بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

क्या ऊंट के दूध और पेशाब से बीमारी का इलाज किया जा सकता है?

मौज़ूए बहस मसअला की वज़ाहत से पहले सही बुखारी में वारिद तीन मुसलसल अहादीस का तरजुमा पेश करता हूं।
1) हज़रत अबू सईद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि एक साहब हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया कि मेरा भाई पेट की तकलीफ में मुबतला है, हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया उन्हें शहद पिलाओ। फिर दूसरी मरतबा वही साहब हाज़िर हुए, हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस मरतबा भी शहद पिलाने के लिए कहा। वह फिर तीसरी बार हाज़िर हुए (और अर्ज़ किया कि शहद पिलाया लेकिन शिफा नहीं हुई) हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फिर फरमाया कि उन्हें शहद पिलाओ। वह फिर आये और कहा कि (हुकुम के मुताबिक़) मैने अमल किया (लेकिन शिफा नही हुई) हुज़ूर हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि अल्लाह तआला सच्चा है और तुम्हारे भाई का पेट झूठा है, उन्हें फिर शहद पिलाओ, चुनांचे उन्होंने शहद फिर पिलाया और इसी से सेहतयाब हो गए। (सही बुखारी)
2) हज़रत साबित हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत करते हैं कि कुछ लोगों को बीमारी थी उन्होंने कहा या रसूलुल्लाह! हमें क़याम की जगह इनायत फरमाइए और हमारे खाने का इंतिज़ाम फरमाइए। फिर जब वह लोग सेहतमंद हो गए तो उन्होंने कहा कि मदीना की आब व हवा खराब है, चुनांचे हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हर्रा में ऊंटों के साथ उनके क़याम का इंतिजाम कर दिया और फरमाया कि उनका दूध पियो। जब वह सेहतमंद हो गए तो उन्होंने हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चरवाहे को क़त्ल कर दिया और ऊंट हांक कर ले गए। हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनके पीछे आदमी दौड़ाये और (जैसा उन्होंने चरवाहे के साथ सुलूक किया था) आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भी उनके हाथ पांव कटवा दिए और उनकी आंखों में सलाई फेरवा दी। मैंने उनमें से एक शख्स को देखा कि ज़बान से ज़मीन चाटता था और उसी हालत में मर गया। (सही बुखारी)
3) हज़रत क़तादा हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है करते हैं कि (उरैना के) कुछ लोगों को मदीना की आब व हवा मुवाफिक़ नहीं आई तो नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनसे फरमाया कि वह आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चरवाहे के यहां चले जाऐं, यानी ऊंटों के पास और उनका दूध और पेशाब पियें। चुनांचे वह लोग हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चरवाहे के पास चले गए और ऊंटों का दूध और पेशाब पिया। जब वह सेहतयाब हो गए तो उन्होंने चरवाहे को क़त्ल कर दिया और ऊंटों को हांक ले गए। हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को जब इसका इल्म हुआ तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें तलाश करने के लिए भेजा। जब उन्हें लाया गया तो हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के हुकुम से उनके हाथ और पांव काट दिए गए और उनकी आंखों में सलाई फेर दी गई। (सही बुखारी)

मजकूरा वाक़्ये की क़दरे तफसील
