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بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

दो नमाज़ों को एक साथ पढ़ना

नमाज़ की वक़्त पर अदाएगी से मुतअल्लिक़ आयाते क़ुरानिया और मुतवातिर अहादीस की रौशनी में मुफस्सेरीन, फुक़हा व उल्मा का इत्तिाफाक है कि फ़र्ज़ नमाज़ को उसके मुतअैय्यन वक़्त पर अदा करना फ़र्ज़ है और बिला उज़्र शरई वक़्त से पहले या बाद में अदा करना गुनाहे कबीरा है।

नमाज़ को वक़्त पर पढ़ने से मुतअल्लिक़ चन्द आयात
““बेशक नमाज़ अहले ईमान पर फ़र्ज़ है जिसका वक़्त मुक़र्रर है”” (सूरह निसा 103)
“नमाज़ों की हिफाज़त करो” (सूरह बक़रा 238) मुफस्सीरे क़ुरान अल्लामा इब्ने कसीर इस आयत की तफसीर में लिखते हैं कि अल्लाह तआला वक़्त पर नमाज़ों को अदा करने की हिफाज़त का हुकुम फरमाते हैं।
“और वह लोग अपनी नमाज़ों की हिफाज़त करते हैं”। (सूरह मआरिज 34) मुफस्सीरे क़ुरान इब्ने कसीर इस आयत की तफसीर में लिखते हैं कि वह लोग नमाज़ के औक़ात, अरकान, वाजिबात और मुस्तहब्बात की हिफाज़त करते हैं।
“सो उन नमाजियों के लिए बड़ी खराबी है जो अपनी नमाज़ में सुस्ती करते हैं” (सूरह माऊन 4 व 5) मुफस्सेरीन ने लिखा है कि वक़्त पर नमाज़ की अदाएगी न करना इस आयत की वईद में दाखिल है।
क़ुरान करीम (सूरह निसा 102) में नमाज़े खौफ की कैफियत और उसके असूल व आदाब बयान किये गए हैं। बहुत सी अहादीस में नमाज़े खौफ की कैफियत बयान की गई है जिन से वाज़ेह होता है कि मैदाने जंग में और एैने जंग के वक़्त सिर्फ नमाज़ की कैफियत में तखफीफ की गुनजाइश है लेकिन वक़्त को नजर अंदाज करने की इजाज़त नहीं है बल्कि इमकानी हद तक वक़्त की पाबन्दी ज़रूरी है। मालूम हआ कि अगर कुफ्फार से जंग हो रही हो और उस वक़्त ज़ररा सी सुस्तीभी हार का सबब बन सकती है तो इस मौका पर भी दो नमाज़ों को जमा करके यानी एक का वक़्त खत्म होने के बाद दूसरे का वक़्त दाखिल होने से पहले पढ़ना जाएज़ नहीं है बल्कि नमाज़ को वक़्त पर अदा किया जाएगा वरना वक़्त के निकलने के बाद उसकी क़ज़ा करनी होगी जैसा कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जंगे अहज़ाब के मौका पर वक़्त पर अदाएगी न करने पर नमाज़ की क़ज़ा की थी।

नमाज़ को वक़्त पर पढ़ने से मुतअल्लिक़ चंद अहादीस नबवी
नमाज़ के औक़ात से मुतअल्लिक़ बहुत सी अहादीस हदीस की किताबों में मौजूद हैं जिनमें से एक यह है कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि मैंने हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा कि कौन सा अमल अल्लाह तआला को सबसे ज़्यादा पसंद है? तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया नमाज़ के वक़्त में नमाज़ पढ़ना। उन्होंने अर्ज़ किया उसके बाद कौन सा अमल ज़्यादा महबूब हैं? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया मां बाप की खिदमत करना। उन्होंने फिर अर्ज़ किया उसके बाद कौन सा अमल? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया अल्लाह तआला के रास्ते में जिहाद करना। (सही बुखारी व सही मुस्लिम)

इसी तरह हज़रत जिबरईल अलैहिस्सलाम की इमामत वाली हदीस बहुत से सहाबा से मरवी है जिसमें लिखा है कि 2 रोज़ हज़रत जिबरईल अलैहिस्सलाम ने इमामत फरमा कर हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को नमाज़ पढ़ाई। पहले दिन हर नमाज़ अव्वल वक़्त में पढ़ाई और दूसरे दिन आखिर वक़्त में पढ़ाई फिर फरमाया कि हर नमाज़ का वक़्त इन दोनों वक्तों के दरमियान है। (अबू दाऊद, तिर्मीज़ी)

हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हमेशा नमाज़ को वक़्त पर अदा फरमाते थे। हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि जंगे अहज़ाब में एक रोज़ जंग की शिद्दत की वजह से हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की असर की नमाज़ फौत हो गई। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सूरज के डूबने के बाद उसकी क़ज़ा पढ़ी और कुफ्फार के खिलाफ सख्त अल्फ़ाज़ में बददुआ फरमाई कि इन लोगों ने हमें नमाज़े असर से मशगूल रखा, अल्लाह तआला इनके घरों और कब्रों को आग से भर दे। (सही बुखारी व सही मुस्लिम)

गौर फरमाएं कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ताईफ के सफर में जब कि आप को लहूलुहान कर दिया गया था फरिशते ने आपके सामाने हाज़िर हो कर उनको कुचलने की पेशकश भी की मगर रहमतुल लिलआलमीन ने उनके लिए हिदायत की ही दुआ फरमाई मगर जंगे अहज़ाब में कुफ्फार की मुज़ाहमत की वजह से नमाज़ के क़ज़ा हो जाने पर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को इस क़दर सदमा पहुंचा कि उनके खिलाफ सख्त से सख्त अल्फ़ाज़ में बददुआ फरमाई।
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि जिस शख्स ने बेगैर किसी उज़्र के दो नमाज़ों को जमा करके पढ़ा उसने गुनाहे कबीरा का इरतिकाब किया। (तिर्मीज़ी)

इस हदीस के एक रावी को इमाम तिर्मीज़ी ने ज़ईफ कहा है फिर भी क़ुरान व हदीस के दूसरे नुसूस से इस हदीस के मज़मून की ताईद होती है, इमाम हाकिम ने इनको हसन व क़वी तसलीम किया है
हज़रत क़तादा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि नमाज़ मे कोताही यह है कि एक नमाज़ को दूसरी नमाज़ के वक़्त तक मुअख्खर कर दिया जाए। (सही मुस्लिम)

दो नमाज़ों को एक साथ जमा करना
क़ुरान व हदीस की रौशनी मे उम्मते मुस्लिमा का इत्तिफाक़ है कि हर नमाज़ को उसके वक़्त पर ही अदा करना चाहिए, यही शरीअते इस्लामिया मे मतलूब है, पूरी ज़िन्दगी इसी पर अमल करना चाहिए और इसी की दावत दूसरों को देनी चाहिए लेकिन अगर कोई शख्स सफर या किसी शरई उज़्र की वजह से दो नमाज़ों को एक साथ पढ़ना चाहे तो इस सिलसिला में फुक़हा व उलमा का इखतिलाफ है। बाज़ फुक़हा व उलमा की एक जमाअत ने सफर या तेज बारिश की वजह से ज़ुहर व असर मे दोनों को एक साथ इसी तरह मग़रिब और इशा मे दोनों को एक साथ पढ़ने की इजाज़त दी है। लेकिन फुक़हा व उलमा की दूसरी जमाअत ने अहादीस की रौशनी में दोनों नमाज़ों को एक साथ पढ़ने की इजाज़त नहीं दी। हज़रत इमाम अबू हनीफा की भी यही राय है, हिन्द व पाक के उलमा का भी यही मौक़िफ़ है। फुक़हा व उलमा की यह जमाअत उन अहादीस को जिन में दोनों नमाजें एक साथ पढ़ने का ज़िक्र आया है ज़ाहिरी जमा पर महमूल करती है, जिसका मतलब यह है कि ज़ुहर की नमाज़ आखिर वक़्त में और असर की नमाज़ अव्वल वक़्त में अदा की जा सकती है, मसलन ज़ुहर का वक़्त एक बजे से चार बजे तक है और असर का वक़्त चार बजे से आफताब डूबने तक तो ज़ुहर को चार बजे से कुछ पहले और असर को चार बजे पढ़ा जाए। इस सूरत में हर नमाज़ अपने अपने वक़्त के अंदर अदा होगी। लेकिन सूरत व अमल के लिहाज से दोनों नमाजें एक साथ अदा होंगी, इसी तरह मग़रिब की नमाज़ आखिर वक़्त में और इशा की नमाज़ अव्वल वक़्त में पढ़ी जाए, इसको जमा ज़ाहिरी या जमा सूरी या जमा अमली कहा जाता है। इस तरह तमाम अहादीस पर अमल भी हो जाएगा और क़ुरान व हदीस का असल मतलब व मक़सद (यानी नमाज़ की वक़्त पर अदाएगी) भी हो जाएगी।

