بِسْمِ اللهِ الرَّحْمنِ الرَّحِيْم
اَلْحَمْدُ لِلّهِ رَبِّ الْعَالَمِيْن،وَالصَّلاۃ وَالسَّلامُ عَلَی النَّبِیِّ الْکَرِيم وَعَلیٰ آله وَاَصْحَابه اَجْمَعِيْن۔

क़ुरान करीम पढ़ने का सवाब मैयित (मुर्दा) को पहुंचने का हुकुम

रोज़मर्रा के तकरीबन 80 फीसद प्रैक्टिकल मसाइल में उम्मते मुस्लिमा मुत्तफिक है, क्योंकि शरीअत इस्लामिया का वाज़ेह हुकुम मौजूद है। अलबत्ता चंद असबाब की वजह से रोज़मर्रा के तकरीबन 20 फीसद प्रैक्टिकल मसाइल में जमाना-ए-कदीम से इखतिलाफ चला आ रहा है और उनमें से बाज़ असबाब यह हैं-
“नस फहमी” (यानी क़ुरान व हदीस की इबारत समझने में इखतिलाफ हो जाए) मसलन अल्लाह तआला का फरमान “अवला मसतमुननिसा” (सूरह अन निसा 43)। उलमा की एक जमाअत ने इस आयत से नवाकिज़े वजु़ (वजु़ को तोड़ने वाली चीजें) मुराद लिया है कि औरत को छूते ही वज़ु टूट जाता है। जबकि दूसरे मुफस्सेरीन व फुकहा मसलन इमाम अबू हनीफा (रहमतुल्लाह अलैहे) ने इस आयत से नवाकिज़े गुसल मुराद लिया है कि सोहबत करने से गुसल वाजिब होता है, औरत को सिर्फ छूने से वज़ु नहीं टूटता है। गरज़ ये कि नस फहमी में इखतिलाफ हुआ जिसकी वजह से बाज़ मसाइल में इखतिलाफ हो गया।

“नासिख व मंसुख को तैय करने में इखतेलाफ” (यानी हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का आखरी अमल कौन सा है?) मसलन नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से रुकु में जाते और उठते वक्त रफे यदैन करना (हाथ का उठाना) दोनों अहादीस से साबित है, लेकिन नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का आखरी अमल क्या है, इस सिलसिला में इखतिलाफ है।

“जदीद इसतिम्बाती मसाइल” नए नए मसाइल में इखतिलाफ का होना बदीही है, क्योंकि हर मुजतहिद व फकीह को इखतियार है कि वह नए मसाइल का हल क़ुरान व सुन्न्त की रौशनी में तलाश करे। मिसाल के तौर पर अपने जिस्म के किसी हिस्सा (मसलन किडनी) को हिबा करने का मसअला।
किसी मोअैय्यन हदीस या किसी खास मौज़ू से मुतअल्लिक अहादीस को क़ाबिले क़बूल मानने में इखतिलाफ हो जाए (मसलन मौज़ू बहस मसअला)।
इन्हीं 20 फीसद मुख्तलफ फीह मसाइल में क़ुरान करीम पढ़ने का सवाब मैयित को पहुंचने का मसअला भी है। इस मसअला में ज़माना कदीम से इखतिलाफ चला आ रहा है। उलमा व फुकहा की एक जमाअत की राय है कि क़ुरान करीम पढ़ने का सवाब मैयित को नहीं पहुंचता, उन उलमा व फुकहा में से हज़रत इमाम शाफई और हज़रत इमाम मालिक भी हैं, जबकि दूसरी जमाअत की राय है कि क़ुरान करीम पढ़ने का सवाब मैयित को पहुंचता है, उन उलमा व फुकहा में से हज़रत इमाम अबू हनीफा, हज़रत इमाम अहमद बिन हम्बल इसके अलावा हज़रत इमाम शाफई और हज़रत इमाम मालिक के बहुत से शागिर्द भी हैं।

