بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

शैख डाक्टर मोहम्मद मुस्तफा आज़मी क़ासमी दामत बरकातुहुम
और उनकी हदीस की खिदमात

अहादीस को अरबी में सबसे पहले कम्प्युटराइज़ करने वाली शख्सीयत जिसको हदीस की खिदमात पर 1980 में किंग फैसल आलमी एवार्ड मिला और जिसने मुस्तशरेक़ीन (खास कर Joseph Schacht, Ignac Goldziher और David Margoliouth) के क़ुरान व हदीस की तदवीन पर एतेराज़ात के मुदल्लल जवाबात में अंग्रेज व अरबी ज़बान में बहुत सी किताबें तसनीफ कीं जिसको असरे हाज़िर में शर्क़ व गर्ब में इल्मे हदीस की अहम व मुस्तनद शख्सियत तसलीम किया गया है।
आपकी पैदाइश 1930 के आस पास उत्तर प्रदेश के मरदुम खेज़ इलाक़ा मऊ (आजमगढ़) में हुई। बर्रे सगीर की मारूफ इल्मी दरसगाह दारुल उलूम देवबन्द से 1952 में फरागत हासिल की। अज़हरुल हिन्द दारुल उलूम देवबन्द से उलूमे नबूवत में फज़ीलत की डिग्री हासिल करने के बाद दुनिया के मारूफ इस्लामी इदारा जामिया अजहर मिस्र से 1955 में “शहादतुल आलमिया मअल इजाज़ह बित्तदरीस” (एम॰ए॰) की डिग्री हासिल की और वतने अज़ीज़ वापस आ गए। 1955 में मुलाज़मत के गरज़ से क़तर चले गए और वहां कुछ दिनों गैर अरबीदां हज़रात को अरबी ज़बान की तालीम दी, फिर क़तर की पब्लिक लाइब्रेरी में लाइब्रेरियन की हैसियत से फरायज अंजाम दिए। इस दौरान आपने अपने इल्मी जौक़ व शौक़ की बुनियाद पर बहुत से क़ीमती मखतूतात पर भी काम किया।
1964 में क़तर से लंदन चले गए और 1966 में दुनिया की मारूफ यूनिवर्सिटी Cambridge London से जनाब A.J. Arberry और जनाब Prof. R.B. Serjeant की सरपरस्ती में Studies in Early Hadih Literaure के मौज़ू पर Ph.D की। मजकूरा मौज़ू पर अंग्रेजी ज़बान में Thesis पेश फरमा कर Cambridge University से डाक्टरेट की डिग्री से सरफराज़ होने के बाद आप दोबारा क़तर तशरीफ ले गए और वहां क़तर पब्लिक लाइब्रेरी मज़ीद दो साल यानी 1968 तक काम किया।
1968 से 1973 तक जामिया उम्मुल क़ुरा मक्का में मुसाइद प्रोफेसर की हैसियत से ज़िम्मेदारी बखूबी अंजाम दी।
1973 से रिटायरमेंट यानी 1991 तक किंग सऊद यूनिवर्सिटी में मुस्तलहातुल हदीस के प्रोफेसर की हैसियत से इल्मे हदीस की ग्रांक़दर खिदमात अंजाम दीं।
1968 से 1991 तक मक्का और रियाज़ में आपकी सरपरस्ती में बेशुमार हज़रात ने हदीस के मुख्तलिफ पहलुओं पर रिसर्च की। इस दौरान आप सउदी अरब की बहुत सी यूनिवर्सिटियों में इल्मे हदीस के मुमतहिन की हैसियत से मुतअय्यन किए गए, नीज़ मुख्तलिफ तालीमी व तहक़ीक़ी इदारों के मिम्बर भी रहे।

हदीस की अज़ीम खिदमात पर 1980 में किंग फैसल आलमी अवार्ड
1980 में दर्ज ज़ैल खिदमात के पेशे नज़र आपको किंग फैसल आलमी अवार्ड से सरफराज़ किया गया।
