बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीनवस्सलातु वस्सलामु अला नबिय्यिल करीम व अला अलिहि व अस्हाबिहि अजमईन

सबसे ज़्यादा जन्नत में ले जाने वाला अमल तक़वा (परहेजग़ारीहै

तक़वा के माअना:

अपने आपको अपने रब की नाराज़गी से बचाना तक़वा है। तक़वा यानि अल्लाह का ख़ौफ़ तमाम भलाइयों का मजमूआ है। अल्लाह तआला ने दुनिया के वुजूद से लेकर क़यामत तक आने वाले तमाम इन्सानों व जिनों के लिए तक़वा की वसीयत फ़रमायी है। तक़वा ही कल क़यामत के दिन निजात दिलाने वाली क़श्ती है। तक़वा मोमिनीन के लिए बेहतरीन लिबास और बेहतरीन ज़ादेराह है। यह वह अज़ीम नेमत हैजिससे दिल की बंदिशें खुल जाती हैंजो रास्ते को रोशन करती हैं और इसी की बदौलत गुमराह भी हिदायत पा जाता है। तक़वा एक ऐसा क़ीमती मोती है कि उसके ज़रिए बुराइयों से बचना और नेकियों को इख़्तियार करना आसान हो जाता है। तक़वा से बारे में दामादे रसूल हज़रत अली रज़िअल्लाहुअन्हु का एक क़ौल किताबों में मज़कूर है कि तक़वा दरअसल अल्लाह तआला से डरनेशरीअत पर अमल करनेजो मिल जाये उस पर क़नाअत करने और क़यामत के दिन की तैयारी करने का नाम है। तक़वा की एक तारीफ़जो सहाबी--रसूल हज़रत उबई बिन कअब रज़िअल्लाहुअन्हु ने हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़िअल्लाहुअन्हु से दरयाफ़्त करने पर बयान फ़रमायी थीइस तरह हैहज़रत उबई बिन कअब रज़िअल्लाहुअन्हु ने उनसे पूछा: क्या आप कभी कांटों वाले रास्ते पर नहीं चलेहज़रत उमर रज़िअल्लाहु अन्हु ने जवाब दिया क्यों नहींहज़रत उबई बिन कअब रज़िअल्लाहु अन्हु ने उनसे पूछा उस वक़्त तुम्हारा अमल क्या होता हैहज़रत उमर रज़िअल्लाहु अन्हु ने कहा कि मैं अपने कपड़े समेट लेता हूँ और कोशिश करता हूँ कि मेरा दामन कांटों में ना उलझ जाये। हज़रत उबई बिन कअब रज़िअल्लाहु अन्हु ने कहा कि बस यही तक़वा है। (तफ़सीर इब्ने कसीरतक़वा का अस्ल मरकज़ दिल हैअलबत्ता इसका इज़हार मुख़्तिलफ़ आमाल के ज़रिए होता हैजैसा कि नबी--अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दिल की तरफ़ इशारा करते हुए फ़रमायातक़वा यहां है। (मुस्लिमग़र्ज़ कि तक़वा असल में अल्लाह तआला से ख़ौफ़ व रजा के के साथ हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तरीक़े के मुताबिक़ ममनूआत से बचने और अवामिर पर अमल करने का नाम है।

तक़वा की अहमियत:

अल्लाह तआला ने अपने पाक कलाम की सैंकड़ों आयात में मुख़्तिलफ़ अन्दाज़ से तक़वा यानि अल्लाह से डरने का हुक्म और उसकी अहमियत व ताकीद को ज़िक्र किया है। तक़वा से मुतअल्लिक़ तमाम आयात का ज़िक्र करना इस वक़्त मेरे लिए मुमकिन नहीं हैलेकिन चंद आयात का तर्जुमा पेश कर रहा हूँऐ ईमान वालोंदिल में अल्लाह का वैसा ही ख़ौफ़ रखो जैसा ख़ौफ़ रखना उसका हक़ है। (सूरह आले इमरान 102) ऐ ईमान वालोअल्लाह से डरोऔर सीधी सच्ची बात कहा करो। (सूरह अलअहज़ाब 70) ऐ ईमान वालोंअल्लाह से डरोऔर सच्चे लोगों के साथ रहा करो। (सूरह अत्तौबा 119) ऐ ईमान वालोंअल्लाह से डरोऔर हर शख़्स यह देखे कि उसने कल के लिए क्या आगे भेजा है। और अल्लाह से डरो। (सूरह अलहश्र 18) तक़वा कोई ऐसा अमल नहीं है जो सिर्फ़ इस उम्मत के लिए ख़ास हो बल्कि दुनिया के वुजूद से लेकर आजतक और क़यामत तक आने वाले हर शख़्स से मतलूब है कि वह अल्लाह से डरकर ज़िन्दगी के दिन गुज़ारेफ़रमाने इलाही हैहमने तुम से पहले अहले किताब को भी और तुम्हें भी यही ताकीद की है कि अल्लाह से डरो। (सूरह अन्निसा 131)

