत से छुटकारा और मफ़र है। अम्बियाए किराम, सहाबाए किराम और अज़ीम मुहद्दसीन व मुफस्सरीन को भी इस मरहले से गुज़रना पड़ा है। दुनिया के बड़े बड़े हिस्सों पर हुकूमत करने वाले भी आज दो गज़ ज़मीन में मदफू़न हैं। यह तो ख़ालिक़े कायनात का निज़ाम हैजिसने मौत और ज़िन्दगी इसलिए पैदा की वह हमें आज़माए कि हम में से कौन अमल में ज़्यादा बेहतर है। अल्लाह तआला मरहूम की मग़फिरत फ़रमाये, उनकी क़ब्र को जन्नत का बाग़ीचा बनाये और उन्हें जन्नतुल फिरदौस में बुलन्द मक़ाम अता फ़रमाये। आमीन!

दारुल उलूम देवबंद के मेरे क़याम (1989-1994) के दौरान हज़रत से मेरा ख़ुसूसी तअल्लुक़ था। फ़ज़ीलत के आख़िरी साल में दारुल उलूम देवबंद की जानिब से जब मुझे तर्जुमान (मानीटर) की हैसियत से ज़िम्मेदारी दी गयी थी तो मैं उमूमन छत्ता वाली मस्जिद में नमाज़े इशा की अदायगी के बाद हज़रत के घर तशरीफ ले जाता थाजो छत्ता वाली मस्जिद से बिल्कुल मिला हुआ था। और सहीह बुख़ारी जिल्द सानी पढ़ने के लिए हज़रत के हमराह दौरए हदीस की क्लास में आता था। कुछ बीमारी की वजह से मैंने अपनी तर्जुमान की ज़िम्मेदारी मौलाना मुज़म्मिल हुसैन मुरादाबादी के सुपुर्द करवा दी थी, लेकिन हज़रत से तक़रीबन रोज़ाना मुलाक़ात का शर्फ़ मुझे पूरे साल हासिल रहा। उस वक़्त मुझे बहुत ख़ुशी हुई थी जब संभल में वाक़े मेरे आबाई मकान में हज़रत तशरीफ लाये थे। अपने अस्लाफ के नक़्शे क़दम पर चलते हुए मैंने अपने अकाबरीन से हमेशा ख़ुसूसी तअल्लुक़ रखा है। इन दिनों हज़रत मुफ़्ती अबुल क़ासिम नोमानी मोहतमिम दारुल उलूम देवबंद, उस्ताद मोहतरम मौलाना अब्दुल ख़ालिक़ संभली नायब मोहतमिम दारुल उलूम देवबंद और दीगर असातज़ए किराम की सरपरस्ती में ही मैं दीने इस्लाम की ख़िदमत करने की कोशिश कर रहा हूँ। अल्लाह तआला कबूलियत व मक़बूलियत से नवाज़े।

