बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन, वस्सलातु वस्सलामु अला नबिय्यिल करीम व अला अलिहि व अस्हाबिहि अजमईन

भारत के वर्तमान संदर्भ में मुसलमान क्या करें ?
जिसका डर था वही हुआ कि उत्तर प्रदेश राज्य में भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के साथ ही कुछ बदमाशों ने अपना ज़हर उगलना शुरू कर दिया है. हज़ारों साल पुरानी गंगा जमुनी संस्कृति के खिलाफमुसलमानों को गाँव खाली करने की धमकियाँ दी जाने लगीं, देवबंद और अलीगढ़ जैसे पुराने शहरों के नाम में परिवर्तन की आवाज़ उठने लगी. मेरठ नगर निगममें वन्दे मातरम् न पढ़ने पर जनता के वोटों से चयनित प्रतिनिधियों की सदस्यता को समाप्त करने का एलान किया जाने लगा, "गायकशी" के नाम पर मुसलमानों में डरफैलाया जाने लगा, अवैध बूचड़खानों को बंद कराने के बहाने भारत के मुसलमानों में डर व आतंक पैदा किया जाने लगा जबकि अवश्यकता थी कि सबसे पहले जनता का भरोसा जीतने के लिए "सबका साथ सबका विकास" के नारे को पूरा किया जाता. बिजली, पानी और कपड़ा, मकान जैसे जनता की समस्याओं का समाधान किया जाता. जनता को ज़्यादा से ज़्यादा शिक्षा के अवसर प्रदान करने के लिए कम से कम बातचीत ही शुरू की जाती, मुस्लिम महिलाओं के साथ सच्ची हमदर्दी का नमूना पेश करके उन्हें रोजगार प्रदान किया जाता, राज्य को सट्टेबाज़ों से साफ करने की कोशिश की जाती, उन शराबखानों को बंद करने की कोशिश की जाती जहाँ भारतीय कानूनों की धज्जियां उड़ाकर स्वास्थ्य के लिए बेहद  हानिकारक शराब तैयार की जाती है, अय्याशी के अड्डों को बंद करने के लिये निर्णय लिए जाते, गुंडों को सलाखों के पीछे बंद किया जाता, उन व्यक्तियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाती जो कुछ पैसों की लिए लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करते हैं, रिश्वतखोरी, धोखाधड़ी, खाने की चीज़ें यहां तक ​​कि दवाओं में मिलावट, चोरी, डकेती और शराब जैसे मुद्दों पर पहले ध्यान दिया जाता।
मछली बाज़ार, सब्जी मंडी और अनाज मंडी की तरह बेशक ऐसेबूचड़खाने मौजूद हैं जहाँ लंबी सूची वाले ज़रूरी शर्तो में से कुछ शर्तें मोजूद नहीं, लेकिन अवैध मछली बाज़ार, सब्ज़ी मंडी और अवैध अनाज मंडी को छोड़ कर केवल बूचड़खानों को बंद कर देना अल्पसंख्यकों के बीच आतंक पैदा करने के प्रयास के अलावा कुछ भी नहीं है, उत्तर प्रदेशके किसी भीबूचड़खाने में गाय नहीं ज़िबह (काटी) जाती, फिर भी मुसलमानों से अपील हे कि उत्तर प्रदेश में गाय काटने पर पाबंदी होने के कारण गाय ज़िबह न करें, लेकिन भारतीय कानूनों के मद्देनजर उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार को चाहिए कि गाय के आलावा अन्य जानवरों को वध (ज़िबह) करने के लिए सभी अवसर प्रदान करें, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को यह आदेश दिया कि पिछले 31 मार्च को समाप्त  हुए मांस की दुकानों के लाइसेंस जल्द से जल्द दोबारा बनाए, और बकरा व मुर्गा ज़िबह करने के लिए हर दो हज़ार मील पर बूचड़खाने बनवाए, उत्तर प्रदेश सरकार को चाहिए कि नई टेक्नोलोजी से बने हुए बूचड़खाने तुरंत पूरे प्रदेश में बनाए, नए बूचड़खाने बनने तक पुराने बूचड़खानों को ज़रूरी कार्यवाही करके तुरंत शुरू करे, नए लाइसेंस बनाने के लिए शर्तों में मछली बाज़ार, सब्जी मंडी, और अनाज मंडी की तरह आसानी का मामला करे, क्योंकि गाय के अलावा अन्य जानवरों को ज़िबह करने के सभी व्यवस्था करना सरकार की जिम्मेदारी है, ताकि लाखों लोगों का रोज़गार खतरे में न पड़े, महंगाई में वृद्धि (बढोतरी) न हो, अराजकता (अफरातफरी) का माहौल पैदा न हो, गोश्त (मांस) एक्सपोर्ट (निर्यात) और चमड़े के कारोबार से भारतीय सरकार और जनता को हासिल होने वाली अरबों की आय (आमदनी) बाक़ी रहे।
