بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

मसइला बीमा (Insurance)

मगरिब से मुतअस्सिर हो कर अब मुस्लमानों ने भी ज़िन्दगी, मकान, गाड़ी और मुख्तलिफ चीज़ों के इन्श्योरेंस कराने को अपनी ज़रूरत समझना शुरू कर दिया है लेकिन हमें चाहिए कि इन्श्योरेंस के जाएज़ होने या न होने या इज्तिरारी हालत में उसकी बाज़ शकलों के जवाज़ के मुतअल्लिक क़ुरान व हदीस की रोशनी में उलमा-ए-किराम से मसअला पूछे और फिर उसके मुताबिक अमल करें। याद रखें कि इन्श्योरेंस की तारीख बहुत ज़्यादा कदीम नहीं है, एशयिाई मुल्कों में तो इसका रिवाज तकरीबन बीस से पचीस साल से ही ज़्यादा हुआ है। तमाम मकातिबे फिक्र के उलमा का इत्तिफाक है कि दुनिया में राएज बीमा का निज़ाम अपनी असल वज़ा में जुए और सूद का मुरक्कब है और यह दोनों इस्लाम में हराम हैं, लिहाज़ा बीमा पर बहस करने से पहले मुनासिब समझता हूं कि क़ुरान करीम की रोशनी में सूद और जुए के हराम होने पर मुख्तसर रोशनी डाल दुँ।

सूद की हुरमत
सूरह बक़रह की आयत 275 से 279 में अल्लाह तआला ने सख्त अल्फ़ाज़ के साथ सूद से बचने की तालीम दी है और फरमाया कि सूद लेने और देने वाले अगर तौबा नहीं करते हैं तो वह अल्लाह और उसके रसूल से लड़ने के लिए तैयार हो जाऐं। नीज़ फरमाया कि सूद लेने और देने वालों को कल क़यामत के दिन जलील व रूसवा किया जाएगा और वह जहन्नम में डाले जाऐंगे, गरज़ ये कि क़ुरान करीम में सूद को इतना बड़ा गुनाह क़रार दिया है कि शराब नोशी, खिनज़ीर खाने और ज़िना कारी के लिए क़ुरान करीम में वह लफ्ज़ इस्तेमाल नहीं किए गए जो सूद के लिए अल्लाह तआला ने इस्तेमाल किए हैं। 275 से 279 आयात का खुलासा तफसीर यह है।

‘‘जो लोग सूद खाते हैं वह क़यामत में उस शख्स की तरह उठेंगे जिसे शैतान ने छूकर पागल बना दिया हो।" सूद की बाज़ शकलों को जाएज़ क़रार देने वाले के लिए फरमान इलाही है कि यह ज़िल्लत आमेज़ अज़ाब इस लिए होगा कि उन्होंने कहा था कि खरीद व खरोख्त भी तो सूद की तरह होती है हालांकि अल्लाह तआला ने खरीद व फरोख्त को हलाल किया है आर सूद को हराम क़रार दिया है। लिहाज़ा जिस शख्स के पास उसके परवरदिगार की तरफ से नसीहत आ गई और वह सूदी मामलात से बाज़ आ गया तो गुज़रे हुए वक़्त में जो कुछ हुआ वह इसी का है और उसकी पोशिदा कैफियत का मामला अल्लाह तआला के हवाला है। और जिस शख्स ने लौट कर फिर वही यानी सूद का काम किया तो ऐसे लोग दोज़खी हैं, वह हमेशा उसमें रहेंगे। अल्लाह तआला सूद को मिटाता है और सदकात को बढ़ाता है। जब सूद की हुरमत का हुकुम हुकुम नाज़िल हुआ तो लोगों का दूसरों पर सूद का जितना भी बक़ाया था उसको भी लेने से मना फरमा दिया गया और इरशाद फरमाया कि ऐ ईमान वालों! अल्लाह तआला से डरो और जो सूद बाक़ी रह गया है वह छोड़ दो अगर तुम सचमुच ईमान वाले हो। और अगर ऐसा नहीं करने तो तुम अल्लाह तआला से और उसके रसूल से लड़ने के लिए तैयार हो जाओ। गरज़ ये कि सूद खाने वालों के लिए अल्लाह और उसके रसूल की तरफ से एलाने जंग है और यह ऐसी सख्त वईद है जो किसी और बड़े गुनाह मसलन ज़िना करने, शराब पीने के इरतिकाब पर नहीं दी गई।‘‘

