Print

بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

शैखुल हदीस व मुजाहिदे आज़ादी मौलाना मोहम्मद इसमाईल संभली

अपने हक़ीक़ी दादा शैखुल हदीस व मुजाहिदे आज़ादी हज़रत मौलाना मोहम्मद इसमाईल संभली की ज़िन्दगी के मुख्तसर अहवाल लिख रहा हूं।
1899 में शहर संभल के मोहल्ला दीपा सराय में तुर्क बिरादरी के सरवर वाले खानदान में पैदा हुए।
इब्तिदाई तालीम संभल और भावलपुर में हुई।
1919 में जब जलियान वाला बाग का इंसानियत सोज़ वाक़्या पेश आया तो मौलाना ने निहायत जोश व वल्वला खेज़ तक़रीर की, इसी तक़रीर से उनकी सियासी व समाजी ज़िन्दगी का आगाज़ हुआ। इस मौक़े पर आपको रईसुल मुक़र्रिरीन का खिताब दिया गया।
1920 में दारुल उलूम देवबन्द में तालीम हासिल करने के लिए दाखिला लिया।
1921 में तालिब इल्मी के ज़माने में ही अंग्रेजों के खिलाफ पुरजोश तक़ारीर के जुर्म में गिरफ्तार किया गया, दो साल कैद बामशक़्क़त का हुकुम सुनाया गया।
दो साल की कैद बामशक़्क़त से रिहाई के बाद संभल ही में रह कर अपनी अधूरी तालीम की तरफ तवज्जोह दी।
1922 में दोबारा दारुल उलूम जाकर मौलाना अनवर शाह कश्मीरी, मौलाना शब्बीर अहमद उसमानी और दूसरे असातज़ए किराम की सोहबत में रह कर तालीम मुकम्मल की।
1924 क आखिर में दारुल उलूम देवबन्द से फरागत के बाद मदरसा शाही मुरादाबाद में मुदर्रिस हो गए।
1930 में जमीअत उलमाए हिन्द के सातवें डिक्टेटर की हैसियत से अंग्रेजों ने गिरफ्तार किया, छः महीने की कैद क़ैद बामशक़्क़त की सज़ा मिली।
1934 के एलक्शन में संभल के मशहूर व मारूफ नवाब आशिक़ हुसैन के मुक़ाबले में फतह हासिल की।
1942 जब कांग्रेस ने हिन्दुस्तान छोड़ो का नारा दिया तो हिन्दुस्तान के दूसरे सियासी रहनुमाओं के साथ मौलाना को संभल से गिरफ्तार किया गया, तक़रीबन एक साल बाद रिहाई हुई। गरज़ मौलाना ने हिन्दुस्तान की आज़ादी के लिए तक़रीबन चार साल जेल में गुज़ारे।
1946 में एम॰एल॰ए॰ के एलेकशन में दोबारा फतह हासिल की और 1952 तक एम॰एल॰एल॰ रहे।
1946 में अपनी सियासी मसरूफियात की वजह से मदरसा शाही मुरादाबाद की दर्स व तदरीस की खिदमात से सुबुकदोशी हासिल कर ली।
1952 से 1957 तक जमीअत उलमाए हिन्द के नाज़िमे आला रहे।
1957 से 1962 तक मदरसा चिल्ला अमरोहा में शैखुल हदीस की हैसियत से खिदमात अंजाम दीं।
1962 से 1965 तक मदरसा इमदादिया मुरादाबाद में बुखारी शरीफ का दर्स दिया।
1965 से 1973 तक मदरसा तालीमुल इस्लाम गुजरात में शैखुल हदीस के मंसब पर फायज़ रहकर बुखारी व मुस्लिम का दर्स दिया।
1973 से 1974 तक बनारस दारुल उलूम में शैखुल हदीस रहे और दर्से बुखारी दिया, गरज़ आपने 17 साल तक बुखारी पढ़ाई।
1974 में मुलाज़मत का इरादा तर्क करके संभल तशरीफ ले आए और तसनीफी काम में मसरूफ हो गए, आपकी तसनीफात में “अखबारुत तंज़ील” यानी क़ुरान की पेशीन गोइयां, “तक़लीदे अइम्मह” और “मक़ामाते तसव्वुफ” क़ाबिले ज़िक्र हैं।