1) आपकी किताब “दिरासत फिल हदीसिन नबवी व तारीखि तदविनिह” जो कि अंग्रेजी ज़बान में तहरीर करदा आपकी Thesis का बाज़ इजाफात के साथ अरबी में तरजुमा है, जिसका पहला एडीशन किंग सउदी यूनिवर्सिटी ने 1975 में शाये किया था। इस किताब में आपने मज़बूत दलाइल के साथ अहादीसे नबविया का दिफा करके तदवीने हदीस के मुतअल्लिक़ मुस्तशरेक़ीन के एतेराज़ात के भरपूर जवाबात दिए हैं।
2) सही इब्ने खुज़ैमा जो कि सही बुखारी व सही मुस्लिम के अलावा अहादीसे सहीहा पर मुशतमिल एक अहम किताब है, असरे हाज़िर में चार जिल्दों में इसकी इशाअत आपकी तखरीज व तहक़ीक़ के बाद ही दोबारा मुमकिन हो सकी। इसके लिए आपने मुख्तलिफ मुल्कों के सफर किए।
3) अहादीसे नबविया को अरबी ज़बान में सबसे पहले कम्प्युटराइज़ करके आपने हदीस की वह अज़ीम खिदमत की है कि आने वाली नसलें आपकी इस अहम खिदमत से फायदा हासिल करती रहेंगी। इंशाअल्लाह यह अमल आपके लिए सदक़ए जारिया बनेगा।
इस तरह डाक्टर मोहम्मद मुस्तफा आज़मी क़ासमी दुनिया में पहले शख्स हैं जिन्होंने अहादीस की अरबी इबारतों को कम्प्युटराइज़ किया। गरज़ ये कि मुंतसेबीन मक्तबे फिक्रे देवबन्द को फख्र हासिल है कि जिस तरह अहादीस को पढ़ने व पढ़ाने, हदीस की कताबों की शरह तहरीर करने और हुज्जियते हदीस और उसके दिफा में सबसे ज़्यादा काम उनके उलमा ने किया है, इसी तरह अहादीसे नबविया को कम्प्युटराइज़ करने वाला पहला शख्स भी फाज़िले दारुल उलूम देवबन्द ही है जिसने क़ुरान व हदीस की तालीम व तअल्लुम से कामयाबी के वह मनाज़िल तैय किए जो आम तौर पर लोगों कम मुयस्सर होते हैं। या अल्लाह! मौसूफ को मज़ीद इल्मे नाफे अता फरमा और आखिरत में भी इमतियाज़ी कामयाबी अता फरमा, आमीन।
डाक्टर मोहम्मद मुस्तफा आज़मी क़ासमी साहब ने हदीस की किताबों की तखरीज व तहक़ीक़, उनपर तालिक़ात, अपनी निगरानी में उनकी इशाअत और क़ुरान व हदीस की तदवीन के मुतअल्लिक़ मुस्तशरेक़ीन के एतेराज़ात के मुदल्लल जवाबात अंग्रेजी व अरबी में पेश करके दीने इस्लाम की ऐसी अज़ीम खिदमत पेश की है कि उनकी शख्सीयत सिर्फ हिन्दुस्तान या सउदी अरब तक महदूद नहीं है बल्कि दुनिया के कोने कोने से उनकी खिदमात को सराहा गया है, हत्ताकि इस्लाम मुखालिफ कुव्वतों ने भी आपकी इल्मी हैसियत को तसलीम किया है। गरज़ ये कि असरे हाज़िर में शैखुल हदीस मौलाना अनवर शाह कश्मीरी के शागिर्दे रशीद मुहद्दिसे कबीर शैख हबीबुर रहमान आज़मी के बाद शैख डाक्टर मोहम्मद मुस्तफा आज़मी क़ासमी साहब का नाम सरेफेहरिस्त है जिन्होंने बहुत सी हदीस की किताबों के मखतूतात पर काम करके अहादीस के ज़खीरे को उम्मते मुस्लिमा के हर खास व आम के पास पहुंचाने में अहम रोल अदा किया। शैख हबीबुर रहमान आज़मी ने भी तक़रीबन 11 अहादीस की किताबों की तखरीज के बाद उनकी इशाअत करवाई थी।