जुए की हुरमत
अल्लाह तबारक व तआला इरशाद फरमाता है ‘‘ऐ ईमान वालो! शराब, जुआ बुतों के थान और जुए के तीर यह सब नापाक शैतानी काम हैं। लिहाज़ा इन से बचो, ताकि तुम कामयाब हो जाओ। शैतान तो यही चाहता है कि शराब और जुए के जरिये तुम्हारे दरमियान दुशनी और बुग्ज़ के बीज डाल दे और तुम्हें अल्लाह की याद और नमाज़ से रोक दे। अब बताओ कि क्या तुम (इन चीजों से) बाज़ आ जाओगे। (सूरह अल माइदा आयत 90-91)
इन आयात में चार चीजें क क़तई तौर हराम की गई हैं
1) शराब
2) किमार बाज़ी यानी जुआ
3) बुतों के थान यानी वह मक़ामात जो अल्लाह के सिवा किसी दूसरे की इबादत करने या अल्लाह के सिवा किसी और के नाम पर कुर्बानी और नजर व नियाज़ चढ़ाने के लिए मखसूस किए गए हैं।
4) पांसे (जुए के तीर)
किमार, मैसीर और अज़लाम मुतरादिफ अल्फाज़ हैं अगरचे मानी में मामूली सा फर्क है लेकिन इन तमाम अल्फाज़ के मानी जुए के ही हैं, जिसको अल्लाह तआला ने हराम क़रार दिया है और अल्लाह तआला ने इस काम को शैतान का नापाक अमल क़रार दिया है जिसके ज़रिये वह इंसानों को सिराते मुस्तकीम से बहकाने का जो अहद उसने कर रखा है उसको पूरा कर सके, इसके अंदर अगर कोई पहलू नफा का नज़र आता तो यह महज नज़र का धोका है, इसके नुकसानात नफा के मुकाबले इतने ज़्यादा है कि हकीर नफा की कोई क़ीमत नहीं है। आखिर में अल्लाह तआला ने फरमाया कि दुनिया व आखिरत की कामयाबी इसी में है कि इन चीजों से बचा जाए। और आयत के आखिर में अल्लाह तआला ने इन चीजों की एक और खराबी ज़िक्र फरमाई है कि यह चीजें तुम्हें अल्लाह तआला की याद और नमाज़ से गाफिल कर देती है। गरज़ ये कि इस आयत में अल्लाह तआला ने जुए को शराब के बराबर क़रार दिया ताकि जुए की हुरमत में कोई शक व शुबहा बाक़ी न रहे।

तक़दीर पर ईमान में खलल
इन्श्योरेंस के मंफी पहलूओं में तीसरा अहम मंफी पहलू यह है कि इन्श्योरेंस तक़दीर पर ईमान से किसी हद तक अमली इंकार का सबब बनता है, जबकि तकदीर पर ईमान रखना हर मुस्लमान के लिए ज़रूरी और ईमान के अरकान में से एक है। तकदीर का तकाजा है कि जाएज़ व शरई असबाब व वसाइल इखतियार किए जाऐं और मुस्तकबिल में पेश आने वाले हालात अल्लाह तआला के सुपूर्द किए जाऐं और उसका यकीन रखा जाए कि खुशहाली और परेशानी सब अल्लाह तआला ही तरफ से आती है और अल्लाह तआला के फैसला को कोई दुनियावी ताकत टाल नहीं सकती है। जबकि इन्श्योरेंस इससे फरार की राह है क्योंकि इसमें पहले से हालात व हवादिस की पेश बन्दियां नाजाएज़ तरीकों से की जाती हैं।

