बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन, वस्सलातु वस्सलामु अला नबिय्यिल करीम व अला अलिहि व अस्हाबिहि अजमईन

उलमाए दीन को मौलाना कहकर पुकारना कैसा है?

बर्रे सग़ीर में उलमाए किराम को उमूमन मौलाना’’ या मौलवी’’ कहकर पुकारा जाता है। कुछ हज़रात ने लफ़्ज़ मौलाना’’ के मुतअल्लिक़ यह कहना शुरू कर दिया है कि मौलाना अल्लाह तआला की सिफ़त है, लिहाज़ा किसी इन्सान के लिए मौलाना का लफ़्ज़़ इस्तेमाल करना जायज़ नहीं है, हालांकि सारी कायनात में सबसे अफ़जल व आला और सारे नबियों के सरदार हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत ज़ैद बिन हारिसा रज़िअल्लाहुअन्हु को मौलाना कहकर पुकारा। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का यह फ़रमान हदीस की मारूफ़ किताबों हत्ता कि सही बुख़ारी में भी मौजूद है। नऊज़ बिल्लाह! इनमें से कुछ मुतशदिदीन ने किसी इन्सान को मौलाना कहकर पुकारने को शिर्क तक कह दिया है। सऊदी अरब के साबिक़ मुफ़्ती आज़म शेख़ अब्दुल अज़ीज बिन बाज़ रहमतुल्लाह अलैइह ने एक सवाल के जवाब में अर्ज़ किया कि नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम क़बीले के सरदार, अपने वालिद और बादशाह वग़ैरह यानि किसी इन्सान के लिए मौलाना का लफ़्ज़ इस्तेमाल किया जा सकता है, जो उनकी वेबसाइट पर सुना और पढ़ा जा सकता है।

सबसे पहले मौलाना’’ लफ़्ज़ के मायने समझें। मौलाना’’ दो लफ़्ज़ों से मुरक्कब ज़बान का लफ़्ज़ है, एक मौला’’ और दूसरे ना’’। यानि मौलाना एक लफ़्ज़ नहीं है जैसा कि कुछ हज़रात समझते हैं। मौला एक मुस्तिक़ल लफ़्ज़ है जिसकी जमा मवाली’’ है, जिसके तकरीबन 20 मायने हैं, जिनमें से चंद माने हस्बे जै़ल हैं: आक़ा, मालिक, परवरिश करने वाला, दोस्त, आज़ाद करने वाला, आज़ाद किया हुआ ग़ुलाम और मेहरबान। लफ़्ज़ मौला’’ के मायने के लिए दुनिया की मशहूर व मारूफ़ डिक्शनरियाँ देखी जा सकती हैं। ना’’ अरबी ज़बान में ज़मीर (Pronoun) है जिसके मायने हमारे (Our)हैं। मौलाइ’’ में ’’ ज़मीर(Pronoun) है जिसके माअना मेरे (My Leader) हैं। मौलाकुम’’ में कुम’’ ज़मीर (Pronoun) है जिसके माअना तुम्हारे (Your Leader) हैं। मौलाहु’’ में हु’’ ज़मीर (Pronoun) है जिसके माअना उसके (His Leader) हैं। ग़र्ज़ कि मौलान के मायने हैं: हमारे आक़ा, हमारे मालिक, हमारे क़ायद और हमारे दोस्त वग़ैरह। जिस तरह ग़ुलाम अपने मालिक को मौलाइ या मौलाना कह सकता हैउसी तरह एक शख़्स अपने दीनी रहनुमा को मौलाना कहकर पुकार सकता है। अहादीस की सनद (Chain of Narrators) का ज़िक्र करते हुए बड़े मोहद्दसीन (मसलन इमाम बुख़ारी रहमतुल्लाह अलैइह और इमाम मुस्लिम रहमतुल्लाह अलैइह) कुछ रावियों का तआरुफ़ इस तरह कराते हैं कि यह फलां शख़्स का मौला है, मसलन इमाम बुख़ारी रहमतुल्लाह अलैहि रावी कुरैब’’ का तआरुफ़ इब्ने अब्बास रज़िअल्लाहुअन्हु के मौला और रावी नाफ़े’’ का तआरुफ़ इब्ने उमर रज़िअल्लाहुअन्हु के मौला से कराते हैं। कुतुबे हदीस में इस तरह की सैंकडों मिसालें मौजूद हैं। फ़िक़ह और उसूले फ़िक़ाह की मशहूर व मारूफ़ किताबों में मौला का लफ़्ज़़ मुख़्तिलफ़ मायने में इस्तेमाल किया गया है। यक़ीनन हमारा हक़ीक़ी मौला सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह की ज़ात ही हैजिसका कोई शरीक नहीं। लेकिन मौला दूसरे माअना में इन्सान के लिए भी इस्तेमाल होता है।