मवाना मेरठ के बाशिन्दों के बेहद इसरार पर वहां आठ माह क़याम फरमा कर दर्से क़ुरान दिया।
आखिरी उम्र में कई साल रमज़ानुल मुबारक मुंबई में गुज़ारे और तरावीह के बाद क़ुरान करीम की तफसीर बयान फरमाई।
23 नवम्बर 1975 बरोज़ इतवार को संभल में वफात हुई।

मुजाहिदे आज़ादी मौलाना मोहम्मद इसमाईल संभली

संभल, मुरादाबाद ज़िला का एक तारीखी शहर है जो अपनी तालीमी और सक़ाफती रिवायात की बिना पर तारीखी रियासत रूहेलखंड में एक खास मक़ाम रखता है। शैख हातिम जैसी अज़ीम शख्सीयत ने वहां इल्म की रौशनी की और मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनी, अबुल फज़्ल और दारुल उलूम देवबन्द के मशहूर उस्ताज़ अल्लामा मोहम्मद हुसैन बिहारी साहब जैसी मायए नाज़ हस्तियों ने हुसूले इल्म के गरज़ से वहां के लिए रख्ते सफर बांधा।
संभल की तारीख में अंग्रेज़ हुकूमत के खिलाफ अलमे बगावत बुलंद करने वालों की एक तवील फेहरिस्त मौजूद है। मौलाना इसमाईल संभली के छोटे भाई मौलाना अब्दुल क़य्यूम, लाला प्रेम पाल, क़ारी अब्दुल हक़, मौलाना मक़सूद तुर्की, चौधरी रियासत अली, लाला चंदूलाल, लाला रूप किशोर, मौलवी नूरुल हसन, शैख अब्दुर रहीम, चेतन स्वरूप, राधे लाल पोद्दार, मुंशी मुईनुद्दीन, मौलवी सुल्तान अहमद, मौलवी अब्दुल वहीद, मौलाना मंसूर अंसारी और मौलाना इसमाईल संभली का नाम उनमें सरे फहरिस्त है।
मौलाना का तअल्लुक़ यूपी में ज़िला मुरादाबाद के मशहूर व मारूफ शहर संभल से था। उनकी सही तारीखे पैदाइश का इल्म तो किसी को नहीं है, एक अंदाज़े के मुताबिक़ वह 1899 में मोहल्ला दीपा सराय में पैदा हुए और तुर्क बिरादरी के सरवर वाले खानदान से तअल्लुक़ रखते थे। आपके वालिद मुंशी किफायतुल्लाह का शुमार इलाक़े के तालीम याफ्ता हज़रात में होता था और वह अपनी कुन्नियत मुंशी जी से मशहूर थे। आपके दादा का नाम सरवर हुसैन था जो अमरोहा में मुंढ़ा गाँव के रहने वाले थे और बाद में संभल मुंतक़िल हो गए। यही आपके खानदान के नाम (सरवर वाले खानदान) की वजहे तसमिया थी। आप मदरसा दारुल उलूम अल मोहम्मदिया संभल में इब्तिदाई तालीम हासिल कर ही रहे थे कि वालिदे मोहतरम का साया सर से उठ गया और आपको आपके बड़े भाई के यहां भावलपुर पहुंचा दिया गया जहां आपने शैखुल हिन्द मौलाना महमूदुल हसन के खलीफा और मौलाना मंसूर अंसारी के रिशतेदार जामिया उसमानिया के सदर व शैखुल हदीस मौलाना फारूक़ अहमद से तालीम हासिल की। भावलपुर में तालीम पूरी करने के बाद आप अपने मादरे वतन संभल तशरीफ लाए और मदरसा सिराजुल उलूम में अपना तालीमी सिलसिला जारी रखा। इसी दौरान जलियान वाला बाग का वह अज़ीम वाक़्या पेश आया जिसने पूरे हिन्दुस्तान में एक आग लगा दी, चुनांचे संभल के गुलछतर बाग में एक बहुत बड़ा इजतिमा हुआ जिसमें मौलाना इसमाईल संभली ने एक इंतिहाई दिल अंगेज़ और वलवला खेज़ तक़रीर की और इस तक़रीर ने अवाम को बहुत ज़्यादा मुतअस्सिर किया। यहीं से उनकी समाजी और सियासी ज़िन्दगी शुरू शुरू हुई और उनको रईसुल मुक़र्रिरीन का खिताब दिया गया।
