बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन, वस्सलातु वस्सलामु अला नबिय्यिल करीम व अला अलिहि व अस्हाबिहि अजमईन

इताअत में मयाना रवी

अल्लाह तआला अपने पाक कलाम में इरशाद फ़रमाता है: अल्लाह तुम्हारे साथ आसानी का मामला करना चाहता है और तुम्हारे लिये मुश्किल पैदा नहीं करना चाहता। (सूरह अलबक़रा 185) सबसे पहले हमें यह समझना चाहिए कि इस आयत का सियाक़ व सबाक़ क्या है? अल्लाह तआला रोज़े की फ़र्ज़ीयत नाज़िल फ़रमाते हुए इरशाद फ़रमाता है कि जो शख़्स भी माहे रमज़ान पाये तो वह उसमें ज़रूर रोज़े रखे। हाँ अगर कोई शख़्स बीमार या मुसाफ़िर है तो उसे इज़ाजत है कि बीमारी के अय्याम या सफ़र के दौरान रोज़े ना रखकर बाद में छूटे हुए रोज़ों की क़ज़ा करे। बीमारी या सफ़र की वजह से रोज़ा ना रखने की इज़ाजत और बाद में उसकी कज़ा करने को अल्लाह तआला ने फ़रमाया: अल्लाह तुम्हारे साथ आसानी का मामला करना चाहता है और तुम्हारे लिए मुश्किल पैदा नहीं करना चाहता। इसी तरह वह बूढ़ा शख़्स जो रोज़ा रख हीं नहीं सकता है उसको गुज़श्ता आयत (184) में अल्लाह तआला ने इज़ाज़त दी की वह रोज़ा ना रखे बल्कि हर रोज़े के बदले में एक मिस्कीन को खाना खिलाये।

मालूम हुआ कि आसानी का मतलब हरगिज़ यह नहीं कि हम जो चाहें करें, कभी ज़कात की अदायगी और कभी नहीं, बल्कि दीन में आसानी का मफ़हूम यह है कि कु़रआन व हदीस का कोई भी हुक्म इन्सानी इस्तेताअत के बाहर नहीं है, जैसा कि अल्लाह तआला का फ़रमान है: अल्लाह किसी भी शख़्स को उसकी वुसअत से ज़्यादा ज़िम्मेदारी नहीं सौंपता। (सूरह अलबक़रा 286) मिसाल के तौर पर अल्लाह तआला ने हर मुसलमान पर रोज़ाना पांच नमाज़ों की अदायगी फ़र्ज़ की है, ख़्वाह मर्द हो या औरत, ग़रीब हो या मालदार, सेहतमंद हो या बीमार, ताक़तवर हो या कमज़ोर, बूढ़ा हो या नौजवान, मुसाफ़िर हो या मुक़ीम, बादशाह हो या गुलाम हत्ता कि जिहाद व किताल के ऐन मौक़े पर मैदाने जंग में भी यह फ़र्ज़ माफ़ नहीं होता है। हाँ यह सहूलियत है कि अगर कोई शख़्स खड़े होकर नमाज़ अदा नहीं कर सकता है तो वह बैठकर पढ़े, अगर बैठकर भी नहीं पढ़ सकता तो लेटकर अदा करे। अगर मरीज़ क़िबले की तरफ़ रुख़ करके नमाज़ पढ़ सकता है तो उसको क़िबला की तरफ़ रुख़ करके नमाज़ पढ़नी चाहिए, लेकिन अगर किसी उज़्र की वजह से क़िबले की तरफ़ रुख़ करके नमाज़ पढ़ना मुमकिन नहीं है तो जिस तरफ़ मुमकिन हो रुख़ करके नमाज़ पढ़ ले। इसी तरह मर्द को चाहिए कि वह फ़र्ज़ नमाज़ मस्जिद जाकर जमाअत के साथ अदा करे, लेकिन उज़्र की वजह से घर पर भी तन्हा नमाज़ पढ़ सकता है। नमाज़ के लिए वुज़ू ज़रूरी है, लेकिन अगर कोई बीमार वुज़ू नहीं कर सकता है तो वह तय्यम्मुम करके नमाज़ पढ़े। वुज़ू में जो आज़ा धोए जाते हैं अगर उस जगह पर पट्टी बंधी हुई है तो वुज़ू की सूरत में जिस जगह पर पट्टी बंधी हुई है उस जगह पर गीले हाथ से मसह कर ले, बाक़ी आज़ा को धोले। आसानी का मतलब हरगिज़ यह नहीं कि वह हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की आंखों की ठंडक यानि नमाज़ ही ना पढ़े।