मुसलमानों को शरई आधार पर यह अनुमति है कि वह सब्जियों और दालों के साथ हलाल जानवर का गोश्त भी खाएं, न सिर्फ मुसलमान बल्कि इसाई भी जो दुनिया में सबसे अधिक संख्या में मौजूद हैं, यहूदी जो दुनिया की अर्थव्यवस्था पर हावी हैं और अन्य धर्मों के मानने वाले भी मांस खाते हैं, यानी दुनिया की आबादी का बड़ा हिस्सा मांस खाता है, दुनिया और भारत के तमाम सभी मशहूर होटलों में अन्य सामान के साथ गोमांस (बीफ़) मटन और चिकन भी प्रदान (पेश) किया जाता है, भारत में मुसलमानों के अलावा भी अनगिनत लोग मांस का उपयोग करते हैं, विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के अनगिनत छात्र व छात्राएं अलग अलग तरीके से तैयार की गई गोश्त की डिशें खाने में प्रयोग करते हैं, कबाब की दुकान पर गैर मुस्लिम लोग भी गर्म गर्म कबाब खाकर खूब आनंद लेते हैं. चिकन बोटी, चिकन कढाई, मटन बिरयानी और मटन क़ोरमा मुसलमानों की तरह अन्य लोगों का भी पसंदीदा भोजन हैं, कहने का मतलब ये है कि विश्व स्तर (पैमाने) पर मांस मानव (इंसानों) की आहार बड़ा स्रोत (सहारा) है, अगर कुछ लोग गोश्त खाना नहीं चाहते हैं या वह इस्लामी तरीके के अलावा झटके से काटे हुए जानवर का मांस खाते हैं तो मुसलमानों को इस पर कोई आपत्ति नहीं और न ही वह उसके खिलाफ कोई प्रदर्शन करते हैं, इस लिए गोश्त न खाने वालों को कोई हक़ नहीं है कि वह दूसरों को भी गोश्त न खाने पर बाध्य (मजबूर) करें, हाँ मुसलमानों को भी चाहिए कि गोश्त खाने को इस्लामी आदर्श (शिआर) न बनाएं, बल्कि यह तो सब्जी और दाल की तरह आलमीस्तरपर खाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण आहार है, यह बात उल्लेखनीय है कि भारत के कई राज्यों में आज भी कानूनी आधार पर गाय काटने और उसका मांस खाने की पूरी अनुमति है।
विदेशों में मांस निर्यात (एक्सपोर्ट) करने में भारत ने अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान और बांग्लादेश को बहुत पीछे छोड़ दिया है, मांस निर्यात करने वाली कंपनियों के अधिकांश मालिक गैर मुस्लिम हैं, दुनिया के पूर्व और पश्चिम यहां तक ​​किघर घर में जानवरों की खाल यानि चमड़े से तैयार किये हुए जूते, पर्स, बेल्ट और अनगिनत चीज़े उपयोग की जाती हैं, लेकिन सांप्रदायिक तत्व उस भारत के धर्मनिरपेक्षता की भूमिका को खत्म करना चाहते हैं जहां कई धर्मों के मानने वाले लोग हजारों साल से एक साथ रह रहे हैं।
अब जबकि केंद्र के अलावा भारत के29 राज्यों में से 13 राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, चार राज्यों में भारतीय जनता पार्टी के मदद से दूसरी पार्टी की सरकार स्थापित (मौजूद) है, और बज़ाहिर जल्दी ही राज्यसभा में उसे बहुमत मिल जाएगी, यानी आधे भारत से अधिक भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, ऐसी स्थिति में मुसलमानों को चाहिए कि अपना संबंध अल्लाह तआलाह से मजबूत करें, क्योंकि कुरान और हदीस की रोशनी में हमारा यह विश्वास (ईमान) व अक़ीदा है कि बिगड़ी बनाने वाला, ज़रुरत पूरी करने वाला और मुश्किल दूर करने वाला अल्लाह तआलाह ही है, साथ ही पापों का पश्चाताप व माफी करकेहमें अल्लाह का इताअतकरनी चाहिए, इसी में हमारी सफलता है, समस्याओं और