बरतानिया के ज़रिये तुर्की के शिकस्त खाने के बाद मुलसमान बहुत ज़्यादा मुतअस्सिर, हुए चुनांचे 22 नवम्बर 1919 को खिलाफत कमेटी की बुनियाद रखी गई और दिल्ली में जमीअत उलमाए हिन्द का क़याम अमल में आया। पूरे मुल्क में खिलाफत की तहरीक चलाई गई। मौलाना महमूदुल हसन की वफात के चंद माह बाद मौलाना इसमाईल संभली ने दारुल उलूम देवबन्द में दाखिला लिया जहां उनके ख्यालात में मज़ीद पुख्तगी पैदा हुई और पूरे जोश व खरोश के साथ क़ौमी व मिल्ली मसाइल में हिस्सा लेना शुरू कर दिया, चुनांचे ज़मानए तालिब इल्मी में ही 22 फरवरी 1921 को उनकी शोलाबार तक़रीरों की वजह से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और दो तीन दिन बाद उनके केस को मुरादाबाद जेल में मुंतक़िल कर उन्हें दो साल की क़ैद बामशक़्क़त की सख्त सज़ा सुनाई गई। फिर तमाम सियासी लोगों को सख्त से सख्त सूरते हाल का सामना करना पड़ा। मौलाना और उनके साथियों को हर तरह के पुरतशद्दुद वाक़्यात बर्दाश्त करने पड़े, गुलामी की ज़िन्दगी गुज़ारनी पड़ी, जेल भेजे गए, उनको खामोश करने की हद दरजा कोशिशें की गईं गोया हर तरह से उन्हें तख्तए मश्क़ बनाया गया, इसके बावजूद उन्होंने घुटने नहीं टेके। बिलआखिर जेल की मुद्दत पूरी होने के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया और fघर वापस आने के बाद अपनी पूरी तवज्जोह तालीम मुकम्मल करने पर मरकूज़ कर दी और मदरसतुश शरअ कटरा मूसा खान में दाखिला लिया जहां मौलाना अब्दुल मजीद, मौलाना करीम बख्श और मौलाना मोहम्मद इब्राहीम से शरीअत के मुख्तलिफ उलूम व फुनून में महारत हासिल की। उसके बाद अल्लामा अनवर शाह कशमीरी, मौलाना शब्बीर अहमद उसमानी और दूसरे असातिज़ए किराम से कस्बे फैज़ के लिए एक फिर देवबन्द का सफर किया। दारुल उलूम देवबन्द से फरागत के बाद 1924 में मदरसा क़ासमीया शाही मुरादाबाद में बहैसियत मुदर्रिस उनका तकर्रुर कर लिया गया। 1930 में मुल्क में एक अज़ीम तब्दीली रोनुमा हुई और कांग्रेस ने मुकम्मल आज़ादी का एलान कर दिया, चुनांचे 26 जनवरी 1930 को पूरे मुल्क में यौमे आज़ादी का जशन मनाया गया। 