हज़रत मौलाना अब्दुल हक़ आज़मी रहमतुल्लाह अलैइह 1928 बरोज़ दोशन्बा आज़मगढ़ (जगदीशपुर) में पैदा हुए, इब्तदाई तालीम अपने ही मक़ाम पर हासिल करने के बाद बैतुल उलूम सरायमीर में फ़ारसी और अरबी की मुतअद्दद किताबें पढ़ीं, फिर दारुल उलूम मऊ में हफ़्तुम अरबी तक तालीम हासिल की। 1948 में दुनिया की अज़ीम इस्लामी यूनिवर्सिटी दारुल देवबंद’’ में दाख़िला लेकर शेख़ुल इस्लाम मौलाना हुसैन अहमद मदनी रहमतुल्लाह अलैइह, अल्लामा मुहम्मद इब्राहिम बलियावी रहमतुल्लाह अलैइह और शेख़ुल अदब मौलाना एज़ाज़ अली रहमतुल्लाह अलैइह वग़ैरह के सामने ज़ानुए तलम्मुज़ तह किया। शेख़ुल हदीस मौलाना ज़करिया कान्धलवी रहमतुल्लाह अलैइह से भी आपने इस्तफ़ादा फ़रमाया। दारुल उलूम देवबंद से फ़राग़तके बाद मुताअद्दद मक़ामात पर तदरीसी ख़िदमात अंज़ाम दी। ख़ासकर मतलउल उलूम (बनारस) में आपने तकरीबन सोला साल तक उलूम क़ुरआन व सुन्नत की तालीम दी। 1982 में आंजनाब को दारुल उलूम देवबंद में उस्ताद हदीस की हैसियत से दारुल उलूम देवबंद की शूरा ने मुतअय्यन फ़रमाकर सहीह बुख़ारी जिल्द दोम और मिशकातुल मसाबीह की तालीम आपके ज़िम्मे रखी। इस तरह आपने 34 साल दारुल उलूम देवबंद में हदीस की सबसे मुस्तनद किताब सहीह बुख़ारी’’ की तालीम दी। कितनी ख़ुशकिस्मती की बात है कि आपने 60 साल से ज़्यादा अर्सा तक उलूम क़ुरआन हदीस की तालीम दी। हजारों उलमाए दीन आंजनाब से हदीस का सबक पढ़कर दुनिया के तूल व अर्ज़ में दीने इस्लाम की इशाअत के लिए अपनी कुर्बानियां पेश कर रहे हैं जो यक़ीनन आपके लिए एक सदक़ा जारिया है, जिसका सवाब इंशाअल्लाह आपको हमेशा मिलता रहेगा। हमारा यह ईमान व अक़ीदा है कि हमारे शेख़ सानी अब दुनिया में नहीं रहे लेकिन उनके तलामिज़ा और शार्गिदों के शार्गिद इंशाअल्लाह उस रोशनी को हमेशा मुनव्वर रखेंगे जो उन्होंने अपने मुश्फिक़ उस्ताद हज़रत मौलाना अब्दुल हक़ आज़मी रहमतुल्लाह अलैइह से हासिल की है।

मैं हज़रत की घरेलू ज़िन्दगी से भी काफ़ी हद तक वाक़िफ हूँ, आप क़नाअत पसंद और इन्तहाई सादा मिज़ाज थे। बर्रेसग़ीर की अहम इल्मी दर्सगाह दारुल उलूम देवबंद में सहीह बुख़ारी का दर्स देने वाले की ज़िन्दगी गुज़ारने का सादा तरीक़ा अगर कोई आम शख़्स देख लेता तो वह हैरान हो जाता। आपकी घरेलू ज़िन्दगी में बहुत मसाइल आये, मगर आपने सब्र का दामन कभी नहीं छोड़ा। आप इन्तहाई तवाज़ो व इन्कसारी के हामिल शख़्स थे। तलामिज़ा के साथ मोहब्बत से पेश आना आपका ऐसा तुर्रए इम्तियाज़ था कि आपके तलबा हमेशा आपके लिए दुआ करते रहेंगे कि अल्लाह तआला मौसूफ़ को करवट करवट चैन व सुकून अता फ़रमा और कल क़यामत के दिन हिसाब किताब के बग़ैर आपको जन्नतुल फिरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमा। 2010 में शेख़ अव्वल हज़रत मौलाना नसीर अहमद खान रहमतुल्लाह अलैइह इन्तेक़ाल फ़रमा गये थे, जिनसे मैंने सहीह बुख़ारी जिल्द अव्वल पढ़ी थी और 2016 के आख़िरी अयाम में हज़रत मौलाना अब्दुल हक़ आज़मी रहमतुल्लाह अलैइह इस दारेफ़ानी से दारे बक़ा की तरफ़ कूच कर गये, इस तरह सहीह बुख़ारी के मेरे दोनो उस्ताद अल्लाह को प्यारे हो गये। अल्लाह तआला दोनों को जन्नतुल फिरदौस में बुलन्द मक़ाम अता फ़रमाये और अल्लाह तआला हमें भी क़ुरआन व हदीस की अज़ीम ख़िदमात के लिए क़बूल फ़रमाये, आमीन। सुम्मा आमीन।

डॉ॰ मुहम्मद नजीब क़ासमी संभली (www.najeebqasmi.com)