बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन, वस्सलातु वस्सलामु अला नबिय्यिल करीम व अला अलिहि व अस्हाबिहि अजमईन

अंबिया--किराम की भूमि (ज़मीन) "सीरिया" में

क़यामत--सुग़रा का दृश्य (मनज़र)

14 अप्रैल को सीरिया के प्रदेश (राज्य) इद्लिब (Idlib) के खान शैख़ून (KhanShaykhun)क्षेत्र में जहरीली गैस पर शामिल बमबारी से हजारों लोगों का जीवन प्रभावित हुआ है, कई मासूम बच्चोंसमेत लगभग सौ लोग मौत की नींद सो गए और पांच सौ से अधिक (ज़्यादा) लोग ज़ख़्मी हो गए, निर्दयता(इंसानियत सौज़) इस घटना (हादसे) की जिम्मेदारी के लिए एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप (इलज़ाम तराशी) जारी है, लेकिन सिद्धांत रूप (उसूली तोर पर) में देश में कानूनों को लागू करने और देश में शांति और सुरक्षा की स्थापना (क़याम) की पूरी जिम्मेदारी सरकार पर आइद होती है, इस राज्य में सौ प्रतिशत बश्शारुल असद की सरकार है, तथा अल-शाईरात (Al-Shayrat) के जिस हवाई अड्डे से उड़ान भर कर जंगी जहाज़ों ने ज़हरीली गैस पर शामिल बमबारी की, वह बश्शारुल असद की सरकार के मुकम्मल (पूरे) कंट्रोल में है, जिस पर अमरीका ने 7 अप्रैल को बमबारी की, जो इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है, कुछ महीने पहले देश शाम देश (सीरिया) के प्रसिद्ध शहर ह़लब” (Aleppo) में हजारों मुसलमानों का गलत खून बहाया गया था, जो शहर ह़लब” (Aleppo) दुनिया का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र माना जाता था, आज वहाँ की पक्की इमारतें खंडहरों में तब्दील हो गईं, इसलिए यही कहा जाएगा कि सीरिया के आम लोगों पर किए जा रहे अत्याचार (ज़ुल्म) और बर्बारियत का असल जिम्मेदार बश्शारुल असद और उसकी सरकार है.

2011 से शुरू हुई इस लड़ाई में अब तक तीन लाख लोगों की हत्या कर दी गई, जबकि पांच लाख लोग घायल या गुमशुदा हैं, केवल दो करोड़ आबादी वाले इस देश के 70 लाख लोग बेघर हैं, यानी देश की आबादी का 35 प्रतिशत दरबदर ठोकरें खाता फिर रहा है, इनमें से पंद्रह लाख लेबनान में, दस लाख जॉर्डन में, पाँच लाख मिस्र और पाँच लाख तुर्की में शरणार्थियों (पनाह गुज़िनों) के लिए तैयार किए हुए शिविरों (केम्पों) में हैं, अच्छी खासी तादाद पश्चिमी देशों में भी है, कुछ लोग अपने पूर्वजों (आबा व अजदाद) के क्षेत्र को छोड़कर देश के अन्य क्षेत्र में रहते हैं, देश में तबाही के साथ अनगिनत आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक समस्याओं का सामना है, जिनकी इस्लाह़ के लिए जंग बंदी के बाद पचास साल से अधिक समय की आवश्यकता होगी, मध्यम वर्ग (दरमियानी तबक़े) से संबंध रखने वाले अनगिनत लोग आज एक वक्त की रोटी के लिए (पनाह गुज़िनों) के लिए तैयार किए हुए शिविरों (केम्पों) के अंदर लंबी पंक्ति में खड़े नजर आ रहे हैं, दूसरों के बच्चों के प्रायोजन (कफ़ालत) करने वाले आज अपने बच्चों के प्रायोजन (कफ़ालत) के लिए भीख माँग रहे हैं, जमींदार लोग एक चारपाई की जगह के लिए तरस रहे हैं, हजारों टन जैतून की खेती करने वाले किसान जैतून खाने के लिए दूसरों के मोह़ताज बन गए हैं, पिस्ता जैसे शक्तिशाली चीज़ उत्पादन करने वालों को आज पेट भर खाना न मिलने से कमजोरी की शिकायत है, जिन क्षेत्रों (इलाक़ों) से इस्लाम की सेवा करने वाले पैदा हुए, आज वहाँ के रहने वाले दूसरों के प्रशिक्षण स्थलों (तरबियत गाहों) में कीमती समय गुज़ार रहे हैं, जिसका परिणाम किसी से छिपा हुआ नहीं है, 80 प्रतिशत शिक्षित (तालीम याफ़्ता) वाले देश के लोग इन दिनों अपने बच्चों को बुनियादी शिक्षा देने के लिए दूसरों की दया (रह़म व करम) पर निर्भर (मुनहसिर) हो गए हैं, घूंघट (परदे) में रहने वाली अनगिनत महिलाएँ (औरतें) आज असुरक्षित स्थानों पर रात बिताने पर मजबूर हैं, यह बश्शारुल असद की विफल (नाकाम) सरकार के आम लोगों पर किए गए अत्याचार नहीं तो और क्या है? 