खालिक़े कायनात ने अपने हबीब मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को भी तक़वा यानि अल्लाह से डरने का हुक्म दिया है चुनांचे सूरह अलअहज़ाब आयत नम्बर में इरशादे बारी हैऐ नबीअल्लाह से डरते रहो। ज़िल्लत के नकशों में इज़्ज़त देने वाले ने क़ुरआन में एलान कर दिया कि उसके दरबार में माल व दौलत और जाह व मनसब से कोई शख़्स अज़ीज नहीं बन सकताबल्कि उसके यहाँ इज़्ज़त का मेयार सिर्फ़ अल्लाह का ख़ौफ है। जो जितना अल्लाह तआला से डर कर इस फानी दुनिया में ज़िन्दगी गुज़ारेगा वह उसके दरबार में उतना ही ज़्यादा इज़्ज़त पाने वाला होगाचुनांचे फ़रमाने इलाही हैदरहक़ीकत अल्लाह के नज़दीक तुम में सबसे ज़्यादा इ़ज़्जत वाला वह शख़्स है जो तुम में सबसे ज़्यादा मुत्तक़ी हो। (सूरह अलहुजरत 13)

इबादतीमामलाती और मआशरती ज़िन्दगी में चैबीस घंटे हर वक़्त अल्लाह तआला का ख़ौफ़ आसान नहीं हैजब कि शैताननफ़्स और मआशरह हमें मुख़ालिफ़ सिम्त ले जाने पर मुसिर रहता हैचुनांचे रहमतुललिल आलमीन ने बन्दों पर रहम फ़रमाकर इरशाद फ़रमायाजहां तक तुम से हो सके अल्लाह से डरते रहो। (सूरह अत्तग़ाबुन 16) यानि हर शख़्स अपनी इस्तिताअत के मुताबिक अल्लाह से डरते हुऐ ज़िन्दगी के लम्हात गुज़ारता रहे। अगर किसी शख़्स से कोई ग़लती हो जाये तो फ़ौरन दिल से माफ़ी मांगेइंशाअल्लाह अल्लाह उसको अल्लाह तआला माफ़ फ़रमायेगा। लेकिन इसका मतलब हरगिज़ यह नहीं है कि हम तक़वा में भी डंडी मारना शुरू कर देंजैसा कि फ़रमाने इलाही हैऐ ईमान वालोअल्लाह से डरो जैसा कि उससे डरने का हक़ है। (सूरह आले इमरान 102)

हज के सफ़र के दौरान और आम ज़िन्दगी में भी एक मुसलमान दुनियावी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कई चीज़ों से आरास्ता होना चाहता हैफ़रमाने इलाही हैऔर (हज के सफ़र मेंज़ादे राह साथ ले जाया करो, क्योंकि बेहतरीन ज़ादे राह तक़वा है। (सूरह अलबक़रा 197) यानि दुनियावी असबाब को इख़्तियार करना शरीअते इस्लामिया के ख़िलाफ़ नहीं है, लेकिन सबसे बेहतर ज़ादे राह तक़वा यानि अल्लाह का ख़ौफ है। सूरह अत्तलाक़ आयत व में राजिक़े कायनात ने एलान कर दिया कि तक़वा का रास्ता इख़्तियार करने वाला दोनों जहां की कामयाबी हासिल करने वाला है: और जो कोई अल्लाह से डरेगाअल्लाह उसके लिए मुश्किल से निकलने का कोई रास्ता पैदा कर देगाऔर उसे ऐसी जगह से रिज़्क अता करेगा जहां से उसे गुमान भी नहीं होगा। नीज़ दूसरे मक़ाम पर फ़रमाया: अगर तुम अल्लाह से डरोगे तो अल्लाह तआला तुम को एक ख़ास इम्तियाज़ अता फ़रमायेगा और तुम्हारे गुनाह तुम से दूर कर देगा और तुम्हारी मग़फ़िरत फ़रमायेगा। (सूरह अल अन्फाल 29)

