بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

शैखुल हदीस मौलाना मोहम्मद ज़करिया कांधलवी

आज उम्मते मुस्लिमा खास कर बर्रे सगीर में रहने वाले मुलसमान मुख्तलिफ जमाअतों, गिरोहों और तंज़ीमों में मुंक़सिम हो गए हैं। “हर फिरक़ा और गिरोह समझता है कि वह ही हक़ पर है और दूसरे बातिल पर हैं।” (सूरह रूम 32)
क़ुरान व हदीस के मुतालआ से वाज़ेह तौर पर मालूम होता है कि इख्तिलाफ फी नफसिही बुरा नहीं है बशर्ते इख्तिलाफ का बुनियादी मक़सद हक़ीक़त का इज़हार हो और इस इख्तिलाफ से किसी की दिल आज़ारी और एहानत मतलूब व मक़सूद न हो। इख्तिलाफ तो दौरे नबूवत में भी था। बाज़ उमूर में सहाबए किराम की राय एक दूसरे से मुख्तलिफ हुआ करती थी। बाज़ मवाक़े पर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सहाबए किराम से मशवरा लिया और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी राय के बजाए सहाबए किराम के मशवरे पर अमल किया, मसलन जंगे उहद के मौक़े पर हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सहाबए किराम के नुक्तए नज़र पर अमल करके मदीना से बाहर निकल कर कुफ्फारे मक्का का मुक़ाबला किया।
जंगे अहज़ाब से वापसी पर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सहाबए किराम की एक जमाअत को फौरन बनू क़ुरैज़ा रवाना फरमाया और कहा कि असर की नमाज़ वहां जा कर पढ़ो। रास्ते में जब नमाज़े असर का वक़्त खत्म होने लगा तो सहाबए किराम में असर की नमाज़ पढ़ने के मुतअल्लिक़ इख्तिलाफ हो गया। एक जमाअत ने कहा कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फरमान के मुताबिक़ हमें बनू क़ुरैज़ा ही में जाकर असर पढ़नी चाहिए चाहे असर की नमाज़ कज़ा हो जाए। जबकि दूसरी जमाअत ने कहा कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के कहने का मंशा यह था कि हम असर की नमाज़ के वक़्त में ही बनू क़ुरैज़ा पहुंच जाएंगे, लेकिन अब चूंकि असर के वक़्त में बनू क़ुरैज़ा की बस्ती में पहुंच कर नमाज़े असर पढ़ना मुमकिन नहीं है, लिहाज़ा हमें असर की नमाज़ अभी पढ़ लेनी चाहिए। इस तरह सहाबए किराम दो जमाअतों में मुंक़सिम हो गए, कुछ हज़रात ने नमाज़े असर वहीं पढ़ी, जबकि दूसरी जमाअत ने बनू क़ुरैज़ा की बस्ती में जाकर कज़ा पढ़ी। जब सुबह नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बनू क़ुरैज़ा पहुंचे और इस वाक़्ये से मुतअल्लिक़ तफसीलात मालूम हुईं तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने किसी जमाअत पर भी कोई तंक़ीद नहीं की और न ही इस अहम मौक़े पर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कोई हिदायत जारी की जिससे मालूम हुआ कि अहकाम में इख्तिलाफ तो कल क़यामत तक जारी रहेगा और इस क़िस्म का इख्तिलाफ मज़मूम नहीं है, अलबत्ता अक़ायद और उसूल में इख्तिलाफ करना मज़मूम है।
अल्लामा इबनुल क़य्यिम ने अपनी किताब “अस सवाइक़ुल मुरसला” में दलाइल के साथ लिखा है कि सहाबए किराम के दरमियान भी बहुत से मसाइल में इख्तिलाफ था जिनमें से एक मसअला एक मजलिस में एक लफ्ज़ से तीन तलाक़ वाक़े होने के बारे में है। यह इख्तिलाफ महज़ इज़हारे हक़ या तलाशे हक़ के लिए था।