2011 में तूनिस, मिस्र, लीबिया और सीरिया में मौजूद सरकारों के खिलाफ क्रांति (इंक़िलाब) आए, लेकिन तूनिस के राष्ट्रपति ज़ैनुल आबिदीन ने 24 वर्षीय सत्ता छोड़कर देश को तबाह होने से बचा लिया, मिस्र के राष्ट्रपति ह़ुस्नी मुबारक ने सार्वजनिक प्रदर्शनों (अवामी मुज़ाहरों) के बाद सेना की दख़ल अंदाज़ी पर 30 वर्षीय सत्ता तनाज़ुल लेकर देश को तबाह होने से बचा लिया, लीबिया के राष्ट्रपति मुअम्मर-अल-क़ज्ज़ाफ़ी के खिलाफ क्रांति आने पर उसका 42 वर्षीय लंबा दौर समाप्त हो गया मगर देश और विनाश (मज़ीद तबाही) से बच गया, तूनिस और मिस्र जैसी मिसाल पेश करके बश्शारुल असद सत्ता छोड़कर देश को तबाह होने से बचा सकते थे, मगर बश्शारुल असद ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर जनता पर बमबारी की, गोलियां बरसाईं, निर्दोष लोगों को मार डाला गया, उन्हें अपने देश को ख़ैर आबाद कहने (छोड़ने) पर मजबूर किया गया, जिसका नतीजा (परिणाम) हमारे सामने है कि इस वक़्त (समय) रूस की मदद से बश्शारुल असद की सरकारइंसानों पर नहीं बल्कि क्षतिग्रस्त (तबाह शुदा) इमारतों और खंडहरों पर है.
सीरिया में आम लोगों की हत्या (क़त्ले आम) और जीवन के मफलूज हो जाने पर दुनिया में सच्ची शांति और सुरक्षा अलमबरदारों को जहां तश्वीस (डर) है, वहीं क़ुरान व ह़दीस़ की शिक्षाओं के अनुसार मुसलमान एक दूसरे के भाई और एक शरीर के समान है, इसलिए दुनिया कोने कोने में रहने वाले मुसलमान देश सीरिया और उसके निवासियों के साथ सहानुभूति (हमदर्दी) और एकजुटता (यकजहती) व्यक्त (इज़हार) कर रहे हैं, लेखक हज़रात लेख (मज़ामीन) लिखकर, उलमा अपने पन्द व नसाइह के ज़रिए, ख़ुतबा (तक़रीर करने वाले) अपने भाषणों (तक़रीरों), अहले स़रवत अपने माली सहयोग (मदद) और मुख्लिसीन अपनी प्रार्थनाओं (दुआओं) के ज़रिएइस मुबारक क्षेत्र में शांति और सुरक्षा के इच्छुक (ख्वाहिशमंद) हैं, लेकिन कुछ लोग उखुव्वत और भाईचारे में बाधा (रुकावट) का सामान बनकर निरोधक (ह़ाइल) हो जाते हैं, अल्लाह तआला इस क्षेत्र (सरज़मीन) में शांति पैदा करे, ज़ालिमों को हिदायत अता फ़रमाए, अगर हिदायत इनके मुक़द्दर में नहीं है तो इनका अस्तित्व समाप्त करदे, ताकि आम लोग खुली हवा में चैन व सुकून की नींद सो सकें.
इस क्षेत्र (सरज़मीन) की विशेष (ख़ास) फ़ज़ीलत क़ुरान व ह़दीस़ में मौजूद है, इसी मुबारक भूमि की तरफ हज़रत इमाम मेहदी हिजाजज़े मुक़द्दस से हिजरत करके क़याम फ़रमाएंगे और मुसलमानों की क़यादत (नेतृत्व) फ़रमाएंगे, हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का नुज़ूल भी इसी क्षेत्र (इलाक़े) यानी दमिश्क के पूर्व में सफेद मीनार पर होगा, बहरहाल यह क्षेत्र (इलाक़ा) क़यामत से पहले इस्लाम का गढ़ (मज़बूत क़िला) और केंद्र (मरकज़) बनेगा, ह़ुज़ूर--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अरबद्वीप के बाहर किसी देश की यात्रा की है तो वह सिर्फ सीरिया है, फ़रमान--रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अनुसार सीरिया की धरती (सरज़मीन) से ही हश्र (हशर का मैदान) स्थापित (क़ायम) होगा.
