بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

दारुल उलूम देवबन्द के मोहतमिम हज़रत मौलाना मरगूबुर्रहमान साहब

तक़रीबन 150 साल से उम्मते मुस्लिमा की दिलों की धड़कन बनकर दारुल उलूम देवबन्द तालिबाने उलूमे नबूवत को इल्म की दौलत के साथ अमले सालेह और अखलाक़े फाज़िला की पाकीज़ह तरबीयत देने में मसरूफ है। इसका असल सरमाया तवक्कुल अलल्लाह है, किसी हुकूमत की इमदाद या किसी मुस्तक़िल ज़रियए आमदनी के बेगैर महज़ अल्लाह तआला के फज़्ल व करम और आम मुसलमानों के अतियात से यह इदारा अपनी बेश बहा खिदमात की तरफ रवां दवां है।
इसी इदारे के हालिया मोहतमिम हज़रत मौलाना मरगूबुर्रहमान साहब शहर बिजनौर के एक अमीर घराने में तक़रीबन 100 साल पहले पैदा हुए। आपके वालिद हज़रत मौलाना मशीयतुल्लाह साहब बिजनौर के रईस जमींदार थे। वह दारुल उलूम देवबन्द की शुरा के मिम्बर भी थे। हज़रत मौलाना मरगूबुर्रहमान साहब ने दारुल उलूम देवबन्द से 1932 में फरागत हासिल की। आपने हज़रत मौलाना मुफ्ती सहूल साहब से इफता की तालीम हासिल की। फरागत के बाद अपने मोहल्ले की मस्जिद में तक़रीबन 25 साल इमामत के फरायज अंजाम दिए लेकिन इस खिदमत के लिए न सिर्फ यह कि उन्होंने कोई मुआवज़ा लिया बल्कि इस दौरान मस्जिद की मुख्तलिफ माली ज़रूरीयात खुद ही पूरी करते थे। 1962 में दारुल उलूम देवबन्द की मजलिसे शूरा के रुक्न चुने गए। इस ज़िम्मेदारी को निभाने के लिए जब भी कभी दारुल उलूम देवबन्द का सफर करते अपने तमाम अखराजात खुद ही बरदाशत करते, हत्ताकि अगर दारुल उलूम की कोई चाय भी पीते तो उसकी क़ीमत दारुल उलूम में जमा फरमाते। इजलासे सद साला के बाद 1982 में मुसाइद मोहतमिम मुक़र्रर हुए। 1982 में मोहतमिम बने और जब से वफात तक (एक मुहर्रम 1432 हिजरी, 8 दिसम्बर 2010 इसवी) इस मंसब पर फायज़ रहे। 1982 के इंतिहाई नाज़ुक हालात में मौलाना ने दारुल उलूम देवबन्द के एहतिमाम और क़यादत की ज़िम्मेदारी संभाली। उन्होंने अपनी खुदाद लाहियतों और तदब्बुर से इस अज़ीम दरसगाह को मुनज़्ज़म रखने में मुसलसल 30 साल बेमिसाल खिदमात अंजाम दीं।
हज़रत मौलाना मरहूम ने अपने तीस साला एहतिमाम के दौरान कोई तंख्वाह नहीं ली बल्कि एक छोटा सा कमरा जो आपको रिहाइश के लिए दिया गया था उसका भी पाबन्दी के साथ किराया अदा करते थे। अपने मेहमानों की चाय वगैरह का मुकम्मल खर्चा अपनी जेब से अदा करते थे अगरचे वह दफ्तरी औक़ात में ही क्यों न आएं। मौलाना मरहूम ने अपनी जायदाद का एक हिस्सा फरोख्त करके दारुल उलूम पर खर्च किया। इसके अलावा अक्सर व बेशतर तआवुन करते रहते थे। हज़रत मौलाना मरहूम कभी भी अपनी राय पर इसरार नहीं करते थे। इंतिहाई सब्र व तहम्मुल के साथ सबको साथ लेने के जज़्बे से काम करते थे। तीस साल पहले एहतिमाम की ज़िम्मेदारी संभालने के वक़्त दारुल उलूम का सालाना बजट तक़रीबन पचास लाख रूपये था, अब चूंकि तलबा की तादाद में कई गुना इज़ाफा हुआ है नीज़ तामीरी कामों का सिलसिला बराबर जारी है, इसलिए अब सालाना बजट तक़रीबन 14 करोड़ रूपये है।
दारुल उलूम देवबन्द के तहफ्फुज़ और इसे एक अज़ीम मक़ाम पर पहुंचाने में जो किरदार हज़रत मौलाना मरहूम ने अदा किया वह इंतिहाई क़ाबिले क़दर है। हज़रत मौलाना मरहूम साहबे फज़्ल और साहबे तक़वा आलिमे दीन थे तवाज़ो व इंकिसारी के हामिल थे, शराफत और बुज़ुरगी के मुजस्सम पैकर थे। हमारी दुआ है कि अल्लाह तआला हज़रत मौलाना मरहूम की मगफिरत फरमाए, उनके दरजात बुलंद फरमाए और जन्नतुल फिरदौस में आला मक़ाम अता फरमाए। तमाम दीनी मदारिस खास कर दारुल उलूम देवबन्द की तमाम शुरूर व फितन से हिफाज़त फरमाए, आमीन, नीज़ मुंतसिबीन और बही ख्वाहाने दारुल उलूम से दुआए मगफिरत और ईसाल सवाब की दरखास्त है।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)