इसी तरह ज़कात के फ़र्ज़ होने पर ज़कात की अदायगी तो करनी है, लेकिन अगर माल ज़कात के वाजिब होने के लिए ज़रूरी निसाब तक नहीं पहुंचाया निसाब से तो ज़्यादा है लेकिन उस पर एक साल नहीं गुज़रा या क़र्ज़ा मौज़ूदा माल से भी ज़्यादा है तो ज़कात वाज़िब नहीं। इसी तरह शरीअते इस्लामिया में आमदनी पर ज़कात नहीं लगायी गयी, यानि इन्सान अपने और घर वालों की ज़रूरतइसी तरह घर के साज़ व सामान और बच्चों की तालीम पर जो रक़्म ख़र्च करता है उस पर कोई ज़कात नहीं है। बल्कि नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: अगर कोई शख़्स अपने घर वालों पर ख़र्चा करता है तो वह भी सद्क़ा है यानि उस पर भी अज्र मिलेगा। (बुख़ारी व मुस्लिम)

उम्मते मुस्लिमा का इत्तेफ़ाक़ है कि हर बालिग़ मर्द व औरत को माहे रमज़ान के रोज़े रखना ज़रूरी है, लेकिन बीमार और मुसाफ़िर के लिए इज़ाजत है कि वह रोज़ा ना रखकर बाद में क़ज़ा करे, इसी तरह इन्तहाई बूढ़े शख़्स के लिए इजाज़त है कि रोज़ा ना रखकर हर रोज़े के बदले में सदक़ए फ़ितर की मिक़दार सदक़ा निकाले। नमाज़, रोज़ा और ज़कात की तरह हज भी इस्लाम का एक रुक्न है। तमाम उम्र में एक मर्तबा सिर्फ़ उसी शख़्स पर फ़र्ज़ है जिसको अल्लाह तआला ने इतना माल दिया हो कि अपने वतन से मक्का मुकर्रमा तक आने जाने पर क़ादिर हो और अपने अहल व अयाल के मसारिफ़ वापसी तक बर्दाश्त कर सकता हो। जैसा कि फ़रमाने इलाही है: लोगों पर अल्लाह तआला का हक़ है कि जो उसके घर तक पहुंचने की इस्तताअत रखता हो वह उसके घर का हज करे। (सूरह आले इमरान 97)

दीन के बुनियादी अरकान को मिसाल देकर समझाया गया कि दीने इस्लाम में आसानी का मतलब अपनी ख़्वाहिशात की इत्तेबा नहीं जैसा कि ला मज़हब लोग समझते हैं बल्कि अल्लाह के अहकाम को नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तरीक़े पर बजा लाने का नाम ही दीन है, ख़्वाह उसके लिए कुछ तकलीफ़ें बर्दाश्त करनी पड़े। हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: दोज़ख ख़्वाहिशाते नफ़सानी से ढ़क दी गयी है और जन्नत मुश्किलात और दुश्वारियों से ढ़की हुई है। (बुख़ारी) इन्सान अगर उख़रवी ज़िन्दगी में कामयाब होना चाहता हैजो यक़ीनन हर शख़्स की ख़्वाहिश है तो उसे चाहिए कि वह अपनी ख़्वाहिशात पर अमल छोड़कर ख़ालिक़े कायनात के अहकाम के मुताबिक़ और हुजू़र अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तरीक़े के मुताबिक़ ज़िन्दगी गुज़ारे, यानि उख़रवी कामयाबी के लिए सिर्फ़ एक ही रास्ता है और वह है दीने इस्लाम को इख़्तियार करना। दीने इस्लाम पर अमल करना आसान ज़रूर है, यानि इन्सान को उसकी ताक़त से बाहर किसी अमल का मुकल्लफ़ नहीं बनाया गया है, लेकिन यह बात यक़ीनी है कि दीने इस्लाम के मुताबिक़ ज़िन्दगी गुज़ारने में दुश्वारियाँ ज़रूर आती हैं, मसलन फ़ज्र की नमाज़ की अदायगी के लिए यक़ीनन सुबह को गहरी नींद आने के बावजूद उठना पड़ता है, सर्दी के बावजूद वुज़ू करना पड़ता है और मस्जिद में जाकर नमाज़ अदा करनी होती है। माल की मोहब्बत और ज़रूरत के बावजूद ज़कात के फर्ज़ होने पर उसकी अदायगी करनी होती है। रोज़ा रखने में भूक प्यास बर्दाश्त करनी पड़ती है, ग़र्ज़ कि हमेशा हमेशा की ज़िन्दगी में कामयाबी हासिल करने के लिए अहकामे इलाही पर अमल करना ज़रूरी है, ख़्वाह उसके लिए मुश्किलात और दुश्वारियों का सामना करना पड़े।