बीमा (Insuruance) की हकीकत
इन्श्योरेंस में बाज़ शराएत पर एक शख्स को दूसरे की तरफ से मुस्तकबिल में पेश आने वाले इमकानी खतरात से हिफाजत और बाज़ इमकानी नुकसानात की तलाफी की यकीन दहानी कराई जाती है, जिस शख्स के लिए खतरात से हिफाजत और नुकसानात की तलाफी की यकीन दहानी कराई जाती है वह एक मुअय्यन मुद्दत तक एक मुक़र्ररह रक़म बीमा कम्पनी को अदा करता है। गरज़ ये कि बीमा कराने वाले और बीमा कम्पनी के दरमियान एक तरह का समझौता होता है और शरई एतेबार से समझौता के लिए ज़रूरी है कि किसी एैन या मनफअत पर कायम हो वरना समझौता बातिल होगा यानी या तो समझौता इवज़ के साथ एैन पर कायम हो जैसे खरीद व फरोख्त और शिरकत वगैरह या फिर बिला इवज़ एैन के साथ जैसे हिबा या इवज़ के साथ मनफअत पर कायम हो जैसे किराया दारी या फिर बिला इवज मनफअत के जैसे उधार। जहाँ तक बीमा का तअल्लुक़ है तो इसमें अक़्द की यह शर्तें खत्म हो जाती है, बल्कि यह तो मुबहम मुआवजा की एक ज़िम्मेदारी लेने के मुतरादिफ है। अब देखना यह होगा कि यह ज़िम्मेदारी लेना हराम है या हलाल या कुछ शराएत के साथ हलाल है। लिहाज़ा इन्श्योरेंस की राएज शकलों को अलग अलग ज़िक्र करके उसका शरई हुकुम ज़िक्र कर रहा हुँ। इस सिलसिला में हज़रत मौलाना मुफती मोहम्मद तक़ी उसमानी दामत बरकातुहुम के मज़ामीन से खास इस्तिफादा किया गया है।

ज़िन्दगी का बीमा (Life Insurance)
ज़िन्दगी के बीमा का खुलासा यह है कि बीमा कराने वाला बीमा कम्पनी को एक मुअय्यन मुद्दत तक कुछ किस्तें अदा करता है जिसको प्रीमियम (Premium) कहते हैं। मुअय्यन मुद्दत की तायीन तिब्बी मुआयना के ज़रिया एक अंदाजा लगा कर मुक़र्रर की जाती है। फ़र्ज़ करें कि दस साल की ज़िन्दगी का अंदाजा किया गया तो दस साल तक यह शख्स हर महीने कुछ किस्तें मसलन एक हजार रूपय माहाना जमा करेगा, इस तरह एक साल में बारह हजार और दस साल में एक लाख बीस हजार रूपय जमा होंगे। अब अगर दस साल के अरसा में बीमा कराने वाले का इंतिकाल हो जाता है तो बीमा कम्पनी एक खास रक़म मसलन पांच लाख उस शख्स को अदा करेगी जिसका बीमा कराने वाले ने बीमा कराते वक़्त नाम पेश किया था खाह वह शरई एतेबार से वारिस हो या नहीं उसके अलावा भी दूसरे वारिस हों। और अगर बीमा कराने वाले का दस साल तक इंतिकाल नहीं हुआ तो जमा शुदा पैसा सूद के साथ बीमा कराने वाले को वापस कर दी जाती है। याद रखें कि बीमा कम्पनी प्रीमियम (Premium) के ज़रिया जमा शुदा पैसा को बैंक में रख कर उस पर सूद लेती है।