डाक्टर मोहम्मद मुस्तफा आज़मी ने सउदी नेशनलिटी हासिल होने के बावजूद अपने मुल्क, इलाक़ा और अपने इदारा से बराबर तअल्लुक़ रखा है, तक़रीबन हर साल ही अपने वतन का सफर करते रहे हैं, अपने इलाक़े के लोगों की फलाह व बबहूद के लिए बहुत से काम करवाते रहे हैं। डाक्टर आज़मी ने दारुल उलूम देवबन्द में दाखिले से पहले तक़रीबन छः महीने मदरसा शाही मुरादाबाद में तालीम हासिल की है, नीज़ आप तक़रीबन एक साल अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भी ज़ेरे तालीम रहे हैं। आपके तीन बच्चे हैं, बेटी फातिमा मुस्तफा आज़मी अमेरीका से M.Com और Ph.D करने के बाद शैख ज़ायद यूनिवर्सिटी में मुसाइद प्रोफेसर हैं। बड़े साहबज़ादे अक़ील मुस्तफा आज़मी अमेरीका से इंजीनियरिंग फिर मास्टर इन इंजीनियरिंग और पी॰एच॰डी॰ करने के बाद किंग सउद यूनिवर्सिटी में मुसाइद प्रोफेसर हैं, छोटे बेटे जनाब अनस मुस्तफा आज़मी ने UK से Ph.D की है और King Faisal Specialist Hospital में बरसरे रोज़गार हैं।
इसके अलावा किंग खालिद बिन अब्दुल अज़ीज़ ने आपकी अज़ीम खिदमात के पेशे नज़र 1982 में आपको Medal of Merit, First Class से सरफराज़ फरमाया।

Saudi Nationality
1981 में हदीस की गिरांक़दर खिदमात के पेशे नज़र आपको सउदी नेशनलिटी अता की गई।

दूसरी अहम जिम्मेदारियां
― Chairman of the Department of Islamic Studies, College of Education, King Saud University
― Visiting Scholar at the University of Michigan, Ann Arbor, Michigan (1981-1982)
― Visiting Fellow of St. Cross College, Oxford, England, during Hilary term (1987)
― Visiting Scholar at the University of Colorado, Boulder, Colorado, USA (1989-1991)
― King Faisal Visiting Professor of Islamic Studies at Princeton University, New Jersey (1992)
― Member of Committee for promotion, University of Malaysia
― Honorary Professor, Department of Islamic Studies, University of Wales, England

इल्मी खिदमात
आपकी इल्मी खिदमात का मुख्तसर तआरुफ पेशे खिदमत है
1) Studies in Early Hadith Literature: यह किताब दरअसल डाक्टर मुस्तफा आज़मी साहब की पी॰एच॰डी॰ की थेसिस है जो अंग्रेजी ज़बान में तहरीर की गई थी जिसका पहला एडीशन बैरूत से 1968 में शाये हुआ, दूसरा एडीशन 1978 और तीसरा एडीशन 1988 में अमेरीका से शाये हुआ और उसके बाद बहुत से एडीशन शाये हो चुके हैं और अलहम्दु लिल्लाह यह सिलसिला बराबर जारी है। इसका 1993 में तुर्की ज़बान में और 1994 में इन्डोनेशी और उर्दू ज़बान में तरजुमा शाये हो चुका है। मशरिक व मगरिब की बहुत सी यूनिवर्सिटियों में यह किताब निसाब में दाखिल है।