लेकिन आज हम इख्तिलाफ के नाम पर बुग्ज़ व इनाद कर रह हैं, अपने मक्तबे फिक्र को सही और दूसरे मकातिबे फिक्र को गलत क़रार देने के लिए अपनी तमामतर सलाहियतें सर्फ कर रहे हैं, हालांकि इस्लाम में इख्तिलाफ की गुनजाइश तो है, मगर बुग्ज़ व इनाद और लड़ाई झगड़ा करने से मना फरमाया गया है जैसा कि अल्लाह तआला ने अपने पाक कलाम में फरमाया “आपस में झगड़ा न करो, वरना बुज़दिल हो जाओगे और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी।” (सूरह अंफाल 46)
आज गैर मुस्लिम कौमें खास कर यहूद व नसारा की तमाम माद्दी ताकतें मुसलमानों को ज़ेर करने में मसरूफ हैं, यह दुनियावी ताकतें इस्लाम और मुसलमानों को ज़लील व रुसवा करने के लिए हर मुमकिन हरबा इस्तेमाल कर रही हैं जिस से हर जीशऊर वाक़िफ है, लिहाज़ा हम सब की ज़िम्मेदारी है कि सहाबा और अकाबेरीन की सीरत की रौशनी में अपने इख्तिलाफ को सिर्फ इज़हार हक़ या तलाशे हक़ तक महदूद रखें। अपना मौक़िफ ज़रूर पेश करें, लेकिन दूसरे की राय की सिर्फ इस बुनियाद पर मुखालफत न करें कि इसका तअल्लुक़ दूसरे मक्तबे फिक्र से है। अब तो दूसरे आसमानी मज़ाहिब के साथ भी हमआहंगी की बात शुरू होने लगी है, लिहाज़ा हमें उम्मते मुस्लिमा के शीराज़े को बिखेरने के बजाए इसमें पैवन्दकारी करनी चाहिए। अगर किसी आलिम के क़ौल में कुछ नुक़्स है तो उसकी ज़िन्दगी का बेश्तर हिस्सा सामने रख कर उसकी इबारत में तौजीह व तावील करनी चाहिए, न कि उसपर कुफ्र व शिर्क के फतवे लगाए जाएं। फुरूई मसाइल में इख्तिलाफ की सूरत में दूसरे मकातिबे फिक्र की राय का एहतेराम करते हुए क़ुरान व हदीस की रौशनी में अपना मौक़िफ ज़रूर पेश किया जा सकता है, लेकिन दूसरे मकातिबे फिक्र की राय की तज़लील और रुसवाई हमारी ज़िन्दगी का मक़सद नहीं होना चाहिए।
बर्रे सगीर में मुख्तलिफ मकातिबे फिक्र के आपसी इख्तिलाफात का शिकार हदीस की बेलौस खिदमत करने वाली शख्सियत शैखुल हदीस मौलाना ज़करिया की भी है। फज़ाइल से मुतअल्लिक़ उनकी तहरीर करदा 9 किताबों के मजमूआ “फज़ाइल आमाल” को भरपूर तंक़ीद का निशाना बनाया गया है और उनकी इल्मे हदीस की अज़ीम खिदमात को ही पसे पुश्त डाल दिया गया है। इन 9 किताबों के मजमूआ पर मुख्तलिफ एतेराज़ात किए गए जिनके बहुत से जवाबात शाये हुए और यह सिलसिला बराबर जारी व सारी है। इस सिलसिले की अहम कड़ी हज़रत मौलाना लतीफुर रहमान साहब क़ासमी की अरबी ज़बान में तहरीर करदा वह जामे किताब “तहक़ीक़ुल मक़ाल फी तखरीज अहादीस फज़ाइलिल आमाल लिश शैख मोहम्मद ज़करिया” है जो बैरूत (लिबनान) और दुबई से शाये हुई है। यह किताब अरबी ज़बान में है और 664 पेजों पर मुशतमिल है। हिन्द व पाक में इसके दो तरजुमे इख्तिसार के साथ शाये हो चुके हैं।
शैखुल हदीस मौलाना मोहम्मद ज़करिया के उन 9 किताबों के मजमूआ पर एतेराज़ात का खुलासा दो उमूर पर मुशतमिल है।
1) किताब में ज़ईफ अहादीस भी तहरीर की गई हैं।
2) बुज़ुर्गों के वाक़्यात कसरत से ज़िक्र किये गए हैं।

मसअले की वज़ाहत से पहले चंद तारीखी हक़ायक़ को समझें
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़माने में हदीस लिखने की आम इजाज़त नहीं थी, ताकि क़ुरान व हदीस में इख्तिलात पैदा न हो जाए।
