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بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

मस्जिद में जमाअते सानिया (दूसरी जमाअत) का हुकुम

मस्जिद में दूसरी या तीसरी जमाअत करने में फ़ुक़हा व उलमा के दरमियान क़दीम ज़माने से इखतिलाफ चला आ रहा है लेकिन इसमें बाज़ शकलें मुत्तफक़ अलैह भी हैं मसलन :
इस बात पर तमाम लोगों का इत्तिफाक़ है कि मस्जिद में दूसरी जमाअत का मुस्तक़िल एहतेमाम गलत है।
जिन मसाजिद में इमाम व मुअज़ज़िन मौजूद नहीं है (पांचों नमाज़ें जमाअत के साथ एहतेमाम से अदा नहीं होतीं) या मार्केट या रेलवे स्टेशन की मसाजिद में (जहां लोग आते जाते रहते हैं) या एक शहर या देहात से दूसरे शहर या दूसरे देहात जाने वाली शाहरा पर वाके मसाजिद में दूसरी, तीसरी या चौथी जमाअत करने में तमाम हज़रात का इत्तिफाक है।
लेकिन मुहल्ला की मसाजिद में (जहां इमाम और मुअज़ज़िन मौजूद हैं और नमाज़ें जमाअत के साथ एहतेमाम से अदा की जाती हैं) दूसरी जमाअत करने के मुतअल्लिक इखतिलाफ है। इमाम अहमद बिन हमबल (रहमतुल्लाह अलैह) की एक रिवायत (जो उनके मुत्तबेईन में ज़्यादा मशहूर है) यह है कि अगर पहले से इत्तिफाक किए बेगैर दो या ज़्यादा हज़रात किसी मस्जिद में जमाअत खत्म होने के बाद पहुंचे तो उनके लिए मस्जिद में जमाअत के साथ नमाज़ अदा करना अकेले पढ़ने से ज़्यादा बेहतर है अगरचे अकेले नमाज़ पढ़ने पर भी नमाज़ अदा हो जाएगी जिसके दलाइल नीचे लिखे गए हैं।
1) हज़रत ओबय बिन काब (रजी अल्लाह अन्हु) से रिवायत है कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया एक शख्स का दूसरे शख्स के साथ जमाअत से नमाज़ अदा करना अकेले अदा करने से बेहतर है और एक शख्स का दो शख्सों के साथ जमाअत के नमाज़ अदा करना दो आदमियों की जमाअत से बेहतर है। (नसई, अबू दाऊद, इब्ने माजा)
2) हज़रत अबू सईद खुदरी (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि एक दिन नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने सहाबा के साथ तशरीफ फरमा थे। एक सहाबी जमाअत खत्म होने के बाद दाखिल हुए तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया ‘‘कौन शख्स इस शख्स पर सदका करेगा कि वह उसके साथ नमाज़ अदा करे?” तो एक सहाबी उठे और उन्होंने इस शख्स के साथ नमाज़ अदा फरमाई। (तिर्मीज़ी 220)
3) हज़रत अनस (रज़ियल्लाहु अन्हु) एक मरतबा किसी मस्जिद में दाखिल हुए तो लोग नमाज़ से फारिग हो चुके थे। आप ने अज़ान दी और इक़ामत कह कर जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ी। (बैहक़ी, इमाम बुख़ारी ने भी मौकूफन अपनी तालीकात में ज़िक्र की है)।
(नोट) इन तीनों दलाइल के जवाबात मज़मून के आखिर में मुलाहिज़ा फरमाएं।
फ़ुक़हा व उलमा की एक बड़ी जमाअत (हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद, हसन बसरी, शैख नाफे मौला बिन उमर, शैख सालिम बिन अब्दुल्लाह, इमाम अबू हनीफा, इमाम मालिक, इमाम शाफई और इमाम अहमद बिन हमबल की दूसरी गैर मशहूर रिवायत) की राय है कि मुहल्ला की मस्जिद में जहां इमाम और मुअज़ज़िन दोनों मुस्तकिल रहते हैं दूसरी जमाअत का एहतेमाम करना मकरूह है बल्कि मस्जिद के बाहर किसी जगह दूसरी जमाअत क़ायम की जाए या फिर मस्जिद में अकेले नमाज़ पढ़ी जाए, जिसके बाज़ दलाइल नीचे लिखे हैं।
1) नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का मामूल था कि आप खुद ही सहाबा को नमाज़ पढ़ाया करते थे और अगर किसी सहाबी की जमाअत की नमाज़ छूट जाती तो वह अपनी नमाज़ अकेले पढ़ते थे, दाएं या बाएं किसी शख्स को तलाश नहीं करते थे कि उसके मस्जिद में ही दूसरी जमाअत का एहतेमाम करें। इस बात को तक़रीबन सारी उम्मते मुस्लिमा ने तसलीम किया है चुनांचे क़ुरान, हदीस, सीरत, तफसीर और तारीख की किताबों में नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पूरी ज़िन्दगी में मस्जिद में दूसरी जमाअत का सुबूत सिर्फ एक बार मिलता है जिसका वाक़या हज़रत अबू सईद खुदरी की रिवायत में ऊपर गुज़र चुका है। गरज़ ये कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़िन्दगी में सिर्फ एक बार दूसरी जमाअत का सुबूत मिलता है जिसमें इमाम फ़र्ज़ पढ़ रहा है और मुक़्तदी इस पर सदका करते हुए नफल अदा कर रहा है। नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पूरी ज़िन्दगी में एक वाक़या भी ऐसा नहीं मिलता जिसमें दो या ज़्यादा लोगों ने फ़र्ज़ नमाज़ की अदाएगी मस्जिद में दूसरी जमाअत की शकल में की हो।
हज़रत इमाम शाफई (रहमतुल्लाह अलैह) अपनी मशहूर व मारूफ किताब “अलउम” में लिखा है कि मैंने इस मसअला में तमाम अइम्मा से यही कहते हुए सुना है कि अगर कोई शख्स मस्जिद में जमाअत खत्म होने के बाद पहुंचे तो वह अकेले नमाज़ पढ़े। हां अगर रास्ता की मस्जिद है जहां इमाम और मुअज़ज़िन नहीं रहते हैं तो इस मस्जिद में दूसरी जमाअत करने में कोई हर्ज नहीं। हमारे अस्लाफ ने सहाबा-ए-किराम की एक बड़ी जमाअत से यही नक़ल किया है कि अगर वह मस्जिद में बाजमाअत नमाज़ खत्म होने के बाद पहुंचते तो अकेले ही नमाज़ पढ़ते थे। सहाबा-ए-किराम एक मस्जिद में दो मरतबा जमाअत से नमाज़ पढ़ने को मकरूह समझते थे।
मुहद्दिसे कबीर हाफिज अबू बकर बिन अबी शैबा ने अपनी किताब ‘‘अलमुसन्नफ” (जो अलमुसन्नफ बिन अबी शैबा के नाम से मश्हुर है) में सही सनद के साथ हज़रत हसन बसरी का क़ौल नक़ल किया है कि सहाबा-ए-किराम जमाअत छूट जाने की सूरत में अकेले नमाज़ पढ़ा करते थे।
2) हज़रत अबी बकरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि एक मरतबा नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मदीना के देहात के इलाका से लौट रहे थे और नमाज़ की अदाएगी का इरादा किया तो देखा कि लोग नमाज़ से फारिग हो गए हैं लिहाज़ा आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम घर चले गए और घर के अफराद को जमा किया और उनके साथ जमाअत से नमाज़ पढ़ी। (माजमुल कबीर लित्तिबरानी, मजमउज़ज़वाएद जिल्द 2 पेज 45) मुहद्दिस हैसमी ने कहा कि इस हदीस के तमाम रावी मज़बूत हैं। शैख नासिरूद्दीन अलबानी ने इस हदीस को हसन क़रार दिया है (तमामुल मिन्नह पेज 155) शैख मशहूर हसन सलमानी ने भी इस हदीस के सही होने का इक़रार किया है। (आलामुल आबिद फी हुकमे तकरारूल जमाअत फ़िल मस्जिदिल वाहिद पेज 34)