2) दिरासत फिल हदीसिन नबवी व तारीखि तदवीनिह - मौसूफ ने अंग्रेजी ज़बान में तहरीर करदा अपनी थेसिस में बाज़ इज़ाफात फरमा कर खुद अरबी ज़बान में तरजुमा किया है जो 712 पेजों पर मुशतमिल है जिसका पहला एडीशन किंग सउद यूनिवर्सिटी ने 1975 में शाये किया था। उसके बाद रियाज व बैरूत से बहुत से एडीशन शाये हो चुके हैं। इन दोनों मजकूरा अंग्रेजी व अरबी किताबों में मुस्तनद दलाइल से यह साबित किया गया है कि हदीस की तदवीन का आगाज़ हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़माने में ही हो गया था, नीज़ इस दावे को गलत साबित किया गया है कि तदवीन का आगाज़ दूसरी और तीसरी सदी हिजरी में हुआ था।
3) मनहजुन नक़्द इंदल मुहद्दिसीन नशअतुहु, तारीखुहु - इस किताब में मौसूफ ने दलाइल से साबित किया है कि मुहद्दिसीने कराम ने अहादीस के इल्मी ज़खीरे को सही क़रार देने के लिए जो उसलूब इख्तियार किया है उसकी कोई मिसाल यहां तक कि हमारे ज़माने में भी नहीं मिलती है। नीज़ इस किताब में तदवीने हदीस के इब्तिदाई दौर में मुहद्दिसीन के हक़ीक़ी तरीक़े कार पर रौशनी डाली गई है। यह किताब अरबी ज़बान में है और 234 पेजों पर मुशतमिल है। इस किताब का पहला एडीशन 1975 में रियाज़ से, दूसरा एडीशन 1982 में रियाज़ से और तीसरा एडीशन 1983 में रियाज़ से शाये हुए हैं, इसके बाद भी इस किताब के शाये होने का सिलसिला जारी है। यह किताब जामिया इस्लामिया मदीना के निसाब में दाखिल है। यह अपनी क़िस्म की पहली अहम किताब है।
4) किताबुत तमीज़ लिल इमाम मुस्लिम - इमाम मुस्लिम की असूले हदीस की मशहूर किताब “अत्तमीज़” आपकी तहक़ीक़ व तखरीज के बाद शाये हुई।
5) Studies in Hadith Methodology and Literature: इस किताब में हदीस के तरीक़े कार से बहस की गई है ताकि अहादीस को समझने में आसानी हो, नीज़ मुस्तशरेक़ीन ने जो शुबहात पैदा कर दिए थे उनका इज़ाला करने की एक बेहतरीन कोशिश है। मुसन्निफ ने इस किताब को दो हिस्सों में मुंक़सिम किया है, पहले हिस्से में अहादीस के तरीक़े कार से बहस की गई है जबकि दूसरे हिस्से में हदीस के अदबी पहलू को सिहाये सित्ता और दूसरी हदीस की किताबों की रौशनी में उजागर किया है। यह किताब अंग्रेजीदां असहाब के लिए उलूम व अदबे हदीस के मुतालआ का अहम ज़रिया है जो मुख्तलिफ यूनिवर्सिटियों के निसाब में दाखिल है। किताब का पहला और दूसरा एडीशन 1977 में अमेरीका से तीसरा एडीशन 1988 में अमेरीका से शाये हुआ, उसके बाद बहुत से एडीशन शाये हो चुके हैं।
6) The History of The Quranic Text from Revelation to Compilation: यह डाक्टर मोहम्मद मुस्तफा आज़मी क़ासमी की बेहतरीन तसानीफ में से एक है जिसमें क़ुरान करीम की तदवीन की तारीख मुस्तनद दलाइल के साथ ज़िक्र फरमाई है। दूसरी आसमानी किताबों की तदवीन से क़ुरान करीम की तदवीन का मुक़ारना फरमा कर क़ुरान करीम की तदवीन के महासिन व खूबियों का तज़किरा फरमाया है, नीज़ इस्लाम मुखालिफ कुव्वतों को दलाइल के साथ जवाबात तहरीर किए हैं। इस किताब में हज़रत ज़ैद बिन साबित रज़ियल्लाहु अन्हु के ज़रिये क़ुरान करीम का हतमी नुसखा तैयार करने के लिए तरीक़े कार पर भी मुफस्सल रौशनी डाली गई है। इस किताब का पहला एडीशन 2003 में इंग्लैंड से दूसरा एडीशन 2008 में दुबई से शाये हुआ। इसके बाद सउदी अरब, मलेशिया, कनाडा और कुवैत से बहुत से एडीशन शाये हो चुके हैं।