खुलफाए राशिदीन के ज़माने में भी हदीस का नज़्म सिर्फ इंफिरादी तौर पर और वह भी महदूद पैमाने पर था।
200 हिजरी से 300 हिजरी के दरमियान अहादीस लिखने का खास एहतेमाम हुआ चुनांचे हदीस की मशहूर व मारूफ किताबें बुखारी, मुस्लिम, तिर्मिज़ी, इब्ने माजा, नसई वगैरह (जिनको सिहाये सित्ता कहा जाता है) इसी दौर में तहरीर की गई हैं जबकि मुअत्ता इमाम मालिक 160 हिजरी के क़रीब तहरीर हुई। इन अहादीस की किताबों की तहरीर से पहले ही 150 हिजरी में इमाम अबू हनीफा (शैख नोमान बिन साबित) की वफात हो चुकी थी। इमाम मोहम्मद की रिवायत से इमाम अबू हनीफा की हदीस की किताब “किताबुल आसार” इन अहादीस की किताबों की तहरीर से पहले मुरत्तब हो गई थी।
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फरमान या अमल को जो हदीस ज़िक्र करने का बुनियादी मक़सद होता है, मतन कहा जाता है।
जिन वास्तों से यह हदीस मुहद्दिस तक पहुंचती है उसको सनदे हदीस कहते हैं। हदीस की मशहूर किताबों में मुहद्दिस और सहाबी के दरमियान उमूमन दो या तीन या चार वास्ते हैं कहीं कहीं इससे ज़्यादा भी हैं।
अहादीस की किताबें तहरीर होने के बाद हदीस बयान करने वाले रावियों पर बाक़ायदा बहस हुई, जिसको असमाउर रिजाल की बहस कहा जाता है। अहकामे शरइया में उलमा व फुकहा के इख्तिलाफ की तरह इससे भी कहीं ज़्यादा शदीद इख्तिलाफ मुहद्दिसीन का रावियों को ज़ईफ और सिक़ह क़रार देने में है, यानी एक हदीस एक मुहद्दिस के नुक्तए नज़र में ज़ईफ और दूसरे मुहद्दिसीन की राय में सही हो सकती है।
सनद में अगर कोई रावी गैर मारूफ साबित हुआ यानी यह मालूम नहीं कि वह कौन है या उसने किसी एक मौक़े पर झुठ बोला है या सनद में इंक़िता है तो इस बुनियाद पर मुहद्दिसीन व फुकहा एतियात के तौर पर इस रावी की हदीस को अक़ायद और अहकाम में क़बूल नहीं करते हैं बल्कि जो अक़ायद या अहकाम सही मुस्तनद अहादीस से साबित हुए हैं उनके फज़ाइल के लिए क़बूल करते हैं, चुनांचे बुखारी व मुस्लिम के अलावा हदीस की मशहूर व मारूफ तमाम ही किताबों में ज़ईफ अहादीस की अच्छी खासी तादाद मौजूद है और उम्मते मुस्लिमा इन किताबों को ज़मानए क़दीम से क़बूलियत का शरफ दिए हुए है हत्ताकि बुखारी की तालीक़ और मुस्लिम की शवाहिद में भी ज़ईफ अहादीस मौजूद हैं। इमाम बुखारी ने हदीस की बहुत सी किताबें तहरीर फरमाईं, बुखारी शरीफ के अलावा उनकी भी तमाम किताबों में ज़ईफ अहादीस कसरत से मौजूद हैं।
(नोट) अगर ज़ईफ अहादीस क़ाबिले एतेबार नहीं हैं तो सवाल यह है कि मुहद्दिसीन ने अपनी किताबों में उन्हें क्यों जमा किया? और उनके लिए तवील सफर क्यों किए? नीज़ यह बात ज़ेहन में रखें कि अगर ज़ईफ हदीस को क़ाबिले एतेबार नहीं समझा जाएगा तो सीरते नबवी और तारीखे इस्लाम का एक बड़ा हिस्सा दफन करना पड़ेगा। ज़मानए क़दीम से जमहूर मुहद्दिसीन का उसूल यही है कि ज़ईफ हदीस फज़ाइल में मोतबर है और उन्होंने ज़ईफ हदीस को सही हदीस की अक़साम के ज़िम्न में ही शुमार किया है।
मुस्लिम शरीफ की सबसे ज़्यादा मक़बूल शरह लिखने वाले इमाम नववी (मुअल्लिफ रियाज़ुस सालिहीन) फरमाते हैं मुहद्दिसीन, फुकहा और उनके अलावा जमहूर उलमा ने फरमाया ज़ईफ हदीस पर अमल करना फज़ाइल और तर्गीब व तरहीब में जायज़ और मुस्तहब है। (अलअज़कार पेज 7-8)
