बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन, वस्सलातु वस्सलामु अला नबिय्यिल करीम व अला अलिहि व अस्हाबिहि अजमईन

अल्लाह तआला अपने बन्दे की तौबा से बहुत ख़ुश होते हैं

हज़रत अनस बिन मालिक रज़िअल्लाहुअन्हु रिवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: अल्लाह तआला अपने बन्दे की तौबा से (जबकि वह उसकी बारगाह में तौबा करता है) उससे भी ज़्यादा ख़ुश होते हैं जितनी ख़ुशी तुम में से किसी मुसाफ़िर को अपनी उस (सवारी के) ऊंट के मिल जाने से होती है जिस पर वह चटियल बयाबान में सफ़र कर रहा हो, उसी पर उसके खाने पीने का सामान बंधा हुआ हो और (इत्तेफ़ाक से) वह ऊंट उसके हाथ से छूट कर भाग जाये और वह (उसको ढूंढते ढूंढ़ते) मायूस हो जाये और इसी मायूसी के आलम में (थका हारा भूखा प्यासा) किसी दरख़्त के साये के नीचे लेट जाये और उसी हालत में (उसकी आंख लग जाये और जब आंख खुले तो) अचानक उस ऊंट को अपने पास खड़ा हुआ पाये और (जल्दी से) उसकी नकेल पकड़ ले और ख़ुशी के जोश में (ज़बान उसके काबू में ना रहे और अल्लाह तआला का शुक्र अदा करने की ग़र्ज़ से) कहने लगे! ऐ अल्लाह! तू मेरा बन्दा और मैं तेरा रब हूँ। (ख़ुशी के मारे उसे पता भी ना चले कि मैं क्या कह गया)(सही मुस्लिम)

बन्दे की तौबा से अल्लाह तआला की ख़ुशी भी उसकी शाने रुबूबियत और रहमत का तक़ाज़ा है कि उसका एक भटका हुआ बन्दाअपनी नादानी से शैतान के फ़रेब में आकर उसकी इबादत की राह से भटक गया थाराहे रास्त पर आ गया। लेकिन बन्दे की तौबा व इस्तिग़फ़ार से अल्लाह तआला की शान में कोई इज़ाफा नहीं होता है। वह बड़ा है और बड़ा ही रहेगा। वह बेनियाज़ है, उसे हमारी ज़रूरत नहीं है, लेकिन हम उसके मोहताज हैं। उसकी कोई नज़ीर नहीं है, वह पूरी कायनात का ख़ालिक़ व मालिक व राज़िक है। अल्लाह तआला से तौबा व इस्तिग़फ़ार करने का फ़ायदा हमें ही पहुंचता है, जिस तरह अल्लाह तआला के हुक्म की ख़िलाफ़वर्जी करने पर उसका नुक़सान भी हमें ही पहुंचता है।

क़ुरआन व हदीस की रोशनी में पूरी उम्मते मुस्लिमा का इत्तेफाक़ है कि गुनाहों से तौबा करना ज़रूरी है। अगर गुनाह का तअल्लुक़ अल्लाह के हक़ूक़ से है मसलन नमाज़़ व रोज़ा की अदायगी में कोताही या उन आमाल को करना जिनसे अल्लाह और उसके रसूल ने मना किया है मसलन शराब पीना और ज़िना करना, तो तौबा के लिए तीन शर्ते हैं: 1) गुनाह को छोड़ना। 2) किये गये गुनाह पर शर्मिन्दा होना। 3) आइन्दा गुनाह ना करने का पुख़्ता इरादा करना। लेकिन अगर गुनाह का तअल्लुक़ हक़ूकुल इबाद से है तो उन तीन शर्तों के अलावा मज़ीद एक अहम शर्त ज़रूरी है कि पहले बन्दे से मामला साफ़ किया जाये, यानि अगर उसका हक़ है तो वह अदा किया जाये या उससे माफी तलब की जाये। ग़र्ज़ कि बन्दों के हुक़ूक़ के मुतअल्लिक़ कल क़यामत तक के लिए अल्लाह तआला ने अपना उसूल व ज़ाब्ता बयान कर दिया पहले बन्दे का हक़ अदा किया जाये, उससे माफ़ी तलब की जाये, फिर अल्लाह तआला की तरफ़ तौबा के लिए रुजूअ किया जाये।