7) On Schacht’s of Muhammadan Jurisprudence: मशहूर व मारूफ मुस्तशरिक़ “शाख्त” की किताब का तंक़ीदी जायज़ा और फिकह इस्लामी के मुतअल्लिक़ उसके ज़रिया उठाए गए एतेराज़ात के मुदल्लल जवाबात पर मुशतमिल एक अहम तसनीफ है जो मुख्तलिफ यूनिवर्सिटियों के निसाब में दाखिल है। यह किताब 243 पेजों पर मुशतमिल है। इस किताब का पहला एडीशन 1985 में न्यू यार्क से दूसरा एडीशन 1996 में इंग्लैंड से शाये हुआ है। इसके बाद बहुत से एडीशन शाये हो चुके हैं और सिलसिला बराबर जारी है। यह किताब दुनिया की मुख्तलिफ यूनिवर्सिटियों के निसाब में दाखिल है। 1996 में इसका तुर्की ज़बान में तरजुमा शाये हुआ। अरबी ज़बान में तरजुमा और उर्दू में मुलख्खस तबाअत के मरहले में है।
8) उसूलल फिक़हिल मोहम्मदी लिल मुस्तशरिक़ शाख्त (दिरासत नक़दियह) - यह डाक्टर मोहम्मद मुस्तफा आज़मी साहब की अंग्रेजी ज़बान में तहरीर करदा किताब का अरबी तरजुमा है जो डाक्टर अब्दुल हकीम मतरूदी ने किया है जो अभी तक शाये नहीं हो सका है।
9) कुत्ताबुन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम - इस किताब में नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जानिब से लिखने वाले सहाबए किराम का तज़किरा है। मुअर्रेखीन ने उमूमन 40-45 कातेबीन नबी का ज़िक्र फरमाया है लेकिन डाक्टर आज़मी साहब ने 60 से ज़्यादा कातेबीन नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का ज़िक्र तारीखी दलाइल के साथ फरमाया है। इस किताब का पहला एडीशन 1974 में दिमश्क़ से और दूसरा एडीशन 1978 में बैरूत से और तीसरा एडीशन 1981 में रियाज़ से शाये हुआ है। इसके बाद इस किताब के बहुत से एडीशन शाये हो चुके हैं। इस किताब का अंग्रेजी तरजुमा जल्दी ही शाये हुआ है।
10) अलमुहद्दिसून मिनल यमामा इला 250 हिजरी तक़रीबन – इब्तिदाए इस्लाम से अब तक आलमे इस्लाम के तमाम शहरों के मुहद्दिसीन के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है, मगर मुसन्निफ ने अलयमामा के मुहद्दिसीन का तज़किरा इस किताब में किया है। इस किताब का पहला एडीशन 1994 में बैरूत से शाये हुआ है।
11) मुअत्ता इमाम मालिक - आपकी तखरीज व तहक़ीक़ के बाद इस अहम किताब की 8 जिल्दों में इशाअत हुई। यह हदीस की मशहूर व मारूफ किताब है जो इमाम मालिक ने तसनीफ फरमाई है। बुखारी व मुस्लिम की तहरीर से पहले यह किताब सबसे मोतबर किताब तसलीम की जाती थी। आज भी इसे अहम मक़ाम हासिल है। मुअस्ससह ज़ायद बिन सुल्तान आल नहयान अबू ज़हबी ने इसकी इशाअत की है। आप ने मुअत्ता मालिक के रावियों पर भी काम किया है जिनकी तादाद आपकी तहक़ीक़ के मुताबिक़ 105 है।