ज़िन्दगी के बीमा (Life Insurance) का शरई हुकुम
इसमें जमा शुदा पैसा तो महफूज है यानी उसकी वापसी यक़ीनी है अलबत्ता वापसी की रक़म मालूम नहीं है कि मसला मज़कूरा में एक लाख बीस हजार मिलेंगे या पांच लाख यानी मुआवजा मालूम नहीं है, उसकी मिकदार मालूम नहीं है लिहाज़ा यह जुआ हुआ, नीज़ वापसी की रक़म सूद के साथ मिलती है और बीमा कम्पनी हासिल करदा रक़म बैंक में जमा करके सूद भी लेती हैं, मज़ीद यह कि ज़िन्दगी का बीमा कराना तकदीर पर ईमान के खिलाफ है। लिहाज़ा ज़िन्दगी का बीमा सूद और जुए पर मबनी होने की वजह से हराम है, नीज़ इसमें अल्लाह तआला की जानिब से मुतअैयन करदा विरासत के निज़ाम की खिलाफवरजी भी है।

अमलाक या अशिया का बीमा (Goods Insurance)
मुख्तलिफ चीज़ों का बीमा कराया जाता है कि अगर वह चीज़ तबाह हो जाए या उसमें नुकसान हो जाए तो बीमा कराने वाले को चीज़ की क़ीमत मिलेगी या उसकी मरम्मत कराई जाएगी, मसलन इमारत या दुकान का बीमा करा लिया जाए कि अगर इमारत या दुकान में आग लग गई तो बीमा कम्पनी इतने पैसे देगी जो इमारत या दुकान की क़ीमत के बराबर होगी और अगर कुछ नुकसान हुआ है तो नुकसान की तलाफी की जाएगी। इसी तरह सामान का बीमा कराया जाता है कि एक जगह से दूसरी जगह भेजने में अगर सामान बरबाद हो जाए तो उसकी क़ीमत मिल सके। इसी तरह गाडि़यों का बीमा कराया जाता है कि अगर चोरी हो जाए या आग लग जाए या किसी हादसा में तबाह हो जाए वगैरह वगैरह तो बीमा कम्पनी इस गाड़ी की क़ीमत अदा करती है या उसकी मरम्मत कराती है लेकिन उसके लिए बीमा कराने वाले को माहाना या सालाना कुछ रक़म बीमा कम्पनी को अदा करनी होती है जिसको प्रीमियम (Premium) कहते हैं जो वापस नहीं मिलती खाह कोई हादसा पेश आए या नहीं।
अमलाक या अशिया के बीमा (Goods Insurance) का शरई हुकुम

जमहूर उलमा की राय है कि यह भी नाजाएज़ है क्योंकि इसमें गरर यानी जुए का उन्सुर मौजूद है। हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस सिलसिला में सारी इंसानियत के लिए एक उसूल बताया ‘‘न आदमी खुद को नुकसान में डाले और न दूसरों को नुकसान पहुंचाए‘‘ (मुअत्ता मालिक, मुसनद अहमद, इबने माजा, दारे कुतनी) एक तरफ से प्रीमियम (Premium) दे कर अदाएगी मुतयक़्क़न है लेकिन दूसरी तरफ से मुआवज़ा मालूम नहीं है और मुअल्लक अललखतर है कि अगर हादसा पेश आ गया तो मुआवज़ा मिलेगा और हादसा पेश नहीं आया तो कोई मुआवज़ा नहीं मिलेगा, लिहाज़ा इसमें गरर यानी धोका पाया जाता है, जमहूर उलमा इस क़िस्म के बीमा के हराम होने के क़ाएल हैं अलबत्ता बाज़ उलमा मसलन शैख मुस्तफा अज़ ज़रक़ा की राय है कि यह बीमा जाएज़ है। हाँ अगर किसी हुकूमत की जानिब से इस क़िस्म का बीमा कराना लाजमी और ज़रूरी हो जाए तो फिर बदरजा मजबूरी कराया जा सकता है।