मज़कूरा हदीस से मालूम हुआ कि जमाअत ऊला छूट जाने पर हमारे और सारी इंसानियत के क़ायद नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मस्जिद में दूसरी जमाअत का एहतेमाम नहीं किया बल्कि घरों में जा कर दूसरी जमाअत की।
3) हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद (रज़ियल्लाहु अन्हु) एक मरतबा अपने दोस्तों के साथ मस्जिद में नमाज़ अदा करने के लिए निकले तो देखा कि लोग मस्जिद से बाहर आ रहे हैं और जमाअत खत्म हो गई। चुनांचे हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद अपने दोस्तों के साथ वापस घर आए और जमाअत के साथ नमाज़ अदा फरमाई। (इस रिवायत को इमाम तबरानी ने ‘‘अलमोजम अल कबीर 9380‘‘ में सही सनद के साथ ज़िक्र फरमाई है नीज़ इब्ने अब्दुर रज्जाक ने ‘‘मुसन्नफ जिल्द 2 पेज 409, 3883‘‘ में ज़िक्र फरमाई है।)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद (रज़ियल्लाहु अन्हु) का शुमार इन फ़ुक़हा सहाबा में होता है कि जिन से बड़े बड़े सहाबा भी मसाइल पूछा करते थे। गौर फरमाएं कि किस चीज़ ने इस फकीह सहाबी को मस्जिद में दूसरी जमाअत करने से रोका। यक़ीनन उन्हों मालूम था कि मस्जिद में तनहा नमाज़ पढ़नी होगी जबकि मस्जिद के बाहर किसी दूसरी जगह में दूसरी जमाअत की जा सकती है चुनांचे उन्होंने मस्जिद के बाहर दूसरी जमाअत का एहतेमाम फरमाया ताकि जमाअत की नमाज़ की फज़ीलत किसी हदतक हासिल हो जाए।
4) हज़रत अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया मेरा दिल चाहता है कि एक शख्स को हुकुम दुं कि लोगों को नमाज़ पढ़ाए और मैं फिर जवानों से कहुं कि बहुत सा इंधन एकटठा करके लाएं फिर मैं उन लोगों के पास जाऊं जो बिला किसी उज़्र घरों में नमाज़ पढ़ लेते हैं और जा कर उनके घरों को जला दूं। (बुखारी व मुस्लिम) इस हदीस में नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ऐसे लोगों के लिए जो मस्जिद में जमाअत के साथ नमाज़ नहीं पढ़ते अपनी ख्वाहिश का इज़हार फरमाया कि मैं उनके घरों में आग लगा दूं। सारी उम्मत मुत्तफिक हैं कि यहां पहली जमाअत मुराद है। अगर आम मसाजिद में दूसरी, तीसरी या चौथी जमाअत करने की पूरे तौर पर इजाज़त दे दी जाए तो पहली जमाअत में न आने वालों के घरों को आग लगाने की नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हुज्जत पूरी नहीं हो सकती क्योंकि जब नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जमाअत में शरीक न होने वालों के घरों को आग लगाने जाते तो वह कह सकते थे कि हम दूसरी, तीसरी या चैथी जमाअत में शरीक हो जाएंगे।
5) बहुत सी अहादीसे सहीहा से मालूम होता है कि शरीअत चाहती है कि जमाअत में ज़्यादा से ज़्यादा हज़रात शरीक हों क्योंकि ज़्यादा हज़रात की शिर्कत ज़्यादा सवाब का बाइस बनेगी आम मसाजिद में दूसरी, तीसरी या चैथी जमाअत की तर्गीब देने की सूरत में पहली जमाअत में लोगों की शिर्कत यक़ीनन कम रहेगी जो शरीअत की ख्वाहिश के खिलाफ है।