13 मार्च 1930 को महातमा गांधी ने अपनी तहरीक नमक सत्याग्रह की एक पामाली के खिलाफ डांडी मार्च तहरीक शुरू की और सिविल नाफरमानी तहरीक भी चलाई गई। इससे नाराज़ हो कर अंग्रेज हुकूमत ने लोगों पर तरह तरह के ज़ुल्म व सितम ढाने शुरू कर दिए। उनको इंतिहाई बेरहमी के साथ मारा गया, गोलियों का निशाना बनाया गया और जेल भेजे गए। जमीअत उलमाए हिन्द ने वक़्त की ज़रूरत को महसूस किया और सिविल नाफरमानी तहरीक में कांग्रेस की मदद के लिए पुख्ता इरादा कर लिया। चुनांचे मुफ्ती किफायतुल्लाह, मौलाना अहमद सईद, शैखुल इस्लाम मौलाना हुसैन अहमद मदनी और मौलाना मुबारक हुसैन संभली को जमीअत उलमाए हिन्द के डिक्टेटर के तौर पर यके बाद दीगरे जेल भेज दिया गया। इस सज़ा में मौलाना इसमाईल संभली का सातवां नम्बर था, चुनांचे 6 महीने के लिए वह भी क़ैद कर दिए गए। इब्तिदा में उनको दिल्ली के बी॰ क्लास जेल में रखा गया लेकिन बाद में मुल्तान जेल भेज दिया गया और सज़ा की मुद्दत पूरी होने के बाद रिहा किया गया।
1932 में करकज़ी काबिना के इंतिखाब के एलान के बाद राजा सलीमपुर की सदारत में एक मुस्लिम इत्तेहाद बोर्ड बनाया गया और उसको यूनाइटेड, सेन्टरालिक, बिहार और मद्रास जैसे सूबों में एलेक्शन कराने की ज़िम्मेदारी दी गई। शाहजहांपुर और बिजनौर में सर याकूब और मिस्टर करीमुर रज़ा खान जो बोर्ड के मिम्बर थे के दरमियान ज़बरदस्त मुक़ाबला आराई हुई। मुरादाबाद बोर्ड के इंचार्ज मौलाना इसमाईल संभली थे, उन्होंने पूरी दिलजमई के साथ इसमें हिस्सा लिया और बोर्ड के उम्मीदवार एलेकशन में कामयाब हुए। यह कहना मुबालगा न होगा कि यह कामयाबी बिला शुबहा जमीअत उलमाए हिन्द और मौलाना इसमाईल संभली की कोशिशों का ही नतीजा था। इसी तरह जब सूबाई एलेक़्शन का वक़्त आया तो मुस्लिम लीग पारलिमिंटरी बोर्ड वजूद में लाया गया। जमीअत उलमाए हिन्द के नाज़िमे आला मौलाना अहमद सईद की तरफ से मोहम्मद अली जिनाह को बोर्ड के मिम्बरान के इंतिखाब की ज़िम्मेदारी दी गई। मिस्टर जिनाह ने 56 में से 22 का इंतिखाब किया जिनमें से 20 जमीअत उलमाए हिन्द के और 2 अहरार के मिम्बरान थे। मौलाना इसमाईल संभली को यूपी बोर्ड का मिम्बर बनाया गया। नीज़ वह तहसील बिलारी और मुरादाबाद के संभल इलाक़े से उम्मीदवार चुने गए। इन दिनों ज़मीनदार, नवाब, राजा और इंगलिश का लेबल लगाने वाले लोग खूब लुत्फ अंदोज़ हुए, क्योंकि अंग्रेज हुकूमत से मदद याफ्ता लोगों का शुमार समाज के मुअज़्ज़ज़ लोगों में होता था, लेकिन जिन लोगों का सीना क़ौम की खिदमत से लबरेज़ था उन्होंने अंग्रेज मुआविन मिम्बर को शिकस्त देने के लिए हर मुमकिन कोशिश की। संभल की मशहूर व मारूफ शख्सियत नवाब आशिक़ हुसैन खान को मौलाना इसमाईल संभली के खिलाफ टिकट दिया गया। संभल बोर्ड के 20 साल तक चेयरमैन होने और तक़रीबन इसी मुद्दत तक वहां के खुसूसी मजिस्ट्रेट होने की हैसियत से नवाब आशिक हुसैन खान लोगों में काफी मक़बूल थे और हुकूमत को सालाना दस हज़ार रूपये टैक्स भी दिया करते थे। इसके बावजूद वह एलेक्शन में कामयाब नहीं हुए और मौलाना इसमाईल संभली फतह से हमकिनार हुए। बिला शुबहा उनकी फतह एक तारीखी फतह थी जिससे क़ौम को और ज़्यादा तक़वीयत मिली। दूसरे मक़ामात पर भी मुस्लिम