आखिरी क़ौल चंद असबाब की वजह से ज़्यादा राजेह है
1) नमाज़ के औक़ात की तहदीद क़तई फ़र्ज़ है जो क़ुरान करीम की बाज़ आयात व मुतवातिर अहादीस से साबित है और पूरी उम्मत का इस पर इजमा है। दो नमाजें एक साथ पढ़ने से मुतअल्लिक़ अहादीस अखबारे आहाद हैं। कुरानी आयात और मुतवातिर अहादीस का अगर बज़ाहिर तआरूज़ खबरे वाहिद से हो जाए तो खबरे वाहिद खबरे वाहिद में तावील करनी चाहिए, लिहाज़ा इन अखबारे आहाद को जमा ज़ाहिरी (यानी नमाज़े ज़ुहर को आखिर वक़्त में और नमाज़े असर को पहले वक़्त मे अदा किया जाए) पर महमूल किया जाना चाहिए ताकि किसी तरह का तआरूज भी न रहे और तमाम अहादीस पर भी अमल हो जाए।
2) बाज़ अहादीस से वाज़ेह तौर पर मालूम होता है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ज़िन्दगी में सिर्फ दो बार हज के मौक़े पर हकीकत में दो नमाज़ों को एक साथ जमा किया है।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को बे वक़्त नमाज़ पढ़ते नहीं देखा (आप हमेशा वक़्त पर नमाज़ पढ़ते थे) मगर हज्जतुल विदा में मग़रिब और इशा को मुज़दलफा में एक साथ पढ़ा (इशा के वक़्त में मग़रिब और इशा एक साथ पढ़ी)। (सही बुखारी व सही मुस्लिम)

हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हमेशा नमाज़ वक़्त पर पढ़ते थे लेकिन (हज्जतुल विदा में) आप ने अरफात में ज़ुहर और असर को ज़ुहर के वक़्त में जमा करके पढ़ा और मुज़दलफा मे मग़रिब और इशा के वक़्त में जमा करके पढ़ा। (नसई)
हुज्जाजे किराम के लिए अरफात (मस्जिद नमरा) में ज़ुहर व असर की हक़ीक़ी जमा और मुज़दलफा में मग़रिब और इशा की हक़ीक़ी जमा मुतावित्र अहादीस से साबित है और पूरी उम्मत का इस पर इजमा है लेकिन हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अरफात और मुज़दलफा के अलावा कभी भी हक़ीक़ी जमा की सूरत में दो नमाज़ों को एक साथ नहीं पढ़ा जैसा कि अहादीसे बाला में ज़िक्र है।

3) बाज़ अहादीस के अल्फ़ाज़ से वाज़ेह तौर पर मालूम होता है कि दो नमाज़ों को जमा करके पढ़ने से मुतअल्लिक़ जमा का ज़हिरी से है, मसलन-
हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) फरमाती है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सफर में ज़ुहर को बाद में और असर को पहले पढ़ा करते थे। मग़रिब को पहले और इशा को बाद में अदा करते थे। (मुसनद अहमद)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) (एक सफर में) शफ़क़ के खतम होने से पहले सवारी से उतरे, मग़रिब की नमाज़ पढ़ी फिर इंतिज़ार किया, शफ़क़ के खतम होने के बाद इशा की नमाज़ अदा की फिर फरमाया कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को जब (सफर में) जल्दी होती तो आप इसी तरह अमल फरमाते जैसे मैंने किया है। (अबू दाऊद, दारे क़ुतनी)

हज़रत मआज़ बिन जबल (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि हम हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ जंगे तबूक के सफर में निकले तो हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ज़ुहर व असर को इस तरह जमा करते कि ज़ुहर को आखिरी वक़्त में और असर को शुरू वक़्त में पढ़ते। (तबरानी अवसत)
हज़रत अबू उसमान नहदी फरमाते हैं कि वह और हज़रत साद बिन अबी वक़्क़ास (रज़ियल्लाहु अन्हु) कूफा से मक्का सफर पर जा रहे थे, हज़रत साद बिन अबी वक़्क़ास ज़ुहर और असर को इस तरह जमा करते कि ज़ुहर को आखिर वक़्त में और असर को पहले वक़्त में दोनों को एक साथ अदा करते, मग़रिब को आखिर वक़्त में और इशा को पहले वक़्त में दोनों को एक साथ जमा करते। (मुसन्नफ इब्ने अबी शैबा)