क़ुरान व सुन्नत में जहाँ भी सीरिया का चर्चा हुआ है, उस से यह पूरा क्षेत्र मुराद है, जो समकालीन (असर--हाज़िर) चार देशों (सीरिया, लेबनान, फिलिस्तीन और जॉर्डन) शामिल है, मौजूदा दौर के मुल्क शाम” (अरबी सूरयह या सूरया, अंग्रेजी में Syria) का पूरा जम्हूरिया अरबिया सूरया है, इसके पश्चिम में लेबनान, दक्षिण पश्चिम में फिलिस्तीन और इसराइल, दक्षिण में जॉर्डन, पूर्व में इराक और उत्तर में तुर्की है, मौजूदा दौर देश शाम यानी सीरिया 1964 . में फ्रांस के कब्जे से मुक्त (आज़ाद) हुआ था, जिनमें अधिकांश (ज़्यादातर) सुन्नी अरब हैं, सीरियाई, कुर्द, तुर्क और दरवज़ (दरूज़) भी थोड़ी संख्या में मौजूद हैं, राजधानी "दमिश्क़" इस क्षेत्र का प्राचीन (पुराना) शहर है, हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु के ज़माने में मुसलमानों ने इस क्षेत्र (इलाके) पर विजय प्राप्त (हासिल) की, "दमिश्क़" के विजय के बाद केवल 26 साल बाद "दमिश्क़" इस्लामी सरकार की राजधानी बन गया, बनू उमय्या की सरकार के ख़ात्मे यानी 132 . तक "दमिश्क़" ही इस्लामी सरकार का केंद्र (मरकज़) बना रहा, 132 . में बनू अब्बासिया की सरकार बनने के बाद इराक़मुसलमानों की सरकार का केंद्र (मरकज़) बन गया, सीरिया में इस्लाम पहुंचने तक लगभग 1500 साल से सिरयानी भाषा ही बोली जाती थी, लेकिन सीरिया के निवासियों (रहने वालों) ने बहुत ईमानदारी और प्रेम के साथ इस्लाम का स्वागत (इस्तिक़बाल) कियाऔर बहुत कम समय में अरबी भाषा उनकी मूल (मादरी) और महत्वपूर्ण (अहम) भाषा बन गई, बड़े बड़े प्रतिष्ठित (जय्यिद) मौहद्दीसीन, फ़ुक़्हा और उलमा--किराम इस धरती में पैदा हुए, सीरिया में 92 प्रतिशत मुसलमान और लगभग 8 प्रतिशत ईसाई, अल्वी और दरवज़ (दरूज़) हैं, भाषा के आधार पर 85 प्रतिशत लोग अरबीयून नस्ल हैं, जबकि कुर्द लोग 10 प्रतिशत और अन्य लोग 5 प्रतिशत हैं.
19 वीं शताब्दी के शुरू तक देश शाम (सीरिया) उस़्मानी सरकार के तहत रहा,लेकिन जल्दी ही शाम (सीरिया) का अधिकांश क्षेत्र फ्रांसीसियों ने क़ब्जा कर लिया, दूसरे विश्व युद्ध के बाद फ्रांस और ब्रिटेन काफी कमज़ोर हो गए थे, इसलिए उन्होंने विश्व स्तर पर अपनी कमज़ोर स्थिति देख कर अपनी सेना को सीरिया से वापस ले जाने का फैसला किया, इस तरह 17 अप्रैल 1946 . को सीरिया स्वतंत्र (आज़ाद) हो गया, 1946 . से 2011 तक यह देश विभिन्न उत्थान (उरूज) और पतन (ज़वाल) से गुज़रा, 1948 और 1967 . में सीरिया ने अरबों के साथ मिलकर इसराइल से हुए युद्ध (जंग) में भाग लिया, 1973 . में सीरिया ने मिस्र के साथ मिलकर इसराइल से युद्ध (जंग) किया, 13 नवंबर 1970 को उस वक़्त (समय) के रक्षा मंत्री हाफिज़ुल असद ने सरकार पर कब्जा कर लिया, 20 जून 2000 को हाफिज़ुल असद के अचानक निधन पर 30 वर्षीय उनकी सरकार का सफाया (ख़ात्मा) हुआ, इसके बाद उनके बेटे बश्शारुल असद ने सरकार की बागडोर संभाली, हालांकि संविधान (आइन) के अनुसार वह देश के राष्ट्रपति नहीं बन सकते थे, क्यूंकि उनकी उम्र कम थी, इसलिए बेटे को पिता की जगह विराजमान (तख़्त नशीं) करने के लिए संविधान (आइन) में संशोधन (तरमीम) किया गया और इतनी उम्र लिखी गई जितनी उम्र बश्शारुल असद उस वक़्त (समय) मौजूद थे, बहरहाल केवल 34 साल की उम्र में देश के सबसे बड़े पद पर निश्चित (मुअ़य्यन) कर दिया गया.