ज़िम्मेदारियों का बीमा (Third Party Insurance)
बीमा की तीसरी क़िस्म ज़िम्मेदारी का बीमा होता है जिसको थर्ड पार्टी इन्श्योरेंस कहते हैं, इसका मतलब यह है कि अगर बीमा कराने वाले के ज़िम्मे किसी तीसरी पार्टी की तरफ से कोई माली ज़िम्मेदारी आएद हो गई तो बीमा कम्पनी उस ज़िम्मेदारी को पूरा करेगी। मसलन गाड़ी से किसी दूसरे शख्स या किसी दूसरी गाड़ी को नुकसान पहुंचने की सूरत में दूसरे शख्स की गाड़ी के नुकसान की तलाफी बीमा कम्पनी के ज़िम्मे होगी लेकिन इस के लिए बीमा कराने वाले को माहाना या सालाना कुछ पैसे बीमा कम्पनी को अदा करनी होती है, जिसको प्रीमियम (Premium) कहते हैं जो वापस नहीं मिलती चाहे कोई हादसा पेश आए या न आए।

ज़िम्मेदारियों के बीमा (Third Party Insurance) का शरई हुकुम
दूसरी क़िस्म की तरह ज़िम्मेदारियों के बीमा के मुतअल्लिक भी जमहूर उलमा की राय उसके हराम होने की ही है अगरचे बाज़ उलमा ने उसके जवाज़ का इस शर्त के साथ फैसला किया है कि बीमा कम्पनी का कारोबार सूद पर न चलता हो।

सेहत का बीमा (Health Insurance) और उसका शरई हुकुम
जिस मुल्क में सेहत का बीमा कराना ज़रूरी और लाज़मी है वहाँ मजबूरी की वजह से कराया जा सकता है वरना जहाँ तक मुमकिन हो सके इससे बचना चाहिए क्योंकि इस में भी धोका जरूर है कि बीमा कराने वाले तरफ से प्रीमियम (Premium) की अदाएगी मालूम नहीं है लेकिन मुआवज़ा मालूम है और अदा करदा पैसा वापस नहीं होती चाहे आदमी बिल्कुल बीमार ही न हो।

बीमा कम्पनी का तारूफ (Insurance Company)
बीमा की मज़कूरा अकसाम को तिजारती बीमा कहते हैं, इसमें एक कम्पनी इसी मक़सद के लिए क़ायम की जाती है और इन का तरीका-ए-कार यह होता है कि पहले अकचैरी हिसाब के जरिया यह अंदाजा लगाया जाता है कि जो हादसें वाकिआत पेश आते हैं उनका सालाना अवसत क्या है, साल में कितनी जगह आग लगती है, कितनी जगहों पर गाड़ियों का एक्सीडेंट होता है, कितनी जगह रेल का तसादुम होता है, कितने जहाज़ डूबते हैं, कितने ज़लज़ले आते हैं, कितने लोग बीमार होते हैं वगैरह वगैरह इसका एक अवसत निकालते हैं और इस अवसत की बुनियाद पर आने वाले सालों के लिए भी वह हादिसात का अंदाज़ा लगाते हैं कि आने वाले सालों में इस क़िस्म के मुतअस्सिरा अशखास को मुआवज़ा दिया जाए तो कुल कितने खर्चे होंगे और किस्तों पर हासिलशुद पैसा को बैंक में जमा करने पर कितना सूद मिलेगा। फ़र्ज़ करें कि उन्हों ने आने वाले साल में पेश आने वाले हादिसात का अंदाजा लगाया कि एक अरब रूपया है, अब बीमा कम्पनी के सारे खर्चे के बाद दस करोड़ का नफा होना चाहिए। अब उन्होंने मतलूबा पैसा लोगों से वसूल करने के लिए किस्तों की तादाद मुक़र्रर कर दी कि जो भी बीमा कराए वह इतनी किस्त अदा करे, जिसका मकसद यह होता है कि जब सारी किस्तें इकटठी हो जाएं तो हमें कुल कितनी रक़म मिलेगी और इस पर कितना सूद मिलेगा। एक अरब दस करोड़ मिलेंगे तो एक अरब मुआवजा में दे देंगे और दस करोड़ हमारा नफा हो जाएगा। यह तिजारती कम्पनियों का तरीका-ए-कार होता है।