अल्लामा क़ुर्तुबी ने अपनी किताब तज़केरा-फी-अहवालिल मौता में लिखा है कि इस बाब में असल सदका है जिसमें किसी का कोई इखतिलाफ नहीं है तो जिस तरह से सदका का सवाब मैयित को पहुंचता है, क़ुरान करीम पढ़ने, दुआ और इस्तिगफार का सवाब भी मैयित को पहुंचेगा क्योंकि यह भी सदकात ही में हैं और जिन हज़रात ने इमाम शाफई के मुतअल्लिक गुमान किया है कि वह मैयित पर क़ुरान करीम पढ़ने को नाजाएज़ करार देते हैं, वह गलत है। क्योंकि सिर्फ इखतिलाफ इसमें है कि इसका सवाब मैयित को पहुंचता है या नहीं। इमाम शाफई और दूसरे जमहूर उलमा इस बात पर मुत्तफिक हैं कि क़ुरान करीम पढ़ने का सवाब मैयित को पहुंचेगा अगर पढ़ने वाला अल्लाह तआला से पहुंचने की दुआ करता है और जिन हज़रात ने कहा कि क़ुरान करीम पढ़ने का सवाब नहीं पहुंचता तो यह उस वक्त है जबकि पढ़ने वाला अल्लाह तआला से पहुंचने की दुआ न करे, (तज़केरा फी अहवालिल मौता लिलक़ुर्तुबी)। गरज़ ये कि अल्लामा क़ुर्तुबी की तहक़ीक़ के मुताबिक अक्सर उलमा की राय में क़ुरान करीम पढ़ने का सवाब मैयित को पहुंचता है।

इस मौज़ू से मुतअल्लिक चंद अहादीस शरीफ
हज़रत आइशा, हज़रत अबू हुरैरा, हज़रत जाबिर, हज़रत अबू राफे, हज़रत अबू तलहा अंसारी और हज़रत हुज़ैफा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) की मुत्तफिका रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दो मेंढे़ क़ुर्बान किए। एक अपनी तरफ से और दूसरा उम्मत की तरफ से, (बुखारी, मुस्लिम, मुसनद अहमद, इब्ने माजा, तबरानी, मुसतदरक और इब्ने अबी शैबा)। उम्मते मुस्लिमा का इत्तिफाक है कि क़ुर्बानी का सवाब मुर्दों और ज़िन्दों को भी पहुंचता है।

एक शख्स ने रसूलुल्लाह सल्लाहु अलैहि वसल्लम से अर्ज़ किया कि मेरी माँ का अचानक इंतिकाल हो गया है। मेरा ख्याल है कि अगर उन्हें बात करने का मौक़ा मिलता तो वह जरूर सदक़ा करने के लिए कहतीं। अब अगर मैं उनकी तरफ से सदका करूं तो क्या उनके लिए सवाब है? अल्लाह के रसूल ने फरमाया हाँ! (बुखारी, मुस्लिम, मुसनद अहमद, अबू दाऊद और नसई)। उम्मते मुस्लिमा का इत्तिफाक है कि सवाब जिन्दा और मुर्दा दोनों को भी पहुंचता है।

हज़रत साद बिन ओबादा (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा कि मेरी माँ का इंतिकाल हो गया है। क्या मैं उन की तरफ से सदका करू? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया हाँ! (मुसनद अहमद, अबू दाऊद, इब्ने माजा और नसई)। इसी मज़मून की दूसरी रिवायत हज़रत आइशा, हज़रत अबू हुरैरा और हज़रत अबदुल्लाह बिन अब्बास से बुखारी, मुस्लिम, नसई, तिर्मीजी, अबूदाऊद और इब्ने माजा वगैरह में मौजूद हैं जिनमें रसूल्लुल्लाह सल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मैयित की तरफ से सदका करने की इजाज़त दी है और उसे मैयित के लिए नाफे बताया है।

हज़रत अबदुल्लाह बिन उमर बिन अलआस (रज़ियल्लाहु अन्हु) की रिवायत है कि उनके दादा आस इब्ने वाइल ने ज़माना जाहिलियत में सौ ऊंट ज़िबह करने की नज़र मानी थी, उनके चाचा हिशाम इब्ने आस ने अपने हिस्से के पचास ऊंट ज़िबह कर दिए। हज़रत उमर बिन आस ने अल्लाह के रसूल से पूछा कि मैं क्या करूं। अल्लाह के रसूल ने इरशाद फरमाया कि अगर तुम्हारे बाप ने तौहीद का इक़रार कर लिया था तो तुम उनकी तरफ से रोज़ा रखो या सदक़ा करो, वह उनके लिए फायदेमंद होगा। (मुसनद अहमद)
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बयान फरमाया “जब किसी आदमी का इंतिकाल हो जाए तो उसको दफन करने में जल्दी करो, उसके सरहाने की तरफ सूरह फातिहा और पैरों की तरफ सूरह अलबक़रा का आखिर पढ़ो।” अल्लामा हाफिज़ इब्ने हजर ने बुखारी शरीफ की शरह में लिखा है कि यह हदीस तबरानी ने सही (हसन) सनद के साथ ज़िक्र किया है।