तक़वा के फ़वाईद व समरात:

अल्लाह तआला ने क़ुरआने करीम में तक़वा के मुख़्तिलफ़ फ़वाएद व समरात ज़िक्र फ़रमाये हैंचंद हस्बे जै़ल हैं:

हिदायत मिलती है, (सूरह अलबक़रा 2)। ऐसा इल्म मिलता है जिसके ज़रिए हक़ व बातिल के दरमियान फ़र्क़ किया जा सके (सूरह अल अन्फाल 29)। ग़म दूर हो ज़ाते हैं और वसीअ रिज़्क़ मिलता है। (सूरह अत्तलाक़ व 3)।अल्लाह की मदद हासिल होती है (सूरह अन्नहल 128)। अल्लाह की मइय्यत हासिल होती है (सूरह जासिया 19)। अल्लाह की मुहब्बत मिलती है। (सूरह अत्तौबा 7)। दुनियावी उमूर में आसानी होती है (सूरह अत्तलाक़ 4)। गुनाहों की माफ़ी और अज्रे अज़ीम का हुसूल होता है (सूरह अत्तलाक़ 8)। नेक अमल की क़बूलियत होती है (सूरह अलमायदा 27)। कामयाबी हासिल होती है (सूरह आले इमरान 130)। अल्लाह की जानिब से ख़ुशख़बरी मिलती है। (सूरह युनूस 62-64)। जहन्नम से छुटकारा मिल जाता हैजो इन्तहाई बुरा ठिकाना है (सूरह मरियम 71 व 72)। हर इन्सान की सबसे बड़ी ख़्वाहिश यानि जन्नत में दाख़िला नसीब होता है (सूरह नून 34)

तक़वा और इस्लाम के बुनियादी अरकान के दरमियान तअल्लुक 

तक़वा और नमाज़़अल्लाह तआला ने अपने पाक कलाम में इरशाद फ़रमायाबेशक नमाज़़ बेहयायी और बुराइयों से रोकती है। (सूरह अलअनकबूत 45) बेहयाई और बुराइयों से रुकना ही तक़वा है। तक़वा और ज़कातअल्लाह तआला ने इरशाद फ़रमायाउनके माल से ज़कात लो, ताकि उनको पाक करे और बाबरकत करे उसकी वजह सेऔर दुआ दे उनको। (सूरह अत्तौबा 103)ज़कात कोई टैक्स नहीं है जो मुसलमान हुकूमत को अदा करता हैइसी तरह ज़कात की अदायगी अमीर का ग़रीब पर कोई एहसान नहीं हैबल्कि जिस तरह मरीज़ को अपने बदन की इस्लाह के लिए दवा की ज़रूरत होती हैइसी तरह अपने नफ़्स की इस्लाह के लिए हर मुसलमान की ज़रूरत है कि वह अल्लाह के हुक्म पर अपने माल की ज़कात अदा करे। और यह सिर्फ़ अल्लाह के ख़ौफ़ की वजह से होता है कि इन्सान माल जैसी मरग़ूब चीज़ को अल्लाह तआला के हुक्म पर क़ुरबान करने के लिए तैयार हो जाता हैऔर यही ख़ौफ़े ख़ुदा तक़वा की बुनियाद है। तक़वा और रोज़ारोज़ा उन आमाल में से है जो तक़वा के हुसूल में मददगार होते हैं। अल्लाह तआला ने अपने पाक कलाम में रोज़े की फर्ज़ीयत की यही हिकमत बताई है कि रोज़े से इन्सान में तक़वा पैदा होता है। फ़रमाने इलाही हैऐ ईमान वालोतुम पर रोज़ा फ़र्ज किया गया जिस तरह तुम से पहली उम्मतों पर फ़र्ज़ किया गया था ताकि तुम मुत्तकी बन जाओ। (सूरह अलबक़रा 183) रोज़े से ख़्वाहिशात को क़ाबू में रखने का मलका पैदा होता है और यही तक़वा यानि अल्लाह के ख़ौफ़ की बुनियाद है। तक़वा और हजसूरह अलहज की इब्तदा ही अल्लाह तआला ने तक़वे की तालीम से करके क़यामत तक आने वाले तमाम इन्सानों और जिनों को बता दिया कि हज की अदायगी के लिए दुनिया के चप्पे चप्पे से जम्मे ग़फ़ीर का जमा होना क़यामत के दिन को याद दिलाता है जहाँ दूध पिलाने वाली माँ अपने उस बच्चें तक को भूल जायेगी जिसको उसने दूध पिलाया। ग़र्ज़ कि मनासिके हज की अदायगी में भी यह तालीम है कि हम क़यामत के दिन की तैयारी करेंऔर ज़ाहिर है यह दिल में अल्लाह के ख़ौफ की वजह से ही मुमकिन है और यही तक़वा है।

हम मुत्तक़ी कैसे बनें?