परेशानियों के समय अल्लाह तआलाह ने हमें धैर्य (सब्र) और नमाज़ क़ायम करने का आदेश दिया और कहा कि अल्लाह तआलाह सब्र करने वालों के साथ है, यानी धैर्य करने वालों को अल्लाह तआलाह की निकटता (मइय्यत) का श्रेय(सौभाग्य) प्राप्त होता है, साथ ही हमें मस्जिदों से अपना रिश्ता मज़बूत करना होगा, क्योंकि मस्जिदें मुसलमानों की न केवल प्रशिक्षण स्थल (तरबियतगाह) हैं, बल्कि मस्जिदें मुस्लिम समाज को दर्शाती हैं, हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मदीना मुनव्वरह पहुँचने से थोड़ा पहले "क़ुबा" बस्ती में "मस्जिद--क़ुबा" और मदीना मुनव्वरह पहुँचने के बाद सबसे पहले जिस मस्जिद की नींव रखी वही बाद में "मस्जिद--नबवी" के नाम से प्रसिद्ध (मशहूर) हुई, जो इस्लाम के दुनिया के हर कोने तक पहुँचने का स्रोत (ज़रिया) बनी, अगर हमारा संबंध मस्जिद से जुड़ा हुआ है तो जहाँ अल्लाह तआला से नज़दीकी हासिल होगी और कल प्रलय (क़यामत) के दिन अल्लाह तआला की दया की (रहमत के) छाया में जगह मिलेगी, वहीँ इन शा अल्लाह इस्लामी दुश्मनों के सभी प्रयास भी बेकार होंगे, इसी तरह मदरसों की सुरक्षा के लिए हर संभव कोशिश करें, क्यूंकि वह दीन--इस्लाम की अस्तित्व (बक़ा) के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
हमारा यह विश्वास (ईमान) व अक़ीदा है कि सांसारिक जीवन केवल एक परीक्षा स्थल है, असल आराम और सुकून तो भविष्य (मरने के बाद) में नसीब होगा, अल्लाह तआला का फरमान हे कि "जिन लोगों ने कुफ्र का मार्ग चुन लिया, उनके लिए दुनिया की ज़िन्दगी बड़ी महबूब व दिल पसंद बना दी गई है, ऐसे लोग ईमान का मार्ग चुनने वालों का मज़ाक़ उड़ाते है, मगर क़यामत के दिन अल्लाह से डरने वाले लोग ही उनके मुक़ाबले में बुलंद स्थान पर होंगे, रहा दुनिया का रिज़्क तो अल्लाह का फरमान है कि जिसे चाहे बेहिसाब दे" (सूरह बक़रह: 212), अन्तिम नबी हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशाद है: "दुनिया मोमिन के लिए क़ैदखाना जबकि काफ़िरों के लिए जन्नत है" (मुस्लिम), यानि अल्लाह की ज़ात (यानि अल्लाह के होने) का इंकार करने वालों के लिए मरने के बाद दर्दनाक अज़ाब है, जबकि अल्लाह के अहकाम (आदेशों) पर अमल करने वालों के लिए जो भी कष्ट हैं वह सिर्फ दुनिया में हैं, मरने के बाद परेशानी नाम की कोई चीज़ उनको नहीं होगी, इन शा अल्लाह
उलमा हज़रात से अपील हे कि मुसलमानों को मुत्तहिदकरने की कोशिश करें, मसाइल में मतभेद की स्थिति में अन्य मकातिब की राय का सम्मान करते हुए अपनी राय ज़रूर पैश की जा सकती है, लेकिन दुसरे मकातिब की राय का अपमान हमारे जीवन का उद्देश्य नहीं होना चाहिए, अन्यथा इस्लाम विरोधी ताकतें अपने उद्देश्य में सफल होंगी, कई मकातिब (समुदाय) की प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था "आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड" भारत में मुसलमानों की सबसे बड़ी पार्टी है, मदारिस, अन्य इस्लामी केन्द्रों और मुस्लिम संगठनों को चाहिए कि "आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड" के झंडे के नीचे इकट्ठे होकर क़ौम व मिल्लत के मुद्दों को हल करने की कोशिश करें, यदि कोई व्यक्ति या समूह या राजनीतिक पार्टी कुरान और हदीस के स्पष्ट आदेश के खिलाफ, या मदारिस व मकातिब के खिलाफ आवाज उठाता है, या भारतीयनियमों के अनुसार इस्लाम पर चलने की हमारी स्वतंत्रता को चुनौती देता है तो भारतीय नियमों के अनुसार हमें मिलकर इसका मुकाबला करना चाहिए.
