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बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन, वस्सलातु वस्सलामु अला नबिय्यिल करीम व अला अलिहि व अस्हाबिहि अजमईन

झूठ बोलना और दूसरों को मूर्ख बनाना बड़ा पाप (गुनाह--कबीरा) है

मग़रीबी तहज़ीब (पश्चिमीसभ्यता)के बेहूदा रस्मोंमें एक रस्म और परंपराअप्रैल फूल (April Fool) मनाना है, इसकी शुरुआत हालांकि यूरोप हुई, लेकिन अब पूरी दुनिया में एक अप्रैल को झूठ बोलकर लोगों को बेवक़ूफ़ बनाया जाता है, और लोगों में ख़ास तौर पर बुजुर्गों का मज़ाक़ उड़ाया जाता है, बहरहाल झूठ बोलकर लोगों को बेवक़ूफ़ बनाने का यह त्यौहार है, अमन व सलामती का अलमबरदार मज़हब--इस्लाम हमेशा ऐसी बुराइयों से समाज को रोकने की तालीम देता है जो समाज के लिए नासूर हो, क़ुरान व हदीस में बार बार सच बोलने की तरग़ीब(प्रेरणा) दी गई है, शरीअत--इस्लामिया में समाज की मुहलिक(जानलेवा) बीमारी झूठ से बचने की न सिर्फ तालीम दी गई बल्कि झूठ बोलने को बड़ा गुनाह (गुनाह--कबीरा) क़रार दिया गया है, अल्लाह तआला ने झूठों पर लानत(अभिशाप) फरमाई है, उनके लिए जहन्नुम (नरक) तैयार की हैजो बदतरीन (खराब)ठिकाना है, अल्लाह तआला ने सुरह: “अहज़ाबआयत: 70-71 में ईमान वालों से ख़िताब (को संबोधित) करते हुए कहा: “कि अल्लाह तआला से डरो और सीधी सच्ची बात कहा करो”.

झूठ बोलने वालों के बारे में आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सख्त वईदें (चेतावनीयां) हैं, इसलिए आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: “सच्चाई को लाज़िम पकड़ो, क्योंकि सच नेकी की राह (रास्ता) दिखाता है और नेकी जन्नत (स्वर्ग) की तरफ ले जाती है, और आदमी यकसां तौर पर (समान रूप से) सच कहता है और सच्चाई की कोशिश में रहता है, यहाँ तक कि अल्लाह की नज़र में उसका नाम सच्चों में लिख दिया जाता है, और झूठ से बचे रहो, इसलिए कि झूठ गुनाह और फुजूर है, और फजूर दोज़ख़ (नरक) की राह बताता है, और आदमी मुसलसल (लगातार) झूठ बोलता है और इसी की जुस्तुजू (तलाश) में रहता है, यहाँ तक कि उसका शुमार झूठों में लिख दिया जाता है”, (मुस्लिम).

एक बार हुज़ूर--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: कि क्या मैं तुम्हें कबीरा (बड़े) गुनाहों में से तीन बड़े गुनाह न बताऊँ? सहाबा--किराम ने अर्ज़ किया यारसूलल्लाह ज़रूर बताएँ, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया: अल्लाह तआला के साथ किसी को शरीक करना, माँ-बाप की नाफ़रमानी (कहना न मानना) करना और किसी इन्सान को क़त्ल करना, रावी कहतें हैं की जिस वक़्त (समय) आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह बात इरशाद फरमाई उस वक़्त आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम टेक लगाए हुए तशरीफ़ फरमा थे, यह कहकर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम (सीधे हो कर) बैठ गए और फ़रमाया: ख़बरदार झूठ बात और झूठी शाहादत (गवाही) (भी बड़ा गुनाह है), आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस जुमले (वाक्य) को इस क़दर ताकीद के साथ फ़रमाया कि हम (दिल में) कहने लगे काश आप सुकूत (ख़ामोशी) इख्तियार फरमा लें, (बुख़ारीवमुस्लिम).

कुछ हज़रात यह कहकर पहली अप्रैल को झूठ बोलते हैं और दूसरों को बेवक़ूफ़ बनाते हैं कि वह सिर्फ दूसरों को हँसाने के लिए कर रहे हैं, तो वह हज़रात इस बारे में अपने नबी का फ़रमान सुन लें, हुज़ूर--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया: “तबाही है ऐसे शख्स (व्यक्ति) के लिए जो दूसरों को हँसाने के लिए झूठ बोले, उसके लिए बर्बादी है, उसके लिए बर्बादी है, (अबू दाऊद, तिरमिज़ी मुसनद अहमद), “अप्रैल फूल में न सिर्फ झूठ बोला जाता है, बल्कि दूसरों को धोखा भी दिया जाता है, और तमाम नबियों के सरदार हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया: “जो शख्स (व्यक्ति) हमें धोखा दे, वह मुसलमान नहीं है, (मुस्लिम) यानि वह शख्स मुस्लमान कहलाने का हक़दार नहीं है जो धोखा देता हो.