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि एक मरतबा हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मदीना में ज़ुहर और असर को मिला कर पढ़ा हालांकि यह किसी खतरे या सफर की हालत न थी। हज़रत अबू ज़ुबैर कहते हैं कि मैंने हज़रत साद से पूछा कि आप ने ऐसा क्यों क्या? हज़रत साद ने जवाब दिया कि मैंने भी यह बात हज़रत इब्ने अब्बास से पूछी थी तो उन्होंने बताया कि आप का मक़सद था कि लोग तंगी में मुबतला न हों। (सही मुस्लिम)
इस हदीस में दो नमाज़ों को एक साथ अदा करने से मुराद ज़ाहिरी जमा है यानी ज़ुहर को उसके आखिर वक़्त में और असर को उके शुरू वक़्त में पढ़ा जाए। मुहद्दिसीन यहां तक कि अल्लामा शौकानी ने भी इस हदीस से ज़ाहिरी जमा ही मुराद लिया है।

इन तमाम अहादीस से वाज़ेह तौर पर मालूम हुआ कि ज़ाहिरी जमा जाएज़ है लेकिन हक़ीक़ी जमा सिर्फ दो जगहों पर है।

4) हदीस के पूरे ज़ख़ीरे में हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अमल से सिर्फ उन्हीं दो नमाज़ों के जमा करने का सबूत मिलता है जिनके औक़ात आपस में मिलते हैं और दरमियान में मकरूह वक़्त भी नहीं है जिनकी वजह से ज़ाहिरी जमा पर अमल हो सकता है और सिर्फ ज़ुहर व असर या मग़रिब व इशा की नमाजें हैं। बाकी जिन नमाज़ों के औक़ात बाहम मिलते नहीं जैसे फज़्र व ज़ुहर या औक़ात तो मिलते हैं लेकिन दरमियान में मकरूह वक़्त है जैसे असर व मगरिब या इशा व फज़्र कि आधी रात के बाद इशा का वक़्त मकरूह हो जाता है। अगर हक़ीक़ी जमा जाएज़ होती तो फिर ज़ुहर व असर या मग़रिब व इशा के साथ ही खास न होती बल्कि इशा व फज़्र या फज़्र व ज़ुहर में हक़ीक़ी जमा जाएज़ होती और इसका कोई भी क़ायल नहीं है, मालूम हुआ कि जिन अहादीस में सफर वगैरह की वजह से दो नमाज़ों को एक साथ अदा करने का ज़िक्र है उससे मुराद एक नमाज़ को उसके आखिर वक़्त में और दूसरे नमाज़ को उसके शुरू वक़्त में अदा करना है।

5) बाज़ अहादीस में आता है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बाज़ मरतबा सफर या खौफ या बारिश के उज़्र के बेगैर भी दो नमाज़ों को एक साथ अदा किया। अगर दो नमाज़ों की हक़ीक़ी जमा जाएज़ होती तो इन अहादीस की वजह से बेगैर किसी उज़्र के भी दो नमाज़ों को हक़ीक़ी जमा करके पढ़ना जाएज़ होता हालांकि अहले सुन्नत वलजमाअत में कोई भी इसका क़ायल नहीं हैं। मालूम हुआ कि इस तरह की अहादीस से मुराद एक नमाज़ को उसके आखिरी वक़्त में और दूसरी नमाज़ को उसके शुरू वक़्त में अदा करना है। जंगे तबूक के लम्बे सफर में यही सूरते अमल थी कि सफर बहुत लम्बा था मौसम सख्त गर्म था पाकी और वज़ू के लिए पानी की कमी थी, इस्लामी फौज की तादाद तक़रीबन तीस हज़ार थी इतने बड़े लशकर का इन मज़कूरा हालात में बारबार उतरना और सवार होना मुशिकल था इसलिए ज़ाहिरी जमा पर अमल किया गया यानी एक नमाज़ को उसके आखिरी वक़्त में और दूसरी नमाज़ को उसके शुरू वक़्त में अदा किया गया।

गरज़ ये कि नमाज़ को वक़्त पर ही अदा करना चाहिए सिवाए 9 जिलहिज्जा को मस्जिदे नमरा (अरफात) में ज़ुहर व असर के वक़्त में और मुज़दलफा में मग़रिब व इशा की अदाएगी इशा के वक़्त में लेकिन अगर कोई उज़्रे शरई है मसलन सफर में हैं और बार बार रूकना दुशवारी का सबब है तो दो नमाजें ज़ाहिरी जमा करके अदा करली जाएं यानी एक नमाज़ को उसके आखिर वक़्त में और दूसरी नमाज़ को उसके शुरू वक़्त में अदा कर लिया जाए।

अल्लाह तआला हम सबको वक़्त पर नमाज़ का एहतेमाम करने वाला बनाए और नमाज़ में कोताही की तमाम शकलों से महफूज़ फरमाए, आमीन।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)