इसका जवाब बहुत आसान है कि मुत्तक़ियों की जो सिफ़ात अल्लाह तआला ने अपने पाक कलाम में बयान फ़रमायी हैं वह सिफ़ात अपने अन्दर पैदा करने की कोशिश करें। चैबीस घंटे हर लम्हे हमारे दिल व दिमाग़ में यह रहना चाहिए कि अल्लाह तआला हमें देख रहा हैऔर उसे हमें अपनी ज़िन्दगी के एक एक लम्हें का हिसाब देना हैख़्वाह हम मस्जिदे हराम में बैतुल्लाह के सामने हों या घर में अपने बच्चों के साथबाज़ार में ग्राहकों के साथ हों या चैपाल में लोगों के साथ। दारूल हदीस की मसनद पर बैठकर बुख़ारी जैसी हदीस की मुसतनद किताब पढ़ा रहे होंया किसी कॉलेज में साइंस की तालीम दे रहे होंमस्जिद के मेहराब में बैठकर क़ुरआने करीम की तिलावत कर रहे हों या किसी यूनिवर्सिटी में हिसाब की तालीम हासिल कर रहे हों। यही दुनियावी ज़िन्दगीहमेशा हमेशा की ज़िन्दगी में कामयाबी हासिल करने का पहला और आख़िरी मौक़ा हैकिसी भी वक़्त मौत का फरिश्ता हमारी रूह हमारे जिस्म से जुदा कर सकता है। मरने के बाद ख़ून के आंसू के समन्दर बहाने की बजाये अभी अल्लाह तआला के सामने सच्ची तौबा करके गुनाहों से बचें और क़यामत तक आने वाले इन्सानों व जिनों के नबी के तरीक़े पर अल्लाह के हुक्मों को बजा लायें। अगर हम इस क़ीमती मोती से आरास्ता हो गये तो सबसे ज़्यादा बुरे ठिकाने से महफूज़़ रहकर ख़ालिक़े कायनात के मेहमान ख़ाने में हमेशा हमेशा चैन व सुकून व राहत के साथ अल्लाह तआला की ऐसी ऐसी नेमतों से सरफ़राज़ होंगे कि जिनके बारे में हम सोच भी नहीं सकते। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा गया कि कौनसी चीज़ सबसे ज़्यादा जन्नत में ले जाने वाली हैआप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायावह तक़वा (परहेज़गारीऔर अच्छे अख़लाक़ है। फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा गया कि कौनसी चीज़ सबसे ज़्यादा जहन्नम में ले जाने वाली हैआप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायामुंह और शर्मगाह। (इब्ने माजामुंह से मुराद हराम माल खानादूसरों की ग़ीबत करनाझूट बोलना वग़ैरह वग़ैरह। शर्मगाह से मुराद ज़िना और उसके लवाज़मात। ग़र्ज़ कि उमूमन तक़वा तीन उमूर से हासिल होता हैः 1) अहकामे इलाही पर अमल करना और बुराइयों से बचना। 2) नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नतों पर अमल करना और मकरूह चीज़ों से अपनी हिफ़ाज़त करना। 3) शक व शुबह वाले उमूर से अपने आपको महफूज़़ रखना और कुछ जायज़ कामों को भी तर्क करनाजैसा कि फ़रमाने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हैकोई शख़्स उस वक़्त तक मुत्तक़ियों में शामिल नहीं हो सकता जब तक वह कुछ जायज़ चीज़ें ना छोड़ दे जिनमें कोई हर्ज नहीं हैउन चीज़ों से बचने के लिए जिनमें हर्ज है। (तिर्मिज़ीइब्ने माजाहाकिमबैहक़ी

डॉ॰ मुहम्मद नजीब क़ासमी संभली (www.najeebqasmi.com)