क़ुरआने करीम में भी मौला का लफ़्ज़ मुख़्तिलफ़ मायने में इस्तेमाल हुआ है। सिर्फ़ मौला का लफ़्ज़़ तन्हा भी इस्तेमाल हुआ हैऔर मुताअद्दद ज़मीरों के साथ भी यह लफ़्ज़ इस्तेमाल हुआ है। सूरतुल हज आयत 78 (वाअतसिमू बिल्लाहि हुवा मउलाकुम फ़नेअमल मउला व नेअमन्नसीर) में दो जगह मौला का लफ़्ज़़ इस्तेमाल हुआ है, एक जगह कुम’’ (Your)ज़मीर (Pronoun) के साथजबकि दूसरी मर्तबा बग़ैर ज़मीर के और दोनों जगहों पर अल्लाह की ज़ात मुराद है। क़ुरआने करीम में मौला का लफ़्ज़ दूसरे माअना में भी इस्तेमाल हुआ है। सूरतुद्दख़्ख़ान आयत 41 (यउमा ला युग़नी मउलन अन मउलन शइआ, वला हुम युनसरून) तर्जुमा: जिस दिन कोई हिमायती किसी हिमयाती के ज़र्रा बराबर भी काम नहीं आयेगा और उनमें से किसी की कोई मदद नहीं की जायेगी) में मौला अल्लाह के लिए नहीं बल्कि दोस्त के मायने में यानि इंसान के लिए इस्तेमाल हुआ है। इसी तरह सूरतुल हदीद आयत 15 (फ़लयउमा ला युख़ज़ु मिनकुम फ़िदयतुन वला मिन्ललज़ीना कफ़रू माअवाकुमुनन्नार हिया मउलाकुम व बेअसल मसीर) तर्जुमा: चुनांचे आज ना तुम से कोई फ़िदया क़बूल किया जायेगाऔर ना उन लोगों से जिन्होंने कुफ्ऱ इख़्तियार किया था, तुम्हारा ठिकाना दोज़ख है, वही तुम्हारी रखवाली है और यह बहुत बुरा अंजाम है) में लफ़्ज़ मौला कुम’’ ज़मीर के साथ जगह या ठिकाने के लिए इस्तेमाल हुआ है। ग़र्ज़ कि अल्लाह तआला ने ख़ुद क़ुरआने करीम में यह वाज़ेह कर दिया कि मौला के कई माआनी हैं। क़ुरआने करीम में लफ़्ज़ मौला ना’’ ज़मीर के साथ दो जगह (सूरतुल बक़रा आयत 286 और सूरतुत्तउबा तौबा आयत 51) में इस्तेमाल हुआ हैऔर दोनों जगह पर अल्लाह की ज़ात मुराद है यानि (Our Creater), लेकिन इसका मतलब हरगिज़ यह नहीं है कि मौलाना एक लफ़्ज़ है और वह सिर्फ़ अल्लाह के साथ ख़ास है। मौला एक मुस्तिक़ल लफ़्ज़ है और उसके साथ मुख़्तिलफ़ ज़मीरें इस्तेमाल की जा सकती हैं: मौलाइ, मौलाना, मौलाकुम, मौलाहु वगैरह।