क़बीला उरैना और क़बीला अकल के तक़रीबन 8 हज़रात मदीना तशरीफ लाए और उन्होंने यह दावा किया कि हम मुलसमान हो गए हैं। वह मर्ज़ुल जुवा में मुबतला हो गए, मर्ज़ुल जुवा पेट की एक बीमारी है जिसमें पेट फूल जाता है और प्यास बहुत लगती है। इस मर्ज़ को इसतिस्क़ा भी कहते हैं। हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनको मदीना शहर से थोड़ा बाहर अपने सदक़े के ऊंटों के पास भेज दिया ताकि खुली फिज़ा में ताज़ा आब व हवा में रहें और सही बुखारी की हदीस के मुताबिक़ उन्हे ऊंट के दूध पीने को कहा, जबकि सही बुखारी की दूसरी हदीस के मुताबिक़ उन्हे ऊंट के दूध और पेशाब पीने का हुकुम दिया, चुनांचे वह शिफायाब हो गए। उन्होंने हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इस एहसान का बदला खयानत और खबासत की शकल में इस तरह दिया कि उन्होंने हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चरवाहे को ज़ुल्मन क़त्ल कर दिया और उसकी आंखों में सलाई फेर दी। जब हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यह इल्म हुआ तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनके पीछे कुछ हज़रात भेजे ताकि उनको गिरफ्तार करके लाया जाए, जब उन्हें गिरफ्तार करके लाया गया तो नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उसी तरह से उनका क़त्ल करवाया जिस तरह उन्होंने चरवाहे को क़त्ल किया था, चुनांचे उनके हाथ पांव कटवा कर उनकी आंखों में सलाई फेरवा दी। यह वाक़्या मुस्ला की मुमानअत के नुज़ूल से पहले का है जैसा कि सही बुखारी में हदीस के आखिर में इसकी वज़ाहत मज़कूर है, हज़रत क़तादा ने बयान किया कि मुझसे मोहम्मद बिन सीरीन ने हदीस बयान की है कि यह हुदूद के नाज़िल होने से पहले का वाक़्या है (बाद में इस तरह की सज़ा की मुमानअत नाज़िल हो गई)। किसी शख्स के बाज़ आज़ा काट कर या उनको मस्ख करके बेदर्दी से क़त्ल करने को मुसला कहते हैं।

हलाल जानवरों का भी पेशाब नापाक है
मौज़ूए बहस मसअला को समझने से पहले एक दूसरे मसअले को भी समझना होगा कि जिन जानवरों को गोश्त खाया जाता है यानी हलाल जानवर मसलन बकरा, बकरी, गाए, भैंस और ऊंट वगैरह क्या उनका पेशाब पाक है या नापाक? क़ुरान व हदीस की रौशनी में हज़रत इमाम अबू हनीफा, हज़रत इमाम शाफई और दूसरे फुक़हा मसलन इमाम सुफयान सौरी की राय है कि इंसान के पेशाब की तरह हर जानवर का पेशाब नापाक है। एक रिवायत के मुताबिक़ हज़रत इमाम अहमद बिन हमबल की भी यही राय है। अलबत्ता इमाम मालिक और बाज़ दूसर उलमा की राय है कि जिन जानवरों का गोश्त खाया जाता है उनका पेशाब पाक है और जिन जानवरों का गोश्त नहीं खाया जाता उनका पेशाब नापाक है। हज़रत इमाम मालिक ने इसके लिए बुनियादी तौर पर दो दलीलें पेश की हैं। पहली दलील हज़रत क़तादा से मरवी हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु की वह मज़कूरा बाला हदीस जिसमें पेशाब पीने का ज़िक्र आया है, वजहे इस्तिदलाल यह है कि अगर पेशाब पाक न होता तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसके पीने का हुकुम क्यों देते। दूसरी दलील यह है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि बकरियों के बाड़े (रहने की जगह) में नमाज़ पढ़ सकते हो। वजहे इस्तिदलाल यह है कि अगर उनका पेशाब नापाक होता तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बकरियों के बाड़े में नमाज़ पढ़ने की इजाज़त क्यों देते। हालांकि इन दोनों अहादीस से हलाल जानवरों के पेशाब के पाक होने की दलील बनाना क़ाबिले एतेराज़ है क्योंकि पहली हदीस से ज़्यादा से ज़्यादा यह साबित होता है कि बीमारी के लिए पेशाब का