तौबा के मायने लौटने के हैं। अल्लाह तआला की नाफ़रमानी से फ़रमांबरदारी की तरफ़ लौटना शरीअते इस्लामिया में तौबा कहलाता है। हुक़ूक़ुल्लाह में कोताही की सूरत में तौबा के सही होने के लिए तीन शर्तें और बन्दे के हक़ूक़ में कोताही करने पर तौबा के लिए चार शर्तें ज़रूरी है। लिहाज़ा हमें जिस तरह अल्लाह के हुक़ूक़ को मुकम्मल तौर पर अदा करना चाहिए, इसी तरह बन्दों के हुक़ूक़ की अदायगी में अदना सी कोताही से भी बचना चाहिए। बन्दों के हुक़ूक़ में कोताही करने पर कल क़यामत के दिन मोहसिने इन्सानियत सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फ़रमान के मुताबिक आमाल के ज़रिए बन्दों के हुक़ूक़ की अदायगी की जायेगी, जैसा कि फ़रमाने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम है: मेरी उम्मत का मुफ़लिस शख़्स वह है जो क़यामत के दिन बहुत सी नमाज़़, रोज़ा, ज़कात (और दूसरी मकु़बूल इबादतें) लेकर आयेगा, मगर हाल यह होगा कि उसने किसी को गाली दी होगी, किसी पर तोहमत लगायी होगी, किसी का माल खाया होगा, किसी का ख़ून बहाया होगा या किसी को मारा पीटा होगा तो उसकी नेकियों में से एक हक़ वाले को (उसके हक़ के बक़द्र) नेकियाँ दी जायेंगी, ऐसे ही दूसरे हक़ वाले को उसकी नेकियों में से (उसके हक़ के बक़द्र) नेकियाँ दी जायेंगी। फिर अगर दूसरों के हुक़ूक़ चुकाये जाने से पहले उसकी सारी नेकियाँ ख़त्म हो जायेंगी तो (उन हुक़ूक़ के बक़द्र) हक़दारों और मज़लूमों के गुनाह (जो उन्होंने किये होंगे) उन से लेकर उसक शख़्स पर डाल दिये जायेंगे और फिर उस शख़्स को दोज़ख में फेंक दिया जायेगा। (मुस्लिम)

अल्लाह तआला ने अपने पाक कलाम में भी बार बार हमें तौबा करने की तलक़ीन फ़रमायी है। इख़्तसार के पेशे नज़र सिर्फ़ दो आयात पेश हैं: ऐ मोमिनो! तुम सब अल्लाह के सामने तौबा करो, ताकि तुम कामयाब हो जाओ। (सूरतुन्नूर 31) ऐ ईमान वालो! अल्लाह के सामने सच्ची तौबा करो। बहुत मुमकिन है कि तुम्हारा परवरदिगार तुम्हारे गुनाह माफ़ करके तुम्हें जन्नत में दाख़िल कर दे। (सूरतुत्तहरीम 8) पहली आयत में अल्लाह तआला ने इरशाद फ़रमाया कि तौबा करने वाले कामयाब हैं, दूसरी आयत में इरशाद फ़रमाया कि सच्ची तौबा करने वालों के गुनाह माफ़ कर दिये जाते हैं और उनको जन्नत में दाख़िल किया जायेगा।