बाहमी इमदाद (Mutual Insurance) का तरीका-ए-कार
बाहमी इमदाद का तरीका-ए-कार यह होता है कि कुछ लोग बाहम मिल कर एक फंड क़ायम करते हैं इसका मकसद मिम्बरान में से किसी मिम्बर के साथ आने वाले हादसा पर उसकी मदद करना होता है। मसलन 100 आदमी मिलकर एक एक हज़ार रूपय सालाना जमा करते हैं कि इस रूपय से आपस में किसी मिम्बर के साथ आने वाले हादसा पर उसकी मदद करेंगे, पैसा कम पड़ने पर दोबारा पैसा डाला जाता है और पैसे बचने पर वह अगले साल के लिए जमा हो जाता है। इस पैसे पर कोई सूद नहीं लिया जाता है। इसमें तिजारत करना पेश नज़र नहीं होता है बल्कि बाहम मिलकर एक दूसरे की मदद करने के लिए फंड बनाया जाता है। यह सूरत सब के नजदीक जाएज़ है।
(एक तजवीज़) दुनिया में राएज सूद और जुए पर मबनी बीमा के तहत मजबूरी में बीमा कराने की सूरत में अदा करदा रक़म से ज़्यादा हासिल होने पर ज़्यादा सदका कर दें और जमा शुदा रक़म से पूरा इस्तिफादा न होने पर इसको सदका समझकर छोड़ दें लेकिन अगर बाहमी इमदाद के तरीका पर बीमा किया गया तो फिर कोई हर्ज नहीं इंशाअल्लाह।

असरे हाजिर में हम क्या करें?
दुनिया में बीमा का राएज तरीका सूद और जुए पर मबनी होने की वजह से असलन तो नाजाएज़ है लेकिन ज़िन्दगी के बाज़ हिस्से में बीमा कानूनन लाज़िम हो गया है उसके बेगैर गुज़ारा नहीं हो सकता, मसलन गाडि़यों का बीमा, दुनिया के तक़रीबन तमाम मुल्कों में गाडि़यों का कम से कम थर्ड पार्टी इन्श्योरेंस कराना लाज़मी है। अब जहाँ कानून ने मजबूर कर दिया तो फिर उलमा-ए-किराम ने बदरजा अवला इन्श्योरेंस कराने की गुंजाइश दी है।
अगर किसी मुल्क या किसी जगह पर वाक़ई किसी मुसलमान की जान या माल महफूज नहीं है तो वहाँ भी बीमा कराने की उलमा ने इजाज़त दी है।
असरे हाजिर के उलाम ने दुनिया में मौजूदा राएज बीमा के मुकाबिल जो निज़ाम तजवीज़ किया है वह बाहमी इमदाद की एक तरक़्क़ी याफता शक्ल है। इस निज़ाम की बुनियाद तबर्रू है न कि अक़्द मुआवजा, जिसका तरीका-ए-कार यह होता है कि मसलन कुछ अफराद ने एक कम्पनी क़ायम करली और जो सरमाया जमा हुआ वह तिजारत में लगा दिया फिर और बीमा दारों को दावत दी जाती है कि आप भी आ कर इसमें पैसा लगाएं, उन्होंने जो रक़म दी वह भी नफा बख्श तिजारत में लगा सरमाया जमा हुआ वह तिजारत में लगा दी गई और साथ में एक फंड बना दिया गया जिसके ज़रिया अगर मिम्बरान को कोई हादसा पेश आ जाए तो इस फंड से उसकी मदद की जाए। साल के आखिर में पैसे बचने पर मिम्बरान को वापस कर दिए जाते हैं या उनके नाम से यह रक़म फंड में आइंदा साल के लिए जमा कर दी जाती हे। इस बुनियाद पर अरब मुमालिक में कुछ कम्पनियाँ क़ायम हुई हैं। बहर हाल बीमा के इस निज़ाम के तहत मतलूब भी हासिल हो जा रहा है और सूद और जुए के उन्सुर से काफी हद तक बचाओ भी है। याद रखें कि हिन्द व पाक की बीमा कम्पनियों में यह निज़ाम मौजूद नहीं है बल्कि उन में आम तौर पर सूद और जुए वाला निज़ाम है।