इस्तेमाल किया जा सकता है, नीज़ अक्सर उलमा ने इस वाक़्ये को खुसूसी व इस्तिसनाई वाक़्या क़रार दिया है जबकि दूसरी हदीस के पूरे अल्फाज़ (यानी बकरियों के रहने की जगह में नमाज़ अदा कर लो लेकिन ऊंटों के रहने की जगह में नमाज़ अदा न करो) से वाज़ेह तौर पर हमारे ही मौक़िफ की ताईद होती है कि हलाल जानवर का पेशाब भी नापाक है, क्योंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ऊंट के रहने की जगह में नमाज़ अदा करने से मना किया है। दोनों दलीलों का तफसीली जवाब आगे आ रहा है।
जिन फुक़हा व उलमा (इमाम अबू हनीफा, इमाम शाफई और इमाम सुफयान सौरी) ने तमाम जानवरों के पेशाब को नापाक क़रार दिया है वह दलील के तौर पर इस हदीस को पेश करते हैं जिसमें हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि पेशाब से बचो, क्योंकि आम तौर पर क़ब्र का अज़ाब पेशाब से न बचने की वजह से होता है। (मुस्तदरक, इब्ने माजा, दारे क़ुतनी, सही इब्ने खुज़ैमा) शैख हाकिम ने इस हदीस को सही अला शर्तिल बुखारी क़रार दिया है। इस हदीस को अल्लाम हैसमी ने भी (मजमउज़्ज़वायद) में ज़िक्र किया है। गरज़ ये कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने आम तौर पर पेशाब से बचने का हुकुम दिया है और किसी इंसान या जानवर के पेशाब की कोई तख्सीस नहीं की। दूसरी दलील मुसनद अहमद में वारिद हदीस है जिसमें मज़कूर है कि दफन के बाद मैयित को कब्र ने जोर से भींचा और दबा दिया तो हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि यह अज़ाब उनके पेशाब से न बचने की वजह से था। गरज़ ये कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तालीमात पेशाब से बचने की हैं और हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ज़िन्दगी में एक मरतबा भी हलाल व हराम जानवरों के पेशाब में कोई फर्क़ बयान नहीं फरमाया।
नीज़ शरइ व तिब्बी दोनों एतेबार से दूर दूर तक पेशाब का गोश्त से कोई तअल्लुक़ समझने में नहीं आता कि जिन जानवरों का गोश्त खाया जाता है उनका पेशाब पाक हो और जिन जानवरों का गोश्त नहीं खाया जाता हे उनका पेशाब नापाक हो, इसी तरह गोश्त खाए जाने वाले जानवरों के पाखाना को नापाक और उनके पेशाब को को पाक क़रार देने, नीज़ इंसान के पेशाब को नापाक और गोश्त खाए जाने वाले जानवर के पेशाब को पाक क़रार देने की कोई मंतिक़ समझ में नहीं आती, हालांकि क़ुरान व हदीस में ऐसी कोई वाज़ेह दलील मौजूद नहीं है जिसमें सिर्फ गोश्त खाए जाने वाले जानवरों के पेशाब को पाक क़रार दिया जाए। अगर यह बात मान भी ला जाए कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बीमारी के इलाज के लिए ऊंट का पेशाब पीने की इजाज़त दी थी मगर यह भी तो बहुत मुमकिन है कि उस ज़माने में इस बीमारी का इलाज उसके इलावा कुछ और नहीं हो इस लिए आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इजाज़त दी हो मगर इससे यह कैसे लाज़िम आया कि सिर्फ गोश्त खाए जाने वाले जानवरों का पेशाब पाक है और जहां तक उस हदीस का तअल्लुक़ है कि जिसमें हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बकरियों के रहने की जगह में नमाज़ पढ़ने की इजाज़त दी है तो उस हदीस के पूरे अल्फाज़ यह हैं “बकरियों के रहने की जगह में नमाज़ अदा कर लो लेकिन ऊंटों के रहने की जगह में नमाज़ अदा न करो” इस हदीस के मानी यह हैं कि बकरियों का पेशाब आम तौर पर दूर दूर नहीं जाता है, लिहाज़ा बकरियों के रहने की जगह में तो किसी पाक व साफ जगह में नमाज़ पढ़ सकते हो लेकिन ऊंट का पेशाब दूर दूर तक बहता है लिहाज़ा ऊंट के रहने की जगह में पाक व साफ जगह का मौजूद होना दुशवार है, लिहाज़ा ऊंट के रहने की जगह में नमाज़ अदा न करो। हक़ीक़त यह है कि इस हदीस से हज़रत इमाम अबू हनीफा के मौक़िफ की ही ताईद होती है कि बकरी और ऊंट का पेशाब भी नापाक है।