सुरतुततहरीम आयत-4, (वइन तज़ाहरा अलैइहि फ़इन्नललाहा हुवा मउलाहु व जिबरीलु व सालिहुल मुमिनीन, तर्जुमा: अगर नबी के मुक़ाबले में तुमने एक दूसरे की मदद की तो याद रखो उनका साथी अल्लाह है और जिब्राईल और नेक मुसलमान है) में वाज़ेह तौर पर मउला हु’’ ज़मीर (Pronoun) के साथ हज़रत जिब्राईल और नेक लोगों के लिए इस्तेमाल हुआ है, ग़र्ज़ कि अल्लाह भी मौला जिब्राईल भी मौला और नेक बन्दे भी मौला हैं, जब अल्लाह तआला ने आम मोमिनीन को मौला कहा है तो हम ना’’ ज़मीर लगाकर उलमाए दीन को मौलाना यानि (Our Leader) क्यों नहीं कह सकते, ख़ुलासए कलाम यह कि मौलाना अरबी ज़बान का लफ़्ज़ है और दो लफ़्ज़ों का मुरक्कब है एक मौला और दूसरे ज़मीर ना, मौला के कई माअना डिक्शनरियों में मौजूद है, क़ुरआने करीम में भी यह लफ़्ज़ कई मआनी के लिये इस्तेमाल हुआ है, सिर्फ़ मौला का लफ़्ज़ भी इस्तेमाल हुआ है और उसके साथ कई ज़मीरें(Pronoun) लगाकर भी इस्तेमाल हुआ है। लिहाज़ा उलमाए दीन को मौलाना कहना बिल्कुल सही है।    

मशहूर व मारूफ़ सही हदीस: (मन कुन्तु मउलाह फ़अलिय्युन मउलाहु) तर्जुमा: जिसका मैं दोस्त हूँ, अली रज़िअल्लाहुअन्हु उसके दोस्त हैं) में हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने लफ़्ज़ मौला को हु’’ ज़मीर(Pronoun) के साथ इस्तेमाल फ़रमाकर कल क़यामत तक के लिए यह साबित कर दिया कि इन्सान भी मौला हो सकता है। यह सही हदीस, हदीस की मुख़्तिलफ़ किताबों में मौजूद है। सही बुख़ारी (किताबुल मग़ाजी-बाबु उमरतुल क़ज़ा ज़करहु अनसुन अनिन्नबिय्यि सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की हदीस में है कि तमाम नबियों के सरदार मुहम्मद अल अरबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत ज़ैद बिन हारिसा रज़िअल्लाहुअन्हु के बारे में फ़रमाया: (अन्ता अख़ूना व मउलाना) तुम हमारे भाई और हमारे मुईन व मददगार हो। सही बुख़ारी में मज़कूर इस हदीस में फ़साहत व बलाग़त के पैकर और अदीबे इस्लाम मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत ज़ैद बिन हारिसा के लिए मौलाना का लफ़्ज़ इस्तेमाल किया है। अगर मौलाना का लफ़्ज़ अल्लाह के अलावा किसी दूसरी ज़ात के लिए इस्तेमाल करना नाजायज़ होता तो क्या मोहम्मुदल अरबी किसी इन्सान के लिए यह लफ़्ज़ इस्तेमाल करते। अल्लाह तआला उन लोगों को हिदायत अता फ़रमाये जो यह कहते हैं कि मौलाना का लफ़्ज़ किसी इन्सान के लिए इस्तेमाल करना नाजायज़ या शिर्क है, हालांकि सारे नबियों के सरदार और तमाम इन्सानों व जिनों में सबसे अफज़ल ने मौलाना का लफ़्ज़ हज़रत ज़ैद बिन हारिसा रज़िअल्लाहुअन्हु के लिए इस्तेमाल फ़रमाया है। इसी तरह बुख़ारी व मुस्लिम व दीगर कुतुबे हदीस में वारिद है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि कोई शख़्स (किसी ग़ुलाम से) यह ना कहे कि अपने रब को खाना खिलाओ। अपने रब को वुज़ू कराओ। अपने रब को पानी पिलाओ। बल्कि सिर्फ़ सय्यदी व मौलाई (मेरे सरदार, मेरे आक़ा) कहना चाहिए। इसी तरह कोई शख़्स यह ना कहे: “मेरा बन्दा, मेरी बन्दी,’’ बल्कि यूं कहना चाहिए: “मेरा गुलाम” “मेरी लौंडी’’। जब नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने किसी इन्सान के लिए ज़मीर के साथ लफ़्ज़ मौला का इस्तेमाल करने की इज़ाजत मरहमत फ़रमाई हैऔर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ख़ुद इस्तेमाल भी किया हैतो इक्कीसवीं सदी में किसी शख़्स को क्या हक़ हासिल है कि वह कहे कि लफ़्ज़ मौला की निस्बत ना’’ ज़मीर के साथ करके किसी इन्सान को मौलाना कहना जायज़ नहीं है।