क़यामत तक आने वाले इन्सानों व जिनों के नबी हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: ऐ लोगो! अल्लाह की बारगाह में तुम तौबा व इस्तिग़फ़ार करो। मैं दिन में सौ सौ मर्तबा तौबा करता हूँ। (मुस्लिम) इसी तरह फ़रमाने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम है: अल्लाह की क़सम! मैं अल्लाह तआला से एक एक दिन में सत्तर सत्तर मर्तबा से ज़्यादा तौबा व इस्तिग़फ़ार करता हूँ। (बुख़ारी) हमारे नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम गुनाहों से पाक व साफ और मासूम होने के बावजूद रोज़ाना सौ सौ मर्तबा इस्तिग़फ़ार किया करते थे, इसमें उम्मते मुस्लिमा को तालीम है कि हम रोज़ाना ऐहतमाम के साथ अल्लाह तआला से अपने गुनाहों की माफ़ी मांगते रहें, इसमें हमारा ही फ़ायदा हैजैसा कि हमारे नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: जो शख़्स पाबंदी से इस्तिग़फ़ार करता रहे (यानि अपने गुनाहों से माफ़ी तलब करता रहे) अल्लाह तआला उसके लिए हर तंगी से निकलने का रास्ता बना देते हैं, हर ग़म से उसे निजात अता फ़रमाते हैं और ऐसी जगह से रोज़ी अता फ़रमाते हैं कि जहां से उसको गुमान भी नहीं होता। (अबू दाऊद-बाबुन फ़िल इस्तिग़फ़ार)

कोई शख़्स कब तक तौबा कर सकता है?: हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमायाअल्लाह तआला अपने बन्दे की तौबा उस वक़्त तक कु़बूल फ़रमाता है जब तक वह नज़अ की हालत को ना पहुंच जाये। (तिर्मिज़ी) यानि जब इन्सान का आख़िरी वक़्त आ जाता है तो फिर उसकी तौबा अल्लाह तआला क़बूल नहीं करते हैं। मौत का वक़्त और जगह सिवाये अल्लाह तआला की ज़ात के किसी का मालूम नहीं। चुनांचे कुछ बचपन में, तो कुछ उन्फ़वाने शबाब में और कुछ अधेड़ उम्र में, जबकि बाक़ी बुढ़ापे में दाई--अजल को लब्बैक कह जाते हैं। कुछ सेहतमंद तंदरुस्त नौजवान सवारी पर सवार होते हैं, लेकिन उन्हें नहीं मालूम कि वह मौत की सवारी पर सवार हो चुके हैं। यही दुनियावी फ़ानी वक़्ती ज़िन्दगी, उख़रवी अबदी ज़िन्दगी की तैयारी के लिए पहला और आख़िरी मौक़ा है। लिहाज़ा ज़रूरी है कि हम अफ़सोस करने या ख़ून के आंसू बहाने से क़ब्लइस दुनियावी फ़ानी ज़िन्दगी में ही अपने गुनाहों से तौबा करके अपने मौला को राज़ी करने की कोशिश करें ताकि हमारी रूह हमारे बदन से इस हाल में जुदा हो कि हमारा ख़ालिक़ व मालिक व राज़िक़ हम से राज़ी हो।