सहाबा-ए-कराम से भी नबी अकरम सल्लाहु अलैहि वसल्लम के बयान किये हुए फरमान पर अमल करना साबित है, जैसा कि इमाम बैहकी (रहमतुल्लाह अलैह) ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर से मुर्दे के सरहाने की तरफ सूरह फातिहा और पैरों की तरफ सूरह अलबक़रा का आखिरी रुकू पढ़ने का अमल ज़िक्र किया है। मुस्लिम की मशहूर शरह लिखने वाले इमाम नव्वी ने इस हदीस को सही करार दिया है। (अल अज़कार)

रसूलुल्लाह सल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बयान फरमाया ‘‘सूरह यासीन क़ुरान करीम का दिल है, जो आदमी भी अल्लाह तआला का कुर्ब और आखिरत में भलाई हासिल करने की ग़रज़ से उसे पढ़ेगा वह उसको हासिल होगी, और इस सूरह को अपने मुर्दों पर पढ़ा करो।” (मुसनद अहमद, इब्ने अबी शैबा, अबू दाऊद, इब्ने माजा, सही इब्ने हब्बान, सुनन बैहकी, नसई)। मुहद्देसीन की एक जमाअत ने इस हदीस को सही करार दिया, उलमा कराम की एक बड़ी जमाअत ने इसी और दूसरे अहादीस की बुनियाद पर क़ुरान करीम पढ़ने को जाएज़ कहा है, जबकि दूसरे मुहद्देसीन ने इस हदीस को कमज़ोर कहा है लेकिन मुहद्देसीन का उसूल है कि फजाइल के बारे में कमज़ोर हदीस पर भी अमल किया जा सकता है जैसा कि इमाम नव्वी (रहमतुल्लाह अलैह) ने जमहूर उलमा के कौल को लिखा है।

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बयान किया कि ‘‘कोई आदमी मरने की हालत में हो और उसके पास सूरह यासीन पढ़ी जाए तो अल्लाह तआला उस पर मौत की हालत को आसान फरमा देता है।” (मुसनद दैलमी, नैलुलअवतार शरह मुसकीयुल अख्बार मिन अहादीसिल अख्यिार लिलकाज़ी अलशौकानी)

हज़रत अनस (रज़ियल्लाहु अन्हु) से मरफुअन रिवायत है कि ‘‘अगर कोई कब्रस्तिान में सूरह यासीन पढ़ता है तो अल्लाह तआला इस कब्रस्तिान के मुर्दों से अज़ाब कब्र को कम कर देता है।” शैख अब्दुल अज़ीज़ (रहमतुल्लाह अलैह) ने इसकी तखरीज की है, इस हदीस को इमाम मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब (रहमतुल्लाह अलैह) ने अपनी किताब अहकामे तमनीयूल मौत में, इमाम हाफिज़ अज़ैलई (रहमतुल्लाह अलैह) ने कंज़ुद्दकाइक की शरह में और इमाम इब्ने कुदामा हम्बली (रहमतुल्लाह अलैह) ने अपनी किताब अलमुगनी, किताबुल जानाइज़ में लिखा है। इमाम इब्ने कुदामा हम्बली (रहमतुल्लाह अलैह) ने अपनी इस मशहूर किताब अलमुगनी, किताबुल जनाइज़ में एक और हदीस लिखा है कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बयान फरमाया ‘‘जिस किसी ने अपने माँ, बाप या उनमें से किसी एक की कब्र पर सूरह यासीन पढ़ी तो मुर्दों की मगफिरत कर दी जाती है।”
मशहुर व मारूफ मुहद्दीस हज़रत अबू मुगीरा (रहमतुल्लाह अलैह) कहते हैं कि हज़रत सफवान (रहमतुल्लाह अलैह) ने बयान किया कि मशाइख कहा करते थे कि अगर मुर्दा पर सूरह यासीन पढ़ी जाती है तो उसकी बरकत से उसके साथ आसानी का मामला किया जाता है। (मुसनद अहमद) इमाम अहमद इब्ने हम्बल (रहमतुल्लाह अलैह) ने हज़रत अबू मुगीरा (रहमतुल्लाह अलैह) से बहुत सी अहादीस नकल की हैं। शैख मुहिब्बुद्दीन अलतबरी और अल्लामा अलशौकानी ने बयान किया है कि इससे मरने के बाद किसी की कब्र पर सूरह यासीन पढ़ना मुराद है।