हाँ यह बात मुसल्लम है कि दीन सिर्फ़ इबादात का नाम नहीं। इबादात यानि नमाज़, रोज़ा, जक़ात और हज वग़ैरह की अदायगी दीने इस्लाम का एक अहम हिस्सा ज़रूर हैं, लेकिन दीन के दीगर अज़्जा मसलन मामलात और मआशरात में भी शरीअते इस्लामिया की तालीमात पर अमल करना ज़रूरी है। कुछ हज़रात इबादात में तो फराइज़, वाजिबात, सुनन और नवाफ़िल का मुकम्मल एहतमाम करते हैं, लेकिन मामलात में अल्लाह तआला के अहकाम को भूल जाते हैं, चुनांचे नमाज़ व रोज़ा की पाबंदी के बावजूद कारोबार में झूठ बोलकर लोगों को धोखा देते हैं, रिश्वत लेते हैं। इसी तरह कुछ हज़रात दूसरों के साथ बर्ताव करने में इस्लामी तालीमात को नज़र अन्दाज़ करते हैं। दूसरी तरफ़ उम्मते मुस्लिमा का एक तबक़ा ऐसा भी है जो दीन के तमाम ही शोबों में इस्लामी तालीमात से दूर रहने के बावजूद दूसरों ख़ासकर नमाज़ व रोज़ा की पाबंदी करने वालों पर एतराज़ात करने को ही अपने लिए दीने इस्लाम की ख़िदमत समझता है।

अल्लाह की इताअत में हमें मियाना रवी इख़्तियार करनी चाहिए, यानि हुक़ूक़ुल्लाह की अदायगी के साथ हमें हुक़ूकुल इबाद में भी कोई कोताही नहीं करनी चाहिए। नमाज़ व रोज़ा की पाबंदी के साथ बीवी, बच्चों, दीगर घर वालों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों और दोस्तों सबका ख़्याल रखना चाहिए, क्योंकि दीने इस्लाम में रहबानियत नहीं है, यानि यह दीन नहीं कि हम जिस मआशरे में रह रहे हैं उसको छोड़कर सिर्फ़ मस्जिद के एक कोने में बैठकर अल्लाह का ज़िक्र करें। यक़ीनन क़ुरआने करीम के एलान के मुताबिक़ अल्लाह तआला के ज़िक्र से दिलों को इत्मीनान हासिल होता हैऔर ज़िक्र ना करने वालों को नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुर्दों के मानिंद क़रार दिया है। लेकिन अल्लाह की मख़लूक़ात और दुनियावी साज़ व सामान का जायज़ इस्तेमाल करके मआशरे में अपना मक़ाम बनाना और असरी तालीम हासिल करके हर जगह अपनी नुमाइंदगी को यक़ीनी बनाना भी तो दीन है। नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चंद फ़रमान पेश हैंजिनसे इस मौज़ू पर ख़ासी रहनुमाई मिलती है।

हज़रत अनस रज़िअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि तीन आदमी अज़वाजे मुतेह्हरात के घर पर तशरीफ़ लाये और उनसे हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इबादत के मुतअल्लिक़ सवाल किया। जब उनको इत्तला दी गयी तो उन्होंने उस को बहुत कम समझा और कहने लगे हम कहाँ और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कहाँ। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तो अगले पिछले सब गुनाह (अगर होते भी तो) माफ़ कर दिये गये हैं। उनमें से एक ने कहा: मैं हमेशा सारी रात नमाज़ पढ़ूंगा। दूसरे शख़्स ने कहा: मैं हमेशा रोज़े रखूंगा। तीसरे ने कहा: मैं औरतों से किनाराकशी इख़्तियार करूंगा और कभी सोहबत ना करूंगा। हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के उनके पास तशरीफ़ ले गये और फ़रमाया: तुम वह लोग हो जिन्होंने ने इस इस तरह कहा? अल्लाह की क़सम! मैं तुम में सबसे ज़्यादा अल्लाह तआला से डरने वाला हूँ और तुम में से सबसे ज़्यादा उसका ख़ौफ़ रखने वाला हूँ, लेकिन मैं रोज़ा रखता हूँ और इफ़्तार भी करता हूँ। नमाज़ पढ़ता हूँ और सोता भी हूँ और औरतों से हमबिस्तरी भी करता हूँ। पस जिसने मेरी सुन्नत से एराज़ किया वह मुझ से नहीं। (बुख़ारी व मुस्लिम)