इसी उसूल को दूसरे उलमा व मुहद्दिसीन ने तहरीर फरमाया है जिनमें से बाज़ के नाम यह हैं:
― शैख मुल्ला अली क़ारी (मौज़ूआते कबीरा पेज 8, शरहुल अक़ारिया जिल्द 1 पेज 9, फतह बाबुल इनाया जिल्द 1 पेज 49)
― शैख इमाम हाकिम अबू अब्दुल्लाह नीशापूरी (मुस्तदरक हाकिम जिल्द 1 पेज 490)
― शैख इब्ने हजर अलहैसमी (फतहुल मुबीन पेज 32)
― शैख अबू मोहम्मद बिन कुदामा (अलमुगनी जिल्द 1 पेज 1044)
― शैख अल्लामा शौकानी (नीलुल औतार जिल्द 3 पेज 68)
― शैख हाफिज इब्ने रजब हमबली (शरह अलत तिर्मिज़ी जिल्द 1 पेज 42-74)
― शैख अल्लामा इब्ने तैमिया हमबली (फतावा जिल्द 1 पेज 39)
― शैख नवाब सिद्दीक हसन खान (दलीलुत तालिब अलल मतालिब पेज 889)
जहां तक बुज़ुर्गों के वाक़्यात बयान करने का तअल्लुक़ है तो उससे कोई हुकुम साबित नहीं होता है बल्कि सिर्फ क़ुरान व हदीस से साबित शुदा हुकुम की ताईद के लिए किसी बुज़ुर्ग का वाक़्या ज़िक्र किया जाता है। बुर्जगों के वाक़्यात तहरीर करने का रिवाज हर वक़्त और हर मक्तबे फिक्र में मौजूद है जैसा कि मौलाना लतीफुर रहमान क़ासमी साहब ने अपनी किताब “तहक़ीक़ुल मक़ाल फी तखरीज अहादीस फज़ाइलिल आमाल लिश शैख मोहम्मद ज़करिया” में दीगर मकातिबे फिक्र के बहुत से उलमा की किताबों के नाम हवालों के साथ तहरीर फरमाए हैं। उम्मते मुस्लिमा का एक बड़ा हिस्सा इस बात पर मुत्तफिक़ है कि कभी कभी बुज़ुर्गों के ज़रिया ऐसे वाक़्यात रूनुमा हो जाते हैं जिनका आम आदमी से सुदूर मुश्किल होता है, नीज़ अगर मान भी लिया जाए कि किताब में बाज़ वाक़्यात का ज़िक्र गैर मुनासिब है या चंद मौज़ू अहादीस ज़िक्र कर दी गई हैं अगरचे वह अहादीस की मशहूर व मारूफ किताबों से ही ली गई हैं, तो सिर्फ इस बुनियाद पर उनकी हदीस की खिदमात को नज़र अंदाज करना उनकी अज़ीम शख्सीयत के साथ इंसाफ नहीं है। शैखुल हदीस ने चालीस साल से ज़्यादा हदीस की किताबें पढ़ाईं, कोई तंखाह नहीं ली। सौ से ज़्यादा अरबी व उर्दू ज़बान में किताबें तहरीर फरमाईं, एक किताब के हुक़ूक़ भी अपने लिए महफूज़ नहीं रखे। 18 जिल्दों पर मुशतमिल “औजजुल मसालिक इला मुअत्ता इमाम मालिक” किताब अरबी ज़बान में तहरीर फरमाई जिससे लाखों अरब व अजम ने इस्तिफादा किया और यह सिलसिला बराबर जारी है।

शैखुल हदीस मौलाना मोहम्मद ज़करिया की शख्सीयत
शैखुल हदीस 10 रमज़ान 1315 हिजरी, 12 फरवरी 1898 को ज़िला मुज़फ्फरनगर के कसबा कांधला के एक इल्मी घराने में पैदा हुए, आपके वालिद शैख मोहम्मद यहया मदरसा मज़ाहिरुल उलूम सहारनपुर में उस्ताज़े हदीस थे। आपके दादा शैख मोहम्मद इसमाईल भी एक बड़े जय्यिद आलिम थे। आपके चाचा शैख मोहम्मद इलयास हैं जो फाज़िले दारुल उलूम देवबन्द होने के साथ तबलिगी जमाअत के मुअस्सिस भी हैं जिन्होंने उम्मते मुस्लिमा की इस्लाह के लिए मुख्लिासाना कोशिश करते हुए एक ऐसी जमाअत की बुनियाद डाली जिसकी इसार व क़ुर्बानी की बज़ाहिर कोई नज़ीर इस दौर में नहीं मिलती और यह जमाअत एक मुख्तसर अरसे में दुनिया के चप्पे चप्पे में यहां तक कि अरबों में भी फैल चुकी है। 