लीग के मिम्बरान को फतह हासिल हुई लेकिन एलेकशन के बाद मिस्टर अली जिनाह हुकूमत की पार्टी के मिम्बरान को भी जो कांग्रेस के खिलाफ थे उसमें शामिल करने की कोशिश करने लगे और दूसरे मिम्बरान की मुखालफत को नज़र अंदाज करते हुए लखनऊ की एक मिटिंग में उनको भी शामिल कर दिया। मिस्टर ज़हीरुद्दीन फारूक़ी और दूसरे लोगों ने एतेराज़ करते हुए कहा कि हमें इस हक़ीक़त को नहीं भूलना चाहिए कि जमीअत उलमाए हिन्द ने मुस्लिम लीग की मदद की है और यह कांग्रेस के लिए नर्म भी है, लेकिन मिस्टर जिनाह ने यह कह कर उनको खामोश कर दिया कि यह लोग बोर्ड में शामिल कर दिए गए हैं और अब जमीअत उलमाए हिन्द या अहरार को उसूल के खिलाफ जाने का कोई हक़ नहीं है। यह अल्फाज़ सुनकर मौलाना इसमाईल संभली अपनी नशिस्त से उठ गए और पूरी खुद एतेमादी के साथ कहा कि हमने एलेक्शन के मक़सद के पेशे नज़र आपका साथ दिया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हमने अपने नज़रियात और उसूल से समझौता कर लिया है, अपना हल तलाश करने का खुद हमें हक़ है। (उनकी यह पूरी तक़रीर मौलाना हुसैन अहमद मदनी की किताब में मौजूद है) चुनांचे मौलाना इसमाईल संभली और जमीअत उलमाए हिन्द के हामी उनके साथियों ने कांग्रेस का इख्तियार कर लिया।
1939 में जब यूरोप में जंग शुरू हुई और हुकूमते हिन्द ने मिम्बरान का एतेमाद हासिल किए बेगैर हिन्दुस्तानी फौज यूरोप भेज दी तो कांग्रेस ने इस इक़दाम की सख्त मुखालफत की और असम्बली का बाइकाट कर रामगढ़ में 20 से 21 मार्च 1940 में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की सदारत में एक प्रोग्राम मुंअक़िद किया और इसमें सिविल नाफरमानी तहरीक का एलान कर दिया और 1940 में अदमे तशद्दुद सिविल नाफरमानी तहरीक शुरू की गई। 1942 में मौलाना इसमाईल संभली को मुरादाबाद में गिरफ्तार कर 9 महीने के लिए जेल भेज दिया गया। फिर अगस्त 1942 में कांग्रेस ने हिन्दुस्तान छोड़ो का नारा बुलंद किया जिसकी वजह से महातमा गांधी को गिरफ्तार कर साबरमती जेल भेज दिया गया और पूरे मुल्क में गिरफ्तारी का सिलसिला जारी हो गया, चुनांचे मौलाना इसमाईल संभली को एक बार फिर गिरफ्तार कर गैर मुतअय्यना मुद्दत के लिए मुरादाबाद जेल भेज दिया गया और एक साल बाद रिहा किए गए।
1946 में एलक्शन के एलान के बाद कांग्रेस और मुस्लिम लीग के दरमियान रस्साकशी बिल्कुल आला पैमाना पर थी। मुस्लिम लीग के नारे के सामने कांग्रेस की हिमायत एक बहादुरी का काम था, चुनांचे मौलाना इसमाईल संभली मुस्लिम लीग के खिलाफ खड़े हो गए, इब्तिदा में अपने लोगों के धोके की वजह से उन्हें हार का सामना करना पड़ा लेकिन दूसरे एलेक्शन में मौलाना की तरफ से परचा दाखिल किए जाने के बाद बेगैर किसी मुक़ाबला आराई के कामयाबी उनके क़दमबोस हुई और 1952 तक वह एम॰एल॰ए॰ रहे। ज़ेहनी इंतिशार की वजह से 1946 में मदरसा शाही मुरादाबाद की मुदर्रिसी को भी खैराबाद कहना पड़ा, फिर 1952 तक जमीअत उलमाए हिन्द के नाज़िमे आला की हैसियत से दिल्ली में मुक़ीम रहे और चार साल तक इसी प्लेटफार्म से समाजी और सियासी खिदमात अंजाम देते रहे। 