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि ‘‘जिस आदमी का कब्रिस्तान पर गुजर हो और वह ग्यारह बार ‘‘कुल हुवल्लाहु अहद” पढ़कर उसका सवाब मरने वालों को बख़्श दे तो पढ़ने वाले को मुर्दों की तादाद के बराबर सवाब मिलेगा।” (दारे क़ुतनी)

अल्लाह के रसूल सल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि ‘‘जो शख्स कब्रिस्तान में दाखिल होकर सूरह फातिहा ‘‘कुल हुवल्लाहु अहद” और ‘‘अलहाकोमुत्तकासूर‘‘ पढ़े फिर कहे मैंने जो पढ़ा है उसका सवाब उन हज़रात को पहुंचाया जो इस कब्रिस्तान में दफन हैं तो वह कल क़यामत के दिन उस शख्स के लिए अल्लाह तआला से शिफाअत करेंगे।‘‘ (दारे क़ुतनी)

हज़रत अब्दुर रहमान बिन अल ऊला (रहमतुल्लाह अलैह) अपने वालिद से रिवायत करते हैं कि उनके वालिद ने फरमाया कि जब मैं मर जाऊं तो बिसम्मिल्लाह व अला सुनन्ते रसूलिल्लाह कह कर लहद वाली कब्र में दफन कर देना और मेरे सरहाने सूरह फातिहा पढ़ना, इसलिए कि मैंने हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) को इस तरह फरमाते सुना है। (अखरजहुल खिलाल फील जामे, किताबुल किरात इंदल कबूर)

अल्लामा हाफिज़ इब्ने क़य्यिम (रहमतुल्लाह अलैह) ने इस हदीस को अपनी किताब ‘‘अररूह” में ज़िक्र किया है और उन्होंने लिखा है कि सलफे सालेहीन की एक जमाअत ने किताबों में लिखा है कि उन्होंने वसीयत की कि दफन के वक्त उनकी कब्र पर क़ुरान करीम पढ़ा जाए।
एक शख्स ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कहा कि मैं अपने माँ बाप की खिदमत उनकी जिंदगी में तो करता रहा लेकिन उनके इंतिकाल के बाद कैसे खिदमत करूंगा? अल्लाह के रसूल ने इरशाद फरमाया कि उनके साथ नेकी यह है कि अपनी नमाज़ के साथ उनके लिए भी नमाज़ पढ़ो और अपने रोज़ा के साथ उनके लिए भी रोज़ा रखो। (दारे क़ुतनी)

अल्लामा हाफिज़ अलजैली (रहमतुल्लाह अलैह) ने अपनी किताब ‘‘शरह कंजुद्दकाएक” में इमाम इब्ने अलहुमाम ने ‘‘फतहुल कदीर” में और शैख मोहम्मद अल अरबी इब्ने अत्तेबानी अलमालकी अलमगरबी (रहमतुल्लाह अलैह) ने अपनी किताब ‘‘इसआफुल मुस्लेमीन वलमुस्लेमात बेजवाज़ व वसुल सवाबेहल अमवात” में इस हदीस को ज़िक्र किया है।
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि माँ बाप के साथ नेकी यह है कि अपनी नमाज़ के साथ उनके लिए नमाज़ पढ़ो, अपने रोज़ा के साथ उनके लिए भी रोज़ा रखो, अपने सदका के साथ उनके लिए भी सदका करो। (अलमुसन्निफ लिलशैख इब्ने अबी शैबा) और इमाम मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब (रहमतुल्लाह अलैह) ने इस हदीस को अपनी किताब ‘‘अहकामे तमनेयिल मौत” में ज़िक्र किया है।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रजी़ अल्लाहु अन्हु) की रिवायत है कि कबीला खश्म की एक औरत ने अल्लाह के रसूल से पूछा कि मेरे बाप पर हज ऐसी हालत पर फ़र्ज़ हुआ कि वह बहुत बुढ़े हो चुके हैं, ऊंट की पीठ पर बैठ भी नहीं सकते हैं, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि तुम उनकी तरफ से हज अदा करो। (बुखारी, मुस्लिम, मुसनद अहमद, तिर्मीज़ी, नसई)

हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर (रज़ियल्लाहु अन्हु) कबीला खश्म ही के एक मर्द का ज़िक्र करते हैं कि उन्होंने अपने बुढ़े बाप के बारे में यही सवाल किया था। अल्लाह के रसूल ने फरमाया तुम्हारा क्या ख्याल है कि अगर तुम्हारे बाप पर कर्ज हो और तुम उसको अदा कर दो तो वह उनकी तरफ से अदा हो जाएगा? उस शख्स ने कहा जी हाँ! तो अल्लाह के रसूल ने इरशाद फरमाया बस इसी तरह तुम उनकी तरफ से हज अदा करो। (मुसनद अहमद, नसई)

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि कबीला जोहैना की एक औरत ने नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सवाल किया कि मेरी माँ ने हज करने की नज़र मानी थी मगर वह उससे पहले ही मर गईं। अब क्या मैं उनकी तरफ से हज अदा कर सकती हूँ? अल्लाह के रसूल ने इरशाद फरमाया तेरी माँ पर अगर कर्ज होता तो किया तुम उसको अदा नहीं करती, इसी तरह तुम लोग अल्लाह का हक भी अदा करो और अल्लाह इसका ज्यादा मुस्तहिक है कि उसके साथ किए हुए अहद पूरे किए जाऐं। (बुखारी, नसई)

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि कबीला जोहैना की एक औरत ने नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सवाल किया कि मेरी माँ ने रोज़ा की नज़र मानी थी मगर वह उससे पूरी किए बेगैर मर गईं। तो क्या मैं उनकी तरफ से रोज़ा रख सकती हूँ? अल्लाह के रसूल ने इरशाद फरमाया उनकी तरफ से रोज़ा रख लो। (बुखारी, मुस्लिम, मुसनद अहमद, नसई)

हज़रत बरीदा (रज़ियल्लाहु अन्हु) की एक रिवायत है कि एक औरत ने अल्लाह के रसूल से अपनी माँ के मुतअल्लिक पूछा कि उनके जि़म्मे एक महीने (या दूसरी रिवायत के मुताबिक दो महीने) के रोज़े थे, क्या मैं यह रोज़े अदा कर दूँ? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनको इजाज़त दी। (मुस्लिम, मुसनद अहमद, तिर्मीज़ी, अबू दाऊद)

हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) फरमाती हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया ‘‘जो शख्स इंतिकाल कर जाए और उसके जि़म्मे कुछ रोज़े हों तो उसकी तरफ से उसका वली रोज़ा रख ले।” (बुखारी, मुस्लिम, मुसनद अहमद)

(वज़ाहत) इन अहादीस में दूसरों की तरफ से नमाज़ और रोज़ा रखने का जो ज़िक्र आया है, उनसे नफली या नज़र की नमाज़ और रोज़ा मुराद हैं। क्योंकि दूसरे अहादीस में फ़र्ज़ नमाज़ या रमज़ान के रोज़े के मुतअल्लिक वाज़े हुकुम मौजूद है कि वह दूसरों की तरफ से अदा नहीं किए जा सकते हैं बल्कि उसके लिए फिदया ही अदा करना होगा।

रसूलूल्लाह सल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि घर वालों के मुर्दा पर (बुलंद आवाज़ के साथ) रोने की वजह से मुर्दा को अज़ाब दिया जाता है। (बुखारी व मुस्लिम) जिन उलमा व फुकहा की राय में क़ुरान करीम पढ़ने का सवाब मुर्दा को नहीं पहुंचता है वह आमतौर पर दो दलाइल बयान करते हैं।
‘‘कोई बोझ उठाने वाला किसी दूसरे का बोझ नहीं उठाएगा, आदमी को वही मिलता है जो उसने कमाया।” (सूरह अन नजम 38, 39)