अप्रैल फूलमें दूसरों का मज़ाक़ भी उड़ाया जाता है, हालांकि पूरी दुनिया को पैदा करने वाले ने तमस्खुर (उपहास) और दूसरों का मज़ाक उड़ाने से मना किया है: “ऐ ईमान वालों! न मर्दों को मर्दों पर हँसना चाहिए, हो सकता है कि जिन पर हँसते हैं वह हंसने वालों से बहतर हों, और न औरतों को औरतों पर हँसना चाहिए, हो सकता जिन पर वह हंसती हैं वह हंसने वालियों से बहतर हों. (सुरह--हुजरात: 11),हुज़ूर--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया: “तुम अपने भाई से झगड़ा मत करो और न उस से मज़ाक़ करो, और न कोई ऐसा वादा करो जिसे तुम पूरा न कर सको”, (तिरमिज़ी), यहाँ ऐसा मज़ाक़ मुराद है जो दूसरे शख्स को बुरा लगे.

जहाँ शरीअत--इस्लामिया ने झूठ बोलने से मना किया है, वहीँ सच बोलने की तरफ ख़ास (विशेष) ध्यान दिलाया गया है और बार बार सच बोंलने की ताकीद की गई है, इसलिए नबी--अकरमसल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमेशा सच बोलने की तालीम (शिक्षा) दी और झूठ बोलने से मना फ़रमाया, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हमेशा सच बोलते थे, यहां तक ​​कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को नबी न मानने वालों ने भी आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सच्चाई और अमानत दारी से मुतअस्सिर (प्रभावित) होकर नुबुव्वत से पहले ही आपको सादिक़ और अमीन जैसे अलक़ाब से नवाज़ा था, इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन अबु जहलभी तस्लीम करता था कि मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम कभी झूठ नहीं बोलते, तमाम अंबिया--किराम ने भी हमेशा सच बोलने की ताकीद फरमाई, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बारे में फरमान--इलाही है: “और किताब में इब्राहीम को याद करो, बेशक वह निहायत (बहुत) सच्चे पैगम्बर थे (सुरह--मरयम: 41), हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम के बारे में क़ुरान--करीम (सुरह--यूसुफ़: 51) में है: “(असलक़िस्सा यह है कि) मैं (हज़रत ज़ुलैख़ा) ने उसको अपनी तरफ माइल (इच्छुक) करना चाहा, और वह (हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम) बेशक सच्चा है”, अल्लाह तआला ने अपने पाक कलाम में भी पूरी इंसानियत को कई बार सच बोलने की तालीम (शिक्षा) दी है, इसलिए इरशाद है: “ऐ ईमान वालों! अल्लाह से डरो और सच्चे लोगों का साथ दो”, (सुरह--तौबा: 119), इसी तरह फरमान--इलाही है: “(अल्लाह तआला फरमाएगा कि) आज वह दिन है कि सच बोलने वालों को उनकी सच्चाई ही फ़ायदा (लाभ)देगी”, (सुरह अल्माइदा: 119), अल्लाह तआला झूठ बोलने वालों की मज़म्मत (निंदा) करते हुए इरशाद फ़रमाता है: “अल्लाह तआला उन लोगों को राह (रास्ता) नहीं दिखाते जो फ़ुज़ूलखर्ची करने वाले हैं और झूठे हैं, (सुरह--मुएमिन: 28), चूँकि झूठ बोलने वालों और दूसरों को मूर्ख (बेवक़ूफ़) बनाने के नताइज परिणाम बहुत घातक (मुहलिक) और खतरनाक हैं, और झूठ बोलने वाले के साथ साथ दुसरे भी इसके शर (बुराई) से महफूज़ (सुरक्षित) नहीं रहते, इसलिए हमें हमेशा झूठ बोलने से बचना चाहिए, अगर किसी शख्स (व्यक्ति) ने कभी झूठ बोला है तो अल्लाह तआला से पहली फुरसत में माफी मांग ले, क्योंकि कबीरा गुनाह (बड़ा पाप) होने होने के कारण (वजह) से इसके लिए मुस्तक़िल तौबा ज़रूरी है, अगर झूठ बोल कर किसी शख्स (व्यक्ति) को धोखा दिया गया है तो इसका गुनाह हुक़ूक़ुल इबाद (बन्दों का हक़) होने की वजह से और ज़्यादा बढ़ जाता है.

डॉ॰ मुहम्मद नजीब क़ासमी संभली (www.najeebqasmi.com)