चौदह राज्यों पर शामिल सीरिया के दमिश्क़, ह़लब और इद्लिब राज्य इन दिनों सुर्खियों में हैं, दमिश्क़ राजधानी होने की वजह से सभी राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र है, ह़लब” (Aleppo) में कुछ महीने पहले बश्शारुल असद सरकार ने हजारों मुसलमानों का गलत (नाह़क़) खून बहाया था, “ह़लब” (Aleppo) प्राचीन शहर होने के साथ एक बहुत बड़ा व्यापारिक केंद्र भी था, लेकिन आज हर तरफ वीरानी नज़र आ रही है, कुछ दिन पहले इद्लिब (Idlib) के खान शैख़ून (KhanShaykhun) क्षेत्र में अल-शाइरात (Al-Shayrat) के सैन्य (फ़ौजी) हवाई अड्डे से उड़ान भर कर जंगी जहाज़ों ने ज़हरीली गैस पर शामिल बमबारी आम लोगों पर की, जिसके परिणाम (नतीजे) में पूरे क्षेत्र में आम लोगों की ज़िन्दगी दो भर होकर रह गई, अल-शाइरात (Al-Shayrat) का सैन्य (फ़ौजी) अड्डा बश्शारुल असद की सरकार के मुकम्मल (पूरे) कंट्रोल में है, “ह़लब” (Aleppo) और इद्लिब (Idlib) दोनों क्षेत्रों में 100 प्रतिशत सुन्नी मुसलमान रहते हैं, यह दोनों क्षेत्र (इलाक़े) किसी अन्य (दूसरी) शक्ति के वश (क़ब्ज़े) में नहीं, बल्कि बश्शारुल असद की सरकार के मुकम्मल (पूरे) कंट्रोल में है, हर तरफ हरियाली और खेती वाले प्रदेश इद्लिब (Idlib) जैतून और पिस्ते की बहुत बड़े पैमाने पर खेती होती है.
क्योंकि दुनिया की बड़ी-बड़ी ताकतें और सरकारें वास्ते के साथ या बग़ैर वास्ते केसीरियाके इस युद्ध में शामिल हैं, इसलिए ज़ाहिर तौर पर इस युद्ध का समाधान आसान नहीं है, इस युद्ध को शुरू हुए छह साल बीत गए, इराक़ और ईरान के युद्ध की तरह इस युद्ध में कई देशों की बेतह़ाशा राशि (रक़म) खर्च हो रही है, ह़ालांकि हमेशा की तरह युद्ध के हर पक्ष को हानि और नुकसान के सिवा कुछ मिलता नहीं दिख रहा, बश्शारुल असद के सत्ता (इक़तिदार) से हटने पर कुछ हद तक समस्या का समाधान (ह़ल) संभव (मुमकिन) है, जैसा कि ह़ाल ही में इराक के शिया आलिम जनाब मुक़तदा अल-स़दर ने सीरियाई राष्ट्रपति बश्शारुल असदसे मांग की है कि वह सत्ता से अलग हो जाएं, ताकि सीरिया के संकट (बोह़रान) का राजनीतिक समाधान (ह़ल) खोजने में मदद मिल सके.
पैसे के खासारे (घाटे) और नुकसान की भरपाई तो संभव(मुमकिन) है, लेकिन इस युद्ध में सीरिया की बर्बादी के अलावा लाखों महिलाएँ विधवा हो गईं, लाखों बच्चे अनाथ (यतीम) हो गए, अनगिनत (बेशुमार) लोग बेसहारा हो गए, लाखों लोग बेघर हो गए, सैकड़ों शैक्षणिक संस्थान (तालीमी इदारे) बंद हो गए, हजारों छात्र-छात्राओं की पढ़ाई पूरी नहीं हुई, लोगों के व्यापार और नौकरियां समाप्त हो गईं, अनगिनत लोग उलमा--दीन की तरबियत से महरूम (वंचित) हो गए, बहुत से लोग एक वक्त की रोटी के मोह़ताज बन गए, उनके नुकसान और घाटे की भरपाई के लिए सदियां आवश्यक (दरकार) होंगी, इसलिए मानवता और भाईचारे के तक़ाज़े के मद्देनजर अगर माली मदद से वहाँ किसी विधवा या अनाथ बच्चे की कफ़ालत हो जाएतो यह कार्य इस समय का सबसे अच्छा दान (सदक़ा) जारीया होगा, साथ ही हमारा मानना ​​है कि सभी समस्याओं का समाधान (ह़ल) करने वाला अल्लाह तआला है, इसलिए इस क्षेत्र में शांति व सलामती के लिए अल्लाह तआला से खूब दुआएं करें.

डॉ॰ मुहम्मद नजीब क़ासमी संभली (www.najeebqasmi.com)