6 खलीजी मुमालिक, 22 अरब मुमालिक और 75 इस्लामी मुमालिक मिलकर भी आज तक कोई ऐसी मुनज़्ज़म जमाअत नहीं तैयार कर सके जिसकी एक आवाज़ पर बेगैर किसी इशतिहारी वसीले के लाखों का मजमा पलक झपकते ही जमा हो जाए। उमूमी तौर पर अब हमारी ज़िन्दगी दिन बदिन मुनज़्ज़म होती जा रही है, चुनांचे स्कूल, कालेज और यूनिवर्सिटी हत्ताकि मदारिसे अरबिया इस्लामिया में भी दाखिला का एक मुअय्यन वक़्त, दाखिला के लिए टेस्ट और इंटरव्‍यू, क्लासों का नज़्म व नस्क़ फिर इमतेहानात और 3 या 5 या 8 साला कोर्स और हर साल के लिए मुअय्यन किताबें पढ़ने पढ़ाने की तहदीद कर दी गई है। हालांकि क़ुरान व हदीस से उनका कोई सबूत नहीं मिलता। इसी तरह अपनी और भाइयों की इस्लाह के लिए कोई वक़्त मुअय्यन नहीं होना चाहिए, लेकिन तालीम व मुलाज़मत व कारोबार गरज़ ये कि हमारी ज़िन्दगियों के मुनज़्ज़म शिडयूल को सामने रखते हुए अकाबेरीन ने इस मेहनत के लिए भी वक़्त की एक तर्तीब दे दी है। इंफिरादी तौर पर जब हमारे अंदर कमियां मौजूद हैं तो इजतिमाई तौर पर काम करने की सूरत में कमियां खत्म नहीं हो जाएंगी। मौजूदा दौर की कोई भी इस्लामी तंज़ीम तंक़ीद से खाली नहीं है। खुलासए कलाम यह है कि शैख मोहम्मद इलयास की फिक्र से वजूद में आने वाली अपनी और भाईयों की इस्लाह की मजकूरा कोशिश मजमूई एतेबार से बेशुमार खूबियां अपने अंदर समोए हुए है।
शैखुल हदीस मौलाना मोहम्मद ज़करिया के चचाज़ाद भाई शैख मोहम्मद यूसुफ बिन शैख मोहम्मद इलयास थे जिन्होंने अरबी ज़बान में तीन जिल्दों पर मुशतमिल हयातुस सहाबा तहरीर फरमाई जिसके मुख्तलिफ ज़बानों में तरजुमा भी हुए, जो अरब व अजम में लाखों की तादाद में शाये हुए और हो रहे हैं, जिनसे लाखों की तादाद ने इस्तिफादा किया और कर रहे हैं।
इस खानदान ने अरबी व उर्दू में सैकड़ों किताबें तहरीर कीं लेकिन खुलूस व लिल्लाहियत की वाज़ेह अलामत यह है कि एक किताब के हुक़ूक़ भी अपने लिए महफूज़ नहीं किए, बल्कि अल्लाह तआला से अजरे अज़ीम की उम्मीद के साथ एलान कर दिया कि जो चाहे शाये करे, फरोख्त करे, तक़सीम करे, चुनांचे दुनिया के बेशुमार नाशिरीन खास कर लिबनान के बहुत से नाशिरीन इस खानदान की अरबी किताबें बड़ी मिक़दार में शाये कर रहे हैं और अरबों में उनकी किताबें बहुत मक़बूल हैं। सउदी अरब के तक़रीबन तमाम बड़े मक्तबों में उनकी किताबें (मसलन औजज़ुल मसालिक इला मुअत्ता इमाम मालिक और हयातुस सहाबा) दस्तियाब हैं।
12 साल की उम्र में शैखुल हदीस मौलाना मोहम्मद ज़करिया ने मदरसा मज़ाहिरुल उलूम सहारनपुर में दाखिला लिया। दारुल उलूम देवबन्द के बाद मदरसा मज़ाहिरुल उलूम सहारनपुर बर्रे सगीर का सबसे बड़ा मदरसा शुमार किया जाता है जिसकी बुनियाद दारुल उलूम देवबन्द के 6 महीने बाद रखी गई थी। शैखुल हदीस के हदीस के अहम असातज़ा में शैख खलील अहमद सहारनपूरी आपके वालिद शैख मोहम्मद यहया और आपके चाचा शैख मोहम्मद इलयास थे।