ऊंट के दूध या दूध और पेशाब से बाज़ बीमारी का इलाज
इस किस्म का सिर्फ एक वाक़्या हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पूरी ज़िन्दगी में पेश आया था, इसके बाद सहाबा के ज़माने में भी कभी ऐसा वाक़्या पेश नहीं आया। जहां तक सही बुखारी में मज़कूर हदीस का तअल्लुक़ है तो उलमाए अहनाफ व शवाफे ने इस के बहुत से वुजूहात दिए हैं जिनमें से तीन जवाबात ज़ैल हैं।
1) हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को वही के ज़रिया बतला दिया गया था कि ऊंट का पेशाब पिये बेगैर उनकी शिफा और ज़िन्दगी मुमकिन नहीं, इस तरह यह लोग मुज़तर के हुकुम में आ गए और मुज़तर के के लिए नजिस चीज़ का इस्तेमाल जायज़ है, यानी अगर किसी इंसान की जान खतरे में हो तो उसकी जान बचाने के लिए हराम चीज़ से इलाज किया जा सकता है।
2) हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पेशाब पीने का हुकुम नहीं दिया था बल्कि उसके खारजी इस्तेमाल का हुकुम दिया था और असल इबारत यूं थीं “इशरबू मिन अल्बनिहा वज़मिदू मिन आबवलिहा”, “इज़मिदू” के मानी हैं लेप चढ़ाना।
3) बहुत से शवाहिद दलालत कर रहे हैं कि यह वाक़्या 6 हिजरी से पहले का है खुद हदीस के रावी हज़रत क़तादा ने बयान किया कि मुझसे मोहम्मद बिन सीरीन ने हदीस बयान की है कि यह हदूद के नाज़िल होने से पहले का वाक़्या है (बाद में इस तरह की सज़ा की मुमानअत नाज़िल हो गई) यानी यह वाक़्या मुसला की हुरमत से पहले का है, जबकि पेशाब से न बचने पर अज़ाबे कब्र की हदीस इस वाक़्या से बाद की है, क्योंकि वह हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से मरवी है और हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु 7 हिजरी में इस्लाम लाए थे, लिहाज़ा हज़रत क़तादा से मरवी हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु वाली हदीस मंसूख है। नीज़ इस हदीस में है कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनका मुसला फरमाया और मुसला बिलइत्तिफाक मंसूख है, लिहाज़ा ज़ाहिर यही है कि यह हुकुम भी मंसूख हो गया हो और इसकी सबसे बड़ी अलामत यह है कि इस वाक़्या के बाद आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कभी भी इस क़िस्म का इलाज नहीं बताया और न किसी सहाबी से इस क़िस्म का इलाज करना मंकूल है।
4) सही बुखारी में ही इस हदीस से पहले हज़रत साबित से मरवी हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु की दूसरी हदीस भी मज़कूर है जिसमें उन्हीं हज़रात का इलाज सिर्फ दूध से मज़कूर है, इस हदीस में पेशाब का दूर दूर तक कोई ज़िक्र नहीं है, इस लिए इस क़िस्म की बीमारी का इलाज सिर्फ ऊंट से भी किया जाता है। नीज़ सही बुखारी में इन दोनों आहादीस से पहले पेट की बीमारी का इलाज शहद से भी मज़कूर है, लिहाज़ा एहतियात इसी में है कि अगर दुनिया में बीमारी का इलाज मौजूद हो तो पेशाब पी कर इलाज न किया जाए, बल्कि सही बुखारी में वारिद हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अक़वाल की रौशनी में पहले शहद, सिर्फ ऊंट के दूध या दूसरी दवाओं से किया जाए और अगर कोई दवा असर नहीं कर रही है और जान का खतरा है तो फिर ऊंट के पेशाब से इलाज किया जा सकता है।
