بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

फुक़हा व मुहद्दिसीन की बस्ती शहर कूफा

हज़रत उमर फारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु के अहदे खिलाफत में मुल्के इराक़ फतह होने के बाद हज़रत साद बिन अबी वक़्क़ास रज़ियल्लाहु अन्हु ने हज़रत उमर फारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु की इजाज़त से 17 हिजरी में कूफा शहर बसाया, क़बाइले अरब में से फुसहा को आबाद किया गया। हज़रत उमर फारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहु अन्हु जैसे जलीलुल क़दर सहाबी को वहां भेजा ताकि वह क़ुरान व सुन्नत की रौशनी में लोगों की रहनुमाइ फरमाएं। सहाबए किराम के दरमियान हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहु अन्हु की इल्मी हैसियत मुसल्लम थी, खुद सहाबए किराम भी मसाइले शरइया में उनसे रुजू फरमाते थे। उनके मुतअल्लिक़ हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इरशादात हदीस की किताबों में मौजूद हैं।
इब्ने उम्मे अब्द (यानी अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहु अन्हु) के तरीक़ को लाज़िम पकड़ो। जो क़ुरान पाक को उस अंदाज में पढ़ना चाहे जैसा नाज़िल हुआ था तो उसको चाहिए कि इब्ने उम्मे अब्द (यानी अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहु अन्हु) की क़िरात के मुताबिक़ पढ़े। हज़रत उमर फारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहु अन्हु के बारे में फरमाया कि वह इल्म से भरा हुआ एक ज़र्फ़ है। हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहु अन्हु ने हज़रत उमर फारूक़ और हज़रत उस्मान गनी रज़ियल्लाहु अन्हुमा के अहदे खिलाफत में अहले कूफा को क़ुरान व सुन्नत की तालीम दी। हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु के अहदे खिलाफत में जब दारुल खिलाफत कूफा मुंतक़िल कर दिया गया तो कूफा इल्म का गहवारा बन गया। सहाबए किराम और ताबईन की एक जमाअत खास कर हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहु अन्हु और उनके शागिर्दों ने इस बस्ती को इल्म व अमल से भर दिया। सहाबए किराम के दरमियान फक़ीह की हैसियत रखने वाले हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहु अन्हु का इल्मी वरसा हज़रत इमाम अबू हनीफा के मशहूर उस्ताज़ शैख हम्माद और मशहूर ताबेईन शैख इब्राहीम नखई व शैख अल्क़मा के ज़रिये इमाम अबू हनीफा तक पहुंचा। शैख हम्माद सहाबिए रसूल हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु के भी सबसे क़रीब और मोतमद शागिर्द हैं। शैख हम्माद की सोहबत में इमाम अबू हनीफा 18 साल रहे और शैख हम्माद के इंतिकाल के बाद कूफा में उनकी मसनद पर इमाम अबू हनीफा को ही बैठाया गया। गरज़ ये कि इमाम अबू हनीफा हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहु अन्हु के इल्मी वरसा के वारिस बने, इसी लिए हज़रत इमाम अबू हनीफा हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहु अन्हु की रिवायात और उनके फैसले को तरजीह देते हैं, मसलन अहादीस की किताबों में वारिद हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहु अन्हु की रिवायात की बिना पर हज़रत इमाम अबू हनीफा ने नमाज़ में रुकू से पहले और बाद में रफे यदैन न करने को राजेह क़रार दिया है। हज़रत इमाम अबू हनीफा का इसमे गिरामी नोमान बिन साबित कुन्नियत अबू हनीफा है। हज़रत इमाम अबू हनीफा की विलादत 80 हिजरी में इसी शहर कूफा में हुई जिनकी बशारत हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी हयाते मुबारका में दी थी जैसा कि मुफस्सिरे क़ुरान शैख जलालुद्दीन सूयुती शाफइ मिस्री ने अपनी किताब “तबयीज़ुस सहीफा फी मनाक़िबल इमाम अबी हनीफा” में दलाइल के साथ ज़िक्र किया है।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)