12) सही इब्ने खुज़ैमा - सही इब्ने खुज़ैमा जो हदीस की सही बुखारी व सही मुस्लिम के अलावा अहादीसे सहीहा पर मुशतमिल एक अहम किताब है, डाक्टर मोहम्मद आज़मी साहब ने ही हदीस की इस नायाब किताब को तलाश किया जिसके बारे में यह ख्याल था कि यह ज़ाये हो चुकी है, इस तरह हदीस की यह अहम किताब मौसूफ की तखरीज व तहक़ीक़ के बाद ही दोबारा शाये हो सकी। इसकी चार जिल्दें हैं, पहला एडीशन 1970 में बैरूत से दूसरा एडीशन 1982 में रियाज़ से और तीसरा एडीशन 1993 में बैरूत से और उसके बाद बेशुमार एडीशन मुख्तलिफ इदारों से शाये हुए और हो रहे हैं।
13) अलइलल लिअली बिन अब्दुल्लाह अलमदीनी - आपकी तहक़ीक़ व तालीक के बाद इसका पहला एडीशन 1972 में और दूसरा एडीशन 1974 में शाये हुआ। इसके बाद बहुत से एडीशन शाये हो चुके हैं।
14) सुनन इब्ने माजा - हदीस की इस अहम किताब की आपने तखरीज व तहक़ीक़ करने के बाद इसको कम्प्युटराइज़ करके चार जिल्दों में 1983 में रियाज़ से शाये कराया। अहादीस को कम्प्युटराइज़ करने का सिलसिला आपने किसी हद तक Cambridge University में Ph.D के दौरान शुरू कर दिया था।
15) सुनन कुबरा लिन नसई - आपने 1960 में इसके मखतूता को हासिल करके इसकी तखरीज व तहक़ीक़ के बाद इशाअत फरमाई।
16) मगाज़ी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम लिउरवा बिन ज़ुबैर बिरिवायति अबिल असवद - मशहूर व मारूफ ताबेई हज़रत उरवा बिन ज़ुबैर (विलादत 23 हिजरी) की सीरत पाक के मौज़ू पर तहरीर करदा सबसे पहली किताब (मगाज़ी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) डाक्टर मोहम्मद मुस्तफा आज़मी ने अपनी तखरीज व तहक़ीक़ और तंकीद के बाद शाये की। इस किताब का पहला एडीशन 1981 में शाये हुआ। यह किताब इस बात की अलामत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात के फौरन बाद सीरते नबवी पर लिखना शुरू हो गया था। इदारा सक़ाफते इस्लामिया, पाकिस्तान ने इस किताब का उर्दू तरजुमा करके 1987 में शाये किया है, इस किताब का अंग्रेजी ज़बान में तआरुफ तबाअत के मरहले में है, असल किताब (अरबी ज़बान में) का पहला एडीशन 1981 में रियाज़ से शाये हुआ है।
17) सही बुखारी का मखतूता - बहुत से उलमा के हवाशी के साथ 725 में तहरीर करदा सही बुखारी का मखतूता जो 1977 में इस्तम्बूल से हासिल किया गया, मौसूफ की तहक़ीक़ के बाद तबाअत के मरहले में है।
गरज़ ये कि डाक्टर मोहम्मद मुस्तफा आज़मी साहब ने हदीस की ऐसी अज़ीम खिदमात पेश फरमाई हैं कि उनकी हदीस की खिदमात का एतेराफ आलमे इस्लामी ही में नहीं बल्कि मुस्तशरेक़ीन ने भी आपकी सलाहियतों का एतेराफ किया है। मौसूफ की अक्सर किताबें इन्टरनेट पर FreeDownload के लिए मुहैया हैं।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)