सच्चे दिल से तौबा करने पर बड़े से बड़े गुनाहों की भी माफ़ी: हदीस की मशहूर व मारूफ़ किताबों में नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़बाने मुबारक से सुनाया हुआ एक वाक़या मज़कूर है: तुम से पहली उम्मत में एक आदमी था जो 99 आदमियों को क़त्ल कर चुका था। उस ने किसी बड़े आलिमे दीन का पता दरयाफ़्त किया तो लोगों ने उसे एक (ईसाई) राहिब का पता बताया। यह शख़्स उस राहिब के पास गया और कहा कि मैं 99 आदमियों को क़त्ल कर चुका हूँ, क्या अब भी मेरे लिए तौबा का इमकान है? राहिब ने कहा: नहीं। तो उस शख़्स ने राहिब को भी क़त्ल कर डाला और इस तरह 100 क़त्ल पूरे कर दिये। (लेकिन वह अपने किये हुए गुनाह पर बहुत शर्मिन्दा था और अल्लाह तआला से सच्ची तौबा करना चाहता था।) फिर लोगों से बड़े आलिमें दीन का पता किया तो लोगों ने उसको एक और आलिम का पता बताया। यह शख़्स उनके पास गया और कहा मैं सौ आदमियों को क़त्ल कर चुका हूँ, क्या अब भी मेरे लिए तौबा का इमकान है, उसने कहा: हाँ, ज़रूर है। और भला अल्लाह के बन्दे और तौबा के दरमियान कोई चीज़ रूकावट हो सकती है? तुम फलां बस्ती में चले जाओ। वहां अल्लाह के कुछ नेक बंदे अपने रब की इबादत में मसरूफ़ हैं। तुम उनके साथ रहकर अल्लाह की इबादत में मसरूफ हो जाओ। यह शख़्स (तौबा करके) उस बस्ती की जानिब चल दिया। आधा रास्ता तय किया था कि मौत आ गयी। उसकी रूह के बारे में रहमत के फरिश्तों और अज़ाब के फरिश्तों में झगड़ा होने लगा। रहमत के फरिश्तों ने कहा कि यह शख़्स अपने गुनाहों से सच्ची तौबा करके अल्लाह तआला की तरफ मुतवज्जेह हो चुका है, लिहाज़ा हम उसकी रूह लेकर जायेंगे। अज़ाब के फरिश्तों ने कहा कि उसने अभी तक कोई नेक अमल नहीं किया है, लिहाज़ा यह शख़्स रहमत का मुस्तहिक़ नहीं है। अल्लाह के हुक्म से एक फरिश्ता इन्सानी शक्ल में उनके सामने आया। दोनों फ़रीक ने उसको अपना हकम बना लिया। उस इन्सान नुमा फ़रिश्ते ने कहा कि दोनों सरज़मीनों (गुनाह की बस्ती और इबादत की बस्ती) की पैमाईश कर लो, जिस इलाक़े से यह क़रीब हुआ उसी इलाक़े के लोगों में शामिल कर दो। चुनांचे उन्होंने ज़मीन की पैमाइश की, उस इलाक़े से क़रीबतर पाया जिसमें इबादते इलाही के इरादे से वह जा रहा था। कुछ रिवायात में आता है कि ख़ुद अल्लाह तआला ने बदकारी की सरज़मीन को हुक्म दिया कि तू दूर हो जा और नेकोकारी की सरज़मीन को हुक्म दिया कि तू क़रीब हो जाऔर इस तरह नेकी की सरज़मीन एक बालिश्त क़रीब निकली चुनांचे उसकी मग़्फ़िरत कर दी गयी।

इस वाक्ए की ताईद क़ुरआन व हदीस से भी होती है, चुनांचे अल्लाह तआला सूरतुज़्ज़ुमर आयत 53 में इरशाद फ़रमाता है: कह दो कि ऐ मेरे वह बन्दों! जिन्होंने अपनी जानों पर ज़्यादती कर रखी हैअल्लाह की रहमत से मायूस ना हो। यक़ीन जानो अल्लाह सारे के सारे गुनाह माफ़ कर देता है। यक़ीनन वह बख़श्ने वाला, बड़ा मेहरबान है।’’ फ़रमाने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम है: अल्लाह तआला रात को अपना हाथ फैलाते हैं ताकि दिन में गुनाह करने वाला रात को तौबा करे और दिन को अपना दस्ते क़ुदरत फैलाते हैं ताकि रात को गुनाह करने वाला दिन को तौबा करे। (सहीह मुस्लिम) अल्लाह तआला दुनिया में शिर्क जैसे बड़े गुनाह को भी सच्ची तौबा करने पर माफ़ कर देता है। लिहाज़ा हमें गुनाहों की कसरत के बावजूद अल्लाह तआला की रहमत से मायूस नहीं होना चाहिए, लेकिन फ़रमाने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम (अक़लमंद शख़्स वह है जो अपना मुहासिबा करता रहे और मरने के बाद के लिए अमल करता रहे। और बेवकूफ़ शख़्स वह है जो अपनी ख़्वाहिश पर अमल करे और अल्लाह तआला से बड़ी बड़ी उम्मीदें बांधे) (तिर्मिज़ी व इब्ने माजा) के मुताबिक हमें गुनाह करने की जुरअत नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ऐसा ना हो कि तौबा की तौफ़ीक़ मिलने से पहले ही हमारी रूह जिस्म से परवाज़ कर जाये।