बुख़ारी व मुस्लिम से पहले लिखी गयी हदीस की मशहूर किताब (मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा) में मज़कूर है कि हज़रत अनस बिन मालिक रज़िअल्लाहुअन्हु से किसी मसले के बारे में सवाल किया गया तो हज़रत अनस रज़िअल्लाहुअन्हु ने कहा कि तुम हमारे मौलाना हसन से मसला पूछो। सही मुस्लिम की सबसे मशहूर शरह लिखने वाले इमाम नववी रहमतुल्लाह अलैइह ने तहरीर किया है कि लफ़्ज़ मौला’’ के तक़रीबन 16 मायने हैं, कुछ उलमाए किराम ने लफ़्ज़ सय्यिदिना’’ को इस्तेमाल करने से एहतेराज़ किया है क्योंकि इस लफ़्ज़ में अपनी ताक़त दिखाने का शायबा पैदा होता है। इसीलिए वह मौलाना का लफ़्ज़ इस्तेमाल करते हैं जो मुख़्तिलफ़ मअनों में इस्तेमाल होता है। ग़र्ज़ कि उलमाए किराम को मौलाना के लक़ब से पुकारना ज़माना--कदीम से चला आ रहा है।

ख़ुलासाए कलाम यह है कि हमारा हक़ीक़ी आक़ा व मौला सिर्फ़ अल्लाह तआला की ज़ात है, उसका कोई शरीक नहीं है। लेकिन दूसरे माअना के एतबार से मौला का लफ़्ज़ किसी दूसरे इन्सान के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। मसलन आज़म (सबसे अज़ीम) और अकबर (सबसे बड़ा) सिर्फ़ अल्लाह तआला की ज़ात है, लेकिन दूसरी निस्बत से यह नाम किसी इन्सान का भी रखा जा सकता है। अलअली’’ अल्लाह का नाम है, लेकिन अली’’ आप के चचाज़ाद भाई और दामाद का नाम भी है। ग़र्ज़ कि आलिमे दीन को मौलाना कहकर पुकारा जा सकता है जैसा कि क़ुरआन व हदीस की रोशनी में तहरीर किया गया है। मुहद्दिस, मुफ़स्सिर, मुअर्रिख़, फ़क़ीह, शेख़, फजीलतुश्शेख़, अल्लामा, मुफ़्ती, मौलवी, आलिम, मुल्ला, प्रोफ़ेसर और डाक्टर जैसे अलक़ाब नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़माने में मौजूद नहीं थे। जब इन अलक़ाब का इस्तेमाल करना सही है तो आलिमे दीन के लिए मौलाना का इस्तेमाल करना क्यों ग़लत होगा, जबकि बताया गया कि लफ़्ज़ मौलाना एक लफ़्ज़ नहीं है, बल्कि यह दो अलफाज़ से मुरक्कब है। और मौला के मुतअद्दिद माअना हैं, ना’’ ज़मीर (Pronoun) है, जिसके मायने हमारे (Our) हैं, ग़र्ज़ कि मौलाना के मायने हुए (Our Leader)। नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ख़ुद अपने सहाबी के लिए मौलाना का लफ़्ज़ इस्तेमाल फ़रमाया है तो किसी को क्या हक़ पहुंचता है कि वह कहे कि आलिमे दीन को मौलाना कहकर पुकारना जायज़ नहीं है। अल्लाह तआला हमें क़ु़रआन व हदीस को मज़बूती के साथ पकड़ने वाला बनाये।

डॉ॰ मुहम्मद नजीब क़ासमी संभली (www.najeebqasmi.com)