हज़रत आयशा रज़िअल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उनके पास तशरीफ लाये और उन (हज़रत आयशा रज़िअल्लाहु अन्हा) के पास एक औरत बैठी थीं। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पूछा यह कौन हैं? मैंने जवाब दिया यह फलां औरत हैं जिसकी नमाज़ का तज़किरा किया जाता है। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: बस ठहरो! तुम वह चीज़ लाज़िम पकड़ो जिसकी तुम्हें ताक़त हो। अल्लाह की क़सम अल्लाह तआला नहीं उकताते बल्कि तुम उकता जाओगे। अल्लाह तआला को वह इताअत ज़्यादा महबूब है जिसको करने वाला इस पर मुदावमत इख़्तियार करे। (बुख़ारी व मुस्लिम)

हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़िअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: दीन में बेजा तशद्दुद करने वाले हलाक हो गये। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह बात तीन मर्तबा इरशाद फ़रमायी। (मुस्लिम) हज़रत अबू हुरैरा रज़िअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुजू़र अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: दीन आसान है और जो कोई बेज़ा तशद्दुद दीन में इख़्तियार करता है दीन उस पर ग़ालिब आ जाता है। पस तुम मयाना दुरुस्त रास्ता इख़्तियार करो और ख़ुश हो जाओ और सुबह व शाम और रात को कुछ हिस्से की इबादत से मदद हासिल करो। (बुख़ारी)

हज़रत अनस रज़िअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मस्जिद में तशरीफ लाये तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दो सुतूनों के दर्मियान एक रस्सी बंधी हुई पायी। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दर्याफ़्त फ़रमाया कि यह रस्सी कैसी है? उन्होंने ने बतलाया ज़ैनब की रस्सी है। जब थक जाती हैं तो उससे सहारा लेती हैं। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: इसको खोल डालो, हर कोई तबीयत के निशात की हालत में नमाज़ (तहज्जुद) पढ़े, जब सुस्ती पैदा हो जाये तो सो जाये। (बुख़ारी व मुस्लिम)

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़िअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ख़ुतबा इरशाद फ़रमा रहे थे। अचानक आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की निगाह एक खड़े आदमी पर पड़ी। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उसके बारे में पूछा। सहाबाए किराम ने बताया कि यह अबू इस्राईल है जिसने नज़र मानी है कि धूप में खड़ा रहेगा और बैठेगा नहीं और ना साया लेगा और ना गुफ़्तगु करेगा और रोज़ा रखेगा। हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: उसको कह दो कि वह बात कर ले और साए में हो जाये और बैठ जाये और रोज़ा को मुकम्मल करे। (बुख़ारी)

खुलासए कलाम यह है कि हमें ज़िन्दगी के तमाम शोबों में शरीअते इस्लामिया पर अमल पैरा होना है, जैसा कि फ़रमाने इलाही है: ऐ ईमान वालो! इस्लाम में पूरे के पूरे दाख़िल हो जाओ और शैतान के नक़्शे क़दम पर ना चलो। यक़ीन जानो वह तुम्हारा खुला दुश्मन है। (सूरह अलबक़रा 208) लिहाज़ा जहां हमें मस्जिदों को आबाद करना है वहीं बाज़ारों में भी इस्लामी तालीमात पर अमल करना है और अपने अख़लाक़ को बेहतर बनाना है। मदारिस व मकातिब की तामीर के साथ असरी दर्सगाहों के क़याम की भी कोशिश करनी है। अपने बच्चों को क़ुरआन व हदीस की तालीम के साथ असरी उलूम पढ़कर मआशिरे को तालीम याफ़्ता बनाने के लिए अपनी गिरांक़द्र ख़िदमात पेश करनी है। अल्लाह तआला के अहकाम पर अमल करके बुरे कामों से बचना है, ताकि मरने के बाद वाली ज़िन्दगी में हमेशा हमेशा की कामयाबी हासिल हो। अहकामे इलाही पर अमल करना और बुराइयों से बचना अल्लाह के ख़ौफ़ के साथ यक़ीनन आसान है।

डॉ॰ मुहम्मद नजीब क़ासमी संभली (www.najeebqasmi.com)