6) जैसा कि तजुर्बा से मालूम हुआ कि जिन उलमा ने सहूलत के पेशे नज़र मुहल्ला की मसाजिद में भी दूसरी जमाअत करने की इजाज़त दे दी है तो वहां तकरीबन हर नमाज़ के बाद दूसरी, तीसरी या चैथी बल्कि कभी कभी बहुत जमाअतें अदा की जाती हैं। जिससे जमाअत की नमाज़ का मकसद ही फौत हो जाता है।
7) आम मसाजिद में दूसरी, तीसरी या चैथी जमाअत की इजाज़त देने से उम्मत में फिरका बन्दी बढ़ेगी मसलन चंद हज़रात मसलकी इखतिलाफात की वजह से किसी इमाम के पीछे नमाज़ नहीं पढ़ना चाहते तो वह दूसरी, तीसरी या चैथी जमाअत का एहतेमाम करेंगे। यही वजह है कि सउदी हूकूमत मस्जिद हराम और मस्जिद नबवी में दूसरी जमाअत करने से रोकती है।
8) मस्जिद में दूसरी जमाअत अदा करने से दूसरे नमाजियों की नमाज़ में दुशवारी होती है खास कर जो अपनी फौतशुदा रिकात पढ़ रहे हों, हालांकि नमाज़ को खुशू व खुज़ू के साथ अदा करने का हुकुम दिया गया है जो नमाज़ में सबसे ज़्यादा मतलूब है।
(नोट) शैख मोहम्मद नासिरूद्दीन अलबानी (रहमतुल्लाह अलैह) (जिनकी हदीस की खिदमात को खलीजी मुल्कों में बड़ी क़दर की निगाह से देखा जाता है) की राय भी यही है कि आम मसाजिद में दूसरी जमाअत करना मकरूह है।

दूसरी जमाअत के काएलीन के दलाइल का जवाबात
1) हज़रत अबी बिन काब (रज़ियल्लाहु अन्हु) की रिवायत से सिर्फ यह मालूम हुआ कि जमाअत में जितने ज़्यादा हज़रात शरीक होंगे उतना ही सवाब ज़्यादा मिलेगा। इस हदीस से आम मसाजिद में दूसरी, तीसरी या चैथी जमाअत करने का दूर दूर तक कोई सुबूत नहीं मिलता।
2) हज़रत अबू सईद खुदरी की रिवायत से हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फरमान की रोशनी में मालूम हुआ कि एक शख्स जिसने फ़र्ज़ नमाज़ जमाअत से अदा कर ली है दूसरे ऐसे शख्स पर सदका कर रहा है जिसने अभी फ़र्ज़ नमाज़ अदा नहीं की है। अगर दोनों फ़र्ज़ नमाज़ अदा कर रहे हों तो कौन किस पर सदका करने वाला होगा? यहां हक़ीक़तन दूसरी जमाअत हुई ही नहीं बल्कि एक शख्स ने नफल की नियत करके उस पर सदका किया। दो शख्स ने फ़र्ज़ की नियत करके मस्जिद में दूसरी जमाअत अदा की हो ऐसा कोई वाक़या नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़िन्दगी में नहीं हुआ।
3) नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सहाबा-ए-किराम के अमल की रोशनी में यही कहा जा सकता है कि हज़रत अनस (रज़ियल्लाहु अन्हु) का अमल रास्ते की किसी मस्जिद का रहा होगा इसी लिए उन्होंने अज़ान और इक़ामत के बाद नमाज़ पढ़ी वरना मुहल्ला की मस्जिद में दोबारा अज़ान का क्या मतलब?

(तम्बीह) बाज़ हज़रात इस गुमान की वजह से कि इमाम क़ादा अखिरा में है जमाअत में शरीक नहीं होते बल्कि दूसरी जमाअत की तैयारी शुरू कर देते हैं जैसे ही इमाम सलाम फेरता है फौरन ही दूसरी जमाअत शुरू कर देते हैं। नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सहाबा-ए-किराम ताबेईन और तबेताबेईन बल्कि इस्लाम की पूरी तारीख में ऐसी कोई मिसाल हमें नहीं मिलती। लिहाज़ा हमें इमाम के साथ ही जमाअत में शरीक होना चाहिए चाहे इमाम के क़ादा अखिरा में होने का यक़ीन ही क्यों न हो।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)