1957 में जमीअत उलमाए हिन्द से इस्तिफा देकर संभल पहुंचे और अपने शैख मौलाना हुसैन अहमद मदनी के हुकुम और मदरसा चिल्ला अमरोहा के मुंतज़िमीन की दरखास्त पर इसी मदरसे में शैखुल हदीस का ओहदा क़बूल फरमाया। 1962 में मदरसा इमदादिया मुरादाबाद में इन्हें शैखुल हदीस मुक़र्रर किया गया और तक़रीबन तीन साल तीन तक वहां हदीस की खिदमत अंजाम देते रहे। बाद में बार बार की दरखास्त पर उन्होंने मदरसा तालिमुल इस्लाम (आनन्द, गुजरात) का रुख किया और आठ साल तक वहां बहैसियत शैखुल हदीस क़याम पज़ीर रहे। इस तरह मुख्तलिफ इदारों में कम व बेश 16 साल तक आप शैखुल हदीस के ओहदे पर फायज़ रहे। 1974 में मुलाज़मत का खयाल तर्क करके वह संभल वापस आ गए और अपनी नामुकम्मल किताबों की तकमील में मशगूल हो गए। मक़ामाते तसव्वुफ, अखबारुत तंज़ील और तक़लीदे अइम्मा उनकी मशहूर व मारूफ किताबें हैं। इसी दौरान मवाना (मेरठ) के लोगों की दरख्वास्त पर वहां गए और आठ महीने क़याम फरमाया। मवाना में क़याम के दौरान उन्होंने आठ महीने तक दर्से क़ुरान दिया। इसी तरह क़ुरान की तफसीर बयान करने के लिए कई साल माहे रमज़ान मुंबई में गुज़ारा। अगरचे आखिरी रमज़ान में उन्हें हर इफतार के बाद इंजेकशन लेना पड़ता था, लेकिन दर्से क़ुरान का सिलसिला जारी रखा और पूरा रमज़ान इसी कैफियत में गुज़रा। इसी बीमारी की हालत में आप संभल वापस तशरीफ ले आए। वापसी के बाद हद दरजा कमज़ोरी की वजह से उन्हें मुरादाबाद के एक सरकारी अस्पताल में दाखिल कराया गया जहां हर मक्तबए फिक्र के लोग, सियासी और समाजी तंजीमें उनको देखने के लिए जूक दरजूक अस्पताल पहुंचने लगीं। डाक्टरों की मुख्तलिफ जमाअत उनकी निगरानी कर रही थी। सी॰एम॰ओ॰ और साबिक़ वज़ीर सेहत जनाब दोदियाल खन्ना भी अपने साथियों के साथ उन्हें देखने आए लेकिन दिन बदिन सेहत गिरती गई और एक वक़्त ऐसा आया कि वह मुकम्मल तौर पर बेहोश हो गए। एबुलेंस के ज़रिया संभल पहुंचाने के लिए उनको आक्सीजन और लाइफ सेविंग इंजेक्शन दिए गए। पूरे रास्ता मुकम्मल तौर पर बेहोशी तारी रही, अचानक उनका दाहिना हाथ आसमान की तरफ उठा और बुलंद आवाज के साथ कल्मा तैयिबा का विर्द ज़बान पर जारी हो गया। इसी कैफियत में घर पहुंचे और बिल आखिर डेढ़ महीने की तवील बीमारी के बाद 23 नवम्बर 1975 बरोज़ इतवार वक़्त डेढ़ बजे दोपहर इल्म व इरफान का यह आफताब हमेशा के लिए गुरूब हो गया। इंन्ना लिल्लाहि वइन्ना इलैहि राजेऊन।
आसमां तेरी लहद पर शबनम अफशानी करे।


मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)