एक हो जाएं तो बन सकते हैं खुर्शीद--मुबीं 
वरना बिखरे हुए तारों से क्या बात बने
क़ौम के समझदार लोगों से उम्मीद है की भारत में मुसलमानों की आबादी के अनुपात के आधार पर उत्तर प्रदेश चुनाव सेइबरत हासिल करके केवल मुस्लिम वोटों की राजनीति न करें, क्योंकि इसके द्वारा बहुसंख्यक समुदाय को एक जगह इकट्ठा होने के लिए आमंत्रित किया जाएगा जो भारत के धर्मनिरपेक्षता के लिए हानिकारक है, स्वतंत्रता सेनानी और भारत की राजनीति पर गहरी निगाह रखने वाले मौलाना अबुल कलाम आज़ादका पूरे जीवन हमेशा यह रुख रहाकि मुसलमान भारत में अन्य समुदायों (क़ौम) के साथ मिलकर सरकार के गठन और देश के निर्माण में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लें, मुस्लिम समुदाय के साथ सहानुभूति (हमदर्दी) यह नहीं कि लौ वर्णन भाषण करके उनकी भावनाओं को भड़काया जाए, बल्किवास्तविक सहानुभूति (असल हमदर्दी) यह है किसंगठित मशीनरी की तरह काम करके हर जगह उनकी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो, इस बात को अच्छी तरह समझ लें कि केवल मुस्लिम वोटों की राजनीति हमारे देश के लिए अत्यंत हानिकारक है.
अब सांप्रदायिक तत्व विभिन्न बहानों से माहौल खराब करने की कोशिश करेंगे, लेकिन होशियारी (समझदारी) यह है कि भावनाओं पर काबू रखकर कानूनी लड़ाई लड़ी जाए, जिसके लिए भारत में मौजूद बड़े बड़े मुस्लिम संगठनों से अनुरोध है कि वह अल्पसंख्यकों की समस्याओं को गंभीरता से लेकर अच्छे वकीलों के साथ मैदान में उतरें.
अंत में अपील (गुज़ारिश) है कि मुसलमानों को घबराने की जरूरत नहीं, क्योंकि अल्लाह तआला ने कुरान--करीम में यह घोषणा (ऐलान) किया है कि "हर परेशानी के बाद आसानी आती है", इस देश की स्वतंत्रता के लिए हमने कंधे से कंधा मिलाकर अपने देशवासियों के साथ भरपूर भाग लिया है, और आज भी इसके निर्माण और विकास में भाग ले रहे हैं, यह देश किसी विशेष धर्म के मानने वालों का ही नहीं है बल्कि यह हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और पारसी सबका है, और इस पर सबका बराबर का हक़ है, इसी दिशा में हमें यह सोचकर ऐसे कदम उठाने की जरूरत है जो सामाजिक भाईचारा को मजबूत करें, और दूसरी जातियों के साथ हमारे दैनिक जीवन में सुधार के लिए संघर्ष में सहायक हों, उलेमा हज़रात और क़ौम के बुद्धिमान लोग और आम मुसलमानों से अनुरोध है कि हम अपने नैतिकताऔर भूमिका के माध्यम से मुस्लिम और अन्य जातियों के बीच उत्पन्न (पैदा होने वाली) दूरी कम करने की कोशिश करेंऔर अपने प्रक्रिया (अमल) से बताएँ कि इस्लाम शांति और सुरक्षा का धर्म है.

डॉक्टरमोहम्मद नजीब क़ासमी सम्भली (www.najeebqasmi.com)