इस वाक्ये से हमें यह सबक़ लेना चाहिए कि अल्लाह तआला हमें इस वक़्त भी माफ़ करने के लिए तैयार है, लिहाज़ा फ़ौरन गुनाहों से माफ़ी मांग कर अच्छाईयों की तरफ़ सबक़त करें। कल, जुमा या रमज़ान पर अपनी तौबा को मुअल्लक़ ना करें। बल्कि अभी गुनाहों से बचकर अपने किये हुए गुनाहों पर शर्मिन्दा हों और अल्लाह तआला से तौबा करें। इंशाअल्लाह अल्लाह हमारे बड़े बड़े गुनाहों को भी अल्लाह तआला माफ़ करने के लिए तैयार है। अगर तौबा से क़ब्ल हमारी रूह हमारे जिस्म से दूर होने लगे तो फिर ख़ून के आंसू बहाने से भी कोई फ़ायदा नहीं होगा। अगर हमने बंदों के हुक़ूक़ में कोताही की है तो पहली फुरसत में हक़ूक़ की अदायगी करके या माफ़ी तलब करके बंदे से अपना मामला साफ़ कर लें, वरना क़यामत के दिन आमाल के ज़रिए हुक़ूक़ की अदायगी की जायेगी जैसा कि हमारे नबी ने बयान किया है। जहां तक दुनियावी ज़िन्दगी में मशग़ूलियत का तअल्लुक़ है तो हमारे नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि अगर इन्सान को एक वादी सोने की मिल जाये तो वह चाहता है कि उसके पास दो वादियां हों। उसके मुंह को क़ब्र की मिट्टी ही भरेगी और तौबा करने वाले की तौबा अल्लाह तआला क़बूल फ़रमायेंगे। (बुख़ारी व मुस्लिम)

बड़े बड़े गुनाहों से मुस्तक़िल तौबा करना ज़रूरी है, अगरचे छोटे छोटे गुनाहों की मग़फिरत के लिए इस्तिग़फ़ार पढ़ना भी काफ़ी है। इसीलिए उलमाए किराम ने क़ुरआन व हदीस की रोशनी में तहरीर किया है कि हमें हर नमाज़़ के बाद और सुबह व शाम इस्तिग़फ़ार पढ़ना चाहिए। इन्सान के साथ शैतान, अपना नफ़्स और मुआशरा लगा हुआ है, जिसकी वजह से इन्सान गुनाह से सच्ची तौबा करने के बावजूद उस गुनाह को दोबारा कर बैठता है, लेकिन इन्सान को हमेशा अपने गुनाहों पर शर्मिन्दा होकर आइन्दा ना करने के अज़्म के साथ तौबा करते रहना चाहिए और इस बात की दिन रात फ़िक्र करनी चाहिए कि फलां गुनाह से कैसे निजात हासिल की जाये, जैसा कि मज़कूरा बाला वाक़ये में 99 क़त्ल करने के बाद वह शख़्स सच्चे दिल से तौबा करना चाहता था। अगर गुनाह से बचने का पुख़्ता इरादा है तो अल्लाह तआला ज़रूर उस शख़्स को गुनाह से बचने की तौफ़ीक अता फ़रमायेगा।

डॉ॰ मुहम्मद नजीब क़ासमी संभली (www.najeebqasmi.com)