अगर इस आयत के अमूम से क़ुरान करीम पढ़ने का सवाब मुर्दा को नहीं पहुंच सकता तो फिर इसाल सवाब, क़ुर्बानी और हज्जे बदल वगैरह करना सब नाजाइज़ हो जाऐंगे बल्कि दूसरे के हक में दुआए इस्तिगफार यहां तक कि नमाज़े जनाज़ा भी बेमाना हो जाएंगी क्योंकि यह आमाल भी उस शख्स का अपना अमल नहीं है जिसके हक मे दुआ की जा रही है। बल्कि इससे मुराद यह है कि अमुमी तौर पर हर शख्स अपने ही अमल का बदला पाएगा। लेकिन बाप, बीवी या किसी करीबी रिशतेदार के इंतिकाल के बाद अगर कोई शख्स उनके जनाज़ा की नमाज़ पढ़ता है या उनके लिए मगफिरत की दुआ करता है या उनकी तरफ से हज या उमरा करता है या क़ुर्बानी करता है या सदका करता है या अल्लाह तआला के पाक कलाम की तिलावत करके उसका सवाब मुर्दे को पहुंचाता है तो अल्लाह तआला इस अमल को कबूल फरमा कर मुर्दे को इसका सवाब अता फरमाएगा इंशाअल्लाह, चाहे मुर्दा गुनहगार ही क्यों न हो, लेकिन अगर अल्लाह तआला के हुकुम से मुर्दा को सवाब नहीं मिला तो इंशाअल्लाह आमाल करने वाले की तरफ इसका अजर पलट कर आएगा, जिस तरह मनीआर्डर अगर पाने वाले को नहीं मिलता है तो भेजने वाले को वापस मिल जाता है।

रसूलूल्लाह सल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि इंसान के इंतिकाल के बाद उसके अमल का सिलसिला खत्म हो जाता है मगर तीन अमल सदक़ा जारिया, ऐसा इल्म जिससे लोग फायदा उठाएं और नेक लड़के की दुआ जो वह अपने वालिद के लिए करे। (इब्ने माजा, इब्ने ख़ुज़ैमा)

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का यह इरशाद सिर्फ उन मज़कूरा तीन आमाल की खास अहमियत को बतलाने के लिए है, अगर इस हदीस को आम रखा जाए तो बेटे की माँ के लिए या भाई की बहन के लिए या किसी शख्स की अपने मुतअल्लिकीन और रिशतेदारों के लिए दुआ, इस्तिगफार और जनाज़ा की नमाज़ सब बेमानी हो जाऐंगी। रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इरशादात में इस तरह की बहुत सी मिसालें मिलती हैं, जैसे नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि जिसने फजर और असर की नमाज़ पाबंदी के साथ अदा करली तो वह जन्नत में दाखिल हो गया। (बुखारी व मुस्लिम) इस हदीस का मतलब यह नहीं है कि हम सिर्फ इन दो वक्तों की नमाज़ की पाबंदी करलें बाकी जो चाहे करें हमारा जन्नत में दाखिला यकीनी है। नहीं, हरगिज़ ऐसा नहीं है बल्कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का यह इरशाद इन दो नमाज़ों की खास अहमियत को बतलाने के लिए है क्योंकि जो इन दो नमाज़ों की पाबंदी करेगा वह जरूर दूसरे नमाज़ों का भी इहतिमाम करने वाला होगा और नमाज़ों का वाकई इहतिमाम करने वाला दूसरे अरकान की अदाएगी करने वाला भी होगा, इंशाअल्लाह। इसी तरह इस हदीस में इन तीन आमाल की सिर्फ खास अहमियत बतलाई गई है।

(खुलासा) जैसा कि इब्तिदा में लिखा गया है कि शरीअते इस्लामिया का वाज़ेह हुकुम मौजूद होने की वजह से रोज़मर्रा के 80 फीसद प्रैक्टिकल मसाइल में उम्मत मुस्लिमा मुत्तफिक है, जिसमें किसी तरह का कोई इशकाल ही नहीं है, लेकिन बाज़ बाला असबाब की वजह से रोज़मर्रा के 20 फीसद प्रैक्टिकल मसाइल में जमाना कदीम से इखतिलाफ चला आ रहा है, जिनका आज तक कोई हल नहीं हुआ और न ही हल की बजाहिर कोई खास उम्मीद है और न ही हमें इन मुखतलफ फीह मसाइल को हल करने का मुकल्लफ बनाया गया है। इस का हल कल क़यामत के रोज़ ही होगा जैसा कि अरब के मशहूर अलिमे दीन शैख डाक्टर आइज़ अलकरनी ने हिन्दुस्तान के हालिया सफर के दौरान अपनी तकरीर के दौरान फरमाया था।

लिहाज़ा हमें इखतियार है कि हम जिन उलमा के साथ अकीदत रखते हैं या जिन से क़ुरान व हदीस का इल्म हासिल करते हैं उन्हीं उलमा की सरपरस्ती में उन 20 फीसद मसाइल पर दूसरी राय का इहतिराम करते हुए अमल करें। मगर यह कि दूसरी राय शरीअते इस्लामिया के वाज़ेह अहकामात के खिलाफ हो।