वालिद के इंतिकाल के बाद सिर्फ 20 साल की उम्र में (1335 हिजरी में) मदरसा मज़ाहिरुल उलूम सहारनपुर में उस्ताज़ हो गए। 1341 हजरी में अपने शैख खलील अहमद सहारनपूरी के इसरार पर सिर्फ 26 साल की उम्र में बुखारी शरीफ का दर्स शुरू फरमा दिया। 1345 हिजरी में नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के शहर मदीना में एक साल क़याम फरमाया और मदरसा अल उलूमुश शरईया (मदीना) में हदीस की मशहूर किताब अबू दाऊद पढ़ाई। यह मदरसा आज भी मौजूद है जिसके ज़िम्मेदार सैयद हबीब मदनी के बड़े साहबजादे हैं। मदीना के क़याम के दौरान ही अपनी मशहूर किताब औजज़ुल मसालिक इल मुत्ता इमाम मालिक की तालीफ शुरू फरमा दी थी, उस वक़्त आपकी उम्र 29 साल थी। 1346 हिजरी में मदीना से वापसी के बाद दोबारा मदरसा मज़ाहिरुल उलूम सहारनपुर में हदीस की किताबें खास कर बुखारी शरीफ और अबू दाऊद पढ़ाने लगे और यह सिलसिला 1388 हिजरी में यानी 73 साल की उम्र तक जारी रहा। गरज़ ये कि आपने 50 साल से ज़्यादा हदीस पढ़ाने और लिखने में गुज़ारे और इस तरह हज़ारों तलबा ने आपसे हदीस पढ़ी जो दीने इस्लाम की खिदमत के लिए दुनिया के कोने कोने में फैल गए।
शैखुल हदीस ने हज की अदाएगी के लिए मक्का और मदीना के बहुस से सफर किए। 1345 हिजरी में आप अपने उस्ताद शैख खलील अहमद सहारपूरी के साथ मदीना में मुक़ीम थे कि आपके उस्तादे मोहतरम का इंतिकाल हो गया और वह जन्नतुल बकी में अहले बैत के क़रीब दफन किए गए। शैखुल हदीस मौलाना मोहम्मद ज़करिया की भी ख्वाहिश थी कि मदीना में ही मौलाए हक़ीक़ी से जा मिलूं, चुनांचे बतारीख एक शाबान 1402 हिजरी मदीना में आपका इंतिकाल हुआ। एक अज़ीम जम्मे गफीर की मौजूदगी में मदीना के मशहूर क़ब्रिस्तान अलबक़ी के उस हिस्से में दफन किए गए जहां अब तदफीन का सिलसिला बन्द हो गया है। मस्जिदे नबवी के तक़रीबन तमाम अइम्मा शैखुल हदीस के जनाज़े में शरीक थे। शैखुल इस्लाम मौलाना हुसैन अहमद मदनी के भतीजे सैयद हबीब मदनी (साबिक़ रईसुल औक़ाफ, मदीना) ने अपनी निगरानी में शैखुल हदीस की कब्र उनके उस्ताद शैख खलील अहमद सहारनपुरी के बगल में बनवाई, इस तरह दोनों शुयूख अलहे बैत के करीब ही मदफून हैं। दारुल उलूम देवबन्द के उस्ताद और मुजाहिदे आज़ादी शैखलु इस्लाम मौलाना हुसैन अहमद मदनी ने चंद मरहलों में तक़रीबन 15 साल मस्जिदे नबवी में उलूमे नबूवत का दर्स दिया। उनके भतीजे सैयद हबीब मदनी एक तवील अरसे तक मदीना के गवर्नर की सरपरस्ती में मदीना के इंतिज़ामी उमूर देखते रहे, गरज़ ये कि वह अरसए दराज़ तक मुसाइद गवर्नर थे। सउदी अरब में कोई भी हिन्द निज़ाद सउदी इनते बड़े ओहदे पर फायज़ नहीं हुआ।
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जो शख्स मदीना में मर सकता है (यानी यहां आ कर मौत तक क़याम कर सकता है) उसे ज़रूर मदीना में मरना चाहिए क्योंकि मैं उस शख्स की शिफाअत करूंगा जो मदीना में मरेगा। (तिर्मिज़ी)
शैखुल हदीस को आखिरी उम्र में (1397 हिजरी में) सउदी शहरीयत भी मिल गई थी और उन्होंने सउदी पासपोर्ट से ही हिन्दुस्तान का आखिरी सफर और इससे पहले साउथ अफ्रीक़ा का सफर किया था। शैखुल हदीस के खलीफा अब्दुल हफीज़ अब्दुल हक़ मक्की साहब भी मौजूद हैं जो अपने खानदान के दूसरे अफराद के साथ 1952 में हिजरत फरमा कर मक्का में मुक़ीम हुए, मक्का में मक्तबा इमदादिया के मालिक हैं। इस मक्तबा से हिन्द व पाक के उलमा की अरबी किताबें सउदी हुकूमत की इजाज़त के बाद बड़ी मिक़दार में शाये होती हैं।