सउदी अरब के मशहूर मुसन्निफ मोहम्मद बिन अब्दुल लतीफ आल शैख ने इस मौज़ू पर एक मज़मून लिखा है जो मशहूर व मारूफ वेबसाइट अलअरबिया पर पढ़ा जा सकता है। मुनासिब मालूमात होता है कि इस मौक़े पर इसका खुलासए कलाम पेश कर दूं ताकि मसअला मज़ीद वाज़ेह हो जाए। उन्होंने शुरू में लिखा है कि बावजूद कि मैं क़ुरान व हदीस पर मुकम्मल तौर पर ईमान लाया हूं और इस बात पर भी मेरा मुकम्मल यक़ीन है कि क़ुरान करीम के बाद सही बुखारी व सही मुस्लिम दो अहम व मुस्तनद सही किताबें हैं, मगर सही बुखारी में वारिद उस हदीस के अल्फाज़ से मुकम्मल तौर पर मुतमिइन नहीं हूं जिसमें ऊंट के पेशाब से इलाज का ज़िक्र वारिद हुआ है। ज़्यादा बेहतर मालूम होता है कि हम इस हदीस के तअल्लुक़ से जलीलुल क़दर फक़ीह हज़रत इमाम अबू हनीफा वाला मौक़िफ इख्तियार करें कि यह एक खुसूसी वाक़्या है जिसमें हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को बज़रिया वही बतलाया गया था कि ऊंट का पेशाब पिये बेगैर उन हज़रात की शिफा और ज़िन्दगी मुमकिन नहीं है, यानी इस हदीस में उमूमी हुकुम नहीं है कि कोई भी शख्स ऊंट के पेशाब से इलाज करे जैसा कि बाज़ उलमा ने समझा है। गरज़ ये कि यह एक खुसूसी वाक़्या है जिस तरह जमहूर उलमा ने सही मुस्लिम में वारिद हदीस को खुसूसी वाक़्या क़रार दिया है जिसमें हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत अबू हुज़ैफा रज़ियल्लाहु अन्हु की अहलिया को हुकुम दिया था कि वह हज़रत अबू हुज़ैफा रज़ियल्लाहु अन्हु के गुलाम हज़रत सालिम को दूध पिला दें जिस से दोनों के दरमियान हुरमत साबित हो जाए, हालांकि क़ुरान व हदीस की रौशनी में उम्मते मुस्लिमा का इत्तिफाक है कि दो साल के बाद दूध पिलाने से हूरमत साबित नहीं होगी यानी मां बेटे का रिशता नहीं बन सकता। तो जिस तरह से जमहूर उलमा ने सही मुस्लिम में वारिद इस वाक़्ये को खुसूसी व इस्तिसनाई क़रार दिया है इसी तरह ऊंट के पेशाब से इलाज वाले वाक़्ये को भी खास क़रार दिया जाए, क्योंकि तिब्बी एतेबार से यह बात समझ में नहीं आती कि पेशाब जिसमें मुख्तलिफ क़िस्म के ज़हर होते हैं इसको पी कर किसी तरह का इलाज किया जा सकता है। नीज़ यह हज़रात अल्लाह के इल्म में काफिर थे और बहुत मुमकिन है कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को वही के ज़रिये बतला दिया गया हो कि यह लोग मुरतद हो कर मर जाएंगे, लिहाज़ा अल्लाह तआला ने काफिर की शिफा एक नापाक चीज़ में रख दी थी। मौसूफ ने मज़ीद लिखा है कि हदीस की सनद सही होने के बावजूद हदीस में वारिद पेशाब के लफ्ज़ पर भी तो कलाम किया जा सकता है जिस तरह शैख मोहम्मद उसैमीन ने सही मुस्लिम में वारिद मशहूर व मारूफ जस्सासा वाली हदीस के अल्फाज़ व मफहूम पर अपने अदमे इतमिनान का इज़हार किया है।
गरज़ ये कि इंसान और हराम जानवरों की तरह हलाल जानवरों का पेशाब भी नापाक है और सही बुखारी में वारिद ऊंट के पेशाब से इलाज वाला वाक़्या खुसूसी व इस्तिसनाई है। नीज़ इस हदीस में कुछ शक व शुबहात भी हैं, क्योंकि इस से पहले वाली हदीस में इसी वाक़्या पर सिर्फ ऊंट के दूध से इलाज मज़कूर है और इसमें दूर दूर तक कहीं भी ऊंट के पेशाब का ज़िक्र नहीं है नीज़ इस हदीस में मुसला का भी ज़िक्र है जो बाद में नाजायज़ हो गया। लिहाज़ा हम ऊंट के पेशाब से इलाज उसी सूरत में करायें जब बीमारी का दुनिया में कोई इलाज न हो और ज़िन्दगी खतरे में हो।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)