इन्हीं मुखतलफ फीह मसाइल में क़ुरान करीम पढ़ने का सवाब मुर्दे को पहुंचने का मसअला है। उलमा और फुकहा की एक जमाअत की राय है कि क़ुरान करीम पढ़ने का सवाब मुर्दों को नहीं पहुंचता। जबकि दूसरी जमाअत की राय है कि हज, ज़कात, कूर्बानी और सदकात की तरह क़ुरान करीम पढ़ने का सवाब भी मुर्दों को पहुंचता है, इन उलमा व फुकहा में से हज़रत इमाम अबू हनीफा और हज़रत इमाम अहमद बिन हम्बल हैं। हज़रत इमाम शाफई और हज़रत इमाम मालिक के बाज़ असहाब की राय भी यही है कि मुर्दों को क़ुरान करीम पढ़ने का सवाब पहुंचता है। जैसा के इमाम नववी ने अपनी किताबुल अज़कार और इमाम सियुती ने अपनी किताब शरहुस्सदर में लिखा है। इमाम हाफिज़ काज़ी अलकुजा़ तकीयुद्दीन अस्सबकी अशशाफई ने अपनी किताब ‘‘कज़ाउल अरब फी असएला हल्ब” में क़ुरान करीम पढ़ने के सवाब को मुर्दा के लिए हिबा करने को जाएज़ करार दिया है।

अल्लामा इब्ने तैमिया ने भी क़ुरान करीम के सवाब मुर्दा के लिए हिबा करने को जाएज़ करार दिया है (मजमूआ फतावा इब्ने तैमिया जिल्द 24)। इमाम अहमद बिन हम्बल (रहमतुल्लाह अलैह) के शागिर्द इमाम अबू बकर अलमरूज़ी (रहमतुल्लाह अलैह) ने कहा है कि मैंने इमाम अहमद बिन हम्बल से सुना है कि जब तुम कब्रस्तिान में दाखिल हो तो आयतल कुर्सी फिर तीन बार ‘‘कुल हुवल्लाहु अहद” पढ़ो। इसके बाद कहो कि या अल्लाह इसका सवाब कब्रस्तिान वालों को पहुंचा। (अलमकसदुल अरशद फी असहाबिल इमाम अहमद)

सऊदी अरब की मजिलस कज़ाए आला के साबिक सदर शैख अब्दुल्लाह बिन हमीद ने इस मौजु पर 16 सफहात पर मुशतमिल एक किताबचा लिखा है जिसमें उलमा के अकवाल दलाइल के साथ तहरीर फरमाए हैं कि अक्सर उलमा की राय यही है कि क़ुरान करीम पढ़ने का सवाब मुर्दा को पहुंचाया जा सकता है।

क्योंकि अहादीस से माली और बदनी इबादात में नयाबत का वाज़ेह सबूत मिलता है, जिस पर सारी उम्मते मुस्लिमा मुत्तफिक है। रही खालिस बदनी इबादत तो बहुत से अहादीस से इस में भी नयाबत का जवाज़ साबित होता है। नेकियों की बाज़ अकसाम को मुस्तसना करने की कोई माक़ूल वजह समझ में नहीं आती है। और क़ुरान व हदीस में किसी भी जगह क़ुरान करीम की तिलावत करके मुर्दे को इसका सवाब पहुंचाने से मना नहीं किया गया है। जिस तरह आदमी मज़दूरी करके मालिक से यह कह सकता है कि उसकी उजरत मेरे बजाए फलां शख्स को दे दो, इसी तरह वह कोई नेक अमल करके अल्लाह तआला से यह दुआ भी कर सकता है कि इसका अजर मेरी तरफ से फलां शख्स को अता कर दिया जाए। लिहाज़ा हमें क़ुरान करीम की तिलावत करके अपने मुर्दों को इसका सवाब पहुंचाना चाहिए लेकिन उसके लिए किसी वक्त की तायीन करना गलत है बल्कि जब भी मौक़ा मिले और जितनी तौफीक हो क़ुरान करीम की तिलावत फरमाएं और मुर्दे को इसका सवाब पहुंचाएं और इसके लिए दुआए मगफिरत फरमाएं।
वल्लाहु आलम बिस्सवाब
मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)