शैखुल हदीस मौलाना मोहम्मद ज़करिया की इल्मी खिदमात
शैखुल हदीस ने अरबी और उर्दू में 100 से ज़्यादा किताबें तहरीर फरमाई हैं जिनमें से बाज़ अहम किताबों का मुख्तसर तआरुफ अर्ज़ है।
― औजज़ुल मसालिक इला मुअत्ता इमाम मालिक यह किताब अरबी ज़बान में है जो हदीस की मशहूर व मारूफ किताब मुअत्ता इमाम मालिक की शरह है। इस किताब की 18 जिल्दें हैं जो आपने दर्से हदीस और दूसरी मसरूफियात के साथ 1375 हिजरी में 30 साल की जिद्द व जोहद के बाद तहरीर फरमाई। मदीना के क़याम के दौरान इस किताब की तालीफ शुरू फरमाई थी, उस वक़्त आपकी उम्र सिर्फ 29 साल थी। दुनिया के तक़रीबन तमाम मकातिबे फिक्र के उलमा इस किताब से इस्तिफादा करते हैं। लिबनान के बहुत से नाशिरीन इस किताब के लाखों की तादाद में नुसखे शाये कर रहे हैं। सउदी अरब की तक़रीबन तमाम ही लाइब्रेरियों और मक्तबों की यह किताब ज़ीनत बनी हुई है, मालिकी हज़रात इस किताब को निहायत इज़्ज़त व एहतेराम के साथ पढ़ते और पढ़ाते हैं, यहां तक कि बाज़ मालिकी उलमा ने फरमाया है कि हमें फुरूई मसाइल से वाक़फियत सिर्फ इसी किताब से हुई है। बाज़ नाशिरीन ने इस किताब को 15 जिल्दों में शाये किया है।
― अल अबवाब वत्तराजिम लिल बुखारी इस किताब में बुखारी शरीफ के अबवाब की वज़ाहत की गई है। बुखारी शरीफ में अहादीस के मजमूआ के उनवान पर बहस एक मुस्तक़िल इल्म की हैसियत रखती है जिसे तरजुमतुल अबवाब कहते हैं। शैख ज़करिया ने इस किताब में शाह वलीउल्लाह देहलवी और अल्लामा इब्ने हजर असक़लानी जैसे उलमा के ज़रिया बुखारी के अबवाब के बारे में की गई वज़ाहतें ज़िक्र करने के बाद अपनी तहक़ीक़ी राय पेश की हैं। यह किताब अरबी ज़बान में है और इसकी 6 जिल्दें हैं।
― लामुउद्दिरारी अला जामे सहीहिल बुखारी यह मजमूआ दरअसल शैख रशीद अहमद गंगोही का दर्से बुखारी है जो शैखुल हदीस के वालिद शैख मोहम्मद यहया ने उर्दू ज़बान में कलमबंद किया था। शैखुल हदीस मौलाना ज़करिया ने इसका अरबी ज़बान में तरजुमा किया और अपनी तरफ से कुछ हज़फ व इज़ाफात करके किताब की तालीक और हवाशी तहरीर फरमाए। इस तरह शैखुल हदीस की 12 साल की इंतिहाई कोशिश और मेहनत की वजह से यह अज़ीम किताब मंज़रे आम पर आई। इस किताब पर शैखुल हदीस का मुक़द्दमा बेशुमार खूबियों का हामिल है। यह किताब अरबी ज़बान में है और इसकी 10 जिल्दें हैं।
― बज़लुल मजहूद फी हल्लि अबी दाऊद यह किताब शैख खलील अहमद सहारनपूरी की तहरीर करदा है, लेकिन शैखुल हदीस मौलाना मोहम्मद ज़करिया की चंद सालों की कोशिश के बाद ही 1345 हिजरी में मदीना में मुकम्मल हुई। इस किताब के मुतअल्लिक़ कहा जाता है कि शैखुल हदीस ने अपने उस्ताद से ज़्यादा वक़्त लगा कर इस किताब को पायए तकमील तक पहुंचाया। यह किताब अरबी ज़बान में है और इसकी तक़रीबन 20 जिल्दें हैं।
― अलकौकबुद दरी अला जामिउत तिर्मिज़ी यह मजमूआ दरअसल शैख रशीद अहमद गंगोही का उर्दू ज़बान में दर्से तिर्मिज़ी शरीफ है जो शैखुल हदीस ने अरबी ज़बान में तरजुमा करके अपने तालीक़ात के साथ मुरत्तब किया है। यह किताब अरबी ज़बान में है और उसकी 4 जिल्दें हैं।