खुलासा कलाम
जैसा कि दलाएल के साथ ज़िक्र किया गया दुनिया में राएज इन्श्योरेंस का मौजूदा निज़ाम सूद और जुए पर मुशतमिल है और इन दोनों की हुरमत क़ुरान व हदीस में वाज़ेह तौर पर मौजूद है जिनके हराम होने पर उम्मते मुस्लिमा मुत्तफिक है। नीज़ अल्लाह तआला ने इरशाद फरमाया ‘‘नापाक चीजों को ही हम ने हराम हराम किया है‘‘ (सूरह आराफ 157) यानी जुए और सूद के उन्सुर से मुरक्कब बीमा के मौजूदा निज़ाम के अंदर अगर हमें बज़ाहिर नफा नज़र भी आए मगर खालिक़े कायनात के कलाम के मुताबिक इस में शर जरूर पोशीदा है लिहाज़ा हत्तल इमकान दुनिया में राएज इन्श्योरेंस के मौजूदा निज़ाम से बचें। अगर बीमा के मौजूदा निज़ाम से बचने में बज़ाहिर नुकसान नज़र आए तो अल्लाह तआला के इरशाद को याद रखें ‘‘जो कोई अल्लाह से डरेगा अल्लाह उसके लिए मुशिकल से निकलने का कोई रास्ता पैदा कर देगा और ऐसी जगह रिज़्क अता करेगा जहाँ से उसे गुमान भी नहीं होगा और जो कोई अल्लाह पर भरोसा करे तो अल्लाह उस (का काम बनाने) के लिए काफी है‘‘ (सूरह अत्तलाक 2, 3)। इन्श्योरेंस में यक़ीनी तौर पर बाज़ मनाफे मौजूद हैं लेकिन नुकसानात इससे कहीं ज़्यादा हैं, इसी वजह से उलमा-ए-किराम ने क़ुरान व हदीस की रोशनी में बीमा कराने को नाजाएज़ क़रार दिया है, शराब में भी बाज़ मनाफे हैं जैसा कि क़ुरान करीम में अल्लाह तआला ने ज़िक्र किया है मगर नुकसानात फवाएद से बहुत ज़्यादा हैं, जिसकी वजह से इसको शरीअते इस्लामिया में हराम किया गया है। हाँ! अगर सूद और जुए से बिल्कुल महफूज किसी बीमा कम्पनी में अमलाक या चीजों का बीमा कराया जाए तो उसकी गुंजाइश है, इसी तरह ज़िन्दगी के जिस शोबा में हूकूमत की जानिब से बीमा कराना लाज़मी हो जाए कि अब बीमा कराए बेगैर कोई चारा नहीं तो फिर इस शोबा में बीमा कराने की गुंजाइश है। वल्लाहु आलम बिसवाब
असरे हाज़िर के मुहक़्क़िक़ व जदीद मसाइल से बखूबी वाक़िफ़ हज़रत मौलाना मुफती मोहम्मद तक़ी उसमानी दामत बरकातुहूम ने इस मौज़ू पर काफी कुछ तहरीर किया है, मैंने यह मज़मून मौसूफ के मज़ामीन से ही इस्तिफादा करके तहरीर किया है, अल्लाह तआला मौसूफ को दीने इस्लाम की खिदमत के लिए क़बूल फरमाए और हम सब को मुंकारात से बच कर ज़िन्दगी गुज़ारने वाला बनाए, आमीन।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)