― ज़ुजउ हज्जतिल विदा व उमरातुन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस किताब में शैखुल हदीस ने हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के हज और उमरह से मुतअल्लिक़ तफसील ज़िक्र फरमाई है। हज और उमरह के मुख्तलिफ मसाइल और मराहिल, नीज़ उन जगहों के मौजूदा नाम जहां हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने क़याम फरमाया था या जहां से गुजरे थे ज़िक्र किया है। यह किताब अरबी ज़बान में है।
― खसाइले नबवी शरह शमाइले तिर्मिज़ी इमाम तिर्मिज़ी की मशहूर तालिफ “अश शमाइलुल मोहम्मदिया” का तफसीली जायज़ा उर्दू ज़बान में तहरीर किया है। इस किताब का अंग्रेजी तरजुमा भी शाये हो चुका है।

शैखुल हदीस की चंद दूसरी अरबी किताबें
―वुजूब एफाउल लेहया
― उसूलुल हदीस अला मज़हबिल हनफीया
―औलियातुल क़यामह
―तबवीब अहकामिल क़ुरान लिल जस्सास
―तबवीब तावील मुख्तलिफिल अहादीस लिइब्ने क़ुतैबा
―तबविब मुश्किलिल आसार लित तहावी
―तक़रीरुल मिशकात मअ तालिकातिह
― तकरीरुन नसई
― तलखीसुल बज़ल
― जामेउर रिवायात वल अज्ज़ा
― जुज़उ इख्तिलाफिस सलात
― जुज़उल आमालि बिन नियात
― जुज़उ अफज़लिल आमाल
― जुज़उ उमरउल मदीना
― जुज़उ इंकहतिही
― जुज़उ तखरीज हदीसि आइशा फी किस्सति बरीरा
― जुज़उल जिहाद
― जुज़उ रफइल यदैन
― जुज़उ तुरुक़िल मदीना
― जुज़उल मुबहमात फिल असानीद वर रिवायात
― जुज़उ मा क़ालल मुहद्दिसून फिल इमामिल आज़म
― जुज़उ मुकफ्फिरातिज़ ज़ुनूब
― जुज़उ मुलतक़तिल मिरक़ात
― जुज़उ मुलतक़तिर रुवात अनिल मिरक़ात
― हवाशी अलल हिदाया
― शरह सुल्लमुल उलूम
― अलवकाये वद दुहूर (तीन जिल्दें, पहली जिल्द नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सीरत के मुतअल्लिक़, दूसरी जिल्द खुलफाए राशिदीन के मुतअल्लिक़ और तीसरी जिल्द दूसरे हुकमरानों के मुतअल्लिक़)

शैखुल हदीस की चंद उर्दू किताबें
― अल एतेदाल फी मरातिबिर रिजाल
― आपी बीती (7 जिल्दें)
― असबाब इख्तिलाफिल अइम्मा
― अत्तारीखुल कबीर
― सीरते सिद्दीक़
― निज़ामे मज़ाहिरुल उलूम (दस्तूर)
― तारीख मज़ाहिरुल उलूम
― शरहुल अल्फिया (तीन जिल्दें)
― अकाबिर का तक़वा
― अकाबिर का रमज़ान
― अकाबिर उलमाए देवबन्द
― मौत की याद
― फज़ाइले ज़बाने अरबी
― फज़ाइले तिजारत
― फज़ाइले आमाल (फज़ाइल पर मुशतमिल 9 किताबों का मजमूआ)
― शरीअत व तरीक़त का तलाज़ुम (इसका अरबी ज़बान में तरजुमा मिस्र से शाये हो चुका है)
चंद सतरें शैखुल हदीस मौलाना मोहम्मद ज़करिया की शख्सियत के मुतअल्लिक़ तहरीर की हैं, अल्लाह तआला क़बूल फरमाए। तफसीलात के लिए दूसरी किताबों के साथ मौलाना सैयद अबुल हसन अली नदवी की किताब (तज़केरा शैखुल हदीस मौलाना मोहम्मद ज़करिया) का मुतालआ फरमाएं। मेरे हर हर लफ्ज़ से आपका मुत्तफिक़ होना कोई ज़रूरी नहीं है अलबत्ता फज़ाइले आमाल को सामने रख कर शैखुल हदीस की शख्सीयत पर कुछ कहने या लिखने से पहले उनकी दूसरी तसानीफ खास कर 18 जिल्दों पर मुशतमिल मशहूर व मारूफ अरबी ज़बान में तहरीर करदा किताब “औजज़ुल मसालिक इला मुअत्ता इमाम मालिक” का मुतालआ कर लें। अरबी से वाक़फियत न होने की सूरत में दुनिया के किसी भी हिस्से के मारूफ आलिम खास कर उलमा से इस किताब के मुतअल्लिक़ मालूमात हासिल कर लें।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)